Wednesday, 17 March 2021

जंग की इब्तेदाह मई २०१९ में लंगूर लँगूरियों ने की थी भुगत भारत रहा है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

इस बात को इससे पेश्तर कई बार यह सहाफी अपने मज़मून में लिख चूका है २०१९ में लंगूर और लँगूरनियों ने इंतेखाब को जंग का नाम दिया था।   फिर जब हक़ीक़ी जंग शुरू हुई तो हर रोज़ नए नए कारनामे देखने को मिल रहें हैं।  

वैसे तो भारतीय फ़िज़ाई फौज के कई तय्यारे २०१९ के बाद फ़िज़ाओं में ही तबाह और बर्बाद किये जा चुके हैं।  इस ज़िम्न भारतीय फ़िज़ाई फौज का एक और मिग-२१ बाइसन तय्यारा आज सुब दीफाई फौजियों ने मार गिराया है।  

ग्वालियर एयरबेस में यह फौजी जंगी तय्यारा मार गिराया गया जिसमे आई ए एफ का ग्रुप कैप्टेन ए गुप्ता भी मारा गया है।    

भारतीय फ़िज़ाई फौज इस को हादसा बता रही है जिसने एक ट्वीट में कहा IAF ने ग्रुप कैप्टेन ए गुप्ता को खो दिया है।   IAF ताज़ियाती पैग़ाम पेश किया और कहा उनके एहले ख़ाना के साथ IAF पुर आज़म सख़्ती से खड़ा है।   

दीफाई फौजों की गिरफ्त मज़बूत, एक और दहशतगर्द को फ़ासी।

 अज़ीज़ दीफाई फ़ौजिओं,

आप मुबारकबाद के हक़दार हैं।   कल या परसों फेस बुक पर किसी साहब का एक मज़मून देखा जिसमें उन्होंने दिल्ली के बाटला हाऊस तनाज़िया पर मुस्लिम नवजवान को फ़ासी की सज़ा सुनाये जाने पर तनक़ीद कर रहे थे।

उनका कहना था, दिल्ली दंगों के मुजरिम खुले आम घूम रहें हैं, ज़ाफ़रानी दहशतगर्द खुले आम घूम रहें हैं और अदालतों को फ़ासी की सज़ा सुनाने के लिए मुस्लिम ही दिख रहें हैं।   उसके ऊपर इस सहाफी ने जवाब दिया था अगर अदालतें अपना काम ज़िम्मेदारी से नहीं कर रहीं हैं तो आप शिद्दत पसंदों और दहशतगर्दों को फ़ासी पर टांगना शुरू कर दो।  इनका खून आपके ऊपर हलाल है।  

ख़ैर हम तो अपना काम कर ही रहें हैं।  ताज़ा मामले में एक और ज़ाफ़रानी दहशतगर्द और एरिया कमेंडेन्ट को फ़ासी पर टांग दिया गया।   हिमाचल प्रदेश की मंडी लोक सभा सीट से रकूने पार्लियामान रामस्वरूप शर्मा को दीफाई फौजों ने गिरफ्तार कर के मुक़दमा चलाया था और उसको हमारी फौजी अदालत ने फ़ासी पर लटकाने का हुकुम सुनाया था।   इसको फांसी पर लटका दो, और तब तक लटका रहने दो जब तक इसकी मौत वाक़े ना हो जाए।  इस हुकुम की अमल बजावनी करते हुए सुब ४ बज कर १० मिनिट पर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द राम को इस सहाफी की मौजूदगी में फ़ासी पर लटका दिया गया।  

क़ैद ख़ाने से उसको ३ बज कर ३५ मिनिट पर बहार लाया गया और उसको ग़ुस्ल वग़ैरा के लिए ताज़ा पानी दिया गया।    फिर उसको चाये और नाश्ते के लिए पुछा गया जिसका उसने इंकार कर दिया फिर भी फौजी अदालत के जेल मेनुअल के हिसाब से उसको हल्का नाश्ता ज़बरदस्ती खिलाया गया।   हमारी फौजी अदालत के मेनुअल के हिसाब से किसी भी फ़ासी पर लटकाने वाले क़ैदी को भूका नहीं मारा जाता है।  उसने २ बिस्किट और एक कैप चाये पी।  फिर उसको ३ पुलिस वाले पकड़ कर फ़ासी के फंदे तक ले गए।  जहाँ पर हज़रते इज़राईल उनकी मौत की रस्सी खींचने के लिए बेताब थे। 

फ़ासी का फंदा देख कर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द ग़मगीन हो गया, जेल मेनुअल के हिसाब से उससे उसकी आखिर ख़्वाहिश पूछी गई जिसका उसने कोई जवाब नहीं दिया।   फिर जल्लादों ने उसके मुँह पर काला कपडा डाल कर उसको फांसी के तख़्ते पर खड़ा कर दिया और एक ही झटके में तख़्ते को खींच दिया गया और उसका जिस्म फंदे से झूल गया।   थोड़ी देर तड़पने और फड़फड़ाने के बाद उसका जिस्म ठंडा हो गया।  उसकी लाश फंदे तक सुब ७ बज कर २० मिनिट तक लटकी रही।  जर्राहों और तबीबों ने उसकी लाश का मुआएना किया और उसको मुर्दा एलान कर दिया। 

उसके बाद उसकी लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दी गई और १० बजे के आस पास उसकी लाश को भारतीय पुलिस अफसरों के हवाले कर दिया गया।   

अज़ीज़ नाज़रीन अब आपसे ख़िताब है, कपिल मिश्रा बोहोत बोहोत बोहोत अदना है जब चाहेगें उसको मौत का मज़ा चखा देंगे।  कुचल देंगें, रगड़ देंगें, मसल देंगें। आप लोग मुतमईन रहें, जब ज़ाफ़रानी मरकज़ी मौजूदा वज़ीर, मौजूदा वज़ीरे आला, मौजूदा रकूने पार्लियमान दीफाई फ़ौजिओं के हाथों से नहीं बच सके तो एक अदना से कीड़े के बारे में सोच कर अपना ज़हन और वक़त दोनों बर्बाद ना करें।  अभी तो और बड़े बड़े मगरमच्छों और बागड़ बिल्लों को मौत देनी है। 

