Tuesday, 20 September 2022

फ़तवे की हक़ीक़त।

मेरे अज़ीज़ बुज़ुर्गों और दोस्तों।

हज़रत जी मौलाना साद साहब की सवाने उमरी का मोताला कर रहा हूँ।  अगर आप हज़रात के पास मज़ीद मालूमात हो तो फ़राहम कीजिये।  नाज़रीन यह वही साद साहब हैं जिनके ख़िलाफ़ हिन्द के कुफ्र, दहशतगर्द और ज़ाफ़रानी मीडिया ने कोविद - १९ में  बदगुमानी फैला कर उसकी अज़मत, विक़ार और रूहानियत पर डाका डालने की नाकाम कोशिश की थी।  उनके मुताल्लिक़ बदगुमानी का वोह आलम था की उनको अरे तूरे के अलफ़ाज़ और अलक़ाब आतंकी तक का इस्तेमाल किया गया था।  उसी वक़्त तमाम ख़बरों पर तब्सिराते राये और मेरे मज़मूनों में वाज़े अलफ़ाज़ में कहा था की मौलाना साद साहब की परछाई को तक तुम काफ़िर छु नहीं सकोगे।  मेरे उस मज़मून और ख़बरनामों पर इज़हारे राये पर मज़ीद ख़बर आई की पुलिस ने मरकज़ निज़ामुद्दीन को चारो जानिब से घेर लिया है अब मौलाना साद गिरफ्तार होगा।  मुझे मेरे रब पर पूरा यक़ीन था की वोह किसी भी मोमीन को उस हद तक ही तकलीफ में डालता है जितनी की रब की मर्ज़ी होती है।  फिर जब पुलिस बेरंग रही तो मीडिया ने ख़बर फैला दी की मौलाना साद फरार हो गया।  उस पर साद साहब ने फ़ौरन मरकज़ निजामुद्दीन से वीडियो शाया किया और कहा में तो मरकज़ के अंदर ही हूँ।  कोई पुलिस आई ही नहीं।  और जैसा मेने कहा था वैसा ही हुआ अल्लाह का सच्चा बन्दा तुम्हारे सामने होगा और तुम उसको देख नहीं पाओगे।  वही साद साहब के साथ हुआ।  

बारहाल जो रूसवाई इन काफ़िरों ने सच्चे मोमेनीनों के लिए की थी उसका इज़ाला इनको अपनी जानों से देना पड़ा।  आगे और देना होगा।  अब बात मुद्दे इस्लामिक फ़तवे की हक़ीकत की करतें हैं।  मेरे अज़ीज़ बुज़ुर्गों दोस्तों जहाँ तक फ़तवे का सवाल है अगर दारुल हर्ब है मतलब हिन्दू रियासत तो इस्लामिक फतवा हर ख़ासों आम पर लागू नहीं होता है।  बल्कि सिर्फ मोमीनों पर लागू होता है।  वहीँ दारुल अमन है जैसा पाक मुल्क तो अब वोह फतवा हर ख़ासों आम पर लागू होगा।  और उसकी ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने वाला हूकूमती सज़ा का मुस्तहिक़ होगा।  

काफिर मुल्क हिन्द में एक आम चलन हो गया है कोई भी दहशतगर्द, ज़ाफ़रानी साधू या ज़हरीली सियासी जमात का नुमाइंदा लंगूर लँगूरनियों के सामने बैठ कर ऐसे ऐसे अक़ल के मुफ़लिस मौलानाओं या दुर्गा वाहिनी की ख़ातूनों की धुल निकालतें हैं जिनको इस्लाम के ज़बर और ज़ेर में फ़र्क़ नहीं मालूम है।और मज़े की बात तो यह है की ज़ाफ़रानी मीडिया की लँगूरनियाँ और लंगूर इन अक़ल के अंधों को इस्लामिक स्कॉलर बोल कर मुख़ातिब करतें हैं। 

हर मुद्दे पर फ़तवे का ख़ौफ़ दिखाना।  अभी कुछ २ बरस क़ब्ल २०१९ के बाद साधू ने एक मुस्लिम को सूबे शुमाल में सिविल इंजीनियर के हूकूमती ओहदे पर मुलाज़मत के लिए रखा।  फिर साधू खुद उस मुस्लिम से फोन पर गुफ्तगू करता है और उससे पूछता है आपको किसी ने धमकाया तो नहीं,  हमारे पास काम करने के ख़िलाफ़ कहीं से कोई फतवा तो नहीं आया।  आगे साधू बोलता है आएगा भी नहीं क्योंकि आपको हमने मुलाज़मत पर रखा है कोई भी हमारे हुकुम के ख़िलाफ़ फतवा नहीं दे सकता।  उसकी ज़ूबान में इस क़दर तकब्बुर और अना पोशीदा था की बोली से ज़ाहिर हो रहा था।   फिर उस मामूली ख़बर को जहाँ ५०० की मुलाज़मत में महज़ एक मुस्लिम नुमाइंदा मुंतखिब किया गया लँगूरनियाँ ऐसी ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चला रही थी।  जबकि ब्रेकिंग न्यूज़ फ़तवे पर साधू का हमला नहीं होना था सही ब्रेकिंग न्यूज़ होना था सूबे शुमाल में मुस्लिम आबादी तक़रीबन १९ फीसद है और ५०० की मुलाज़मत में महज़ एक नुमाइंदा और साधू बातें बड़ी बड़ी कर रहा है।  क्या यही है सब का साथ सब का विकास। 

फिर साधू, बीजेपी वालों और शिद्दत पसंद काफ़िरों को में कहना चाहता हूँ की इस्लामिक फतवा सिर्फ़ मुस्लिम और इंसानों के ऊपर लागू होता है।  वोह किसी काफ़िर, दहशतगर्द, शैतान, दिमाग़ी मरीज़ (पागल) और हैवान पर लागू नहीं होता है।  बोहोत से मुर्तद बदगुमानी फ़ैलाते हैं की हम किसी फ़तवे से नहीं डरते।  अरे तुमको कौन डरा रहा है।  फतवा तुम्हारे ऊपर लागू ही नहीं होता है।  तुम तो मुर्तद हो चुके हो अब तुम हिन्दू बन कर जो काम करोगे वोह तुम्हारा अमल होगा।  हाँ लेकिन अगर मुसलमान बन कर इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश करोगे या नबी मुकर्रम की शाने बे पनाह में बदकलामी करोगे तो तुम्हारा होगा "सर तन से जुदा"

अब तो खुल कर कहो की तुम हिन्दू हो चुके हो और तुम्हारा मज़हबे इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है।  फिर तुम जो भी ग़लाज़त, नजासत खाना चाहो खाओ पीओ और वही अपने मुँह से उगलो। 

 

Zuber

Some more tough days ahead for Saffron Terror of India.

