अज़ीज़ नाज़रीन,
किसानों का तमाम शुमाली हिन्द पर हुआ क़ब्ज़ा फ्री किये गए तमाम टोल प्लाज़ा। मज़ीद आगे की जानिब बढ़ने के इमकान। हुकूमत चलाने की ज़िम्मेदारी बजाये किसी ज़ालिम डलहौज़ी को देने के इन किसानों को दे देना चाहिए। कम से कम जनता के फलाही कामों को तवज्जो तो मिलेगी। आज के दौर में अगर आम जनता को पेट्रोल और डीज़ल के बाद सबसे बड़ा झटका सड़क पर चलने से लगता है तो वोह है टोल का झटका।
दहशतगर्दों के क़त्ल, ज़ुल्म, नाइंसाफी, हड़प नीती, और ज़िना बिल जब्र, गिरोह गर्दना ज़िना जैसे संगीन जुर्म जब हद से ज़्यादा बढ़ गए तब भी भारत की हिजड़ा अवाम सड़कों पर नहीं निकले, लेकिन भला हो भारत ख़ास पंजाब, हरयाणा, राजिस्थान के किसानों के उन्होंने हुकूमत और ख़ास दहशतगर्दों को साफ़ पैगाम दे दिया है। किसानों ने आज से तमाम टोल प्लाज़ा पर क़ब्ज़ा कर के उनको फ्री कर दिया है। जिससे आम जनता को राहत और सुकून मिला है। वैसे भी देश में तक़रीबन तमाम टोल प्लाज़ा हुकूमती नुमाइंदों और मंत्रियों के हैं। इनमे तो कई १९९०-९५ में बनाये या उससे भी पहले बनाये गए थे और उस सड़क या पूल की लागत से कई गुना ज़्यादा वसूला जा चूका है, लेकिन अभी तक उनसे पैसा वसूल किया जाता है।
आज भारत के तमाम अवाम को किसानों का साथ देना चाहिए और इस ज़ालिम लार्ड डलहौज़ी की कंपनी बहादुर वाली गुलामी से अवाम को आज़ादी दिलवाना चाहिए। लार्ड डलहौज़ी भी ऐसा ही करता था, विस्तारवादी नीती के तहत जो आज़ाद रियासतें या मुल्क उसकी मुख़ालेफ़त करते थे उनके ऊपर फौजी हमला करता था और जो रियासतें कंपनी बहादुर की मिलकियत हो गई उनके ऊपर ज़ुल्म करता था।
आज का मौजूदा काश्त बिल माज़ी के डलहौज़ी के (Doctrine of Lapse) या हड़प नीती का जदीद रूप है। मौजूदा डलहौज़ी कंपनी बहादुर के बजाये अडानी और अम्बानी बहादुर को फायदा देना चाहता है। लेकिन इस जदीद डलहौज़ी की हिकमते अमली पुराने डलहौज़ी से काफी मेल खाती हैं। ख़ैर जिस देश में ज़मीन का सीना चीर कर अपने मर्ज़ी के बीज डालने वाले जांबाज़ किसान मौजूद हैं उस ज़मीन को कोई ज़न्खा डलहौज़ी क्या बेच पायेगा। दहशतगर्दों को ज़बरदस्त शाकिस्त होगी। जब माज़ी का ज़हीन, ताक़तवर और पड़ा लिखा अंग्रेज़ डलहौज़ी नहीं जीत पाया तो इस दौर का एक चाय वाला अनपढ़ गवार हिजड़ा डलहौज़ी की खाल पहले कर क्या जीत पायेगा। मतलब इन किसानों के बाप दादा डलहौज़ी नामक शेर से भीड़ चुके हैं तो इनकी नस्लें शेर की खाल में भेड़िये से क्यों डरेगी।
किसानों के हौसले को सलाम उन्होंने दिखा दिया जो किसान डलहौज़ी, शैतान, दहशतगर्दों, ज़ालिमों, दरिंदों, भगवा क़साइयों, जनखों को अन्न ऊगा कर दो वक़्त की रोटी मोहिय्या करतें हैं अगर वतन की इज़्ज़त और ज़मीन के सौदेबाज़ी का मामला आ जाए तो इतहास गवाह है गंगा की सौगन्द जब जब धरती या वतन की इज़्ज़त पर आंच आई है किसी दुष्ट, पापी ने इस धरती पर हमला किया है किसानों ने अपने हल को हथियार बना कर राक्षसों और ज़ालिमों से मुक़ाबला किया है।
यह खाकी दहशतगर्द बोलता है की हम किसानों पर एक्शन लेंगें क्या एक्शन लेगा तू, अब किसानों के साथ भारत का अवाम भी आ चूका है। अगर कोई नहीं आया है तो बस तुझ जैसा हूकूमती और अंग्रेज़ों का ग़ुलाम। जो पहले अंग्रेज़ों का गुलाम था अब अंग्रेज़ों के गुलामों का गुलाम।
भारत को टोल फ्री करके किसानों ने दिखा दिया की वोह सिर्फ हल चलाना ही नहीं जानते परन्तु मौक़ा मिले तो वोह आज के दौर के हिजड़ों और डलहौज़ी से ज़्यादा अच्छी और साफ़ सुथरी सरकार चला सकतें हैं।
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