गोली मारोगे सालों को अरे यह पहले किस ने बोला था ज़ारा याद रखो ठाकुर।

Tuesday, 16 March 2021

रिज़वान ने पाकिस्तान को किया रोशन, और ज़ाफ़रानियों ने दहशत को।


ब्रतानियाँ में मुक़ीम पाकिस्तानी एक्टर रिज़वान अहमद अपनी फिल्म 'साउंड ऑफ मेटल' (Sound Of Metal) के लिए ऑस्कर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर के लिए नामज़द किये गए हैं।  रिज़वान अहमद को ऑस्कर के लिए नामजद होना पाकिस्तान के लिए एजाज़ है, क्योंकि वोह तमाम आलम में पहले मुस्लिम एक्टर हैं जो ऑस्कर के लिए नामज़द हुए।  पाकिस्तान और मुस्लिम नाम आने से हिंदुस्तान के कई मुनाफ़िक़ों, मक्कारों और मुल्हिद ख़ातूनों को अंगार लग गई है।  अगर यही कोई हिंदुस्तानी कारगरदेगी करता तो मुबारकबाद का तांता लग जाता है।   यही गंदगी और ख़बासत जो भरी है इन काफिरों के ज़ेहनों में उसको खुरच खुरच के निकालना पडेगा।   सऊदी अरब में ख़ास मक्का और मदीना में उस दहशतगर्द मुसलमानों और इस्लाम से दुश्मनी रखने वाले शिद्दत पसंद कनाडा के शहरी की पहली फिल्म रिलीज़ होती है तो भारत में खुशिया मनाई जाती हैं।  वहीँ पाकिस्तानी एक्टर ने कुछ अच्छा किया तो अंगार लग रही है।    

पाकिस्तान और पाकिस्तानी हर महाज़ में सदा से भारत से दो क़दम आगे हैं।  अब भले ही शिद्दत पसंद हिन्दूसंघी और बीजेपी वाले इस बात को तस्लीम ना करें और पाकिस्तान का मज़ाक़ बनाएं लेकिन हक़ीक़त से कैसे मुँह छुपायेगें। फौजी कारगरदेगीइन्साफखेल कूदमाशी तरक़्क़ीतालीमज़हानतमुतमईन अवाम।   इस ज़िम्न में एक और तरक़्क़ी पाकिस्तान के नाम के साथ जुड़ गई है। 

यह बात तो साबित हो चुकी है की जितनी ज़हानत पाकिस्तानी अवाम में है उतनी ही जहालत भारत के अवाम में है।   भले ही भारत का अवाम अपने आपको आला तालीम आफता तस्लीम करता रहे और पाकिस्तानियों का मज़ाक़ बनाये लेकिन भारत के अवाम की मिसाल उस गधे के जैसी है जिसके ऊपर किताबें तो लादी गई हैं लेकिन ज़हानत उसमे नहीं आई।   उसको तो वही गधा हम्माली और ग़ुलामी करना है। अगर भारत के अवाम में ज़हानत होती तो तमाम आला तालीमी आफता डॉक्टर्स, इंजीनियर्सओ.एन.जी.सी. के डायरेक्टर्स, सहाफी, एम.बी.ऐ., बी.टेक, एम.टेक, मुसन्निफ़, शायर अपने अपने नामों के आगे फ़ख़्र से चौकीदार नहीं लगाते।   दूसरी बात एक शख़्स के तमाम सियाह कारनामे अवाम के सामने नुमाया हो गए फिर भी उसको इन्तेख़ाब में लाया गया।  अब आज अंधेरों में आंसू बहा रहें हैं।   ऐसी गधों वाली ज़हानत से पाकिस्तानी जाहिल पंचर बाज़ (रफ़ीक पंचरवाला) लेकिन ज़हीन अच्छे जो एक ही झटके में दिखा देतें हैं की हम ज़हीन हैं, और एक क़ाबिल पड़े लिखे शख़्स को वज़ीरे आज़म मुंतख़िब करतें हैं। 

यही फ़र्क़ होता है अपनी मेहनत पर इल्म हासिल करने में और जालसाज़ी, साजिश, चीटिंग कर के पास होने में।  तालीम से इंसान तरक़्क़ी, टेक्नोलॉजी, फलसफे, मिंतक़ की जानिब सोचता है, वहीँ चीटिंग कर के पास हुआ चौकीदारी कर उसके शाना बा शाना ताली बाजाता है थाली पीटता है और फूल बरसाता है।

हिंदुस्तान की तारीख़ गवाह है उसकी इब्तेदाह तो टुकड़ों टुकड़ों से हुई थी। अगर मुग़ल और मुस्लिम बादशाह नहीं आतें तो अभी तक तमाम शिद्दत पसंद इक़्तेदार के लिए एक दुसरे का ख़ून ख़च्चर कर रहे होते फिर मुस्लिम बादशाहों मुगलों ने तमाम टुकड़े जम (मिला) कर एक मुल्क बनाया और उसको नाम दिया हिन्दुस्तान।  मुस्लिम बादशाह इक़्तेदार में थे, चाहते तो कोई भी इस्लामिक नाम दे सकते थे।  उसके बाद झूटन खाने के जैसे कोई भी साधू या गुलाम हाकिम उस नाम को बदलने की कवायत करता फिरता, लेकिन उन्होंने अपनी रियाया के जज़बात की क़द्र करते हुए उसका नाम हिंदुस्तान दिया क्योंकि उनकी मिलकियत में भी उस वक़्त हिन्दू अक्सरियत थी और किसी भी हिन्दू को तलवार के ज़ोर पर मुस्लिम नहीं बनाया गया था।  जैसा की ज़ाफ़रानी हुकूमत में होता है, तलवार गर्दन पर रख कर बोला जाता है बोल जय जय…………. नहीं तो काट डालेगें।   इतना ही नहीं तलवार रख कर हिन्दू बनाया जा रहा है, जो कमज़ोर है बेबस है वोह तो उनसे डर जाते हैं लेकिन जो सख़्त हैं अपने मज़हब पर ही चलते हैं।

एक छोटे से किस्से के साथ अपनी बात ख़तम करूँगा।   एक आला तालीमी आफ़्ता तस्सव्वुर किया जाने वाला भारतीय चौकीदार डॉक्टरचौकीदार इंजीनीरचौकीदार एम.बी.ऐ. जैसा और एक जाहिल तसव्वुर किया जाने वाला पाकिस्तानी जा रहें थे।   अब आला तालीमी भारतीय भक्त के पैर में कुछ गंदगी लगी।  उसने उसको हाथ से छूआ और चखने की कोशिश की दूसरी रिवायत में आता है नाक पर लगा कर सूंघा। वोह मेला था।  तो अपने आपको बोहोत ही अक़लमंद समझना बेवक़ूफ़ लोगों की अलामत है "जाओ आज बादल हैं पाकिस्तानी तुमको नहीं देख पाएंगे हमला कर दो" ऐसी सोच तीन जगह मेला लगाती है।  एक पैर में दूसरा हाथ में और तीसरा मुँह में या नाक में। 

वहीँ अनपढ़ जाहिल तसव्वुर किया जाने वाला पाकिस्तानी (पाकिस्तानी पंचरवाला) जाता है और उसके पैर में गंदगी लगती है तो वोह उसको वहीँ पैर से कुचल कर मसल कर रगड़ कर आगे बढ़ जाता है।  और ऐसा कर के वोह एक ही जगह लगाता है।   जबकि भारतीय तीन जगह मेला लगाते हैं।

Monday, 15 March 2021

Saffron Nationalist Government, be ready to send them back.

