Tuesday, 28 November 2023

भारत का मुसलमान लाचार कमज़ोर ईमान।

अज़ीज़ नाज़रीन,

२०२४ के इन्तेख़ाब के लिए तमाम सियासी जमातों ने कमर कस ली है।  जिसका असर हाल ही में हुए सूबों के इन्तेख़ाब में ख़ूब देखने को मिल रहा है।  ऐसा महसूस हो रहा है ज़ाफ़रानी महाज़ सभी सूबों से ग़ायब होने वाली है।   ताहम जिन सूबों में इन्तेख़ाब हो चूकें हैं वहां मुख़ालिफ़ ज़ाफ़रानी महाज़ हवा ख़ूब देखने को मिल रही है।  सूबे शुमाल में साधू के ऊल जलूल फ़ैसले और मुस्लिम अवाम को हरसा करने की वजह ही वही समझ में आ रही है की ज़ाफ़रानी महाज़ का बोरिया बिस्तर बंद होने वाला है।

तमाम सियासी तंज़ीमों यहाँ तक ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी से भी २०२४ के लिए यही मुतालबा होगा अगर उनको मेरी तंज़ीम के नुमाइंदों के वोट चाहिए तो उनको अपने मेनिफेस्टो में यह बात दर्ज करना होगी अगर हम इन्तेख़ाब जीत गए तो २५ करोड़ मुसलमानों को ३७० की तर्ज़ पर ख़ुसूसी दर्जे का मुस्लिम सूबा देंगें या एक अलहदा रियासत की बात करें।   जिसमे अदालतें, वज़ीर ए आज़म, एवान, सदर ए ममलकत, इन्तेज़ामियाँ, बल्दिया सभी मुस्लिम अवाम के लिए वक़्फ़ होना चाहिए।  मरकज़ के पास महज़ फ़ौज और करेंसी का इख़्तेयार होना चाहिए।  हमारे उस मुस्लिमों के सूबे में किसी भी क़िस्म की बाहरी (भारत) की क़ुव्वत की कोई मदाखलत नहीं होना चाहिए।     

बोहोत ज़ुल्म हो गए मुस्लिम अवाम पर हर जानिब ज़ाफ़रानी दहशत को एक आसान हदफ़ मुस्लिम अवाम ही दिखता है।  किसी भी मुस्लिम को कभी भी गिरफ्तार कर लिया जाता है।  सहाफी खुले आम मुस्लिम बच्चिओं को हिन्दू बनाने की बातें अवामी टीवी पर करतें हैं।  यह सब बातें कहाँ जा कर रूकेगी। 

किसी भी मुस्लिम नौजवान को साधू, हेमंत, नरोत्तम, कट्टर जैसे ज़हरीले कीड़े गिरफ़्तार करतें हैं फिर उनका कोई पुरसान ए हाल नहीं होता है।  अदालतों में ज़ेर गौर मुस्लिम नौजवान जेलों में सड़ रहें हैं।  ना ही उनकी सज़ा पर कोई फैसला हुआ है और ना ही उनका मुद्दा अदालतों के सामने रखा गया है।  इसलिए ना ही उनको बैल मिलती है और ना ही उनकी सुनवाई होती है।  यह नाइन्साफ़ी ख़तम करना होगी।  

भारत के २०% मुस्लिम अवाम लेकिन कमज़ोर उनकी क़ियादत करने वाले सियसतदांओं को थोड़ी समझ होना चाहिए।   भारत में योगी, अमित, हेमंत, नाथूराम (नरोत्तम) के आतंकवादी कभी भी कही भी किसी भी मुस्लिम को गोली मार देतें हैं।  पुलिस की निगरानी में हिन्दू आतंकवादी मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट को गोली मार देतें हैं।   भारत की सहाफ़त है की मुस्लिम किरदार कुशी करती है।  ज़ाफ़रानी हुकूमतों में मुसलमानों की बस्तियां ऐसी उजाड़ी हैं जैसे कोई फ़िज़ाई हमले किया हो।  मुसलमानों की मस्जिदें गसप की जाती हैं।  तोड़ दी जाती हैं।  मुस्लिम अवाम से ज़बरदस्ती ऐसे नारे लगवाए जातें हैं जो उनके मज़हबी अक़ीदे की खिलाफ़वरज़ी करते हैं।  हर हलके में हिन्दू दहशत गले फाड़ फाड़ कर नारा लगाते हैं।तफ़रीह फिल्मों में सिर्फ और सिर्फ इस्लाम. मुस्लिमानों और पाकिस्तान के खिलाफ बदगुमानी ज़हर फैलाया जाता है।  अगर यह हिन्दू दहशत ज़ुल्म बर्बरियत का क़िस्सा ख़तम नहीं हुआ तो हो सकता है कोई अबू ओबेदा भारत में भी पैदा हो जाएँ।  जिनका नाम लेने से पहले ही योगी अमित हेमंत नाथूराम का पेशाब निकल जाए।