 


AUTONOMOUS JOURNALIST

Some more tough days ahead for Saffron Terror of India. 

https://autojourna.wordpress.com/2022/09/20/some-more-tough-days-ahead-for-saffron-terror-of-india/ 




Wednesday, 14 September 2022

हिटलर या मुनाफ़िक़ों का पैग़म्बर।

अज़ीज़ नाज़रीन,

दरिंदा, ज़ालिम तरीन, क़साई, जल्लाद हाकिम मोदी को हिटलर का लक़ब इस ख़ाकसार ने ही दिया था, और अब मुनाफ़िक़ों का पैग़म्बर इसका दूसरा लक़ब है।  २०१० में मुसन्निफ़ सहाफत में आया था।  और ख़ाकसार ने ही इस मलून दरिंदे को हिटलर नाम दिया।  अपने मज़मूनों और उस वक़्त सहाफी टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और दैनिक भास्कर के लिए ऑन लाइन खबरनामों पर अपना तब्सिरा और राये देता था।  कई एक खबरनामों में इस मलून का नाम हिटलर दिया।  उसके बाद अहमदाबाद में हिटलर नाम से एक होटल खोला गया जिस पर बवाल हुआ था।  फिर नई बंबई में भी हिटलर नाम से होटल या कोई शो रूम खोला गया था।  जिस पर इजराइल के यहूद ने सख्त एहतेजाज किया, जिसका बाद में नाम तब्दील किया गया।  तहक़ीक़ात में पता चला वोह सभी मोदी गुलाम थे, और जब उनके आक़ा को हिटलर नाम दिया गया तो उन्होंने अपनी तिजारत का नाम भी हिटलर रख लिया।   

मज़ीद पोशीदा केमेरे में तहक़ीक़ात में पता चला की उन मोदी गुलामों का मक़सद एहले यहूद को ईज़ा पहुँचाना नहीं था।  बल्कि वोह चाहते हैं की मोदी २००२ की तर्ज़ पर तमाम भारत में मुस्लिम अवाम के साथ ऐसा कारनामा करे जैसा की हिटलर ने यहूद के साथ किया था।

फिर यह मोदी नामी शैतान तो बोहोत ही बड़ा दरिंदा और दज्जाल फितना निकला वोह तो हिटलर से ज़्यादा ज़हरीला नाग निकला।  इसको शैतानी इल्म की महरात थी सो इसने सबसे क़ब्ल सूफियों पर डाका डाला और उनको गुमराह किया।  २००५ में सुन्नी मुस्लिम जमात के आला हज़रत फ़िरक़े से कुछ मुस्लिम मौलाना उसको मिलने गए यह जानते हुए की यह शक़्स गुजरात में मुस्लिम नस्ल कूशी का ज़िम्मेदार है और उस वक़्त इसकी ज़हरीली तक़रीरें तमाम सोशल मीडिया पर विराल थी।  और उन्होंने उसको टोपी सर पर लगाना चाही लेकिन उसने एक ही झटके से सर को अलग कर लिया जैसे किसी नाजिस्त और ग़लीज़ चीज़ को उसके सर पर रखा जा रहा हो।  और उसने अपने अर्दली को टोपी लेने को कहा यहाँ तक की टोपी हाथ में भी नहीं ली।  लेकिन मौलाना की जमात ज़लील हो कर इस्लाम को रुसवा कर के ही ही ही हंस कर आ गए।  

उसने मुस्लिम टोपी सर पर क्यों नहीं पहनी क्योंकि उसको अक्सरियत जमात का ताऊन चाहिए था और वोह खवाब हिन्दुस्तान का हाकिम (राजा) बनने के देख रहा था।  बिल आख़िर उसके दिमाग की गंदगी २०१२ से आहिस्ता आहिस्ता बहार आने लगी और उसको भी हिन्दुस्तान की हाकिमियत के खवाब सच्चे होते दिखने लगे।  फिर उसने ३ रोज़े रखे अपने गुनाहों और मुस्लिम क़त्ले आम का कफ़्फ़ारा।  उस तीन रोज़ा मोहीम में उसने ख़ाकसार को भी बुलाया था।  हूकूमते गुजरात का VIP कार्ड भेज कर वज़ीरे आला की जानिब से अपने ३ रोज़ा मोहीम का हिस्सा बनने और अवाम के फलाही कामों में किस तरह वोह आगे की जानिब बढ़ सकता है इसके लिए राह दिखाए।  उसको जवाब दिया था की आप सभी फ़रीक़ों के साथ इन्साफ कीजिये और जिसने भी २००२ में मुस्लिम क़त्ले आम किया है उसको सज़ा दीजिये।  उसका VIP कार्ड अपने ख़ास नुमाइंदे के हाथों भेजने की हिकमत उसी  वक़्त समझ में आ गई थी वोह मुझे बीजेपी का एजेंट बनाना चाहता था।   

२०१७-१८ में निजामुद्दीन ओलिया के यौमे पैदाइश पर आलमी सूफी इजलास मुनक़्क़िद किया।  जिसमे तमाम आलम यहाँ तक की बग़दाद से भी सूफी तशरीफ़ लाये थे।  और भारत के सूफी मोदी के साथ बड़े ही शान से सेल्फी लेते हुए पाए गए थे।  उस खबर पर भारत के सूफियों और फोटो बाज़ों के साथ मोदी की तस्वीर और इजलास की इफ्तेताह पर “भारत ………  की जय” के जो नाज़ेबा नारे लगे थे उस खबर पर अच्छी तरह से धो डाला था।  

फिर मोदी ने जिस बेइज़्ज़त्ती से सूफियों और सय्यद ज़ादों को तकब्बुरामोज़ लहजे में  मुख़ातिब किया था वोह बड़ी ही तशवीशनाक थे। मुख़ातिब करने से क़ब्ल नाम के आगे ना ही अलक़ाब, ना ही जनाब, ना ही कोई दाम जिल्लाकुम और ना ही कोई इज़्ज़त सीधा नाम ले रहा था।  इजलास हुआ सूफी और गरीब नवाज़, निजामुद्दीन ओलिया की सवाने उमरी पर बातें और पहुंच रहें हैं हाकिम के दर पर फ़क़ीर। मतलब ज़ाहिर हो रहा है की यह फ़क़ीर दुनयावी उमूर में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं।  हाकिम के यहाँ जाना इनके लिए बाइसे इज़्ज़त होता है खवाह वोह इस्लाम दुश्मन ही क्यों ना हो।  यह तो गरीब नवाज़, निज़ामुद्दीन ओलिया और तमाम खुदाई फ़क़ीरों और हक़ीक़ी सूफियों की तालीम की ख़िलाफ़वर्ज़ी है।  क्योंकि कोई भी सूफी या हक़ीक़ी फ़क़ीर कभी भी किसी भी हाकिमे वक़्त से मुत्तासिर होता है और ना ही उसका गुलाम रहा और ना ही किसी ऐसे इजलास का हिस्सा बना जो हाकिम ने मुनक़्क़िद किया हो।  