 AUTONOMOUS JOURNALIST

Saffron Nationalist Government, be ready to send them back. 

https://autojourna.wordpress.com/2021/03/15/saffron-nationalist-government-be-ready-to-send-them-back/ 



दीफाई फौजियों ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों को क़त्ल करो

अज़ीज़ दीफाई फौजियों,

आज का ख़िताब ख़ास आप लोगों के लिए वक़्फ़ है और उसपर अमल दरकार है।   जिस तरह के हालात हिन्द में चल पड़ें हैं और २०१४ के बाद जिस तरह का बरहना रक़्स दहशतगर्दों ने भारत में मचाया है वोह तारीख़ की किताबों में सियाह अलफ़ाज़ में दर्ज हो चूका है।  जून २०१४ में पूना के कंप्यूटर टेक मोहसिन शैख़ की पहली हूजूमी दहशत से शहादत से ले कर जान-फेब २०२१ में किसानों पर जदीद झलियावाला बाग़ और गोली बारी तक तमाम ज़ुल्म, ज़ाफ़रानी दहशत, फ़िरक़ापरस्ती सब कुछ दर्ज हो चूका है।  

अज़ीज़ फ़ौजिओं इन सब मामलात में ज़ाफ़रानी हुकूमत और दहशतगर्द उतने ज़िम्मेदार नहीं है जितने की ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ, और उनकी ज़ेहनी दहशत।  क्योंकि दहशतगर्दों ने इन लंगूर-लँगूरनियों को ही फ़रोख़्त कर लिया था, फिर जो कुछ भी सियाह सफ़ेद होता उसपर यह तमाम लंगूर ख़ामोशी इख़्तेयार कर लेते थे।  वहीँ कुछ भी झूटी सच्ची फरेबी ख़बर यह दहशतगर्द इस्लाम, मुस्लिम, पाकिस्तान, कश्मीर, फलस्तीन की निस्बत से चलाने को कहते तो उसको बढ़ा चढ़ा कर मिर्च मसाला तैयार कर के हर रोज़ की ब्रेकिंग न्यूज़ बना लंगूर-लँगूरनियाँ अवाम की ज़ेहनी दहशत मचा डालते थे।   

मुसलमानों, मस्जिदों, मदरसों, पाकिस्तान, कश्मीर के ख़िलाफ़ महज़ ७ सालों में जितना झूट फरेब पर मब्नी ज़हर और आलूद इन लंगूरों ने हिन्दू अवाम के ज़ेहनों में भरा था शायद उतना तो आज़ादी के ७० सालों में भी नहीं भरा गया होगा।   हिन्दू अवाम के ज़ेहनों में फ़िरक़ापरस्ती थी लेकिन वोह खुल के बहार नाही आती थी।   और जो कोई भी शिद्दत पसंद था वोह अपनी ज़हनों की ख़बासत और नजासत अवामी हल्क़े में खारिज नहीं कर पाता थ। और अगर उसने ऐसी कोई भी झूटी सच्ची बातों को किसी सहाफी इजलास में खारिज किया या अपने ज़ेहनी फुतूर को अवामी हल्क़े में दिखाने की कोशिश की तो फ़ौरन उसके ऊपर अमल दरपेश होता था।  

लंगूर-लँगूरनियों के भरे हुए उस ज़हर का नतीजा क्या हुआ, जो हिन्दू मुस्लिम सदियों से एक हम साये के जैसे एक दुसरे के सुख दुःख के हामी होते थे वही एक दूसरे के दुश्मन बन गए।   इस नफ्सा नफ़्सी में फायदा किस का हुआ, ज़ाफ़रानी तंज़ीम और उससे जुड़े हुए संघी, शिद्दत पसंदों का।  एक आम भारतीय जो २०१४ के बाद इन लंगूर लँगूरनियों की ज़हर अंगेशी में आ कर नया नया संघी बना था उसका तो वाटोला हो गया।  क्योंकि अगर आज पेट्रोल, डीज़ल, गैस, सब्जी भाजी, दाल दलीया, मॉस मच्छी मॅहगी हुई है तो वोह सिर्फ मुस्लिम अवाम के लिए थोड़ी हुई है वोह तो सभी के लिए हुई है।   अगर आज नौकरी से मुलाज़िम निकाले गए है तो वोह सिर्फ मुस्लिम थोड़ी बल्कि आम हिन्दू भी निकाले गए।   वैसे भी संघी ज़हर तो मुस्लिम अवाम को पंचार बाज़ बोलता था।   उनकी तो पंचर की दूकान अभी भी अच्छी चल रही है और अब तो पेट्रोल डीज़ल मेहगा होने से खूब चलेगी।   बर्बादी किस की हुई आम हिन्दू की हुई।  जो भी हिन्दू खलीज मुमालिकों में काम करते थे, मग़रिबी मुमालिकों, अमेरिका में काम करते थे तिजारत थी उनमे से कमो बेश ६० फीसद निकाल दिए गए या बेरोज़गार हो गए।     

ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियों ने कश्मीर और कश्मीरियों के ख़िलाफ़ इतना ज़हर भर दिया था की हर दूसरा कश्मीरी भारत में दहशतगर्द लगने लगा।  इस मुद्दे पर २०१५ के आस पास अंग्रेज़ी में एक मज़मून लिखा है।   और यही बात कही है कभी गलती से बॉम्बे में लोकल के अंदर कोई आम कश्मीरी सीधा साधा नौकरी की तलाश में आया और बोल दे में कश्मीरी हूँ तो तमाम अवाम ख़ौफ़ज़दा हो जाता है फ़ौरन पुलिस आ जाती है तहक़ीक़ात शुरू हो जाती है।  वहीँ उल्फा या आसाम लिबरेशन आर्मी का कोई हक़ीक़ी दहशतगर्द लोकल में सफर करे और बोले में आसाम से हूँ तो अवाम पर उसका कोई असर नहीं होता है।  पत्थर बाज़ दहशतगर्द बोल बोल के तमाम सूबे और वहां की अवाम को बर्बाद कर दिया।   

फिर जो हक़ीक़ी सवाल हुकूमत से हूकूमती नुमाइंदों से करने चाहिए थे हर मुद्दे पर मुख़ालिफ़ों से सवाल।अरे हुकूमत मुखालिफ थोड़ी चला रहे हैं, वोह तो ज़ाफ़रानी महाज़ चला रही है।  लेकिन कहीं हक़ीक़ी सवाल करने पर भाजपा का वोट बैंक कमज़ोर ना पड़ जाए तो सवाल होते थे मुख़ालिफ़ों से और हर मुद्दे को मुख़ालिफ़ों की जानिब मोड़ दिया जाता है की वोही हुकूमत को काम नहीं करने दे रहें हैं।  ऐसा पेश किया जाता था की तमाम कारगरगेदी मुख़ालिफ़ों की है।   हुकूमत तो अपना काम अच्छे से कर रही है। 