वैसे भी तमाम भारत में मुसलमानों के खिलाफ लंगूर जमात ने इतना ज़हर भर दिया है की उनको इस माहौल में कोफ़्त होती है।  हर जगह उनको पाकिस्तानी, गद्दार, भारत के दुश्मन, आतंकवादी बोल कर मुखातिब किया जाता है।  उनके हर तेहवारों पर दंगा फसाद होता है।  चाहे वोह ईद हो या ईद ए क़ुर्बान चाहे वोह ईद मिलाद हो या मुहर्रम।  ठीक है हम खाते हैं गाये, बैल, भैंस, ऊँट, मुर्गा, बकरे का गोश्त अगर हिन्दू समाज के जज़बात हमारे खाने से टूटते हैं तो हमको अलहदा सूबा दो।  

उस सूबे में शरिया क़ानून नाफ़िज़ किया जाएगा अगर कोई मुनाफ़िक़ या मुनाफ़िक़ा पाई जाती है जो इस्लामिक क़ानून की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करती या करता है या हिन्दू हो कर मुस्लिम नाम रख कर इस्लाम के ख़िलाफ़ बदगुमानी पैदा करती या करता है मुस्लिमानों में इन्तेशार फ़ैलाती या फ़ैलाता है या सूबे की हुकूमत के ख़िलाफ़ ऐसा झूट फ़ैलाता  या फ़ैलाती है जो हक़ नहीं है तो उसका होगा सर तन से जुदा।   

२०२४ में मुसलमानों को अपनी अलहदा पहचान चाहिए।  आज जिन यहूदिओं के लिए लंगूर लँगूरनियों की छाती से दूध टपक रहा है।  अगर मुस्लिम अवाम को उनकी अलहदा पहचान नहीं दी गई और हालात वैसे ही रहे जैसे आजकल हैं तो २०२४ से ले कर २०३० भारत के लिए बोहोत  बोहोत सख़्त होने वाला है।   

अब मुस्लिम अवाम मज़ीद ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं करेगा।  कभी कपड़ों से पहचाने वाले आज मुस्लिम ड्रेस कोड को इख़्तेयार कर के रक़्स कर रहें हैं।  एक तरफ तो ज़ालिम दरिंदे शैतान जल्लाद क़साई को मुस्लिम पहनावे और अज़ान से इतनी तकलीफ है दूसरी तरफ़ बुर्का पहन कर रक़्स किया जा रहा है।  अब वोह बजरंगी, संघी, लंगूर लँगूरनियाँ कहाँ गए किस भोग में जा छुपे जो सूबे शुमाल में बच्चियों के बुर्का पहन कर क्लास पर आने और इम्तेहान देने पर आग बबूला हो जाते थे।  पूरे कॉलेज में बुर्का पहन कर लड़किया स्टेज पर आई तो आग बबूला क्यों नहीं हुए।   कैसे किसी भी इदारे में उसके ऊपर रक़्स किया जा सकता है। 


पेशकर्ता जुबेर अहमद खान सहाफ़ी

Saturday, 25 November 2023

सुनों ज़ाफ़रानी मुनाफ़िक़ों लंगूर लँगूरनियों।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

आज जो तमाम आलम के आला तालीमी  आफ़ता मूमालिक और मग़रिबी, इसराइली और भारत का ज़ाफ़रानी सहाफ़त हमास को एक ज़ालिम तरीन दहशतगर्द तस्लीम कर रही है और उसकी किरदार कूशी कर अदना दर्जे के मज़मून कमर तोड़ दी, हमास का हौसला टूट गया ऐसी ख़बरे शाया की जा रही हैं।    

