बिरादराने वतन साफ़ शफ़्फ़ाफ़ ज़हन और अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियां
आज आपके रूबरू दहशतगर्द, ग़द्दारी और माशी बदउनवानी की निस्बत से हाज़िर हुआ हूँ। जिसके लिए ओमूमन भारत में मुक़ीम ज़ाफ़रानी मीडिया
के लंगूर और लँगूरनियाँ मुस्लिम अवाम को दहशतगर्द और ग़द्दारी के ज़िम्मेदार बताते थे। लेकिन आज आप हज़रात के दरमियान हक़ीक़त रखूँगा जिसको
अब ख़ुद लंगूर तस्लीम कर रहें हैं और अब इन हाकिमों को दहशतगर्द बोल रहें हैं
जिनमे से कोई भी मुस्लिम नहीं है।
नाज़रीन आपको बर्मा की दहशतगर्दाना ख़ातून के बारे में इल्म तो हो
चूका होगा। उसके बाद दहशतगर्दों और शैतानी
उलूम का मरकज़ इज़राईल जिसका दहशतगर्द सरगना नितिन याहू उसके ख़िलाफ़ आलमी अदालत ने जंगी जराईम और
दहशतगर्दाना वारदातों को अंजाम देने की तहक़ीक़ात शुरू कर दी है।
ताज़ा मामले में बोलीविया की अबूरी सदर (अंतरिम राष्ट्रपति) जिनिन
एनेज को २०१९ की वारदातों में उनके मुलव्विस होने और दहशतगर्द, वतन के साथ
ग़द्दारी के इलज़ाम में गिरफ्तार किया है। उनके
मशकूक किरदार की वजह से हमअसर सदर (तत्कालीन राष्ट्रपति) इवो मोरालेस को अपने ओहदे
से इस्तीफा देना पड़ा था। वज़ीर कॉर्लिस एडुअड्रो
डेल किरस्तो ने बरोज़ हफ्ते (सनीचर) को ट्वीट किया "में बोलीविया के अवाम को इत्तेला
देता हूँ की जिनिन एनेज को पकड़ लिया गया है और इस वक़्त वोह पुलिस के हाथों में हैं।"
ख़बरनामे सिन्हुआ की इत्तेलात के हिसाब से स्टेट अटॉर्नी जनरल
के दफ्तर ने बरोज़ जुमे को एनेज और उनके पांच साबिक़ मददगारों की गिरफ्तारी का हुकुम
नाफ़िज़ किया था। त्रिनदाद के शुमाली शहर के
टेलीविज़न फुटेज से पता चला की पुलिस ऑफिसर्स और दो प्रॉसिक्यूटर्स ने एनेज के रिहाइश
गाह पर छापा मारा और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
साबिक़ फौजी कमंडरों विलियम्स कलिमन और सर्जियो ओरेलना और साबिक़
पुलिस कमांडर यूरी कलद्रान के ख़िलाफ़ भी गिरफ्तारी का वारंट जारी किये गए हैं। नाज़रीन आपके इल्म में इज़ाफ़े के लिए बताता चलूँ की
अक्टूबर में मुल्क के आम इन्तेख़ाब में धांधली और धोखे बाज़ी को ले कर पनपे तनाज़े के
बाद नवंबर २०१९ में मोरालेस ने ऑफिस से बरतरफ़ कर दिया गया था। इसके बाद मुल्क भर में एहतेजाज शुरू हो गया था जो
कई हफ़्तों तक चला था।
दौराने एहतेजाज कमो बेश ३० से ज़ाइद अफ़राद जाहनबाक हुए थे और
तक़रीबन ७०० ज़ख़्मी हुए थे। इस दौरान २०१९ से
२०२० तक ानेज ने आबूरी हैसियत से बोलीविया के ६६वे सदर के फ़राइज़ को अंजाम दिया। जो अब गिरफ्तार हो चुकी हैं। ग्यूइलर तेजाडा के बाद वोह बोलीविया की दूसरी ख़ातून
सदर थी।
सहाफी जुबेर के लंगूर-लँगूरनियों और फौज से तल्ख़ सवालात
नाज़रीन जिस अंदाज़ में ज़ाफ़रानी लंगूर और बेहया वाहियात बरहना