आज महज़ ७ सालों में भारत की जो हालत है उसके लिए महज़ ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ ज़िम्मेदार हैं।  यह लोग सहाफी नहीं बल्कि दहशतगर्दों के सिलीपर सेल के जैसे काम कर रहे थे।   हर मुद्दे पर दहशतगर्दों को मेहफ़ूज़ करना और हक़ पसंद इंसान को ही क़त्ल करने की क़वायत और ख़बर चलाना।  माहौल ऐसा बनाना की एक हीरो ज़ीरो हो जाए और जो दहशतगर्द है वोह सदन में पहुंच जाए।  फिर भी अपनी ५६ इंची छाती चौड़ी कर के बोले की महात्मा का खून गोडसे ने सही किया था।    

आज भारत के जो हालात हैं उसके लिए सिर्फ और सिर्फ ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ ज़िम्मेदार है, अगर उन्होंने अपने फ़र्ज़ के साथ ग़द्दारी ना की होती और वक़्तन फा वक़्तन हुकूमत को उसके किये हुए ग़ैर ज़रूरी फैसलों पर कटघरे में खड़ा किया होता जो डेबिट झूटी सच्ची बातों पर की जाती थी बजाये उसके असली और ज़रूरी मुद्दों पर हूकूमती नुमाइंदों से की जाती तो आज वतन के हालात कुछ और होते। 

दीफाई फ़ौजिओं तुम्हारे ऊपर लाज़िम है की हर लंगूर और लँगूरनियों को गिरफ्तार करो और उसका सर क़लम कर दो।   असल में यही गद्दार, और दहशतगर्दों के मुहाफ़िज़ और उनकी बोली बोलने वाले ऐसे अनासिर हैं जो कभी भारत के हो ही नहीं सकते।   इनका क़त्ल तुम्हारे ऊपर हलाल है।  क्योंकि इनको पैसा दे कर दहशतगर्दों की जानिब से खरीदा जाता था, अगर वक़्त पर ही यह लोग वतन के साथ ग़द्दारी करने के किसी भी अमल का इंकार करते और हक़ीक़ी खबरे बताते तो आज भारत के हालात कुछ और होते।      

लेकिन इन्होने पैसों में बिक कर वही खबरे चलाई जो दहशतगर्दी को फ़रोग़ देती थी।  कुछ अच्छे और साफ़ दिल सहाफी भी ज़ाफ़रानी मीडिया में मौजूद हैं।   जो अपने फ़र्ज़ के साथ ग़द्दारी नहीं करते और हक़ खबरे बताते हैं, ऐसे सहाफियों को दिल से सलाम है।   जैसे आज तक पर मौजूद साहिल जोशी, सईद अंसारी।  

इनकी मोहब्बत मुल्क और भारतीय फौज से भी फरेबी और झूठी है अगर इनकी मुल्क और फौज की मोहब्बत के दरमियान दहशतगर्द आ गए तो इनकी ज़ुबान से सच्चाई के बजाये दहशतगर्दों के लिए मीठे अलफ़ाज़ निकलेंगे भलें ही फौज की इज़्ज़त और वक़ार पर बात क्यों ना आ जाए।  एक स्वेता सींग पुलवामा के बाद पाकिस्तान से जंग में फौज की खूब हौसला अफ़ज़ाई करती थी, फौजी कपडे पहन कर फौजी चौकियों की नुमाइश भी खूब करती थी ऐसा दिखाती थी की वही अकेली फौज की हमदर्द है बाक़ी सब बेकार।   फिर वही हमदर्दी नफरत में बदल गई जब चीन ने घुसपैठ की अब बारी फौज की हिमायत की नहीं थी बल्कि आतंकवादिओं को बचाने की थी।   क्योंकि अब इज़्ज़त आतकवादिओं की उतरने वाली थी।  फिर क्या था दहशतगर्दों और फौज की मोहब्बत में बाज़ी दहशतगर्द ले गए और फौज हो गई निकम्मी  नाकारा।   किसी ने मोदी सरकार पर चीन की घुसपैठ पर सवाल उठाया तो यही स्वेता सिंह तिलमिला उठी और बोलती है की अगर चीन की जानिब से घुसपैठ हुई है तो उसमे सरकार  कहाँ से ज़िम्मेदार है बल्कि फौज ज़िम्मेदार है फौज ने अपना काम अच्छे से नहीं किया अब मोदी जी थोड़ी सरहद पर जा कर चीन से जंग करेगें वोह तो फौज का काम है।  वह क्या बात है।  बालाकोट हो तो मोदी की कारगरदेगी, घुसपैठ हो तो फौज निक्कम्मी। 

कुल मिला कर इन लंगूर लँगूरनियों का वतन के साथ ग़द्दारी, दहशतगर्दों से मिली भगत, हर दहशतगर्दाना हमले के बाद असली दहशतगर्द को मेहफ़ूज़ करने  मतलब सुबूतों को मिटाने का जुर्म साबित हो चूका है। पैसे और गिफ्ट ले कर न्यूज़ चलाने का जुर्म भी बनता है और इन सब की सज़ा है मौत।  फ़ासी या गर्दन क़लम की जाए।   जितना नुकसान इन लंगूर लँगूरनियों ने मुल्क का किया है उतना तो शायद दहशत से भी नहीं हुआ होगा।

Sunday, 14 March 2021

ज़ाहिर हुए एक के बाद एक दहशतगर्द। मुस्लिम कोई भी नहीं।

 बिरादराने वतन साफ़ शफ़्फ़ाफ़ ज़हन और अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियां

आज आपके रूबरू दहशतगर्द, ग़द्दारी और माशी बदउनवानी की निस्बत से हाज़िर हुआ हूँ।   जिसके लिए ओमूमन भारत में मुक़ीम ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ मुस्लिम अवाम को दहशतगर्द और ग़द्दारी के ज़िम्मेदार बताते थे।  लेकिन आज आप हज़रात के दरमियान हक़ीक़त रखूँगा जिसको अब ख़ुद लंगूर तस्लीम कर रहें हैं और अब इन हाकिमों को दहशतगर्द बोल रहें हैं जिनमे से कोई भी मुस्लिम नहीं है। 

नाज़रीन आपको बर्मा की दहशतगर्दाना ख़ातून के बारे में इल्म तो हो चूका होगा।  उसके बाद दहशतगर्दों और शैतानी उलूम का मरकज़ इज़राईल जिसका दहशतगर्द सरगना नितिन याहू उसके ख़िलाफ़ आलमी अदालत ने जंगी जराईम और दहशतगर्दाना वारदातों को अंजाम देने की तहक़ीक़ात शुरू कर दी है।

ताज़ा मामले में बोलीविया की अबूरी सदर (अंतरिम राष्ट्रपति) जिनिन एनेज को २०१९ की वारदातों में उनके मुलव्विस होने और दहशतगर्द, वतन के साथ ग़द्दारी के इलज़ाम में गिरफ्तार किया है।  उनके मशकूक किरदार की वजह से हमअसर सदर (तत्कालीन राष्ट्रपति) इवो मोरालेस को अपने ओहदे से इस्तीफा देना पड़ा था।  वज़ीर कॉर्लिस एडुअड्रो डेल किरस्तो ने बरोज़ हफ्ते (सनीचर) को ट्वीट किया "में बोलीविया के अवाम को इत्तेला देता हूँ की जिनिन एनेज को पकड़ लिया गया है और इस वक़्त वोह पुलिस के हाथों में हैं।