फिर उन तमाम सूफियों को बखूबी इल्म होगा की मोदी का कोई भी इजलास दहशतगर्द संघ तैयार करती है।  उस इजलास में शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम का ताऊन होता है और हर इजलास में किस तरह से मुस्लिम अवाम को बर्बाद किया जाए इस्लाम को तबाह किया जाए ऐसी मंसूबा बंदी होती है।  और मज़े की बात तो यह की उस इजलास से महज़ एक हफ़ते क़ब्ल ज़ाफ़रानी लंगूर अमीश देवांगन ने गरीब नवाज़ की शान में बदकलामी की थी।  उनको ज़ानी और ज़ालिम जैसे अलक़ाब से मुखातिब किया था।  बाद में उसके खिलाफ केस दर्ज हुआ और उसने माफ़ी मांगी यह बोल कर की उसने वोह तमाम अलक़ाब मोईनुद्दीन के लिए इस्तेमाल किये थे, ना की गरीब नवाज़ को मुखातिब किये थे।  

खैर अब तो यह बात साबित हो चुकी है की कुछ शिया मुसलमान, अहमदिया दज्जाल, कुछ मुनाफ़िक़ और तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी दहशतगर्द, बीजेपी वाले उसको पैग़म्बर तस्लीम कर चुके हैं।   तभी तो उसके दिल्ली की सल्तनत पर क़ाबिज़ होते ही अहमदाबाद में उसका मंदिर बना डाला था। 

 Zuber

Tuesday, 13 September 2022

गर मोदी हो मुक़ाबिल तो पाकिस्तान मांगो।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मज़मून उन मुनाफ़िक़ों पर सख़्त तन्क़ीदी है जो पाकिस्तान का नाम आते ही आग बबूला हो जातें हैं।  नाज़रीन जिस हिसाब से दौरे मुनाफ़िक़त में कौन अपना है और पराया यह तस्सव्वुर करना बोहोत ही मुश्किल है।  उसी तरह कौन सच्चा मुसलमान है कौन संघी जासूस यह भी समझ पाना मुश्किल है।  हर शक़्स ज़ाहिरी अपने आपको इस्लाम का अलम्बरदार और मुसलमानों का ख़ैरख़्वाह बताता है।  लेकिन उसकी असलियत जब कुफ्र से जंग और इस्लाम दुश्मन को हलाक करने की गुफ्तुगू पर भारत से हमदर्दी ख़ास मोदी, बीजेपी और संघी नरम रुख से ज़ाहिर हो जाती है।  फिर हदीसों का बयान हर इंसान पर हुसने सुलूक करने की बातें नबी सल्लम से ऐसी मोहब्बत का दिखावा करेगें की इन से बड़ा हमदर्द कोई नहीं होगा।  लेकिन जहाँ नूपुर शर्मा, टी राजा, नवीन जिंदाल और उन तमाम गुस्ताख़े रसूल की बात करो तो माफ़ करने की वकालत करने लगेगें।  फिर इनकी हमदर्दी का पैमाना नबी से हट कर उन गुस्ताखों की जानिब माईल हो जाएगा।  फिर नबी की मोहब्बत का पैमाना इन लोगों के नज़दीक माफ़ करना और नबी के उसवाये हसना तक महदूत रह जाएगा।   नबी ने अपने दुश्मनों तक को माफ़ कर दिया उनके लिए रेहमतुल लील आलमीन का लक़ब क़ुरआन में आया तो हम कौन होतें हैं गुस्ताखों से बदला लेने वाले। 

किसी मुजाहिद सच्चे आशिक़े रसूल की हिम्मत पस्त करना हौसले को कमज़ोर करना संघी, बीजेपी वालों और गुस्ताख़े नबी के लिए भारत के लिए नरम रुख रखना मतलब ज़ाहिर हो जाता है की वोह संघी नुमाइंदा है।  जो शक होता है वोह कुछ ही अर्से बाद मज़बूत बन जाता है जब उस शक़्स के फोटो बीजेपी के इजलास में देखे जातें हैं।  जब उस शक़्स को बीजेपी की मजलिसों में नाचते हुए टोपी को हवा में उछालते हुए दाढ़ी के साथ खिलवाड़ करते हुए देखा जा सकता है। 

फिर अगर भारत से जंग करने या तक़सीम की बात करो तो हुब्बुल वतनी की वोह हदीस बताना शुरू कर देंगें जिसका मेने कभी मुताला नहीं किया।  मेरी नज़रों से तो हुब्बुल वतनी की ऐसी कोई हदीस नज़र में नहीं आई।  अगर ज़ालिम की इताअत करना हुब्बुल वतनी है और ज़ुल्म के खिलाफ, ना-इंसाफ़ी के खिलाफ, इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी करने वाले हाकिम के खिलाफ, बोलना या जंग करना. हुब्बुल वतनी के फ़लसफ़े की ख़िलाफ़वर्ज़ी करना है तो मुझे ऐसी बगावत और इंक़लाबी मोहीम का हिस्सा बनना मंज़ूर है, मुझे ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त, ना इन्साफ, मस्तूरातों की अस्मतदरी करने वाले शैतान के खिलाफ जंग करना मंज़ूर है लेकिन ऐसी ज़ालिम की इताअत करने जैसी हूबल वतनी मंज़ूर नहीं।  क्योंकि मेने तो ना ही ऐसी हदीस और ना ही क़ुरानी क़ौल देखा है बिलफार्ज होगा और मेरे इल्म में नहीं तो वोह ज़ालिम तरीन, ना इन्साफ, दरिंदा सिफ़त हाकिम के लिए नहीं होगा।

अगर हिन्द का मुसलमान तक़सीम या पाक्सितान की सरहदों की तोहसीह के ख़तरात को महसूस कर के हर ज़ुल्म और अज़ीयत बर्दाश्त कर रहा है तो उन से मेरी गुज़ारिश है अभी तक खामोश थे क्या हुआ वही सब तो वैसे भी हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। 

१.     तुम्हारी हर मस्जिद पर अब तो अदलिया की जानिब से डाका डाला जा रहा है और उसको अहले हुनूद वोह भी शिद्दत पसंद और दहशतगर्दों के हवाले कर दिया जा रहा है। 

२.     जिन दहशतगर्दों ने तुम्हारी बेहेन बेटिओं की अस्मत दरी की उनको लूटा तुम्हारे अपनों का क़त्लो ग़ारत किया उनके रोज़गार को तबाह किया उनको बाइज़्ज़त बरी किया जा रहा है। 

३.         तुम्हारे तालीमी इदारों (मदरसों, स्कूलों, यूनिवर्सिटीज) को तोडा जा रहा है।  तुम्हारे घरों को तोड़ा जा रहा है। 

४.       तुम्हारी शरीयत पर डाका डाला जा रहा है उसको तब्दील किया जा रहा है।  मस्जिदें इस्लाम का अहम हिस्सा नहीं हैं, नमाज़ इस्लामिक फ़रीज़ा नहीं है, नक़ाब या हिजाब इस्लाम का हिस्सा नहीं है। मर्द नमाज़ नहीं पड़ सकते, चेहरे पर दाढ़ी नहीं रख सकते दुख्तराने मिल्लत हिजाब नहीं पहन सकती।  दाढ़ी वाले मर्दों की दाढ़ी भरे बाजार नोची जाती है।  उनको दाढ़ी की वजह से बज़र्ब मारा पीटा जाता है।  दुख्तराने मिल्लत का हिजाब रोड पर उतरवाया जाता है।  