जबकी हक़ीक़त उसके बरक़्स सोशल मीडिया से पता पड़ती है।  ना ही हमास की कमर टूटी है और ना ही हौसला।  आज जिस हमास को ख़ास भारत की मीडिया की जानिब से ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त बोला जा रहा है उसी हमास की वजह से फ़लस्तीन के अवाम के चेहरों पर खुशी नुमाया हुई है।  जो मस्तूरातें, बच्चियां, मासूम बच्चे और मर्द इजराइल के ज़ुल्म का शिकार हो कर कई कई सालों से जेलों में क़ैद थे और हर रोज़ इजराइल की दहशत ज़ुल्म बर्बरियत को सेहन करते थे ऐसे कुछ १३० के क़रीब मासूम पहले मरहले के यर्ग़माल (बंधकों) की अदला बदली पर अपने अहले खाना से मिले।   

किसी की वालेदा को किसी की बीवी को किसी के बहिन को ज़ालिम दरिंदे दहशतगर्द इजराइल ने कई सालों से यर्ग़माल बना रखा था जब बिछुड़े हुए गले मिल कर रोये हैं तो किसी भी इंसान के आँखों से आंसूं निकलना आम बात है।  हाँ अब जो ज़ालिम की ताईद कर रहें हैं ज़ुल्म को भी मज़हब और ज़ात के चश्मे से देख रहें हैं उनको ऐसे मरमरी मिलन देख कर जलन होती है, उनके हिसाब से इजराइल के बंधक छूट जाना थे और फ़लस्तीन के लोग बीच रस्ते में ही हलाक हो जाते, इनको नहीं मिलना था।  फिर ऐसे लोग इंसान ही नहीं हैं बल्कि वोह तो हैवानों, शैतानों और रावण की औलादों में से हैं। 

फलस्तीन के बिछड़े हुए अवाम को यह खुशी किस की वजह से मिली सिर्फ और सिर्फ हमास की वजह से मिली है।  वर्ना इजराइल या भारत की मुसलमानों के लिए जेल एक मौत का कुव्वा है एक बार किसी भी मुस्लिम को झूठे इलज़ाम में गिरफ्तार किया की उसकी फिर जल्दी रिहाई नहीं होती है। 

जो लंगूर बोल रहें हैं की हमास की कमर टूट गई हौसला पस्त हो गया तो हमास के सरबराह अबू ओबेदा ने वाज़े अलफ़ाज़ में कहा है की जंग जारी रहेगी।  दूसरी बात इजराइल ने हमास की तमाम शर्तों मान कर जंगबंदी की है।   पहले तो इजराइल बोलता था किसी भी सूरत में जंग नहीं रूकेगी पहले इजराइल के बंधकों को छोड़ों और अब क्या हालात हैं तो कमर किस की टूटी है।   

वहीं इंस्टाग्राम पर हमास इजराइल की जंग की अपडेट देने वाले एक अकाउंट ने दवा किया है की नेतन्याहू का बेटा हमास से जंग करते हुए ढेर हो गया है।  यह ख़बर सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेस बुक पर तेज़ी से वाइरल है।   मुजाहिदो ने  नेतन्याहू को इससे क़ब्ल भी ज़बरदस्त घाव दिए हैं।  इस बार नेतन्याहू की लुगाई सारा का पहले शोहर डोरोन न्यूबर्गर से बेटा जनरल रबेल डोरोन न्यूबर्गर को मुजाहिदों ने ढेर किया है।  यह जनरल इजराइल का १०९वीं ब्रिगेड का कमांडर था और जंगी महाज़ का हिस्सा और क़यादत का जिम्मेदार था उसका ढेर होना इजराइल के लिए बोहोत बड़ा नुकसान और हमास मुजाहिदीनों के लिए बड़ी कामयाबी मानी जा रही है।     

