Tuesday, 26 March 2019

इस कारगरदेगी को क्या समझे ये सहाफी......

अज़ीज़ नाज़रीन,

वतने अज़ीज़ में जो ख़ामोशी छाई हुई है, हर चेहरा मायूस हर सूरत उदास नज़र आती है.  इस ख़ामोशी को क्या समझा जाए तूफ़ान और तबाही आने से पहले की खामोशी या हालात साज़गार होने की पेशबंदी है.  हर नज़र उस मसीहा को तलाश रही है जिसकी जानिब उम्मीद की जा सकती है, के वो अच्छे दिन ले कर आएगा. 

पिछले कुछ महीनों से या यूं कह लीजिये दिसंबर २०१८ से इस सहाफी के इंग्लिश, उर्दू और हिंदी ब्लॉग के मज़मून में कुछ ख़ुसूसियाती हिस्से गायब कर दिए गए थे.  इसी हिसाब से फेसबुक और ट्वीटर से कुछ ख़ुसूसियाती हिस्से जून २०१४ के बाद से ही गायब हो गए थे.  इस ज़लील हरकत का सीधा सीधा ताल्लुक़ मोदी इंतेज़ामिया से था.  क्योंकि वो ख़ुसूसियात किसी भी मज़मून को मक़बूलियत फ़राहम करने में साज़गार थे.  इस सहाफी की तनक़ीदीया मज़ामीन उस मौजूदा दौरे हुकूमत के लिए होतें हैं जो इक़्तेदार में होती है, और २०१४ से सहाफत और सोशल मीडिया मोदी हुकूमत के ज़ेरे क़यादत काम कर रही है.  तो मोदी इंतेज़ामिया ये कैसे बर्दाश्त कर लेती के उसकी अक़लियतों, दलितों, ख्वातीनों और अवाम की फलाह-बहबूती की निस्बत से की हुई बदकारिओं और बदआमालियों का तज़किरा मन्ज़रे आम पे हो, तो वो सभी ख़ुसूसियाती हिस्से  इस सहाफी के ब्लॉग आर्टिकल्स, ट्वीटर और फेसबुक से गायब हो गए थे, जिसकी वजह से मोदी इंतेज़ामिया का बरहना कारोबार अवाम के रू बरू हो जाता था.

लेकिन आज सुब ये देख कर बड़ी हैरानी हुई की एक ख़ुसूसियात फिर से इस सहाफी के फेसबुक अकाउंट पे नज़र आ रहा है.  इस तरक़्क़ी से क्या तवक़्क़ो की जाए, क्या मोदी इंतेज़ामिया का बाजा बजने वाला है और नई हुकूमत के आने का इमकान है.  क्योंकि मोदी इंतेज़ामिया तो कोई भी सुहूलियत उन सहाफिओं को हरगिज़ हरगिज़ नहीं फ़राहम करेगी जो उसके खिलाफ लिखते हैं.  हालात साज़गार हो रहे हैं और सहाफत को आज़ादाना माहौल धीरे धीरे फ़राहम हो रहा है उसकी सिर्फ और सिर्फ दो ही वुजूहात इस सहाफी को समझ में आती है.  एक मोदी इंतेज़ामिया अपनी पकड़ कमज़ोर कर रही है जिसकी वजह से फेसबुक जैसे आलमी सोशल नेटवर्किंग साइट ने उनकी बात को मांनने से इंकार कर दिया.  दूसरी हुकूमत बदलने वाली है जिसकी वजह से कोताही की दुरुस्ती अपने आप होना शुरू हो गई है.

ख़ैर वजह चाहे कुछ भी हो अगरचे मोदी इंतेज़ामिया को अब अपनी ग़फ़लत का एहसास हो गया और वो सहाफत की आवाज़ को आला मुक़ाम पे पहुंचाने का नया अज़्म लेकर आई है या हुकूमत बदलने वाली है दोनों ही सूरतों में ख़ुदमुख़्तार सहाफिओं के लिए खुशखबर है और लंगूर-लँगूरनिओं के लिए बुरे दिन आने का इमकान है.