५.       तुम्हारी शिनाख्त को मिटाया जा रहा है।  हर उस चीज़ को तबाह किया जा रहा है जिससे की इस्लाम और मुसलमान इस मुल्क का हिस्सा थे वोह ज़ाहिर होता होगा।

वैसे भी वोह सब हो रहा है जो तक़सीम के वक़्त हुआ था।  तो अब तमाम मुसलमानों को पाकिस्तान से लगी सरहद की तोहसीह करना चाहिए और बंगलादेश से लगी सरहद पर बिहार, मग़रिबी बंगाल और आसाम के मुसलमानों को दाख़िल होना चाहिए। फिर जो हाल ग़द्दारे पाकिस्तान, ग़द्दारे इस्लाम मुजीबुर्रेहमाँन के साथ किया था वही हाल उसकी लौंडिया के साथ करना चाहिए।  फांसी पर लटकाने से क़ब्ल मुजीब के कुत्ते तक को हलाक कर दिया था।  उसकी लौंडिया के साथ भी वही सब करना चाहिए।  मुजीब की लौंडी भी मुनाफ़िक़ पैग़म्बर मोदी की गुलाम है।   जैसा की उसका बाप था। 

फिर बंगलदेश पाकिस्तान से एक एक मंदिर तोड़ कर एक एक काफिर को वहां से भगा कर दोनों मुमालिकों की सरहद की तोहसीह कर देना चाहिए।    

Zuber

दज्जाल के फ़ितने का आगाज़ है, मुनाफ़िक़े इस्लाम का पैग़म्बर।

अज़ीज़ नाज़रीन,     

मौजूदा फितना अंगेज़ शख़्स शैतानी उलूम का माहिर दज्जाल मोदी जिसको मुनाफिके इस्लाम अपना नया पैग़म्बर तस्लीम कर चुके हैं, ऐसे मुनाफ़िक़ों और ख़ौफ़ज़दा मुसलमानों के लिए आगे की राहें हिन्दुस्तान में सख्त तक़लीफामोज़ होने वाली हैं।  क्योंकि ऐसे मुनाफ़िक़ ना तो इधर के रहेंगें और ना ही उधर के। धोबी के गदेह के जैसी इनकी हालत होने वाली है।  कियोंके १५ अगस्त २०२२ को हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट का एलान किया जा चूका है।  अब ऐसे तमाम मुस्लिमों का क्या होगा जो मोदी को अपना नबी अख़िरुज़्ज़ामा तस्लीम कर चुके हैं।   उनके नज़दीक पैग़म्बर मुहम्मद सल्लम की अज़मत, इज़्ज़त और ताज़ीम मोदी से कमतर है। जैसे की बक़ौल दज्जाल सुहेब क़ासमी मरकज़ जमात हिन्द का मुनाफ़िक़ गुस्ताख़े नबी नूपुर शर्मा के मुवाफ़ेक़त में अवामी न्यूज़ चैनल पर बयान देता है।  मज़ीद वोह बोलता है की नूपुर शर्मा को मुसलमानों को माफ़ कर देना चाहिए और बदला लेने की हिकमत नहीं करना चाहिए। 

बोहोत से खुशदिल मौलाना और मुनाफ़िक़े इस्लाम नबी सल्लम की रेहमतुल लील आलमीन के क़ुरानी आयात को और सीरते नबवी को हथियार बना कर पेश करतें हैं।   जो खुशदिल मौलाना हज़रात हैं उनके बयान में नबी की खुश असलूबी, मासूमियत, हर अफ़राद को माफ़ करने की सिफ़त, किसी के ऊपर गुस्सा ना करने की सिफ़त को एक मोजज़े की हैसियत से नबी की अज़मत और ताज़ीम  को बताना मक़सद होता है।  वहीँ जो दज्जाल मुनाफ़िक़ और नबी से हद दर्जे का बुग्ज़ और कीना रखते हैं वोह नबी के माफ़ करने की सिफ़त को कुफ्फार और गुस्ताख़े नबी के लिए एक फरारी के हथियार के रूप में बयान करतें हैं। 

और दज्जाल नबी के हासिद बोलतें हैं जब नबी ने अपनी हयाते ज़िन्दगी में किसी से बदला नहीं लिया नबी ने सब को माफ़ कर दिया तो उनके फ़ौत* होने के बाद तुम कौन होतें हो बदला लेने वाले।  (*दज्जाल और दुश्मन नबी उनको फ़ौत हो गए या मौत आ गई ऐसा बोलतें हैं) जबकी खुश दिल हज़रात पर्दा कर लिया बोलतें हैं। 

तो उन दज्जालों को जवाब हैं नबी की हयाते ज़िन्दगी में उनको पूरा इख़्तेयार था की उनकी ज़िन्दगी या अज़मत पर कोई हमलरेज़ हो तो वोह चाहे माफ़ करें या उससे क़िस्सास लें।  उनको अपनी ज़िन्दगी का पूरा इख़्तेयार था।  हम उनके उम्मती हैं, फिर उनके पर्दा करने के बाद अगर कोई भी उनके खिलाफ ऊल जलूल बोलेगा तो हमें पूरा इख़्तेयार है की उस मलून से क़िस्सास लिया जाए।  कियोंके दिल आज़ारी हमारी हुई है।  हाँ अगर नबी किसी आलिम, मुफ्ती या किसी वली के ख्वाब में आ कर आज १४०० साल बाद भी बोल दें की इनको माफ़ करो तो माफ़ कर सकतें हैं।  लेकिन वोह वली कामिल होना चाहिए।  किसी खुद एलान कर्दा दज्जाल नबी अखिरुज़्ज़मा मोदी का भक्त नहीं और ना ही किसी फ़िरक़े का गुलाम (बीजेपी, संघी, यहूद, नसारा) का पैरोकार झूठा फरेबी झोला छाप नहीं होना चाहिए। 

दूसरी बात आज जो दज्जाल मुनाफ़िक़ नबी के गुस्ताखों को माफ़ करने की वकालत कर रहें हैं में उससे पूछता हूँ अगर तुम्हारे वालिद के फ़ौत होने के बाद कोई भी उनको बूरा भला कहता है या तुम्हारे वालिद के मुताल्लिक़ ऐसा झूट फरेब फैलाता हैं जो उनके अंदर मौजूद ही नहीं था, तो क्या तुम उसको माफ़ करोगे।  आज जो मुसलमान नबी के उसवाये हसना सिर्फ कुफ्र और गुस्ताख़ को मेहफ़ूज़ करने के लिए बताते हैं ऐसे ज़मीर फरोशों से में पूछना चाहता हूँ तुम तो तुम्हारे वालिद की जायदाद पर भी डाका डालने से बाज़ नहीं आ रह हो।  जब तक तुम्हारे वालिद हयात थे उनको पूरा इख़्तेयार था वोह चाहे अपनी दौलत को जाइज़ तरह से जैसे चाहे खर्च करें।  फिर उनके इंतेक़ाल के बाद मदरसों पर काहे को नहीं लगा रहे हो।  और खुद क़ाबिज़ हो कर क्यों बैठ गए।  काहे को दौलत का बटवारा कर दिया।  चलो बनाओ आलिशान मस्जिद क्योंकि तुम्हारे वालिद तो मस्जिदों में पैसा लगाने के हामी थे।  तुम नबी के  उसवाये हसना की बात करते हो अपने वालिद तक को नहीं पहचान पाए उन तक नहीं पहुंच पाए और नबी पर बात करने लगे।  दोनों ही जगह तुम्हारा मफ़ात पोशीदा है।  नबी की माफ़ करने की सिफ़त बयान कर के कुफ्र और गुस्ताख़े नबी को बचाना और दौलत का बटवारा कर के अपने मफ़ात को बचाना। 

