अज़ीज़ नाज़रीन,
आज आप हज़रात के रूबरू सियासत से अलहदा वलियों की रूहानी बातें
उनकी कश्फ़ और करामात बताने के लिए हाज़िर हुआ हूँ।
नाज़रीन बुज़ुर्गी और रूहानियत में दो
चीज़ें ख़ास अल्लाह ताला ने अपने नबियों और बन्दों को अता की होती हैं। बारी इलाह ने अपने ख़ास बन्दों को एहलाम की क़ुव्वत और ताक़त फ़राहम की होती है। दूसरी बात कोई ऐसा काम जो एक आम इंसान के बस और
क़ब्ज़े क़ुव्वत में ना हो लेकिन नबी उसको बार बार करे हर बार करे तो उसको मोज़ेज़ा कहतें
हैं और वहीँ काम किसी वली से ज़ाहिर हो तो उसको करामात बोलतें हैं। यह मोजज़ा और करामात अल्लाह की तरफ से अताई होतें
हैं और अल्लाह के हुकुम से ज़हीर भी होतें हैं।
आइये सफर के रास्तें में आप हज़रात को हज़रत निज़ामुद्दीन ओलिया
रेहमतुल्लाह अलैहे के एक क़िस्से का बयान करता हूँ।
हज़रत निज़ामुद्दीन ओलिया के दौरे वलियत में एक शराब का ताजिर बोहोत परेशान था उसकी शराब की तिजारत चल ही नहीं रही थी क्योंकि वोह दौर इस्लामिक बादशाहत का था, और शराब इस्लाम में हराम है। जब हज़रत के रूहानी फैज़ के चर्चे दिल्ली के कूचों से निकल कर बस्ती से बहार होने लगे और बोहोत से लोग उनसे फ़ैज़याब होने लगे तो उस शराब के ताजिर ने सोचा की हज़रत से में भी जा कर अपनी तिजारत के लिए कोई तावीज़ या दुआ के लिए अर्ज़ करता हूँ। हज़रत की दुआ से मेरा भी कारोबार चलने लगेगा।
चुनाचे वोह हज़रत की कुटिया पर पंहुचा और अर्ज़ की में शराब का
ताजिर हूँ, आपका
बोहोत नाम सूना है, और में आपसे एक तावीज़ की अर्ज़ ले कर आया हूँ, की मेरा शराब का कारोबार खूब चले। हज़रत ने उससे अगले रोज़ आ कर तावीज़ ले जाने को कहा।
महफ़िल में बैठे कुछ हम जैसे गुनाहगार और वलियों के बारे में
बदगुमानी रखने वाले, सिर्फ अल्लाह वाले भी थे जो अपने आपको बोहोत बड़ा फ़क़ीह,
जदीद आलिम और मुफ्ती तस्सव्वुर करते थे, उनके
दिल में कराहियत आई की हज़रत शराबखोरी के लिए तावीज़ दे रहें हैं कैसे वली हैं। इसको नमाज़ की तरग़ीब करना थी इस्लाम का दर्स देना
था,
अल्लाह के एहकाम बताना थे।
नाज़रीन यहाँ यह बताता चलूँ की अल्लाह का हर सच्चा वली दिलों
का चोर होता है और वोह इंसान की शक्ल और सूरत देख कर उसके ईमान की दर्जे हरारत को भांप
लेता है। दूसरी बात जैसा की इससे पेश्तर इस
सहाफी के सूफियाना मज़मूनों में लिखा जा चूका है, की कोई भी वली एक बदकार, गुनाहगार, ज़ानी को हक़ की तरग़ीब नहीं करता है। और ना ही उसको नमाज़ रोज़े अल्लाह और उसके रसूल की
बातें बताता है। क्योंकि गुनाहों की गंदगी
से लिपटे उस शख्स को अगर मज़हब और हक़ की बात बताई तो उसको कोफ़्त होने लगेगी और वोह उस
महफ़िल से ही उठ कर चला जाएगा। तो हर सच्चा
वली पहले इंसान के दिल के अंदर पोशीदा कुदूरत, गंदगी, ग़लाज़त को बहार करता है उसका दिल पाक करता है उसका नफ़्स पाक करता
है उसका बातिन पाक करता है फिर उसको ज़ाहिरी ग़ुस्ल दिलवा कर पाक करता है, जब
उसका ज़ाहिर और बातिन पाक हो जाता है, तब उसको हक़ की दावत देता है। अब उसको अल्लाह के क़ानून और हदीस बताता है फिर उसको
वोह महफ़िल अच्छी लगती है और उस महफ़िल में उसका दिल लगता है और गुनाहों की जो लज़्ज़त
