मेरी रसाई सिर्फ़ माशूक के क़दमों तक ही रही,
उनके रुख़सार को देखने की कहाँ हैसियत मेरी।
सहाफ़ी ज़ुबेर
अज़ीज़ नाज़रीन,
भारत में तमाम मीडिया सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान और इस्लाम पर हमला कर के अपने सियासी आक़ाओं को उसका फ़ायदा पहुंचाने की हिकमत करतें हैं। सौरभ नामी लंगूर संघी दहशत से मुत्तासिर है। इस मरदूत ने साधु के साथ मिल कर हाल ही के एक मुबाहिसे में किसान एहतेजाज को योगी से बात करते हुए मुस्लिम बनाम हुकूमत करने की नाकाम कोशिश की थी। कियोंके अगर किसान एहतेजाज मुस्लिम बनाम हुकूमत हो गया तो किसानों को बख़्श कर बेगुनाह मुस्लिम अवाम को धना धन गोलियां मार कर अपनी भड़ास निकालेेंगे। मुसलमानों को झूठे इल्ज़ाम मै घरों से निकाल कर जेल करेगें उनके घरों को इल्ज़ाम लगा कर तोड़ेगे। ऐसे ही लँगूर सिस्टम और हुकूमत मे ज़हर भरतें हैं।
जब लंगूर मुसलमानों के खिलाफ हुकूमत के ज़ेहन में ज़हर भर सकतें हैं और उनकी बर्बादी पर जश्न बनातें हैं तो में बहैसियत सहाफ़ी यह कहना चाहता हूँ जो तंज़ीम यह वादा करती है की अगर हम जीत कर आये तो मूर्ती पूजा पर पाबन्दी लगा देंगें तो हमारा वोट उसको मिलेगा।
वैसे भी सनातन मज़हब में कहीं भी मूर्ती पूजा का ज़िक्र नहीं है। वेद, उपनिषद, गुरू ग्रन्थ साहिब कही भी मूर्ती पूजा का कोई ज़िक्र नहीं मिलता है। फिर यह कैसे मुमकिन है एक पत्थर का मुजस्समे में "प्राण प्रतिष्ठा" कर के वोह ज़िंदा हो जाए और इंसान के सुख दुःख की बात जान ले और उसका मुदावा भी करे।
२२
जनवरी से क़ब्ल जिस हिसाब से लंगूर लँगूरनियों ने "प्राण प्रतिष्ठा" पर बवाल काटा था तो राम की मूर्ती के अंदर बिला वास्ता प्राण फूंक कर बेक डोर
एंट्री की क्या ज़रुरत थी। बराहे रास्त उसी
राम को ज़िंदा कर देना था।
जब
२२ जनवरी का मीडिया में बोहोत हंगामा हो रहा था एक मुबाहिसे में मेने यही बात कही थी। एक मूर्ती में प्राण डालने की बात कर रहे हो में
चुनौती देता हूँ प्राण प्रतिष्ठा वाले रोज़ जितने हिन्दू हादसों में, खुदकशी कर के,
दिल के दौरे से या किसी और वजह से मरेगें उन सब को नहीं सिर्फ़ एक को ज़िंदा कर दो तो
में मान जाऊंगा। उस कमेंट को Standing Committee में काफ़ी सरहाना मिली और बोहोत मवाफ़िक़ नतीजे मिले उसके बाद कई एक हस्तियों
ने ऐसे सवाल उठाये।
मौत
एक ऐसी सच्चाई है जिस पर हर इंसान का यक़ीन है हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई यहूदी यहाँ तक
जो ख़ुदा को नहीं मानते वोह भी मौत की हक़ीक़त पर यक़ीन रखतें हैं। एक दिन तो हमको भी मरना है। मौत पर यक़ीन हैं लेकिन ख़ुदा पर नहीं।
मेरी
सियासी तंज़ीमों से यही गुज़ारिश है। इस्लामिक
शरीयत में तो ख़ूब मुदाख़ेलत कर दी। ट्रिपल तलाक़,
हिजाब, मस्जिद, नमाज़, अज़ान और इन मुद्दों पर ऐसे ऐसे मुनाफ़िक़ आ कर इल्म देना शुरू कर
देते थे जिनको इस्लामिक जुरिसपिडेन्स का बुनयादी इल्म भी नहीं था। मज़े की बात ऐसे जाहिलों हूकूमती ग़ुलामो को इस्लामिक
दुश्मन मुनाफ़िक़ों को मीडिया के लोग इस्लामिक स्कॉलर्स बोलते थे। जहाँ शरीयत पर इस्लाम पर कोई भी बात होती सभी
ज्ञान पेलने लगते थे चलो अब बनाओ मूर्ती पूजा की पाबन्दी का क़ानून।
हिजाब, ट्रिपल तलाक़ पर ऐसी ऐसी ओबाश बदकार ख़ातूने ज्ञान देने लगी जो अवामी हलके में बरहना नंगी पूतंगी घूमना पसंद करती हैं। हिजाब पर बेन के पीछे उनकी भी अपनी वजह है। दुम कटी कुतिया चाहती है सबकी दुम कट जाए ताके वोह जब नंगी होगी तो अलग नहीं दिखेगी।