आज हिंदुस्तान का मुसलमान इतना ख़ौफ़ज़दा हो चूका है जैसा की इससे पेश्तर एक मज़मून में बोलै है की अगर कोई भी इनकी गर्दन पर तलवार रख कर बोलेगा की तस्लीम कर मोदी नबी अखिरुज़्ज़ा है तो वोह यह भी तलसीम कर लेगें।  फिर इनके नज़दीक पैग़म्बर सल्लम की अज़मत और इज़्ज़त भी कुछ नहीं रहेगी।  और वही दज्जाल का फितना है।  जब वोह फितना बढ़ेगा तो कुछ मुसलमान उसके हर्बे और हर क़िस्म के काम को करने को ले कर उसके शैतानी जाल में फस जायेगें और कुछ उससे और उस दौर के हाकिमे वक़्त के क़तल कर दिए जाने के खौफ से उस पर यक़ीन करने लगेगें। 

जैसा की इस शैतानी अमल और दज्जाल की सवारी पर अल्लाह के घर से फूलों की बरसात की जा रही है। वीडियो महाराष्ट्र के धूलिया का बताया जा रहा है।  यह वही फ़िरक़ा है जो वालिओं के मज़ारात की ज़ियारत करने को कुफ्र बोलता है।  ग़ौसुल आज़म, गरीब नवाज़ या निजामुद्दीन ओलिया यहाँ तक की नबी की मिलाद का ज़िक्र आतें ही इनको बुख़ार आ जाता है और शिर्क बिदआत जहनुम्मी दीन में इज़ाफ़त क़बर पुज्जे और ना जाने क्या क्या फलसफे आ जातें हैं।  लेकिन एक दज्जाल शैतान की सवारी पर फूलों की बरसात इनके नज़दीक भाईचारे की मिसाल है।  गंगा जमुनी तहज़ीब है।     

फिर अगर नबी की मिलाद इतना बड़ा शिर्क है नबी ने नहीं बनाया, सहाबा ने नहीं बनाया क़ुरआन से साबित नहीं हदीस से साबित नहीं।  लेकिन एक इस्लामिक रियासत दुबाई, अबू धाबी, क़तर, ओमान में तो तुमने खुद शिर्क के अड्डे का इफ़तेहताह कर दिया।  बुतपरस्ती तो सबसे बड़ा गुनाह है और हर जगह क़ुरआन इसकी मुख़ालेफ़त करता है। नबी की हदीस है की इस्लामिक रियासत कुफ्र शिर्क और बुतपरस्ती से आज़ाद हुई। 

दूसरी बात यूं.ऐ.ई. का हाकिमे वक़्त ख़लीफ़ा खुद उस शैतानी मूरत को अपने सर पर रख कर आलिशान मंदिर में नसब करने गया था।  तीसरी बात वोह मंदिर किस के कहने पर बनवाया एक ऐसे दरिंदा सिफ़त दज्जाल फ़िरोंन के कहने पर बनवाया जिसके मुल्क और हाकिमियत में पैग़म्बर की अज़मत में बदकलामी की जाती है क़ौमे मुस्लिम पर तशद्दुत की जाती है जान से मार डाला जाता है जिनकी मस्जिदों पर डाका डाल कर उनको गसप कर लिया जाता है।  जहाँ क़ुरआन को आतिशे नार किया जाता है, जहाँ मदरसों को मिस्मार कर दिया जाता है, जहाँ शरीयत को ख़तम कर देने की साजिश की जा रही है।  जहाँ हिजाब में एक खातून को रोड पर बरहना किया जाता है।   जहाँ दुख्तरान मिल्लत की इज्तेमाई अस्मत रेज़ी  की जाती है।    #गुजरात #मुज़्ज़फ़्फ़रनगर

Zuber 

Kashi Mosque case Verdict, is the booster of bitter pill for the Genocide of Muslims.

 

AUTONOMOUS JOURNALIST

Kashi Mosque case Verdict, is the booster of bitter pill for the Genocide of Muslims. 

https://autojourna.wordpress.com/2022/09/13/kashi-mosque-case-verdict-is-the-booster-of-bitter-pill-for-the-genocide-of-muslims/

Thursday, 8 September 2022

शेर की खाल में छुपे भारतीय गीदड़ (भेड़िये)

अज़ीज़ नाज़रीन,

अज़ीम इस्लामिक रियासत पाकिस्तान का एशिया कप में अफगानिस्तान पर फतह का परचम लहराना था की उस फतह की तकलीफ और जलन भारत में मौजूद गीदड़ों, संघी दहशतगर्दों के दिलों दिमाग पर एक जूनून पैदा करने लगी।  जितने भी भारतीय गीदड़ इस्लामिक रियासत यूनिटेड अरब अमेराब में एक दरन्दाज़ के जैसे भारत को फाइनल में देखने की आरज़ू लिए दाखिल हुए थे उनकी आरज़ू चकना चूर हो गयी।  उनका तमाम जादू टोना टोटका मंतर का असर ज़ाइल हो गया और भारत के हाथ लगी ज़लालत भरी हकाल पट्टी।

दिल के अरमा, आसूओं में बह गए।

अब ऐसे में अपनी मायूसी का ग़ुबार किस के ऊपर निकालते तो उन भारतीय गीदड़ों ने अफ़ग़ान शेरों की खाल पहन कर दंगा फसाद मचाना शुरू कर दिया।  वैसे भी भारत के संघी, शिद्दत पसंद काफिर और बीजेपी वाले दहशत मचाने में मशहूर हैं।  जब वोह अपने खुद के मुल्क को बर्बाद किये जा रहें हैं तो एक इस्लामिक रियासत को कैसे बख्शेंगे।  उसको तो बेदर्दी से बर्बाद करने में सरे फेहरिस्त रहेंगे।

फिर इन भारतीय संघी और शिद्दत पसंद काफ़िरों ने अफ़गानी क्रिकेट यूनिफार्म में पाकिस्तानी फेन्स पर अपना ग़ुबार निकाला और उनके ऊपर कुर्सियां फेंकी मार पीट की गई।  ताके सभी को ऐसा लगे की अफगानी और पाकिस्तानी लड़ रहें हैं।  जबकि वोह अफ़ग़ानी शेर नहीं बल्कि वोह  संघी, कट्टरपंथी काफ़िर और भारत से आये हुए अफ़ग़ानी खाल में छुपे भारतीय भेड़िये हैं।   दूबाई हुकूमत से गुज़ारिश है इनको पकड़ कर इनका पिछवाड़ा लाल करो सब क़ुबूल देंगें किस के इशारे पर हंगामा किया है। 