اس صحافی کی اردو جمع
  

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हिंदी रसम अल खत उर्दू अलफ़ाज़

Friday, 22 March 2019

जश्न मनाता हुआ हिन्दुस्तानी दहशतगर्द हिमायती गिरफ्तार

न्यू जीलैंड में हुए दहशतगर्द हमले पे जहाँ बेन अक़वामी मुमालिक तशवीश में और आलमी बरादरी ग़मगीन है वही हिन्दू अवाम हैं जो इस हमले पे जश्न मना रहे हैं.  इस मौज़ूं पे ये सहाफी भारत में जश्न मनाने पे पहले ही अपने खबरनामे में ये बात अवाम की तवज्जो पे ला चूका है.  बरहाल हुकूमते हिन्द ने तो ऐसे मवादी दहशतगर्द हिन्दू ज़ेहनियत पे कुछ खैरख्वाह अमल नहीं किया लेकिन UAE में एक भारतीय हिन्दू को ऐसा करते हुए गिरफ्तार किया गया है.  आलमी मिडिया की सुर्खिया जब ऐसी ना ज़ेबा खबर बनी तब मुस्लिम अवाम को सख्त तशवीश और अज़ीयत पहुंची और सख्त तरीन हैरानी हुई कि कैसे गांधी के वतन में ऐसे लोग भी हैं जो ऐसे निहायत शर्मनाक रद्दो अम्ल में शामिल हैं.
न्यू ज़ीलैंड में २ मस्जिदों में गुजिश्ता जुमे को हुए दहशतगर्दाना हमले में कमों बेश ५० अफ़राद शहीद गये थे. इस हमले पे जहाँ दुनिया भर में लोग दुः ख और रंजीदा हैं,  वहीँ गैर मोहज़्ज़िब, बे अदब, आदमख़ोर ना सिर्फ भारत में बल्कि बेरुन मुल्क कुछ हिन्दू हैं जो इस हमले पर इज़हारे ख़ुशी और जश्न मना रहे हैं.  बक़ौल बेन अक़वामी मीडिया एजेंसी ख़बरनामे के राइटर के भारत से दुबई में नौकरी करने गया रोनी सिंह ने सोशल मीडिया पर न्यू जीलैंड में हुए आतं’की हमले पर खुलेआम  जश्न मनाया.
रोनी सिंह का कमेंट वायरल होने के बाद मजमूई अरब अमीरात की कंपनी ने अपने मुलाज़िम रोनी सिंह को मुअत्तिल कर दिया और फ़ौरन  भारत वापिस भेजने का हुकुम जारी कर दिया है. बड़ी हैरानी की बात है रोनी सिंह खुद मोहाजिर है और न्यू जीलैंड के दहशतगर्द ने एलान कर्दा हमले की वजह भी बढ़ती हुई मोहाजिरों की तादात को बताया था.  उसमे उसने हमले में मोहाजिरों से सख़्त तरीन नफरत और आलूद को बखान भी किया था लेकिन रोनी सिंह को दहशतगर्द इस लिए एक मसीहा दिखा क्योंकि वो मुस्लिम अवाम से नफरत करता था.
न्यूजीलैंड में हुए मुसलमानों का इज्तेमाई क़त्ल का जश्न मानाने के इलज़ाम में कंपनी ने ये कदम उठाया है. मजमूई अरब अमीरात की कम्पनी ने अपने बयान में कहा है कि हमारे पास सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल करने वालों की कोई जगह नहीं है,और हम सिफर रवादारी (जीरो टोरलेंस) हिकमत को अपना रहे हैं और इस वजह से इस गुनहगार का एहदनामा फौरी तोर से ख़त्म कर दिया गया है.
मज़ीद तहक़ीक़ात के लिए मुताल्लिक़ आला ओहदेदारों को इस हिन्दू दहशतगर्द ज़ेहनियत को सुपुर्द कर दिया गया है. कंपनी के मनेजर ने दौरान गुफ्तगू मीडिया से खिताब करते हुए  बताया की मुलाज़िम को यूएई सरकार ने भी फौरी जलूतन करने का हुकुम दिया था. जलूतन करने के बाद रोनी सिंह को भारत को सुपुर्द कर दिया जायेगा.
اس صحافی کی اردو جمع

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हिंदी रसम अल खत उर्दू अलफ़ाज़

जश्न मनाता हुआ हिन्दुस्तानी दहशतगर्द हिमायती गिरफ्तार

Wednesday, 20 March 2019

में सहाफी; नहीं एक चौकीदार

अज़ीज़ नाज़रीन मौजूदा हुकूमते हिन्द के बादशाह सलामत के ऊपर ये सहाफी कई तन्ज़िया मज़मून लिख चूका है.  जिसमे ख़ास एक था राजा……. भाग - १ और एक था राजा……. भाग - २ शामिल हैं. 

