Tuesday, 30 August 2022

हिन्द की रूदाली गेंग का बेवा (विधवा) विलाप बंद हो।

नाज़रीने गिरामी,     

मालिके कायनात की लाठी बेआवाज़ है लेकिन जब पढ़ती है तो नाइंसाफों मुँह से हगने वालों क़ातिलों के या तो चूतड़ सुर्ख कर देती है या उसको हलाक कर देती हैं।  हिन्द में ऐसी ज़िंदा मिसालें "ऊपर वाले के यहाँ देर है लेकिन अंधेर नहीं" बोहोत सी देखने को मिल रहीं हैं।  ख़ास २०१४ के बाद से तो शिद्दत पसंद काफ़िरों, बीजेपी वालों, संघी दहशतगर्दों और ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर-लँगूरनियों को इतनी लाठियां पड़ी हैं की लँगूरनियाँ उस पिटाई की अज़ीयत और जलन के चलते बरहना (नंगी) घूम रहीं हैं।  और लंगूरों ने मुँह से खाने के बजाये हगने का आग़ाज़ किया है।  यह उनकी तकलीफ का सबूत है। 

अब सिलसिलेवार बताता हूँ जब जब इन लंगूर लँगूरनियों, बीजेपी वालों और शिद्दत पसंद काफ़िरों ने इस्लाम, मुसलमान, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान के बारे में ऊल जलूल बका कुछ ही अर्से के बाद उनके ऊपर वैसे ही हालात हो गए की तालिबान की हिमायत करने पर मजबूर हो गए।  ऐसी पड़ती है मालिके कायनात की लाठी की चूतड़ सूर्ख हो जातें हैं।  अब जर्राह के पास जा कर दिखा भी नहीं सकते। 

१.  नज़रिने गिरामी जिस तालिबान को ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ बदनाम करते थे रूढ़िवादी, धकियानूसी १४०० साल की परंपरा निभाने वाले आज उसी तालिबान की हिमायत और फलसफे को केरला के हिन्दू एझावा गुट बरादरी और बीजेपी के लिए नर्म रुख रखने वाले सियासत दान वेल्लापल्ली नतेसन ने स्कूल कॉलेजेस यूनिवर्सिटीज में तुलबात और तालिबे इल्मों के लिए मुख्तलिफ क्लास रूम की हिमायत की है।  वोह लड़के और लड़कियों के एक क्लास रूम में बैठ कर तालीम लेने के ख़िलाफ़ हैं।  उनके हिसाब से एक साथ बैठ कर तालीम लेने वाली तहज़ीब भारतीय सक़ाफत की ख़िलाफ़वर्ज़ी करती हैं।  यह तहज़ीब मग़रिबी और अमीरिकी है हमें उसका हिस्सा नहीं बनना चाहिए।  उन्होंने बरोज़ इतवार (Gender Neutral Policy) के लिए ख़िताब करते हुए एक सहाफी इजलास में हुकूमत से मुतालबा किया की स्कूल कॉलेज में मर्दों और ख़वातीनों के लिए मुख़तलिफ़ क्लास रूम का एहतेमाम किया जाए।    

अब चलिए बतातें हैं तब किया हुआ था जब तालिबान ने अवामी ज़राये आमदो रफ़्त, तालीमी इदारों, दफ्तरों में मस्तूरातों और मर्दों के लिए अलहदा इन्तेज़ामात किये थे।  तब लँगूरनियाँ बरहना हो गई थी और तालिबान को कोसने लगी थी।  यह तो क़दामतपसंदी सोच है, मस्तूरातों को दबाने की हिकमते अमली।  १४०० साल वाली क़दीमी मेरास है। हालांकि लँगूरनियों को उसी वक़्त अपने ब्लॉग मज़मून में धो डाला था। उनको मेने उसी वक़्त जूते मारे थे। अगर इतना ही बूरा लग रहा है तो बॉम्बे जैसे अज़ीम शहर में लेडी स्पेशल लोकल क्यों चल रही है। तुम भारत के लोग तो अपने आपको बोहोत ही जदीद और तालीमी आफ़ता बोलते हो। फिर हर बस में लेडी सीट क्यों चाहिए। ठीक है अभी बंद कर दो लेडी स्पेशल लोकल और हर लोकल में लेडीज डब्बा हटा दो फिर देखो हर लँगूरनी आग मूतेगी उनको महिला हमदर्दी दिखेगी।