जो हालात आज ज़ाफ़रानी भारत में हैं वही हू बहू हमास ने इजराइल को तोड़ फोड़ने से पहले थे।  ज़ुल्म की इंतेहा हो गई थी।  लेकिन मौजूदा इजराइल के क्या हालात हैं।  दुशमन के फौजी एक दो नहीं हज़ारों में मारे गए और अब इजराइल हमास की तमाम शर्तों को मान कर जंगबंदी करने को राज़ी हुआ है।  साधू योगी, हेमंत, नाथूराम (नरोत्तम) और मरकज़ का अमित की हुकूमतों में हर दुसरे रोज़ मुस्लिम अवाम को झूठे इलज़ाम में गिरफ़्तार किया जा रहा है।  "का" और "एन.आर.सी." दिल्ली हिन्दू दहशत के बाद की गई मुस्लिम गिरफ्तारियों में कई बेगुनाह ज़ेरे ग़ौर जेलों में सड़ रहें हैं।  अदालतें ज़ाफ़रानी दहशत और सियासत के पैरों तले दब चुकी हैं।  उनको हुकुम होता है की किसी भी मुस्लिम का केस अदालत के लिए जल्दी सुनवाए को नहीं आना चाहिए।  

किसी भी ज़ाफ़रानी दज्जाल ने पुलिस से किसी मौलवी के ख़िलाफ़ झूठी शिकायत कर दी के फलां बिन फलां लव जिहाद में मुलव्विस है या तब्दील मज़हब के लिए ज़िम्मेदार है पुलिस फ़ौरन गिरफ़्तार कर लेती है।  गिरफ़्तार करने से क़ब्ल ना ही कोई जांच की जाती है और ना ही शिकायत करने वाले की सदाक़त देखी जाती है की वोह झूठी शिकायत कर रहा है और उसका माज़ी और मौजूद क्या है।  संघ और शिद्दत पसंद हिन्दू तंज़ीमों से जुड़े हुए दहशतगर्द ऐसी झूठी शिकायत करते ही इसलिए है की एक सीधे मुसलमान को जेल में सड़ा दो। 

ऐसे हस्सास मसलों पर अपने मुस्लिम भाइयों को भारत के ज़ुल्म, दहशत और जेलों से छुड़वाने के लिए अब मुस्लिम अवाम को भी कमर कसना होगी।  ऐसे तो जेलों में तुम्हारे अपनों की जवानी बर्बाद हो जाएगी।  हमास को जो ज़ाफ़रानी आज कौस रहें हैं उन्होंने इन्साफ किया है।  जो नाइंसाफी एक तरफ़ा हिकमत ज़ुल्म दहशत बरसों से इस्राएल कर रहा था उसके उस ज़ुल्म बर्बरियत को रोका है। 


पेशकर्ता जुबेर अहमद खान सहाफ़ी

Friday, 24 November 2023

माल ए मुफ़्त दिल ए बेरहम।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मज़मून भारत के उन मुनाफ़िक़ों, ग़द्दारों, दोग़ले अवाम को वक़्फ़ है जो दूसरों को सलाह तो ख़ूब देतें हैं लेकिन जब उनकी ख़ुद की बारी उस सलाह पर अमल करने की आती है तो बिल में किसी चूहे की तरह छुप जातें हैं।  यह लोग अपना माल मेहफ़ूज़ रखतें हैं और दूसरों के असासों माल ओ दौलत ज़मीन जायदाद पर थर्ड पार्टी को नफ़ा पहुंचाने के लिए नज़र होती है।  

टॉनिक वाली बाई जैसी तमाम लँगूरनियों से ले कर तमाम संघी, शिद्दत पसंद काफ़िर और बीजेपी वाले फ़लस्तीन के अवाम पर अपने फ़लसफ़े दे रहें हैं।  यहूदीयों के लिए तो दुनियां में कोई मुल्क नहीं है बेचारे कहाँ जायेगें मुसलमानों के ५७ मुल्क हैं फ़लस्तीनी अवाम कहीं भी जा कर रह सकतें हैं।  क्या यहूदियों के लिए मुस्लिम बड़ा दिल नहीं कर सकते।  क्या मुस्लिम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ सकते।  