इसको वक़्त का तकाज़ा कहेगे या मोदी जी और बीजेपी की मजबूरी के वज़ीरे आज़म जैसे अज़ीम शान ओहदे को चौकीदार से शबी दी जा रही है. इतना ज़लील आज़ादी के बाद भारत कभी भी नहीं हुआवज़ीरे आज़म चौकीदार, अदलिया असमत फरोश, सहाफत ज़ेहन फरोश, इंतेज़ामिया नाकारा निक्कम्मी और अवाम ग़ुलामअपनी ग़ुलामी का सबूत ना सिर्फ शरदकालूँ और नाबीना  शरदकालूँ देतें हैं बल्कि बा शऊर और होश मंद भी अपनी गुलामी का बा खूबी सबूत देतें हैंइस मौज़ू पे ये सहाफी क़ौमी इजलास जश्ने आज़ादी और योमे जमुहरिया की निस्बत से कई मज़मून कलमबन्द कर चूका हैजिसमे ख़ास है यौमे जमुहरिया और अवाम (हम).

इन्तेख़ाबात से कुछ अर्से क़ब्ल मोदी जी ने अपने नाम को तब्दील कर के प्रधान मंत्री की जगह चौकीदार नरेंद्र मोदी कर दियाफिर क्या था अकीदतमंदो और नाबीना अकीदतमंदो को ऐसा करना लाज़मी हो गयाजब मुल्क का वज़ीरे अज़ाम सबसे आला ओहदेदार एक चौकीदार बन रहा है तो तबीब (जर्राहा-डॉक्टर), इंजीनियर, बीटेक, ऍम टेक जैसे अला पेशेवर डिग्री किये हुए हज़रात भी अपने नाम के आगेमें चौकीदार डॉ.......” “में चौकीदार सिविल इंजीनियर........” वग़ैरा वग़ैरा लगा के फख्र महसूस करने लगे.    अब इस भेड़ चाल और अंध भक्ति को क्या कहेगें की उनको अपने ओहदे अपनी डिग्री की परवाह तो नहीं बल्कि वो मोदी भक्ति में इतने तल्लीन हो गए की उनको वतन की इज़्ज़त और अपनी डिग्री के रूतबे अपने ओहदे का भी एहतेराम ना रहा.   ऐसा कर के ना सिर्फ मोदी जी बल्कि तालीमी आफ़ता आला ओहदेदार वो अवाम जो "में भी चौकीदार" मोहिम का हिस्सा बन रहे हैं बेन अक़वामी मुमालिकों को इस बात का सबूत फ़राहम कर रहे हैं, की भारत में कितनी भी आला तालीम हासिल कर लो, कितने ही आला ओहदे पे फ़ाइज़ हो जाओ लेकिन ज़ेहनियत अदना ही रहेगी.  

इस रूहे ज़मीन के तमाम मुमालिकों में वतन अज़ीज़ एक ऐसा वाहिद मुल्क होगा जहाँ बेवकूफों  की कमी नहीं हैएक ढूंढ़ने चलो और हज़ारों की तादात में मिल जातें हैं.  ऐसा नहीं है की ये बेवकूफ अनपढ़ और जाहिल होते हैं बल्कि इनमे अवाम का वो हिस्सा भी शामिल है जो आला तालीमी आफ़ता, सियासत दान और मज़हबी रहनुमाओं की जमात से ताल्लुक रखता हैअब इन लोगो में या तो शऊर की कमी होती है या इनको डराया धमकाया जाता है या कभी इनको वतन की मोहब्बत के नाम पे इनका जज़्बाती इसतेसाल किया जाता है.

फरवरी महीने में पुलवामा हादसे के बाद अपनी तमाम कूव्वत और ताक़त बराये ताक़ रख कर लगे सब एक भेड़ चाल चलने की पाकिस्तान पे हमला कर दो.  जिसमे शामिल हैं आला सियासदान, मज़हबी रहनुमा और बिला शुबा गुलाम ज़ेहनियत भारतीय अवामपुलवामा हमला था या हादसा अभी ये साबित भी नहीं हुआ, फिर किस ने किया क्यों किया ये साबित भी नहीं हुआ था और तहक़ीक़ाति इदारे किसी नतीजे पे पहुंच पाते की लगे सभी जंग के मुवाफ़ेक़त में नारे लगाने.       ऐसी ही ज़ेहनियत का फायदा मोदी जैसे चालाक सियासतदां उठाते है और अवाम के गले में मुल्क की मोहब्बत के नाम पे गुलामी का पट्टा बाँदें रखते हैं.