लँगूरनियों ने मुसलमानों को दहशतगर्द बोल कर बदनाम किया था और इस्लाम दहशत की तालीम
देता है मस्जिदें, मदरसे शिद्दत का दर्स देतें हैं अब वही लंगूर और लँगूरनियाँ उलटे मुँह गिर पड़े।
इन ज़ाफ़रानी सहाफियों की पिटाई इतनी हुई के इनका जिस्म ऊदा नीला हो गया और लँगूरनियों
का सुर्ख़। अब यह सहाफी और हक़ पसंद सहाफी ख़ास
मेरे अज़ीज़ हमख़याल अभिसार शर्म, रविश कुमार, प्रसून कुमार वाजपाई तो ज़रूर इन लंगूरों से सवाल करेंगें कौन
है असली दहशतगर्द।
जिन मुसलमानों को बदनाम करते थे किसी भी मुल्क के हुकुमरान या
आला ओहदेदार को दहशतगर्दाना जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया। फिर जिस तरह से मस्जिदों और मदरसों पर तोहमत तराशी
की जाती थी की वहां शिद्दत पसंदी सिखाई जाती है दहशत का दर्स दिया जाता है तो एक भी मदसरे या मस्जिद में ऐसी वारदात सामने नहीं आई।
जबकी कठुआ में ८ साला मासूम को मंदिर में ज़िना की तकलीफ और शिद्दत को एक हफ्ते
तक बर्दाश्त करनी पड़ी, इतना ही नहीं उस ज़िना से क़ब्ल और पेश्तर उस बच्ची का क़त्ल होने तक जितने भी जुर्म
हुए हैं वोह सब मंदिर में हुए. उसकी तलाफ़ी तो सिर्फ और सिर्फ मौत थी लेकिन हुआ क्या फौज और पुलिस का जवान
बाइज़्ज़त बरी हो गए और जो मुजरिम थे उनमे से ५-७ और ३ साल की सज़ा पाए। क्या यह इन्साफ का पैमाना है।
दूसरी वारदात अभी हाल ही में एक मंदिर में आसिफ नाम के नाबालिग़
मासूम को इसलिए बज़र्ब पीटा गया क्योंकि वोह प्यासा था,
और अपनी मासूमियत और प्यास की शिद्दत में वोह मंदिर मस्जिद का
भेद भूल गया उसकी बज़र्ब पिटाई, इस बात की दलील है की मुस्लिम बच्चों को हर वक़्त मंदिर और मस्जिद में फ़र्क़ करते आना चाहिए, कभी भी मंदिर में नहीं जाना चाहिए, वहां उनकी मौत इंतज़ार कर रही होती है। अब १४ साल के नाबालिग़ को इस बात का किधर होश रहा की क्या मंदिर क्या मस्जिद उसकी मासूमियत और प्यास उसको बुतखाने तक ले आई. जहाँ उसको मिली शिद्दत और जब्र मार पीट. अब जिस समाज
में पानी पीने पर एक मासूम नाबालिग़ को पीटा जाए फिर वोह गर्व से कहे की हम राम भक्त
हैं तो ऐसे राम भक्तों को देख कर शायद असली राम अपने आपको रावण कहलाना ज़्यादा पसंद
करेगें। क्योंकि जो काम इन लोगों ने किया
है वोह असली राम की तालीम के बरक्स है लेकिन रावण की तालीम के हिसाब से दुरस्त है।
जिन मस्जिदों को बदनाम किया जाता है वही मस्जिदें ना सिर्फ बॉम्बे
बल्कि तमाम आलम में ज़रुरत मंदों की इमदाद के लिए सरे फेहरिस्त होती हैं। चाहे वोह केरला का तूफ़ान और बाढ़ हो या बॉम्बे में
पानी भराव, या दिल्ली
में दहशतगर्दाना हमलों में मज़लूमों की बिला तफ़रीक़ मज़हब इमदाद करने का मामला। नाज़रीन जिस बोहरी बाज़ार मस्जिद में ताला बंदी तक
यह सहाफी नमाज़ अदा करता था वहां चारों जानिब मारवाड़ी और गुजराती ताजिरों की दुकाने
हैं। उनमे से ज़्यादातर मस्जिद का तहारत