२.          आज जो रूदाली गेंग अंकिता के क़ातिल के ऊपर बेवा रोना (विधवा विलाप) कर रही है और कड़ी सज़ा की मांग कर रहें हैं तो में कहना चाहता हूँ की अंकिता के क़ातिल को भी वैसी ही सज़ा मिले जैसी की बिल्क़ीस बानो के इज्तेमाई अस्मतदरी करने वालों, उसकी ३ साल की बेटी और एहले खाना के ७ अक़ारिबों को मौत के घाट उतारने वालों को मिली थी। अगर वोह तमाम हिन्दू दहशतगर्द संस्कारी थे और शाहरुख़ भाई भी संस्कारी हैं।  फिर अकेले शाहरुख ने एकेली लड़की को जलाया है वहीँ ११ हिन्दू दहशतगर्दों के जुर्म में ८ क़तल जिसमे ३ साला मासूम और ५ माह की हामेला के साथ इज्तेमाई अस्मतदरी शामिल है।  

३.        जब इमरान ख़ान अज़ीम इस्लामिक सल्तनत पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म मुंतखिब हुए थे और पहले हूकूमती दौरे पर अमेरिका गए थे।  तब लँगूरनियों ने उनके लिए अदना दर्जे की ख़बरों को शाया किया था।  यह वैसा ही था जैसा की हिन्द में असदुद्दीन को इंतेखाब से दूर रख कर ज़ाफ़रानी तंज़ीम को फायदा पहुंचाने के लिए लंगूर (राजदीप) और तमाम लँगूरनियाँ क़ौमी चैनल पर अदना दर्जे की ऐसे बदज़ुबानी बोलते थे (वोट कटुआ, फ़िरक़ापरस्त, कट्टरपंथी सोच) ताके वोह ज़लील हो कर इंतेखाब से बरतरफ़ हो जाएँ।  

फिर जब मोदी की ज़लालत बेरुन मुल्कों में होती है तब इन लंगूर और लँगूरनियों में ख़ामोशी छा जाती है। ज़ीरो बटे सन्नाटा।  जब जर्मनी में एक ख़ातून के पास घूस रहा था तब वहां के आला ओहदेदारों ने अपनी तरफ खींच लिया।  फ्रांस में कैमरे के सामने आना चाहता था तो फ्रांस के वज़ीरे आज़म उसके सामने आ गए और उसको पोशीदा कर लिया।  अभी दो माह क़ब्ल जापान में गया और जापान के वज़ीरे आज़म के साथ आ रहा था फिर बड़े ही गर्मजोशी से अमेरिकी सदर की जानिब हाथ बढ़ाया उन्होंने नज़र अंदाज़ कर दिया और जापानी सदर से हाथ मिलाया। 

फिर जहाँ तक वोट कटुआ का सवाल है उसके ऊपर लंगूर ख़ास राजदीप को पहले ही धो डाला है।  जब हैदराबाद और बिहार के इंतेखाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम को कुछ भी हाथ नहीं लगा।  और हैदराबाद में ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने वोट काटे केसीआर और बिहार में नितीश के।  रहा सवाल मजलिस का तो बिहार में ५ मुंतखिब हो कर आये थे और हैदराबाद में मेहफ़ूज़ रहा मजलिस का क़िला। 

तो बताने का मक़सद वही है हर उस मुद्दे पर जिसपर यह फ़िरक़ापरस्त, ज़हीरीली सोच, ज़ाफ़रानी शिद्दत और लंगूर-लँगूरनियाँ इस्लाम, मुसलमानों, तालिबान, पाकिस्तान, कश्मीर और मजलिस को झूठ फरेब के साथ बदनाम करते थे, मालिके मुतलक़ की लाठी ऐसी पड़ेगी की इनके चूतड़ या तो लाल हो जायेगें या फिर मुँह से हगने वाला ही हलाक हो जाएगा। 

जिस तरह से कोविद १९ के बाद हिजाब ना पहनने पर फाइन लगता था वैसे ही हिजाब की मवाफ़ेक़त में यह शिद्दत पसंद और ज़ाफ़रानी आयेगें।  हालात वैसे ही होंगें।  

Zuber

#JusticeForShahrukh  

Monday, 29 August 2022

आलमी कप में धोया एशिया कप में धूल गए।

See this After UAE now its turn for Pakistan to face the rage of Almighty. also. 

