Monday, 21 December 2020

५ साल मुफलिसी, ग़ुरबत और बेइज़्ज़ाती के, बाक़िया एहतेजाज के…….

मज़मून नवाज़ सहाफी जुबेर

तारीख़ २१ डिसेम्बर २०२० मुक़ाम मुंबई शाम ४:५१  


अज़ीज़ नाज़रीन,

मोदी इन्तेज़ामियाँ के पिछले ५ साल मुफलिसी, ग़ुरबत की नज़र हो गए और अगले ५ साल एहतेजाज की नज़र हो रहें हैं। 

भारतीय जनखा पार्टी (बीजेपी) में दौरे हाजरा में कुछ भी दुरुस्त नहीं चल रहा है।  अब यह बात अलहदा है की बीजेपी वाले अपनी नामर्दानगी को पोशीदा करने के लिए कभी पाकिस्तान का हाथ कभी आई.अस. आई. का हाथ कभी इस्लामिक स्टेट का हाथ कभी मुसलमानो का हाथ बोल कर अपनी फजीती और मुख़ालेफ़त को दबाते रहें।   अब मज़ीद आगे की जानिब जाते हुई हाल ही के किसान मुखालिफ बिल पर एहतेजाज करते हुए किसानों को खालिस्तानी बोल कर बीजेपी ने अलग ही मुद्दे को पैदा कर दिया है।   २०१४ के बाद जब कभी भी कोई भी एहतेजाज होता था तो उसमे बीजेपी और लंगूरों को बड़ी तादात में आज़ादी के परवाने मिल जाते थे।  यहाँ भी आज़ादी के नारे लगे वहां भी आज़ादी के नारे लगे।   लेकिन यह पहली बार हो रहा है जब किसी मुख़ालेफ़त को ख़ालिस्तानी नाम दिया जा रहा है। 

नाज़रीन क्या यह जनखा पार्टी के साथ बदबख़्ती है या उनके बदकिरदार, गुनाहों और नाइंसाफी की आज़माइश के गुजिश्ता ५ साल मतलब २०१४ से २०१९ तक सख़्त मुफलिसी, ग़ुरबत और बेइज़्ज़ती के नज़र हो गए।   पिछले ५ सालों में कोई इस्म विकास के नाम से बच्चा तो पैदा नहीं हुआ, बरक़्स नोट बंदी, जी अस टी, पुलवामा जैसी बड़ी बड़ी कई ग़फ़लत और गुस्ताखियां  मोदी इन्तेज़ामियाँ की जानिब से होती रही।     

मज़े की बात तो यह रही हर ग़फ़लत और ग़लती पर जब मुख़ालेफ़ीन मोदी इन्तेज़ामियाँ से सवाल जवाब तलब करते उसको कभी राम मंदिर का  मज़हबी रूख़ दे कर कभी अपने भाड़े के गुंडों से वतन परस्ती के नाम पर कभी फ़िरक़ापरस्ती का ज़हर दे कर मुद्दे को पूरा तब्दील कर दिया जाता था।  

२०१४ से ले कर २०१९ तक भारत तमाम अंदरूनी मसलों में उलझा रहा जिसके चलते फलाही कामों की जानिब तवज्जो देने का मौक़ा ही नहीं मिला।   उसका असर यह हुआ की मेह्गाई आस्मां को छूने लगी।   उसके ऊपर साहब का हर दूसरे रोज़ बेरुन मुल्क दौरा।   साहब बहादुर भारत में तो कम और बेरुन मुल्क में ही ज़्यादा रहने लगे।  सहाफी जुबेर इस मुद्दे पर एक मज़ाक़ करता है।

एक बार राहुल गांधी को मोदी जी से कुछ सवाल करने थे, ऐवान की कारवाही चालू होते हुए मोदी जी कमो बेश ७ दिन तक भारत के पार्लियामेंट से नदारद दिखे।   जब उनके ग़ायब रेहने की वजह मुख़ालफ़ीनों ने मांगी तो पता पड़ा पिछले १ हफ्ते से हुकूमते आज़म बेरुन मुल्क रकने ऐवान में हिस्सा ले रहें हैं।   