ख़बरनामे सिन्हुआ की इत्तेलात के हिसाब से स्टेट अटॉर्नी जनरल के दफ्तर ने बरोज़ जुमे को एनेज और उनके पांच साबिक़ मददगारों की गिरफ्तारी का हुकुम नाफ़िज़ किया था।   त्रिनदाद के शुमाली शहर के टेलीविज़न फुटेज से पता चला की पुलिस ऑफिसर्स और दो प्रॉसिक्यूटर्स ने एनेज के रिहाइश गाह पर छापा मारा और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 

साबिक़ फौजी कमंडरों विलियम्स कलिमन और सर्जियो ओरेलना और साबिक़ पुलिस कमांडर यूरी कलद्रान के ख़िलाफ़ भी गिरफ्तारी का वारंट जारी किये गए हैं।  नाज़रीन आपके इल्म में इज़ाफ़े के लिए बताता चलूँ की अक्टूबर में मुल्क के आम इन्तेख़ाब में धांधली और धोखे बाज़ी को ले कर पनपे तनाज़े के बाद नवंबर २०१९ में मोरालेस ने ऑफिस से बरतरफ़ कर दिया गया था।  इसके बाद मुल्क भर में एहतेजाज शुरू हो गया था जो कई हफ़्तों तक चला था। 

दौराने एहतेजाज कमो बेश ३० से ज़ाइद अफ़राद जाहनबाक हुए थे और तक़रीबन ७०० ज़ख़्मी हुए थे।  इस दौरान २०१९ से २०२० तक ानेज ने आबूरी हैसियत से बोलीविया के ६६वे सदर के फ़राइज़ को अंजाम दिया।  जो अब गिरफ्तार हो चुकी हैं।   ग्यूइलर तेजाडा के बाद वोह बोलीविया की दूसरी ख़ातून सदर थी। 

सहाफी जुबेर के लंगूर-लँगूरनियों और फौज से तल्ख़ सवालात  

नाज़रीन जिस अंदाज़ में ज़ाफ़रानी लंगूर और बेहया वाहियात बरहना लँगूरनियों ने मुसलमानों को दहशतगर्द बोल कर बदनाम किया था और इस्लाम दहशत की तालीम देता है मस्जिदें, मदरसे शिद्दत का दर्स देतें हैं अब वही लंगूर और लँगूरनियाँ उलटे मुँह गिर पड़े। इन ज़ाफ़रानी सहाफियों की पिटाई इतनी हुई के इनका जिस्म ऊदा नीला हो गया और लँगूरनियों का सुर्ख़।   अब यह सहाफी और हक़ पसंद सहाफी ख़ास मेरे अज़ीज़ हमख़याल अभिसार शर्म, रविश कुमार, प्रसून कुमार वाजपाई तो ज़रूर इन लंगूरों से सवाल करेंगें कौन है असली दहशतगर्द।  

जिन मुसलमानों को बदनाम करते थे किसी भी मुल्क के हुकुमरान या आला ओहदेदार को दहशतगर्दाना जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया।  फिर जिस तरह से मस्जिदों और मदरसों पर तोहमत तराशी की जाती थी की वहां शिद्दत पसंदी सिखाई जाती है दहशत का दर्स दिया जाता है तो एक भी मदसरे या मस्जिद में ऐसी वारदात सामने नहीं आई।   जबकी कठुआ में ८ साला मासूम को मंदिर में ज़िना की तकलीफ और शिद्दत को एक हफ्ते तक बर्दाश्त करनी पड़ी, इतना ही नहीं उस ज़िना से क़ब्ल और पेश्तर उस बच्ची का क़त्ल होने तक जितने भी जुर्म हुए हैं वोह सब मंदिर में हुए. उसकी तलाफ़ी तो सिर्फ और सिर्फ मौत थी लेकिन हुआ क्या फौज और पुलिस का जवान बाइज़्ज़त बरी हो गए और जो मुजरिम थे उनमे से ५-७ और ३ साल की सज़ा पाए।  क्या यह इन्साफ का पैमाना है।  

दूसरी वारदात अभी हाल ही में एक मंदिर में आसिफ नाम के नाबालिग़ मासूम को इसलिए बज़र्ब पीटा गया क्योंकि वोह प्यासा था, और अपनी मासूमियत और प्यास की शिद्दत में वोह मंदिर मस्जिद का भेद भूल गया उसकी बज़र्ब पिटाई, इस बात की दलील है की मुस्लिम बच्चों को हर वक़्त मंदिर और मस्जिद में फ़र्क़ करते आना चाहिए, कभी भी मंदिर में नहीं जाना चाहिए, वहां उनकी मौत इंतज़ार कर रही होती है।  अब १४ साल के नाबालिग़ को इस बात का किधर होश रहा की क्या मंदिर क्या मस्जिद उसकी मासूमियत और प्यास उसको बुतखाने तक ले आई.  जहाँ उसको मिली शिद्दत और जब्र मार पीट.  अब जिस समाज में पानी पीने पर एक मासूम नाबालिग़ को पीटा जाए फिर वोह गर्व से कहे की हम राम भक्त हैं तो ऐसे राम भक्तों को देख कर शायद असली राम अपने आपको रावण कहलाना ज़्यादा पसंद करेगें।   क्योंकि जो काम इन लोगों ने किया है वोह असली राम की तालीम के बरक्स है लेकिन रावण की तालीम के हिसाब से दुरस्त है। 

जिन मस्जिदों को बदनाम किया जाता है वही मस्जिदें ना सिर्फ बॉम्बे बल्कि तमाम आलम में ज़रुरत मंदों की इमदाद के लिए सरे फेहरिस्त होती हैं।   चाहे वोह केरला का तूफ़ान और बाढ़ हो या बॉम्बे में पानी भराव, या दिल्ली में दहशतगर्दाना हमलों में मज़लूमों की बिला तफ़रीक़ मज़हब इमदाद करने का मामला।   नाज़रीन जिस बोहरी बाज़ार मस्जिद में ताला बंदी तक यह सहाफी नमाज़ अदा करता था वहां चारों जानिब मारवाड़ी और गुजराती ताजिरों की दुकाने हैं। उनमे से ज़्यादातर मस्जिद का तहारत ख़ाना और पीने के लिए मस्जिद का ठंडा पानी इस्तेमाल करतें हैं  नाज़रीन एक एक वक़्त २-२ और ५-५ लीटर की बॉटल भरते हुए खुद इस सहफ़ी ने देखा है, कभी कभी नमाज़ के वक़्त भी पानी भरते हैं और तहारत करतें हैं जिससे नमाज़ियों को तकलीफ और दुश्वारी का सामना भी करना पड़ता है लेकिन किसी भी नमाज़ी ने उन पर बावजूद उनका मज़हब जानने के तनक़ीद नहीं की।   