नाज़रीने गिरामी

आज का मौज़ूं एशिया कप में पाकिस्तानियों की धुलाई से मुत्तालिक़ है।  क्या वजह है माह क़ब्ल जिस पाकिस्तान की टीम ने भारत को आलमी कप में धोया था, वही पाकिस्तानी टीम महज़ माह में इतनी कमज़ोर हो गई की ताश के पत्तों की तरह पाश पाश हो गई।  नाज़रीन उसकी वजह है हाकिमे वक़्त का गद्दी नशीन होना।  जैसा आप हज़रात को इल्म होगा और हर मोमीन का यह तस्सव्वुर है की वाल्दैन की बदकारी का ज़वाल पूरे घर को अदा करना होता है और हाकिम अगर बदकार हो तो उसका ज़वाल पूरे मुल्क पर होता है।  

इमरान खान की क़ियादत में जिस पाकिस्तान की टीम से भारत की टीम ऐसी ख़ौफ़ज़दा होती थी की कई दफ़ा खेल के मैदान में नहीं आई थी।  यहाँ तक की भारत की सरज़मीन पर जब धोया था तब बायकाट पाक क्रिकेट की मोहीम का आगाज़ ज़ाफ़रानी ज़हर ने किया था।  यहाँ तक की वानखेड़े स्टेडिम का पिच खोद डाला गया था।  ताके पाक टीम यहाँ पर कर बॉम्बे को फ़तह ना कर ले और भारत के हाथ लगे ज़लालत और रूस्वाई। 

फिर जब इमरान खान ने टीम की क़ियादत से अलहदगी इख़्तेयार की और सियासत में शरीफ़ या भूट्टू ने इस्लामिक रियासत की क़ियादत संभाली तब फिर से हालात साज़गार होना शुरू हुए थे।  और गाहे बगाहे भारत और पाकिस्तान के दरमियान क्रिकेट खेली जाने लगी थी।  क्योंकि उन हाकिमों में उतनी रूहानी क़ुव्वत और ताक़त नहीं थी की भारत के शैतानी हमलों को रोक सके। 

फिर मुल्के हिन्द में हिटलर, जल्लाद, दरिंदा, क़ातिल, दहशतगर्द एक फिरोन की नस्ल का हाकिम क़ाबिज़ हुआ वहीँ २०१८ में पाक मुल्क की क़ियादत फिर वही शेरे बब्बर इमरान खान के हाथ में आई।  जी हाँ नाज़रीन यह वही इमरान खान हैं जिनका नाम सुन कर ही हिन्द के उस दरिंदे उसके पैरोकार, ज़ाफ़रानी शिद्दत, सिंघी दहशत और बीजेपी वालों और ज़ाफ़रानी सहाफ़त को जुलाब हो जाते हैं।  

फिर फ़रवरी २०१९ में मोदी, बीजेपी, संघी दहशतगर्दों ने अपने ही फौज के अराकीनों को क़तल कर दिया और इलज़ाम पाकिस्तान, इमरान खान पर लगा दिया।  जिससे की उनकी इज़्ज़त बर्बाद हो जाए और आलमी बरादरी पाकिस्तान के ऊपर हमलावर हो जाए।  लेकिन यहाँ पर भी फ़तह पाक और इमरान खान की ही हुई और ज़लालत हिन्द में मौजूद ज़ालिमों, दरिंदों, दहशतगर्दों के हाथ लगी। 

यहाँ से फिर सिलसिला वही शुरू हुआ क्रिकेट बायकाट क्योंकि इन ज़ालिमों को इल्म हो चूका था की अब आगे हमारी मौत है। क्योंकि हमारी जंग अब पाक के बे ईमान और सियासत में कमज़ोर हाकिमों से नहीं है बल्कि उस मुजाहिदे आज़म से है जो हमको हर हलक़े में कमज़ोर और रुस्वा कर चूका है।    