दरअसल इनको काफिर शिद्दतपसन्द टीम को फाइनल में देखने की खूब आरज़ू थी।   जब आस टूटी तो इन काफिरों की टोटी टूटी और इन्होने हंगामा मचा दिया और नाम अफगानिस्तान पर लाद दिया।  अगर सबसे ज़्यादा इज़ा और तकलीफ अफगानिस्तान की शाकिस्त से किसी को हुई है तो वोह भारत को हुई है ना की अफगानिस्तान को हुई होगी।  फिर पाकिस्तान की शाकिस्त से सबसे ज़्यादा फायदा किस को होने वाला था भारत को ना की अफ़ग़ानिस्तान को।  आस फाइनल खेलने की भारत की थी, अफगानिस्तान को भी इल्म होगा की हम फाइनल में हरगिज़ नहीं पहुंच सकेगें।  क्योंकि अगला मुक़ाबला भारत से होगा।   इस मुद्दे पर जो भी अवाम ट्वीट कर रहें हैं उनको मामले की पूरी तहक़ीक़ात से आगाह किया है और उनको ५-७ ट्वीट किये हैं।

की हगामा करने वाले अफ़ग़ानी नहीं बल्कि भारतीय हैं।  जहाँ तक मैदान पर झगडे दंगा फसाद का सवाल है तो वोह भी अफ़ग़ानी नहीं बल्कि अफ़ग़ान टीम में मौजूद भारतीय ग़ुलाम सोच है।  अफ़ग़ानिस्तान की तो अपनी कोई टीम ही नहीं है।  दूबाई में मुक़ीम भारतीय और पाकिस्तानी अवाम को ले कर टीम बनाई गई है। अफ़ग़ानिस्तान की टीम के झगड़ू वैसे ही हैं जैसा की भारत का गुज्जू दलाल इरफ़ान पठान और कैफ़ जैसे दरिंदे मुसलमानों पर लानत है इन जैसे ज़मीर फ़रोश ग़ुलाम सोच और मोदी भक्ति पर, जब जब पाकिस्तान के खिलाफ मैच होता था भारतीय संघी दहशत तो खुद आगे नहीं बढ़ते थे और इन जैसे ज़मीर फरोशों को आगे कर के दंगा करवाते थे।  वही हाल अब अफ़ग़ानिस्तान की टीम के साथ है। 

ऐसी ही हालत अभी हाल ही में खेले गए टी-२० आलमी कप में हुई थी तब भी अफ़ग़ान की पाकिस्तान पर फतह के ऊपर भारतीय टीम सेमी फाइनल का खवाब सजाये बैठी थी।  लेकिन हुआ उसके उल्टा जैसा की  एशिया कप में हुआ है पाक जीत गया फिर किया था वही हंगामा अफ़ग़ानिस्तान का पाकिस्तान के फेन्स को मार पीट करना लहू लूहान करना।  उस वक़्त भी लिखा था की सभी को मालूम है की एक मैच जीत कर अफ़ग़ानिस्तान सेमी फाइनल में नहीं पहुंच सकता, लेकिन पाक की हार से भारत की सेमी फाइनल में पहुंचने की उम्मीद जाग जाती सो पूरी नहीं हुई और हिंदुस्तानी फेन्स ने अफगानी यूनिफार्म में दंगा फसाद मचा दिया था।    

दूबाई हुकूमत से एक गुज़ारिश और है इन स्टेडियम में दंगा फसाद करने वालों कुर्सी तोड़ने वालों पाकिस्तानी फेन्स पर जान लेवा हमला करने वालों को गिरफ्तार किया जाए।  और पकड़ कर ऊदा नीला कर के पूछ ताछ की जाए सब उगल देंगें के किस के इशारे पर इन्होने यह गन्दी हरकत की है।  नुकसान की भरपाई का हर्जाना भारत में बैठे इन काफिर आतंकवादिओं के आक़ा और आतंक के सरगना मोदी से वसूल किया जाना चाहिए।  जब माल लगा है घटने लगा कलेजा फटने।  इन काफिरों को आर्थिक पनिशमेंट के साथ साथ पीनल पनिशमेंट भी होनी चाहिए।  

सख्त सज़ा होना चाहिए ताके मुस्तक़बिल में ऐसी वाहियात हरकरत कोई ना कर सके।  नहीं तो भारत से आने वाले तमाम फेन्स से वीसा देते वक़्त एक बांड लिख कर लेना चाहिए, की कोई दंगा फसाद नहीं करेगें। 

Zuber

चंद्रयान के ५ इंजिन वाले हिन्द की ज़लालतभरी हकाल पट्टी

मेरे अज़ीज़ मेरे हमदम मेरे मोहसिन, 

बिल आख़िर हो गया हिन्दुस्तान एशिया कप से बहार।   लंगूर लँगूरनियाँ और यू ट्यूबर आसरे के टटटू ऐसी बिल्ली जिसको अपने ख़्वाब में सदा गाये का गोश्त ही दिखता है जिस हिसाब से अदद शुमारी का हिसाब किताब लगा रहे थे और किसी करामात या मोजज़े की तवक़्क़ो कर रहे थे उस उम्मीद की आस को भी दीफ़ाई फ़ौजिओं ने फांसी दे दी।   इन काफ़िर शिद्दतपसंदों की ख़बीस जोड़ घटाओ का हिसाब देखिये यह चाहते थे की अगले तमाम मैच पाकिस्तान हार कर बहार हो जाए और भारत फाइनल में आ जाए।  

करामात या मिरेकल हो भी जाता लेकिन किस बुनयाद पर अगर हूकूमते हिन्द ने मुसलमानों की लाशें नहीं गिराई होती अगर मुसलामानों के मकान दूकान रोज़गार नहीं गिराए होते अगर मुसलमानों के मदसरों को तबाह नहीं किया होता, मुसलमानों के मज़हबी और इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वरज़ी नहीं की होती, मुसलमानों की किताब की बेहुरमती नहीं की होती मुसलमानों के पैग़म्बर की बेहुरमती नहीं की होती हुकूमत ने दहशतगर्द हमले नहीं किये होते, अगर फ़िरक़ावाराना ज़हर नहीं फैलाया होता तो बिलकुल मिरेकल हो जाता।  ना सिर्फ भारत एशिया कप के फाइनल में खेलता बल्कि फतह भी उसी की होती। 