नाज़रीन मेरा इख़्तेलाफ़ तो भारत की फौज से है जब सब कुछ आईने के तरह शफ़्फ़ाफ़ हो चूका है की ग़द्दारी हर ज़ाफ़रानी, संघी और शिद्दत पसंदों के ज़हन में भरी हुई है।   दूसरी बात वतन के असासे, जायदाद फ़रोख़्त कर डाले, मेहगाई आस्मां को छु रही है, दहशतगर्दाना हमलों में मुलव्विस होने के तमाम सबूत मिल रहें हैं।  हाल ही में वेस्ट बंगाल में बम बनता हुआ एक बीजेपी का कारकून मारा गया।   हज़ारों की तादाद में ज़िंदा बम बरामद किये गए।  फिर भी फौज किस तरह की मज़ीद तबाही का इंतज़ार कर रही है।   फौज को अपने हाथों में तमाम इन्तेज़ामियाँ को ले लेना चाहिए।  २०१४ और उसके बाद हर इन्तेख़ाब को जालसाज़ी फरेब धोखाधड़ी से जीतना। जब इतना सब कुछ खुल कर सामने आ गया है तो फौज का अमल काहे को नहीं नज़र आता है.  भारत में ज़ाफ़रानी ज़ालिमों दहशतगर्दों का तख़्ता पलट क्यों नहीं हो सकता।   क्या यह दहशतगर्द फौज से ज़्यादा ताक़तवर हैं. 

क्या भारत की फौज एक ज़न्खे की तरह सिर्फ कश्मीर के मासूमों और मज़लूमों पर गोली चलाना जानती है।  जिस तरह ३ मासूम लेबरों को अक्टूबर २०२० में दहशतगर्द बोल कर गोली मार दी थी वैसे ही हर मासूम को गोली मारी जाती है क्योंकि अगर वोह मासूम नहीं होते और असली दहशतगर्दों के सामने भारतीय फौज आ जाती तो उसकी जैसे घिग्गी बनी थी पठानकोट, उरी या पुलवामा में की तरह हाल हो जाता है।  नाज़रीन अब तमाम आलम को इल्म हो चूका है की पठानकोट, ऊरी और पुलवामा बीजेपी ने इन्तेख़ाब जीतने के लिए करवाए थे और इलज़ाम लगा दिया मुस्लिम कश्मीरी अवाम और पाकिस्तान पर। 

फिर अगर ऐसी फौज पर लंगूर और लँगूरनियाँ कसीदे कस्ती हैं तो गुस्सा भी आता है और नफरत भी बढ़ती है।   क्या फौज मासूमों को मारने के लिए ही है या अपने ओहदे का रसूख़ दिखा कर मासूम बच्चियों की अस्मत लूटने के लिए ही है # मेजरगोगोई

नाज़रीन फौज का काम महज़ सरहदों की हिफाज़त करना नहीं होता है बल्कि जब जब मुल्क पर ज़ालिम, दहशतगर्द, ग़द्दार क़ब्ज़ा कर लें तो फौज का काम है ऐसे अनासिरों से जांग की जाए और उनको उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए।   क्योंकि ज़ाहिर दुशमन से पोशीदा दुश्मन ज़्यादा खतनाक होता है।  सरहद पर तो हर फौज चौक्कन्नी होती है लेकिन असली फौज वोह जो वतन में छुपे गद्दारों को पकडे और उसके सबसे बड़े ग़द्दार ज़ाफ़रानी तंज़ीम उस से जुड़े हुए अफ़राद, संघ और शिद्दत पसंद ज़ेहनियत है।  जो मुल्क को खोकला कर रही है और तबाही की जानिब ले जा रही है।  

Saturday, 13 March 2021

गोली मारो के बाद चाकू, तलवार मारो सालों को।

अज़ीज़ नाज़रीन,

एक और भारतीय जनखा पार्टी का आला ओहदेदार जहन्नुम रसीद।   आसाम के तिनसुकिया में असेंबली इंतेखाबात से क़ब्ल बरसरे इक़्तेदार भारतीय जनखा पार्टी (बीजेपी) के एक सदरे आरज़ी दूकान (बूथ अध्यक्ष) को क़त्ल कर दिया गया है।  पुलिस ने उसी गांव के एक शख़्स जयचंद्र गोगोई को हिरासत में लिया है।   

ज़ाराये इत्तेला मालूमात के हिसाब से क़त्ल की वारदात बरोज़ जुमे की है।   जहाँ मार्गरिटा असेंबली इलाक़े के बोहिडिहिंग गांव की पंचायत रिहायशी देबानंद गोगोई बूथ सदर पर डम डम इलाक़े में किसी नावाक़िफ़ अनासिर ने चाक़ू से धावा बोल दिया और उसको चाकूओं से गोद गोद कर ज़ख़्मी कर दिया, गोगोई ज़ख्मों की ताप बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने दम तोड़ दिय।  

हर रोज़ की संघी दहशतगर्दों की इस तरह की हलाकत बीजेपी के नुमाइंदों की हर दुसरे रोज़ की मौतों से ज़ाफ़रानी तंज़ीम सख़्त ग़मगीन और ख़ौफ़ में है।  ज़ाफ़रानी तंज़ीम के आसाम बूथ सदर की हलाकत के बाद तश्वीश और ताज़ियाती पैग़ामात की आंधी आ गई।   वज़ीरे आला से ले कर तमाम सड़क छाप और गली, चौराहों नुक्कड़ों पर बैठी बीजेपी की मस्तूरातों के पैग़ामात आने शुरू हो गए।   

वज़ीरे आला के ट्वीट के बाद डीजीपी जी पी सिंह ने मुल्ज़िम जयचंद्र गोगोई को गिरफ्तार कर लिया है।  मज़ीद सिंह ने बताया की क़तल में इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार बरामद करने की कोशिश की जा रही है।  

संघी दहशतगर्द और भारतीय जनखा पार्टी के नुमाइंदों ने नारा दिया था गोली मारो उसके बाद तो जैसे गोली बारी की बाढ़ ही आ गई थी हर दुसरे रोज़ भारतीय जनखा पार्टी के नुमाइंदे, शिद्दत पसंद काफिर या संघी दहशतगर्द गोली मार के जहन्नुम रसीद किये जाने लगे।   गुजिश्ता कुछ महीनों से गुमान यह है की दीफाई फौजों ने अपनी हिकमते अमली तब्दील की है और उस ग़द्दार गुस्ताख़ की गर्दन क़लम करने के लिए तलवार हाथों में ले लिए हैं। जिसने हाल ही में आला अदालत के साथ ज़िनाकारी कर के गंदगी की है.  अब जब जसे दीफाई फौजों के हाथों में शमशीर आई है तब से संघी दहशतगर्द, भारतीय जनखा पार्टी के नुमाइंदे और शिद्दत पसंद काफिर तलवार से काटे जा रहें हैं या चाकूओं से गोद गोद कर हलाक किये जा रहें हैं।  