एक आम राये है इस्लाम में औरतों को आज़ादी नहीं है। में मीडिया और समाजी तंज़ीमों के नुमाइंदों को चुनौती देता हूँ मेरी एहलिया से आ कर जब चाहें पूछ लें की उसको कितनी आज़ादी है। कियोंके में इस्लामिक हिसाब से जीता हूँ और औरत के हुक़ूक़ क़ुरान हदीस के हिसाब से जानता हूँ। औरत ग़ुलाम नहीं है बल्कि मोहसीना है। दोस्त साथी।
जो
लोग औरत को ग़ुलाम समझ कर हर बात पर उसके हाकिम बनते हैं तो उसमे इस्लामिक तालीम की
कोई गलती नहीं है बल्कि उस शख्स की लाइल्मी है।
मूर्ती
पूजा पर पाबन्दी के क़ानून में जो मुनाफ़िक़ मुस्लिम नाम रख कर हिन्दुआना रस्म इख़्तेयार
करते हैं हिजाब पहन कर ऊल जलूल बयान बाज़ी करते हैं। हिन्दू से शादी यह बोल कर करतें हैं की हमें इस्लाम
की क़ैद में नहीं रहना है एक घुटन होती थी अब आज़ाद हैं ऐसों के खिलाफ जो तंज़ीम सख़्त क़ानून
बनाने का वादा करेगी हमारा वोट उसको मिलेगा।
उस क़ानून में गिरफ्तारी से ले कर मौत की सज़ा तक होना चाहिए। अगर फ़रार है तो उसके असासे ज़प्त करना चाहिए। उसके ऊपर इकनोमिक एम्बार्गो लगाना चाहिए। फ़िर देखतें हैं कैसे कोई मुनाफ़िक़ बड़ी बड़ी बातें
करता है में मुल्लों के किसी फ़तवे से नहीं डरती या डरता।
इसलिए
नहीं की उन्होंने इस्लामिक शरीयत के ख़िलाफ़ काम किया बल्कि इसलिए की उन्होंने फ़रेब किया
धोखा दिया, थे हिन्दू ही लेकिन नाम मुस्लिम रख कर तमाम भारत और आलम के अवाम को गुमराह
किया। अगर कोई मुस्लिम हिन्दू मज़हब अपनाता
है तो कोई क़ैद नहीं है।
और
ऐसे तमाम मामले २०१४ के बाद से लेना होंगे जो मुस्लिम नाम से इस्लाम में बदगुमानी पैदा
करते थे सब की गिरफ्तारी होना चाहिए। सऊदी
अरब में कई ऐसे मुनाफ़िक़ पकड़े गए हैं जो थे हिन्दू लेकिन मुस्लिम नाम से दाढ़ी टोपी के
साथ गलत हदीस बयान करते थे मोदी संघ राम मंदिर पर मुवाफ़िक़ बयान देतें थे। अभी हाल ही में जनवरी को ऐसा ही एक मुनाफ़िक़ गिरफ्तार
हुआ उसका सर क़लम करने का हुकुम नाफ़िज़ हो चूका है उसकी गिरफ्तारी पर संघी, शिद्दत पसंद
हिन्दू यहाँ तक की वज़ीर ऐ खारजा तक को अंगार लगी।
रवी शंकर तक का बयान आया मतलब इस बदगुमानी और मुनाफ़ेक़त के तार भारत की सरकार
से जुड़े हुए हैं।
इस
क़ानून से हिन्दू, सिख, क्रिस्टी और दलित बहार रखना चाहिए वोह हिन्दू मज़हब के ख़िलाफ़
कुछ भी बोल सकतें हैं कियोंके भारत एक हिन्दू मुल्क है। लेकिन जहाँ कोई मुस्लिम इस्लाम और उसके क़ानूनों
के ख़िलाफ़ बोले शरीयत के ख़िलाफ़ बयान दे फौरन उसकी गिरफ्तारी होना चाहिए। उसके मज़हब की पूरी तफ़्तीश उसकी पिछली पुश्तों के
बारे में जानकारी हासिल करना चाहिए। अगर वोह
सच्चा मुस्लिम है तो उसको छोड़ देना चाहिए कियोंके अब उसका मामला उलेमा ते करेंगे की
वोह इस्लाम से खारिज है या अभी भी वोह मोमीन है।
लेकिन अगर गिरफ्तार किया हुआ बन्दा या बंदी अपने बाप दादा और अहले खाना की पूरी
जानकारी नहीं दे पाई या पाया मतलब वोह हिन्दू है और मुस्लिम नाम से बदगुमानी फैला रहा
है तो वोह अब सज़ा का मुस्तहिक़ होगा।
फ़िर देखतें हैं यह बरसाती मेंढक कितने दिन ज़िंदा रहतें हैं। जो सिर्फ़ बरसात में ही आ कर टर टर करतें हैं। २०१४ या उससे पहले के ऐसे तमाम मामलों को लेने की हिकमत यह है की इन्होने जुर्म तो कर दिया। इस्लाम और मुसलमानों की इज्तेमाई अस्मतदरी कर दी अब इनको इनके जुर्म की सज़ा मिलनी चाहिए। अगर एक ज़ानी, ख़ूनी, डाकू जुर्म कर के फ़रार हो जाए तो उसका जुर्म माफ़ नहीं होता है। कियोंके वोह जुर्म कर चूका जब मिलेगा उसको सज़ा होगी। उसी हिसाब से जिस हिन्दू ने मुस्लिम नाम रख कर शरीयत के ख़िलाफ़ बयान बाज़ी की उसकी गिरफ्तारी होना चाहिए। कियोंके उसने इस्लाम की इज्तेमाई अस्मतदारी की है और तमाम आलम के मुस्लिम अवाम को गुमराह किया है।
सहाफ़ी ज़ुबेर