२०१९ में भला हुआ कोविद - १९ वबा का जिसने मोदी जी के दौरों पर पूरा बेन लगा दिया, अब गुलछर्रे और मौज मस्ती के लिए विदेशी नहीं बल्कि देसी खालिस भारतीय सक़ाफ़त इख़्तेयार करना पड़ रही है।  उससे वतन की माश पर जो गुलछर्रे और बेरुन मुल्क जाने में इख़राजात होते थे वोह भी बंद हुए।  

लेकिन २०२० लाया सख़्त मुख़ालेफ़त का दौर जिसकी पेशबंदी शुरूवात से ही हो गई थी। जब मोदी इन्तेज़ामियाँ की दूसरी हुकूमत ने अगस्त ०५ को कश्मीर की मुस्तक़िल दफा ३७० और ३५ A मंसूख कर के दरनंदाजी की, अपने दरअंदाज़ (घुसपैठिये) और दशशतगर्द भेज कर कश्मीर पर काबू पाना चाहा।  

उसके बाद शुरू हुआ एहतेजाजों का तवील मरहला जो अभी तक तमने का नाम नहीं ले रहा है।   कश्मीर के बाद "का" एन.आर.सी. जैसे सियाह क़ानूनों के खिलाफ एहतेजाज जो मार्च २०२० तक चला उसके बाद ताला बंदी।  अभी भारत को खुले हुए कुछ ही अरसा हुआ था की तक़रीबन वही महीना अगस्त के बाद किसान एहतेजाज शुरू हुआ।    जो दिसम्बर को पार करते हुए नए साल यानी २०२१ में दाखिल होने को बेक़रार है जैसा की शाहीन एहतेजाज हुआ था।  

यह एहतेजाज ख़त्म हुआ की नया एहतेजाज हिन्दू अवाम की जानिब से आने वाला है, जो पूरा २०२१ निगल जाएगा और २०२२ में दाखिल होगा।   अल ग़रज़ २०१९ से ले कर २०२२ तक तवील मरहला एहतेजाज का रहेगा फिर २०२२ से ले कर मोदी इन्तेज़ामियाँ के खिलाफ बगावत, जंग और २०२३ में जंग का नतीजा।  हो सकता है बीच में मोदी इन्तेज़ामियाँ पस्त हो कर घुटने टेंक दे और हार तस्लीम कर ले।   लेकिन फील वक़्त २०२१, २२, २३ सख़्त हैं।   

कुल मिला कर इस सहाफी को इस बात को मन्ज़रे आम पर लाने में कोई गुरेज़ और परेशानी नहीं की पिछले ५ साल यानी २०१४ - २०१९ मोदी इन्तेज़ामियाँ को सख़्त बेइज़्ज़त्ती, बदनामी का ज़हर पीना पड़ा और अगले ५ साल यानी २०१९ से २०२३ एहतेजाजों से जूझती रही मोदी हुकूमत। 

 कुल मिला कर विकास पैदा करने का मौक़ा ही नहीं मिला।

कुल मिला कर यह कहना ग़लत नहीं होगा की विकास पैदा करने का मौक़ा ही नहीं मिला।  इधर उधर के मसलों में ही वक़्त निकल जाता था फिर अपनी लुगाई (विकास के कामों) के लिए वक़्त और क़ुव्वत ही नहीं बचती थी सो विकास की ज़िम्मेदारी कभी पाकिस्तान कभी मुस्लिम कभी जिन्ना, कभी रोहंगिया, कभी गुस्पेठियों के कन्धों पर ही रहती थी।   फिर सवाल यह उठता है की इन लोगों की इतनी हिम्मत कैसे हुई के तुम्हारी लुगाई (विकास) के कामों में मदाखलत करें या तो तुमने बुलाया होगा या फिर तुम्हारी लुगाई ने बुलाया होगा। 

अब जा कर इन ५ नामों से छुटकारा मिला है और अब विकास पैदा करने की ज़िम्मेदारी भारतीय जनखा पार्टी ने खलिस्तानी मुहाफिजों को दी है।   मतलब, किसान एहतेजाज में इन को ख़ालिस्तानी दिख रहें हैं।२०२१-२२ में हिन्दू अवाम के ऊपर यह ज़िम्मेदारी होगी की वह विकास ख़ुद पैदा करें।   मतलब किसी मसले पर जब हुकूमत और हिन्दू अवाम में रस्सा कशी होगी तब इनको भी ऐसा ही कुछ नाम दिया जाएगा।  

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