ज़ाराये इत्तेला सहाफी जुबेर
हैदराबाद निज़ाम स्टेट बा तारिख ०५ दिसम्बर वक़्त शाम ०६.०७ निज़ाम स्टैंडर्ड टाइम
नाज़रीन, माज़ी के निज़ाम और मौजूदा निज़ाम इन दोनों शख़्सियत में ज़मीन आस्मां का फ़र्क़ है। मौजूदा दौर के नवाब हैदराबाद ओवेसी ब्रादरान एक तालीमी आफ़ता अक़लमंद, दनिशमन सयासतदान हैं। माज़ी के नवाब सिर्फ और सिर्फ ऐश इशरत की ज़िन्दगी बसर करने वाले वोह हाकिम थे, जिनको कभी गले लगा कर ग़द्दारी कर के साजिश के तहत क़तल किया गया था। रात की तारीकी में जब निज़ाम उस दौर के सबसे बड़े गद्दार और आज के दौर की बीजेपी (भारतीय जनखा पार्टी) जैसे तंज़ीम कांग्रेस के वज़ीरे दाख़ला और नायब वज़ीरे आज़म पटेल के हरम में मौजूद थे तब खुफिया तोर से भारतीय घुस्पैठिए (फौज) को भेज कर हैदरबाद पर हमला कर दिया। और फिर अवाम की गर्दन काट काट कर कुव्वे, बावड़ियां खून से सुर्ख कर दी। भारतीय फौजों और घुसपैठियों ने जो दहशत और ज़ुल्म किया है वोह तारिख के सफों में स्याह अलफ़ाज़ में दर्ज है। एक हस्ते खेलते खुशहाल और उस दौर में भारत से ज़्यादा अमीर मुल्क निज़ाम को जंग की अज़ीयत से तबाह और बर्बाद कर दिया था। उस दौर में निज़ाम एस्टेट का नाम दुनियां के अमीर तरीन मुल्कों की फेहरिस्त में शुमार होता था।
उस दौर के निज़ाम के साथ गले लग कर गर्दन क़लम हो चुकी थी, धोखा हो चूका था साजिश हो चुकी थी, ग़द्दारी की जा चुकी थी तो आज के दौर के नवाब उस ही ज़हरीली सोच, नस्ल और साजिश से बा खूबी वाक़िफ़ थे। क्योंकि बादशाहों को अगरचे फरामोश भी कर दिया जाए तो आज़ाद भारत में भी तारिख ने जो ज़ख़्म उनके आबो अजदाद को दिए थे उससे मौजूदा जदीद नवाबों ने इबरत हासिल की और बोहोत ही मोहताद तरीके से जंग लड़ी और हिजड़ों की फौज को ज़बरदस्त शाकिस्त हुई। इस जंग में ज़ाफ़रानी हिजड़ों की बड़ी तादात में हलाकत हुई। और निज़ाम का क़िला फतह करने से हिजड़े क़ासिर रहे। अलबत्ता उन्होंने अपने ही जैसे तंजीम के बड़े पैमाने पर फौजी मार डाले और नतीजा सिफर। गद्दी पर अब बैठेगा कौन। मेयर होगा या तो मजलिस का या टी आर अस का। हिजड़े तो दूर दूर तक नहीं हैं।
इसको कहतें हैं जो जंग जीत के भी हार गए, जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी उर्दू नज़मों में जुलाई या अगस्त २०२० में किया है। हाथ क्या लगा हिजड़ों के सिर्फ दो हाथ वोह भी बजाने के लिए। अब एवान में ऐसे ही हिजड़ों को गाना पड़ेगें। "सज रही गली मेरी अम्मा सुनहरी गोटे में"। दूसरा "रंग बरसे भीगे चुनवाली रंग बरसे"।
अब उनको हैदराबाद की तहज़ीब अच्छी तरह सीखना पड़ेगी और गाये की बरियानी भी खूब खानी होगी। यह तहज़ीब बदलने चले थे, कही ऐसा ना हो की इनको ही हैदराबाद की बोली, तहज़ीब, खाना, क़ुरान, हदीस और इस्लाम सीख कर हैदराबाद की तहज़ीब इख़्तेयार करना पड़े। फिर कहीं से कोई उठ कर यह ना बोल दे की यह तो डेमोक्रैटिक जिहाद है। क्योंकि मजलिस के सरबराह ने कहा था की यह ज़ाफ़रानी सर्जिकल स्ट्राइक की बात करते हैं इनको अवाम डेमोक्रेटिक स्ट्राइक कर के जवाब देगा। तो हर उस मुद्दे को यह ख़ौफ़ ज़दा हिजड़े जिहाद से जोड़ देतें हैं जिससे इनकी पुंगी बजने वाली होती है।
यह तो बारिश है इल्म, फलसफे, नूर, रेहमत की बारिश और जब बारिश होती है तो हर वोह इंसान उसमे सराबोर होता है भीगता है जो इसके ज़ेरे साये होता है। और जहाँ ओवेसी ब्रादरान जैसे मुजाहिद और रूहानी वली मौजूद होंगे, क्या पता वहां एक ज़ाफ़रानी पर तो क्या तमाम ज़ाफ़रानियों पर कैफियत तारी होगी और वोह गुलामी में दाखिल होंगे। और वोह गुलामी ओवेसी घराने के तुफैल निजामुद्दीन, गरीब नवाज़, ग़ौसुल आज़म होते हुए नबी सल्लम तक पहुंचेगी।
रौशन चिराग़ की कैफियत भी वही है, जो इंसान जितना बड़ा इस्लाम, मुजाहिदों, रूहानी शख़्सियतों का दुश्मन होता है वोह उतना ही बड़ा फ़क़ीह और इस्लाम पर मर मिटने वाला बनता है। इस्लाम में नबी सल्लम से बुग्ज़ रखने वाले उनको शहीद करने वाले सुराक़ा इब्ने मालिक, उमरे फ़ारूक़ रज़े अल्लाह ऐसे अरबी थे जो आप सल्लम को शहीद करने पहुंचे थे। उसके बाद जब आप सल्लम के मोजज़ात आप हज़रात पर ज़ाहिर हुए तो एक कैफ़ियत तारी हुई और रोम रोम ख़ुदा ऐ ज़ुलजलाल के गज़ब से ख़ौफ़ज़दा हो गया। फिर जो अश्कों की बारिश हुई और अपने गुनाहों पर पशेमानी के तमाम पिछले गुनाह धो दिए गए। आ गए ग़ुलामी में लेकिन उस ग़ुलामी में भी बने वक़्त के बेहतरीन ख़लीफ़ा और बादशाह। तारीख शाहिद है।
No comments:
Post a Comment