१९८३ वर्ल्ड कप याद है वेस्ट इंडीज जैसी अज़ीम टीम वोह सियाह आंधी जिसको रोकना किसी के बस में नहीं था।  लेकिन उस ताक़त को भी रूहानी और जज़बाती करामाती लोगों ने रोका।  पूरा ना सिर्फ भारत बल्कि पाकिस्तान में भी अवाम दूवा कर रहे थे।  क्योंकि उस वक़्त हालात मुख्तलिफ़ थे।  टीम और हुकूमत के दिलों दिमाग़ में संघी ज़हर नहीं भरा हुआ था।  कपिल देव, गवास्कर और किरमानी जैसे अज़ीम खिलाड़ी थे।  जिनके अंदर खेल का जज़बा था ना की दिमाग़ फुतूर और फ़िर्क़ा वाराना ज़हर।  

हालांकी मौजूदा भारतीय टीम बोहोत ही बेहतरीन टीम है और तमाम खिलाड़िओं ने बेहतरीन भाईचारगी का मुज़ाहेरा किया है।  मौजूदा टीम के लिए तल्ख़ अलफ़ाज़ इस्तेमाल करने का दिल नहीं है।  ख़ास विराट कोहली और कप्तान रोहित शर्मा से ख़ास हमदर्दी हो रही है।  विराट का कॅरियत तबाह करने के पीछे कोई तो ज़ाफ़रानी या संघी साजिश है।  क्योंकि विराट ने जो अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में फैसले लिए, ऐसा ना करने के लिए उनको बड़े बड़े ज़ाफ़रानियों का दबाओ आया था।  लेकिन विराट सख्त हो गए। 

मौजूदा टीम भारत को सज़ा हुकूमत की हरामखोरी अक़लियत ख़ास मुस्लिम, क्रिस्टी, सिख अवाम की हक़तल्फ़ी और लंगूर लँगूरनियों की ज़हरीली बोली की मिली है।  ज़ाफ़रानी लँगूरनियाँ जो अपने आपको सहाफ़ी बोलती है लेकिन ज़हर इतना की पाकिस्तान का नाम आते ही आग बबूला हो जातीं हैं।  पहले ही कंगाली अब कितने टीवी टूटेंगे।  और ज़हर इतना भरा हुआ है, हर मुद्दे पर पाकिस्तान को कोसती रहती है।

दूसरा वोह तिहाड़ी क़ैदी जिसको हर मुद्दे पर पाकिस्तानी लिंक मिल जाता है।  आलामी कप में भारत की पाकिस्तान से हार पर मोहम्मद समी को हाशिये पर लिया था उसको पाकिस्तानी बोला था और इस बार हरदीप सींग को खालिस्तानी बोला जा रहा है।  लेकिन मज़े की बात तो यह है की इन सब चीज़ों में संघी ज़हर, शिद्दत पसंद काफिर, बीजेपी की आई टी सेल ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि पाकिस्तानी ज़िम्मेदार हैं।  वह क्या सीन है।  अगर एक इंसान पाकिस्तान को मदद कर रहा है और उसको पाकिस्तान ने ही या आई. अस.आई. ने ही एक्सपोज़ कर दिया के यह हमारा आदमी है तो फिर से अगली मदद कैसे मिलेगी।  साफ़ ज़ाहिर है की यह झूट फरेब फैलाना और पाकिस्तान को बदनाम करने का काम भारत में बैठे संघी ज़हर, शिद्दत और बीजेपी की आई टी सेल का है। 

बरहाल अगरचे मौजूदा टीम में ज़हरीले कीड़े सुरेश रैना, गौतम गंभीर या वीरेंदर सेहवाग पाकिस्तान से ज़हर रखने वाला इरफ़ान जैसे दहशतगर्द ज़ेहनियत मौजूद होते तो इस सहाफ़ी  की क़लम से ज़बरदस्त धुलाई की जाती।   इतनी पिटाई होती की आती नस्ले उस भारतीय टीम की गंजी पैदा होती। 

मौजूदा हालात में अब तमाम आलम से इन शिद्दत पसंद काफ़िरों, संघी दहशतगर्दों, बीजेपी वालों की ज़लालत भर हकालपट्टी होना शुरू हो गई है।   इंग्लैंड क्रिस्टी मुल्क में मोदी भक्त, संघी ज़हर गाये का नाजिस्त खाने पीने वाले की सियासी हकालपट्टी हुई अब इस्लामिक मुल्क से मैच में हुई।      

भारत के साथ ऐसा तो होना ही था। तुम दूसरों के लिए खड्डा खोदोगे तो उसमे तुमको ही गिरना है।  भारत के अवाम, सहाफ़ी और कट्टरपंथी हिन्दू टीम पाकिस्तान के साथ मैच एक जंग के जैसे पुरानी हार का बदला लेने के लिए खेलते हैं।  जबकी पाकिस्तान जीत के लिए खेलता है।  हमारे मकान दूकान और मदरसे गिराओगे और उम्मीद हमसे दुआ की रखोगे ऐसा नहीं होगा। अल्लाह उसके रसूल की बेहुरमती करोगे और तवक़्क़ो की वोह तुम्हारी टीम को फाइनल में पहुचाये तो ऐसा नहीं होगा

नाज़रीन चंद्रयान याद है महान साइंसदान नरेन्द्रभाई मोदी उनके इसरार पर ५ इंजन लगाए थे जबकी इसरो के साइंसदान ३ इंजन पर उसको उड़ाने के मुवाफ़ेक़त में थे।  क्या हुआ मंज़िल से महज़ ५ किलोमीटर पर ग़र्क़ाब हो गया, तबाह हो गया बर्बाद हो गया।  यह महान शख्स मोदी भाई हर उस इल्म में इसको महारत है जहाँ इसकी कोई हाजत नहीं होती।  कभी यह फौजी सिपह सालार बन जाता है और फौज की कारगरदेगी में दखल अंदाज़ी करने लगता है।  आज बादल है पाकिस्तान को तुम्हारे जहाज़ नहीं दिखेंगे जाओ हमला कर दो।  नतीजा भारत ने अपने दो फ़िज़ाई तय्यारे तबाह करवा लिए और एक पायलट अभिनन्दन की गिरफ्तारी हुई।  

Zuber

Wednesday, 7 September 2022

क्या पाक में फिर इमरान आ गए? ५ अदद हिन्द पर पड़े भारी।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हिन्द पाक का मुक़ाबला हर वक़्त नब्ज़ को जमा देने वाला किसी जंग से कम नहीं होता है।  दुबाई में खेले गए एशिया कप के सुपर ४ का मैच भी ऐसा ही साबित हुआ।  उस मैच में जिस तरह का आग़ाज़ हुआ था और हिंदी बेटिंग उससे ज़ाहिर हो चला था की पाक की जानिब से भी इन्तेक़ामी हिकमते अमली का मुज़ाहेरा देखने को मिलेगा।  हुआ वही जिसकी उम्मीद थी पाक की जानिब से खूब जारिहाना मुज़ाहेरा देखने को मिला।  