ख़ाना और पीने के लिए मस्जिद का ठंडा पानी इस्तेमाल करतें हैं। नाज़रीन एक एक वक़्त २-२ और ५-५ लीटर की बॉटल भरते
हुए खुद इस सहफ़ी ने देखा है, कभी कभी नमाज़ के वक़्त भी पानी भरते हैं और तहारत करतें हैं
जिससे नमाज़ियों को तकलीफ और दुश्वारी का सामना भी करना पड़ता है लेकिन किसी भी नमाज़ी
ने उन पर बावजूद उनका मज़हब जानने के तनक़ीद नहीं की।
नाज़रीन मेरा इख़्तेलाफ़ तो भारत की फौज से है जब सब कुछ आईने के
तरह शफ़्फ़ाफ़ हो चूका है की ग़द्दारी हर ज़ाफ़रानी, संघी और शिद्दत पसंदों के ज़हन में भरी हुई है। दूसरी बात वतन के असासे,
जायदाद फ़रोख़्त कर डाले, मेहगाई आस्मां को छु रही है, दहशतगर्दाना हमलों में मुलव्विस होने के तमाम सबूत मिल रहें
हैं। हाल ही में वेस्ट बंगाल में बम बनता हुआ
एक बीजेपी का कारकून मारा गया। हज़ारों की
तादाद में ज़िंदा बम बरामद किये गए। फिर भी
फौज किस तरह की मज़ीद तबाही का इंतज़ार कर रही है।
फौज को अपने हाथों में तमाम इन्तेज़ामियाँ को ले लेना चाहिए। २०१४ और उसके बाद हर इन्तेख़ाब को जालसाज़ी फरेब धोखाधड़ी से जीतना। जब इतना सब कुछ खुल कर सामने आ गया है तो फौज का अमल काहे को नहीं नज़र आता है. भारत में ज़ाफ़रानी ज़ालिमों दहशतगर्दों का तख़्ता पलट क्यों नहीं हो सकता। क्या यह दहशतगर्द फौज से ज़्यादा ताक़तवर हैं.
क्या भारत की फौज एक ज़न्खे की तरह सिर्फ कश्मीर के मासूमों और
मज़लूमों पर गोली चलाना जानती है। जिस तरह ३
मासूम लेबरों को अक्टूबर २०२० में दहशतगर्द बोल कर गोली मार दी थी वैसे ही हर मासूम
को गोली मारी जाती है क्योंकि अगर वोह मासूम नहीं होते और असली दहशतगर्दों के सामने
भारतीय फौज आ जाती तो उसकी जैसे घिग्गी बनी थी पठानकोट,
उरी या पुलवामा में की तरह हाल हो जाता है। नाज़रीन अब तमाम आलम को इल्म हो चूका है की पठानकोट,
ऊरी और पुलवामा बीजेपी ने इन्तेख़ाब जीतने के लिए करवाए थे और
इलज़ाम लगा दिया मुस्लिम कश्मीरी अवाम और पाकिस्तान पर।
फिर अगर ऐसी फौज पर लंगूर और लँगूरनियाँ कसीदे कस्ती हैं तो
गुस्सा भी आता है और नफरत भी बढ़ती है। क्या
फौज मासूमों को मारने के लिए ही है या अपने ओहदे का रसूख़ दिखा कर मासूम बच्चियों की
अस्मत लूटने के लिए ही है # मेजरगोगोई
नाज़रीन फौज का काम महज़ सरहदों की हिफाज़त करना नहीं होता है बल्कि
जब जब मुल्क पर ज़ालिम, दहशतगर्द, ग़द्दार
क़ब्ज़ा कर लें तो फौज का काम है ऐसे अनासिरों से जांग की जाए और उनको उनके अंजाम तक
पहुंचाया जाए। क्योंकि ज़ाहिर दुशमन से पोशीदा
दुश्मन ज़्यादा खतनाक होता है। सरहद पर तो हर
फौज चौक्कन्नी होती है लेकिन असली फौज वोह जो वतन में छुपे गद्दारों को पकडे और उसके
सबसे बड़े ग़द्दार ज़ाफ़रानी तंज़ीम उस से जुड़े हुए अफ़राद,
संघ और शिद्दत पसंद ज़ेहनियत है। जो मुल्क को खोकला कर रही है और तबाही की जानिब
ले जा रही है।