ठीक है अगर हमारी फौज पे किसी बाहरी ताक़त ने हमला किया है तो उसको इस गलती का जवाब बिला शुबा दिया जाना चाहिए लेकिन अगर वही हमला मुल्क में बैठे अला ओहदेदारों ने किया है तो उनकी क्या सजा होना चाहिएपुलवामा हमले के बाद तमाम मुख़ालेफ़ीन एक सुर में हुकूमते हिन्द के साथ शाना बा शाना खड़े थे जिसमे वो मुस्लिम सियासतदां भी थे जो कभी हुकूमत से अपने सख्त तरीन तन्क़ीदी सवालात के लिए मशहूर थे लेकिन इस हमले पे शुबा हुकूमत पे करने के बजाये वो भी इस भेड़ चाल का हिस्सा बन गए और मोदी की बिछाई हुई सियासी बिसात पे शह खा गए

बी.बी.सी. हिंदी खबरनामे ने एक राये शुमारी की थी जिसमे अवाम से पुछा गया था मोदी का अपने नाम के आगे चौकीदार लगाना सही है क्याउसके ऊपर इस सहाफी ने पहले ही अपनी नाराज़गी ट्वीट कर के ज़ाहिर कर दी है.

Zuber Ahmed Khan Retweeted BBC News Hindi
निरही बिवकूफ़ी है अपनी इज़्ज़त अपने हाथ से गिराने की कवायत. उसमे अंध भक्त इंजीनियर, ऍम टेक्. बी टेक् अपने नाम के आगे चौकीदार लगा रहे हैं. और ये ही ही क़ुरआन का फरमान है अल्लाह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत. अब जिसकी किस्मत में ज़िल्लत लिख दी उसको इज़्ज़त नहीं मिले

 

                                              
BBC News HindiVerified account @BBCHindi
#KahaSuni | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपने नाम के साथ चौकीदार जोड़ा है...इसे आप कैसे देखते हैं?

मोदी जी का ऐसा करना एक दम अहमक़ाना क़दम है राये शुमारी को मुत्तासिर करने के लिए सियासत दान अपने अपने तरीके कार हिकमते अमली इख्तियार करते हैं लेकिन ऐसा पहली बार देखा गया है एक वज़ीरे अज़ामा अवाम की हमदर्दी हासिल करने के लिए इतनी पस्त ज़ेहनियत इख्तियार कर गिर कर अपने आपको अवाम के रू बरू पेश कर रहा हैये ही अगर पिछले पांच सालों में कुछ काम:-
१.           वतन की निस्बस्त से
२.          अवाम की फलाह और बहबूती की निस्बत से
३.           अक़लियतों की निस्बस्त से  
४.          ख़्वातीनों की निस्बस्त से  
५.          बेरोज़गार नौजवओं की निस्बत से  
६.          किसानों की निस्बत से  
७.          कीमतों में बे पनाह इज़ाफ़ा (मेहगाई ) कम करने की निस्बस्त से
८.          अमनो अमान कायम रखने की निस्बस्त से  
९.          बेन अक़वामी हालात साज़गार करने की निस्बत से
कुछ अच्छे इक़दाम उठाये होते तो जनवरी २०१९ से लेकर तो इन्तेख़ाबात आने तक अपने किये हुए कामों की फेहरिस्त गिनाते गिनाते भी वक़्त कम पड़ जाता लेकिन अच्छे कामों की फेहरिस्त ख़त्म ना होती फिर इस तरह से अवाम की हमदर्दी हासिल करने के लिए अपने आपको ज़लील और ख्वार भी नहीं करना पड़ता बल्कि हक़ से और आगे बढ़ के अवाम खुद ही इंतेखाबात में आपके हक़ में राये शुमारी करती.

जो मुख़ालेफ़ीन पुलवामा में हक़ीक़त सामने आये और उससे रू बरू हुए बिना एक नाबीना की तरह से हुकूमत के हक़ में यकजेहदी दिखा रहे थे “हम हुकूमते के किसी भी फैसले में साथ हैं”.  और जो चौकीदार मोहिम में दिखा रहे हैं “में भी चौकीदार”  अब इन जैसे लोगों को अक़लमंदो की जामत तस्सव्वुर किया जाए या बेवकूफों की क्योंकि इन्होने कुछ ना देखा और कुछ ना पाया बस मोदी की बनाई हुई राह पे मोदी के हम क़दम हो गए.
  
اس صحافی کی اردو جمع




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हिंदी रसम अल खत उर्दू अलफ़ाज़

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अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...