में तो तमाम वतन परास्त अवाम से इतना ही कहना चाहूंगा जहाँ देखो कोई भी संघी, शिद्दत पसंद काफिर या बीजेपी का कोई भी नुमाइंदा फ़ौरन काट डालो।   इनका खून तुम्हारे ऊपर हलाल है।   इन्होने किसी दुसरे पर गद्दारी का इलज़ाम लगाया था अब साबित हो चूका है की असली ग़द्दार यह ही हैं।  वतन की आबरू, मार्श, जायदात को फ़रोख़्त करने वाले ऐसे पैरासाइट हैं जो उस हरे भरे `दरख़्त को ही तहस नहस कर डालतें हैं जिसके ऊपर वह पलते हैं।  और तब तक उस दरख़्त पर मौजूद रहतें हैं जब तक तमाम दरख़्त सूख कर मर नहीं जाता है।   और अगर उस दरख़्त को ज़िंदा रखना है तो उसके ऊपर कीटनाशक डाल कर दरख़्त पर मौजूद तमाम पैरासाइट को ख़लास किया जाता है।  और यह फलसफा महज़ दरख़्त तक महदूत नहीं है बरक़्स हर जानदार चीज़ पर जब दूसरी ऐसी पैरासाइट क़ब्ज़ा कर लेती है जो ख़ुद तो कुछ मेहनत मशक़्क़त नहीं करती बल्कि जिस पर मुक़ीम है उसका खून चूसती रहती है तो इससे पेश्तर की वोह पैरासाइट बड़े हिस्से को ख़तम कर दे उसको ख़तम किया जाता है। 

और एक बात यह पैरासाइट एक जानदार चीज़ से या जगह से हटाए गए तो दूसरी जगह अपना मुक़ाम बना लेते हैं।   इसका बेतरीन इलाज़ है इनको जड़ से ही ख़तम कर डालो।  नहीं तो २०२४ में बेहद तकलीफ देने वाले हैं।   २०१९ के लिए इस सहाफी ने जो जो पेशनगोई की थी वोह सब अब सही और दुरुस्त साबित हो रही है।  भारत ख़ाना जंगी की अज़ीयत झेल रहा है।  और बर्बाद भी हो चूका है।  तो २०२४ से पहले इस बीजेपी और संघी दहशत नाम के फ़ितने को पूरी तरह ख़तम करना होगा।   नहीं तो फ़रवरी या मार्च २०२१ को लिखे एक मज़मून में यह सहाफी ख़्वाहिश ज़ाहिर कर चूका है हम तो चाहेगें की फिर से २०२४ में बीजेपी ही आये।

उस मुनाफ़िक़ ग़द्दार की दरख़्वास्त का तोड़ प्रशांत भूषन।

हक़ और इन्साफ की जंग में हर एक मुनाफ़िक़ और ग़द्दार को शिकस्त देने के लिए बारी इलाह अपने मक़बूल और पसंदीदा बन्दों का इन्तेख़ाब कर ही लेता है।  हर दौर में ज़ालिमोंग़द्दारोंक़साइयों को जो झूठी सच्ची फरेबी बातों पर आला अदालत का वक़्त और पैसा बर्बाद करतें हैं ऐसे फरेबी झूठी अनासिरों को उनकी ही ज़ुबान में जवाब देने कोई हक़ वाला इन्साफ वाला खड़ा होता है।  हक़ और इन्साफ की जंग लड़ने वाले वकीलों में भानुशालीमेहमूद पराचा के साथ साथ अगर प्रशांत भूषन का नाम नहीं लिया तो यह उनके हक़ और इन्साफ के लिए जद्दो जेहद और इन्साफ की जंग की तौहीन होंगी।  ऐसे हक़ पसंद वुक्ला का इन्साफक़ानून और दस्तूर के दायरे में किया हुआ अमल ही उस मुनाफ़िक़ के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने का काम करेगाजो झूटी और फरेबी बात पर अदालत का वक़्त बर्बाद करता है।  

ऐसे ही आतिशी मुद्दे पर प्रशांत भूषन फिर से मुनाफ़िक़ों को अंगार लगाने आ पहुंचे हैं।   ताज़ा मामले में उनका रोहिंगिया मुहाजरीनों के हक़ के लिए क़ानूनी जंग लड़ना उस ग़द्दार के ज़ख्मों पर सख़्त नमक रगड़ने के लिए काफी है।  उन्होंने आला अदालत में दरख़्वास्त (पेटिशन) दायर की जम्मू की जेल में हिरासत रखे गए १५० से ज़ाइद रोहिंगिया को रिहा किया जाए और उनकों मुल्क बदर करने से रोका जाए। 

जिस तरह से संघी दहशत, शिद्दत पसंदों ने उस ग़द्दार के आला अदालत झूठी और फरेबी बातों पर गुमराह करने जैसे अमल को सोशल मीडिया पर वायरल किया था, अब प्रशांत भूषन का नाम हक़ और इन्साफ के सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने लगा है।  ट्वीटर पर बरोज़ हफ्ते (सनीचर) सुबह ११ बजे तक प्रशांत भूषन को लेकर ७००० से ज़्यादा ट्वीट्स किये जा चुके थे। 

प्रशांत भूषन को संघी, शिद्दत पसंद काफिर, बीजेपी वाले और उसका वोह हमख़याल मुनाफ़िक़ ज़बरदस्त गाली गलोच और बूरा भला बोल रहा है।  लेकिन यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है ऐसे वोह पहले भी देख चुके हैं।   जब जब हक़ और इन्साफ की जंग का उन्होंने परचम बुलंद किया है तब तब ना इन्साफ, ग़द्दार, क़ातिलों ने उनको बूरा भला बोला है।   

यह बात तो ते है अब प्रशांत भूषन आला अदालत में एक एहम नाम तस्लीम किये जातें हैं और वोह पाली नरीमन, मरहूम राम जेठमालानी की फेहरिस्त से आगे पहुंच चुके हैं।   फिर जिस मुद्दे पर प्रशांत जैसे वकील पैरवी करेगें तो सुप्रीम कोर्ट को भी बोहोत ही मोहतात रह कर फैसला देना होगा।  क्योंकि इससे पेश्तर प्रशांत के कई केसेस में सुप्रीम कोर्ट मुतनाज़ा और एक तरफा फैसले को आलमी और क़ौमी सहाफियों ने बरहना कर दिया था।   जब जब हक़ और इन्साफ की जंग में सुप्रीम कोर्ट ने इन्साफ का क़त्ले आम किया है और मुक़ाबिल अगर जिरह करने वाले वकील प्रशांत भूषन थे तो अदालत के फैसले की धज्जिया सहाफियों ने उड़ा कर रख दी थी।  