पहले थी अब गुनाहों से उसको कोफ़्त होती है।
मतलब हर अमल उस बन्दे के उलटे हो जातें हैं, पहले जिस रूहानी महफ़िल
से कोफ़्त होती थी अब उसको ऐसी महफिले अच्छी लगती है और पहले गुनाहों में लज़्ज़त अब उसको
कोफ़्त देती है।
अब वोह बन्दा अगले रोज़ तावीज़ लेने आया,
हज़रत ने उसको तावीज़ दिया और कहा इसको अपनी दूकान के दरवाज़े पर
लटका देना। कुछ ही अर्से के अंदर उसकी शराब
की दूकान चलने लगी, अब उसका क़ुरब हज़रत से भी बढ़ने लगा। जब जब वोह हज़रत की महफ़िल में जाता शाराब की बिक्री
खूब होने लगती। जैसे जैसे शाराबख़ाने की बिक्री
बढ़ती गई उसका हज़रत के लिए इश्क़ भी बढ़ता गया।
हज़रत की बातें उसके दिल में पेवस्त होने लगी,
एक अलग ही कशिश और खिचाव हज़रत की जानिब बढ़ने लगा। अब उसका यह आलम हो गया की जहाँ पहले ३ या ४ दिन
में ५-१० मिनिट हज़रत की महफ़िल में बैठता था अब १ या कभी २ घंटा बैठने लगा। फिर धीरे धीरे उसने कारोबार की जानिब तवज्जो देना
बिलकुल बंद कर दी और अब दिन के १२ या कभी २४ घटें ही हज़रत की ख़िदमत में रहने लगा। जब क़ुरब और इश्क़ बढ़ा तो बेतकल्लुफी भी बढ़ गई,
अब एक रोज़ उसने हज़रत से बोल दिया मुझको दायरे इस्लाम में दाखिल
कर लीजिये। हज़रत ने कहा तुम्हारा शराब का
कारोबार उसका क्या होगा, बोला वोह तो पहले ही बंद कर दिया। फिर
हज़रत ने उसको ग़ुस्ल करवा कर कलमा पढ़वाया।
और कहा ठीक है जो तावीज़ हमने तुमको दिया था उसको वापिस कर दो अब उसकी तुमको
कोई ज़रुरत नहीं है।
वोह शख़्स गया और दूकान से तावीज़ खोल कर हज़रत को दे दिया,
इस बार भी वही तमाम हम जैसे गुनाहगार और वलिओं से हसद रखने वाले बदगुमान लोग मौजूद थे जिन्होंने हज़रत को तावीज़ देने पर कराहियत महसूस की थी। हज़रत ने तावीज़ जहाँ बैठे थे वही रख दी और उन लोगों
को दिखाने के लिए अपनी जगह से उठ कर दुसरे हुजरे में चले गए। इन लोगों के दिल में वस्वसा आया की तावीज़ में क्या लिखा था कहीं हिनसे खींच कर उर्दू अलफ़ाज़ में कुछ तो नहीं लिखा था। सो उन्होंने तावीज़ खोल कर देखा उसमे हज़रत ने अल्लाह
से मुनाजात की थी, या अल्लाह माना की शराब हराम है, फिर भी लोग पी रहें हैं तो ऐसा करम कर की जो पियें तो इसी की
दूकान से पियें।
तो ऐसी होती है वलियों की शान,
अगर यही वोह शख़्स जिसका खुदा के ऊपर यक़ीन ही नहीं था और वोह
तो मुशरिक था, किसी
मुफ़्ती या आलिम के पास जाता तो क्या वोह दाखिले इस्लाम हो पाता,
नहीं हरगिज़ नहीं। फ़ौरन
मुफ्ती साहब उसको धक्के मार मार कर बहार कर देते।
वहीँ अल्लाह के एक सच्चे फ़क़ीर के दर से उसको हक़ीक़ी रौशनी मिली और दाखिले इस्लाम
हुआ।
बताने का मक़सद यही है अल्लाह के वलियों की अज़मत वही इंसान जान सकता है जो खुद उस हस्ती को पा चूका होगा। वैसे तो झोला छाप भरे पड़े हैं मार्किट में जो सभी अपने आप को अल्लाह का वली और फ़क़ीर बोलतें हैं। लेकिन देखने वाली बात वही है की अल्ल्हा ने करामात ज़ाहिर किस फ़क़ीर के ज़रिये करवाई और किस को रूसवा किया। बस जिस की करामात ज़ाहिर हो गई उसी को विलायत मिली है बाक़ी तो बस फानी हैं।
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