अज़ीज़ नाज़रीन,
जिस तरीक़ेकार हिकमत इख़्तियार कर के हूकूमते हिन्द की कुर्सी पर फ़ाइज़ हिन्द स्टेट का भागदादि फ़ाइज़ हुआ है और उसके ज़ुल्म, सितम, बर्बरियत से तमाम अवाम आजिज़ आ चूका है फिर जिस ख़िलाफ़त तहरीक की ये सहाफी हर वक़्त बात करता था वो शुरू हो चुकी है.
ख़िलाफ़त का मतलब होता है हुकूमत के तानाशाही अंदाज़ और ज़ुल्म, बर्बरियत, क़त्ल, मजमूई, क़त्ल, ना इंसाफ़ी ख़्वाह हर उस क़दम की ख़िलाफ़त करना जो आम अवाम को सख़्त तरीन मुत्तासिर करने वाला है. इससे पेश्तर इस सहाफी ने कहा था की हुकूमत से एहतेजाज दर्ज करवाने के लिए अवाम को सिविल नाफरमानी का रास्ता इख़्तेयार करना चाहीये. हम हुकूमत के किसी भी सियाह क़ानून को नहीं मानते.
खिलाफ़वर्ज़ी करेगें, नहीं मानते तुम्हारे क़ानून को क्या करोगे जेल में डालों.
अब धीरे धीरे अवाम इस जानिब सोचने लगा है. हाल ही स्याह कानून "का" और शहरियत तरमीम क़ानून की सयासी हल्क़ों से खिलाफ़वर्ज़ी की ख़बरें आने लगीं हैं.
पहले वेस्ट बंगाल में तृणमूल की दीदी, फिर उत्तर प्रदेश के सामजवादी भैया ने ये ते किया है की हुकूमत के किसी भी नुमाइंदे को वो अपने कोई भी दस्तावेज़ शहरियत साबित करने के लिए नहीं देंगे. सही रास्ता है और दुरुस्त है.
इस मुद्दे पर ये सहाफी तमाम मुख़ालिफ़ों और ख़ास तुलबा के साथ खड़ा है और वो भी किसी भी हुकूमत के नुमाइंदे को अपने कोई भी दस्तावेज़ नहीं देगा. क्या करोगे डिटेंशन सेंटर भेजोगे, हमारी नस्ले बर्बाद करोगे, ज़ुल्म करोगे.
क्या करोगे और कितना करोगे. हम भी देखना चाहते हैं की तुम्हारे ज़ुल्म की इन्तहा कितनी है और हमारी बर्दाश्त की कूव्वत कितनी है.
फिर ये जिस्म उस हद तक अज़ीयत और तकलीफ बर्दाश्त कर सकता है जितनी की उसके अंदर बर्दाश्त करने की हिम्मत होती है उसके बाद मरे हुए जिस्म पे क्या अज़ीयत करोगे. ये जिस्म तो फानी है और दुनिया की हर चीज़ फानी है बाक़ी जो रहने वाली ज़ात है वो हैं इंसान के अमाल और उसकी रूह.
और वही ऊपर जायेगें, ये जिस्म नहीं जाएगा.