पाक में जो भूट्टोस और शरीफ की क़ियादत में हिन्द पाक के दरमियान गाहे बगाहे क्रिकेट का आगाज़ हुआ था २०१९ से फिर से पूरी तरह बंद हो गया।  बस अब तो आलमी कप या कोई ऐसे टूर्नामेंट में ही दोनों टीमें आमने सामने होती थी जहाँ बोहोत ही ज़रूरी होता था।  

बिल आख़िर इमरान खान की हाकिमियत में आलमी क्रिकेट में पाक हिन्द के मुक़ाबले की नौबत गई।  तमाम काफिर शिद्दत, संघी दहशत और बीजपी वालों को मिला कर नो निहाद सेक्युलर, मुस्लिम सभी मुत्मइन थे की हमारे पास मोदी की शैतानी क़ुव्वत है  हर हाल में काफिर शिद्दत ही फतहयाब होगी।  लेकिन हुआ उसके बरक़्स रूहानी ताक़त के सामने शैतान क़तल किया गया।  और पाकिस्तान ने भारत को १० विकेट से धो डाला।  और भारत के तमाम १० काफिर शिद्दत को क़तल कर दिया। 

नाज़रीन अब हिन्द का बड़ा शैतान (मोदी) मजला शैतान (अमित) और अदना शैतान (योगी) यह भली भाँती समज गए थे की पाक के इस शख़्स से बराहे रास या सीधी आमने सामने की जंग में फाहयाब नहीं होंगे हर उस हलक़े में उसको शाकिस्त और रूस्वाई का समाना करना पडेगा जिसमे की मुक़ाबिल पाक का शेरे बब्बर इमरान खान होंगे।  फिर यहाँ से इन काफ़िरों ने इस्लाम दुश्मनों ने साजिश का आगाज़ किया और मुनाफ़िक़ों से मिलीभगत कर के फ़ज़लू नाम के दज्जाल के साथ साजिश कर के इमरान खान को बरतरफ़ किया और खुद हाकिमियत के कुर्सी पर फ़ाइज़ हो गए। 

अब मसले पहले से मज़ीद पेचीदा हैं जिन मुद्दों पर फ़ज़लू और शरीफ ने इमरान खान को हटाया था।  हज पर जाने के लिए पहले लाख का इख़राजात होते थे अब फ़ज़लू के बेरुन मुल्क वज़ीर के होने के बावजूद १० और ११ लाख का इख़राजात होता है।  ऐसे ही हर उस मुद्दे पर दो और तीन गुना ज़ाईद पैसा अवाम को देना पड़ रहा है जो इमरान खान की हुकूमत में कम देना होता था।   

तक़रीबन ऐसे ही हालात हिन्द में हैं मेहगाई, ख़ातूनों  की अस्मत रेज़ी, दहशतगर्दी जैसे जिन आतिशी मुद्दों पर शैतान और ज़ाफ़रानी दरिंदे क़ाबिज़ हुए थे उन मुद्दों को अवाम पहले से मज़ीद ज़्यादा महसूस कर रहा है। 

फ़ज़लू जैसे गुंडे ने हाकिमियत और अपने मफ़ात के ख़ातिर इमरान खान की हुकूमत को गिराया था लेकिन उसका ख़मयाज़ा पाक अवाम को भगतना पड़ेगा।  क्योंकी मौजूदा हुकूमत हिन्द हो या पाक दोगली हिकमते अमली पर अमल पेरा हैं।  पाकिस्तानी हुक्काम पर अमेरिका, भारत, इजराइल का ख़ौफ़ तारी है।इनको अपने मालिके हक़ीक़ी का ख़ौफ़ नहीं है, जभी रूसवा और ज़लील हो रहें हैं।

लेकिन शैतान, ज़ालिम, दरिंदा, दहशतगर्द, क़ातिल कितना ही क़वी और ताक़तवर हो जाए एक दिन हर उसको बेरहमी से क़तल कर दिया जाता जो ज़ालिम और नाइंसाफ होता है।  हिन्द में भी वही होगा जो मेरा मालिक चाहता है।  चाहे कितना भी माफ़ी मांगों या अपने खुद एलान कर्दा लक़ब "वीर" रख लो।   

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...