भाजपा ने उस ग़द्दार को हाल ही में होने वाले एहम इन्तेख़ाब को देखते हुए खड़ा किया था और ऊल जलूल पेटिशन दायर करवाई थी लेकिन अब रोहिंगिया का मसला उसका तोड़ होगा। 

यह बात तो ते है आने वाले दिनों में ज़ाफ़रानी महाज़ हर क़िस्म के गुनाह बदकारी हरामख़ोरी के साथ इन्तेख़ाब को मुतासिर कर जीतने की हिकमत करेगी।  लेकिन अगर अवाम तालीमी आफ़ता है, ज़हीन हैं तो वोह गुजिश्ता ७ सालों की मुल्क की हालत पर ग़ौर कर के ही वोट करेगें।  जिस उत्तर प्रदेश को कब्रस्तान और शमशान, ईद दिवाली, के नाम पर फ़िरक़ावाराना कर दिया था आज उस सूबे की क्या हालत है।   आमवात है की रुकने का नाम ही नहीं लेती हैं।   जुर्म, क़त्ल, डाका ज़नी, ज़िना बिल जब्र, गिरोह गरदाना ज़िना, फ़िरक़ावाराना ज़ेहनियत और ऐसे तमाम मामलों में भारी इज़ाफ़ा हुआ है जिसको रोकने की कस्मे खा कर साधू महाराज गद्दी नशीन हुए थे।     

Indian terrorists destroyed Kashmir: Kashmiris faces huge losses after aggression and occupation.

AUTONOMOUS JOURNALIST

Indian terrorists destroyed Kashmir: Kashmiris faces huge losses after aggression and occupation. 

https://autojourna.wordpress.com/2021/03/13/indian-terrorists-destroyed-kashmir-kashmiris-faces-huge-losses-after-aggression-and-occupation/ 




Tuesday, 9 March 2021

मालिके कायनात के हक़ का एक और तमाचा चस्पा।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

हक़ का एक और ज़ोरदार तमाचा ज़ाफ़रानी तंज़ीम भारतीय जनखा पार्टी के मुँह पर रसीद हुआ है।  यह की त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बरोज़ मंगल अपने उत्तराखंड के वज़ीरे आला के ओहदे से इस्तीफा दे दिया है।  नाज़रीन अब ज़रा पिछले साल इस मार्च - अप्रैल वक़्त को देखतें हैं, तो यही उत्तराखंड के वज़ीरे आला थे जो संघी दहशत और ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियों के वसवसों, साजिशों का शिकार हो कर तब्लीग़ी जमात पर तोहमत तराशी कर रहे थे।   झूट फरेब फैला रहे थे उत्तराखंड में एक ही रोज़ में १५०० जमाती करोना वबा से मुत्तासिर पाए गए।  इतना ही नहीं ऊल जलूल क़ानून बनाने की वकालात कर बैठे थे।   इन महाशय के ऊपर इस सहाफी ने कई कमेंट तब आज तक में दिए थे।   और अब नतीजा भी मिल गया।   इनकी कुर्सी गई जिसके ऊपर बोहोत ही पोंगाते थे।    

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शाम बेबी प्रसाद मौर्य से मुलाक़ात की और अपने ओहदे से इस्तीफा दे दिया।   इस्तीफे के बाद सिंह ने एक सहाफी इजलास को ख़िताब किया, लेकिन फिर वही बेकार की लायानी बातों में वक़्त को बर्बाद किया और हक़ बात बताना ही भूल गए।   उन्होंने यह तो बताया की वोह लम्बे वक़्फ़े से बीजेपी में रह कर सियासत कर रहें हैं और गुजिश्ता ४ सालों से वज़ीरे आला के ओहदे पर फ़ाइज़ है, उन्होंने मज़ीद कहा की वोह तवक़्क़ो भी नहीं कर सकते थे की सूबे की क़यादत उनको मिलगी।  जब इतना सब ठीक ठाक चल रहा था तो पस्ती और ज़वाल की क्या वजह थी।  यह बताना वोह भूल गए।  

नाज़रीन में बताता हूँ उनके पस्ती की क्या वजह थी गुजिश्ता साल मार्च अप्रैल में यह वही त्रिलोक सिंह थे जिन्होंने मरकज़ निज़ामुद्दीन और तब्लीग के ऊपर लांछन लगाए थे और झूठी सच्ची बातें सहाफी इजलास में कही थी।   उत्तराखण्ड में २५०० जमातिओं को गिरफ्तार किया गया है वोह करोना वबा फैला रहे थे और साजिश में मुलव्विस थे।   इतना ही नहीं मौलाना साद साहब पर भी टीका टिपडी की थी।  बस हो गया वाटोला। 

नाज़रीन इस बात को नक़्श और ज़हन नशीन कर लें जिस जिस अफ़राद ने मुस्लिम हक़ तलफी की है मुस्लिम अवाम के साथ ना इंसाफ़ी की है उसकी मौत उसके पीछे पीछे भाग रही है।   उसको दौड़ा दौड़ा कर एनकाउंटर किया जाएगा।   जैसा की खाकी दहशत १९९३ के बाद मुस्लिम अवाम को झूठे सच्चे केसेस में मुलव्विस कर के पहले बोलते थे चल भाग और पीछे से भागते हुए मुस्लिम बेगुनाह नवजवान को गोली मार देते थे।  #ख़्वाजा यूनुस 

नाज़रीन जैसा की तवक़्क़ो की जा रही है अभी तो और बड़े बड़े फैसले होना बाक़ी हैं।   जिसमे इन्साफ की साफ़ तौर पर तस्दीक़ होते हुए देखी जा  सकती है।   जिस जिस ने दिल्ली दहशगर्द हमलों की इब्तेदाह की थी "गोली मारो" नारों से और जिस जिस ने दहशत फैलाई थी उनका तो एनकाउंटर होगा और ज़रूर होगा।  

लगता है मोदी इन्तेज़ामियाँ गोली मारो सालों के फलसफे पर काम कर रही है।  और अगर नहीं किया तो आलमी सिफारती दबाओ के आगे करना होगा।   जिस जिस ने मुस्लिम अवाम को मौत के घाट उतारा है अब उनकी बारी है।  चाहे वोह कपिल मिश्रा हो या रागिनी तिवारी या कोई और।   कोई और का मतलब समझ गए ना।   कोई भी हो मारा जाएगा।  चाहे वोह किसी ख़ास सूबे का वज़ीरे आला हो या मरकज़ी वज़ीर अगर कुछ भी ग़लत किया है तो सज़ा भोगने को तैयार रहे। 

Sunday, 7 March 2021

Use proper terminology, is it was not terror attack?

 AUTONOMOUS JOURNALIST

Use proper terminology, is it was not terror attack? 

 https://autojourna.wordpress.com/2021/03/07/use-proper-terminology-is-it-was-not-terror-attack/ via @journalistzuber

Absconded wanted dead or alive.


अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...