नाज़रीन कुछ बातों की जानिब आप हज़रात की तवज्जो चाहूंगा।

१.           जैसा की इससे क़ब्ल बयान किया जा चूका है हिन्द के ऊपर ५ का अदद काफी भारी है और हिन्द की ५ तक़सीम भी मुतव्वाक़्क़ो है।  बरोज़ ३१ को गणपती बैठे थे और ४ सितम्बर को ५चवें दिन का वित्सर्जन था।   मेरी बिल्डिंग के बाज़ू में शिद्दत पसंद काफिरों की बस्ती (बिल्डिंग) है उसमे बीजेपी के रकूने असेंबली का दफ़तर भी है। उस बिल्डिंग में मारवाड़ी, जैनी, गुज्जू शिद्दत पसंद हिन्दू रहतें हैं।  जहालत की हद दर्जे को पार करते हुए। रात को १२-०१ बजे तक शराबख़ोरी कर के इस क़दर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना हँसना फ़िरक़ावाराना इश्तेआल अंगेज़ी भरे नारे लगाना।  उनके लड़के लड़कियां हर दम छत पर टंगे रहते हैं।  जब मेने फ्लेट लिया था तब उस जगह खाली मैदान था अगर इल्म होता की इस क़दर जाहिल और दहशतगर्दाना ज़ेहनियत अवाम आ कर पड़ोस में रहेगा तो हरगिज़ फ्लेट नहीं लेता।  

२.       भारत का पहला मुक़ाबला पाक के साथ था और भारत ने अपने पहले ही लीग मैच में पाक को हराया था उसके ऊपर ज़हरीली ज़ुबान जो बोली जा रही थी।  उसका कफ़्फ़ारा भारत को देना था।  हर मुद्दे पर बदला लेना।  लंगूर और लँगूरनियाँ पाक को हरा कर वर्ल्ड कप की हार का बदला ले लिया ऐसा बोल रहे थे।  अब तो टूर्नामेंट से ही बहार हो गए।  हकाल पट्टी।  जब ज़हरीली ज़ुबान बोलोगे और वोह भी पाकिस्तान के लिए तो हमें अपने मुक़ाबिल पाओगे और वहीँ से भारत के ऊपर गर्दिश के बादल मडराने लगे थे।  क्योंकि जो लंगूर और लँगूरनियों की ज़हरीले बद ज़ुबानी थी तो उसका ख़मयाज़ा तो उनको भुगतना ही था।  पाकिस्तान के साथ जंग।  इन जंगी मरीज़ों को हर मुद्दे पर जंग ही दिखाई देती है।  खेल के मैदान को भी जंग का मैदान बोलतें हैं। 

 ३..   बात वही है की इमरान खान का ख़ौफ़ इन भारतीयों और उसके हाकिमों पर इस क़दर हावी हो चूका है की हार के बाद मेरे मज़मून में इमरान का ज़िक्र ही उनको सुपर ४ में पाकिस्तना से शाकिस्त का एक मुद्दा बन गया। 

       बताने का मक़सद वही है कुफ्र अपने बोहोत से डाव खेला है शैतानी हर्बे जादू टोना टोटका इंसान बोहोत कुछ ततबीर करता है प्लानिंग करता है लेकिन ततबीर प्लानिंग वही कामयाब और अमलपेरा होती है जो मेरे रब ने की होती है।  चाहे कुछ भी कर लो होगा वही जो मेरे रब ने सोच लिया होगा।  हिन्द के इस बटवारे में इन हिन्दुओं की शिद्दत, संघी, बीजेपी, मोदी और अमित ज़िम्मेदार हैं।   

Zuber

Sunday, 4 September 2022

गौ दहशतगर्द को दी गई फ़ासी।

नज़रिने गिरामी,

दीफ़ाई फ़ौजिओं की कारगरदेगी से अवाम खासे मुतमईन और खुश नज़र आ रहें हैं।  सूबे शुमाल में दीफ़ाई फ़ौजिओं की पकड़ मज़बूत होती जा रही है।  जो इन्साफ ज़ाफ़रानी फ़िरक़ापरस्त अदालियाँ  मज़लूमीन को नहीं दे पाई वोह दीफ़ाई फौजी अदालत दे रही है।  हर हूजूमी मारा जाएगा, हर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द, हर शिद्दत पसंद काफिर हर बीजेपी वाला दीफ़ाई गिरफ्त में है।  कभी भी उसको उठा कर फांसी दे दी जाएगी।    

सूबे शुमाल के कानपुर देहात में एक मंदिर के अतराफ़ के अंदर गौदहशतगर्द को ख़ामोशी से फांसी पर लटकाया गया।  यहाँ तक की इस दहशतगर्द को फांसी दी जा रही है यह हिकमते अमली इतनी ख़ामोशी से की गई की उसके अहले ख़ाना तक को उसकी भनक नहीं लगी।  सुबह उस दहशतगर्द की लाश फांसी के फंदे से झूलती हुई मिली।  ज़ाफ़रानी दहशतगर्द को अकबरपुर कोतवाली हलके के ज्योतिष गांव में अल ऐलानियाँ खुले आसमान के नीचे मैदान में अवाम के सामने फांसी दी गई। 

दीफ़ाई अदालत ने कानपुर देहात में मवेशियों के नाम पर दहशत मचाने वाले  ५२ साला गौ दहशतगर्द राजेश द्विवेदी को १० रोज़ क़ब्ल आवारा मवेशिओं को अपने क़ब्ज़े में ले कर अवाम पर मार पीट करने और उनका वीडियो बना पर खाकी दहशतगर्दों को शिकायत करने के इलज़ाम में गिरफ्तार किया था।  उसके ऊपर दीफ़ाई फौजी अदालत में मुक़दमा चला था।  जहाँ पर उसको गाये के नाम पर फिरौती मांगना, क़तल करना, दहशत मचाना, गायों की स्मगलिंग जैसे संघीन जुर्म का मुजरिम पाया गया।  जिसमे अदालत को फांसी ही सबसे ज़्यादा मुनासिब सज़ा दिख रही थी।  जूरी ने एक एक सूर से फांसी की सज़ा को तज़वीज़ किया।  उस दरिंदे, ज़ालिम, गौ दहशतगर्द को अल सुबह फांसी पर लटका दिया।  

इससे क़ब्ल शुमाली हिन्द के सूबे हरयाणा के मेवात में १६ अगस्त को गौ दहशतगर्दों  की टीम पर दीफ़ाई हमला हो गया था।  इन दहशतगर्दों पर दीफ़ाई फ़ौजिओं ने घात लगा कर हमला कर दिया था.  जिसमे एक गौ दहशतगर्द को बेरहमी से पीटा था, जिसे नूह मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था।  

नाज़रीन तब की कांग्रेस हुकूमत ने  भाई अफ़ज़ल गुरू की ख़ामोश फ़ासी दी थी।  हालांकी इससे क़ब्ल उसी तर्ज़ पर कई ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ज़ाफ़रानी अदालियाँ के फ़िरक़ापरस्त जजों, हूकूमती ज़ाफ़रानी ज़हन कारिंदों और आला ओहदेदारों को ऐसे ही ख़ामोश फ़ासी दी गयी है।  और भाई अफ़ज़ल के Judicial Murder का क़िसास लिया है। 

भाई अफ़ज़ल नहीं हम शर्मिंदा हैं, आपके क़ातिल अब नहीं ज़िंदा हैं। #Pranb

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...