में उन तमाम मुनाफ़िक़ों से कहना चाहता हूँ जो पराई आग में हाथ सेंक रहें हैं यह आग जल्द ही उनके घरों तक पहुंचने वाली है।  दूसरी बात इस मुद्दे पर तुम्हे मुदाख़लत का क्या हक़ है।  फलस्तीन के मुसलमान अपना हक़ छोड़ दें ऐसे बयान तुम किस हैसियत से जारी कर रहे हो।  ना ही फ़लस्तीन इजराइल का मुद्दा भारत के पडोसी मुल्क का मुद्दा है और ना ही हिन्दू अवाम को किसी भी सूरत से मुतास्सिर कर रहा है।  ना ही यहूदी और ना ही फ़लस्तीन के मुस्लिम अवाम का मज़हबी, समाजी, अक़ीदा खान पान, रेहन सहन, बोल चाल भारत के हिन्दू अवाम जैसा है। 


में उन तमाम संघी और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम लंगूर लँगूरनियों से कहना चाहता हूँ।  तुमको अगर यहूदी अवाम की इतनी परवाह है तो भारत सरकार से कह कर उनको भारत में ही एक अलहदा मुल्क बनावा दो।  फ़लस्तीन के मुसलमान तुम्हारी बात क्यों मानेगें तुमने उनके हक़ के लिए क्या किया है।  हाँ लेकिन भारत सरकार तुम्हारी बात ज़रूर मान लेगी।

उत्तराखंड या उत्तरकाशी का पहाड़ी इलाक़ा केदारनाथ या गोवा बोहोत ही मुनासिब रहेगा।  जितना बड़ा रक़बा फ़लस्तीन का इसराइल ने क़ब्ज़ा किया है उतना ही यहूदियों को दे कर उसको नाम इसराइल दे दिया जाए तो कैसा रहेगा। 

तीसरी बात चलो भारत सरकार को छोड़ दो उसके सरकार के असासों पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं है।  लेकिन तुम्हारी मिलकियत तुम्हारे असासों पर तुम्हारा पूरा हक़ है।  तुम अपने घर में इजराइल के नहीं भारत में रहने वाले एक यहूदी को पनाह दे दो।  देखतें हैं कितने दिन तक तुम उसको अपने यहाँ बर्दाश्त कर सकते हो।  खाना पानी बिजली बेड रूम ड्राइंग रूम हर चीज़ पर उसका उतना ही हक़ हो जितना की तुम्हारा है।  तुम फ़लस्तीन से उनकी ज़मीन छोड़ने को कह रहे हो तुम मरते वक़्त अपने असासे को जायदाद को क्या अपनी औलाद को नहीं बल्कि यहूदी समाज के लिए वक़्फ़ कर के जाने की हिम्मत रखते हो।  अगर नहीं तो कैसे फ़लस्तीन के मुसलमानों से ऐसी उम्मीद रखते हो। 

गोवा में स्मृति ईरानी जी की दुख्तर का जो रेस्टोरेंट है उसमे हर रोज़ वोह यहूदी अवाम को भर पेट मुफ़्त में खाना खिला सकती है।  अपने रेस्टोरेंट में उनको पनाह दे सकती है।  अगर नहीं तो ऐसी उम्मीद फ़लस्तीन के मुसलमानों से क्यों रखी जा रही है।  

दुसरे के माल दौलत जायदाद पर सभी खूब नसीहतें करतें हैं बेदर्दी से खर्च करने की हिकमत होती हैयह वही ज़ेहनियत है जो किसी की मुलाज़मत करते हुए कंपनी के असासों दौलत को इस बेदर्दी से उड़ातें हैं जैसे वोह हराम की हो, लेकिन जब ख़ुद का मौक़ा आता है तो एक एक रुपये को खर्च करने में कलेजा फट जाता है।

यह वही सोच है जो ट्रिपल तलाक़ पर मुस्लिम खातूनों से हमदर्दी का मुज़ाहेरा कर रही थी "बीचारी कहाँ जाएगी, क्या खायेगी" लेकिन जब हूजूमी दहशत में मारे गए मुस्लिम नौजवानों की बेवाओं पर सरकार से मदद की बात हुई तो यह तमाम दोग़ले लोग फ़रार हो गए।  जिन  मुस्लिम नौजवानों पर बच्चा चोरी, बाइक चोरी,  बकरी चोरी, लव जिहाद का झूठा इलज़ाम लगा कर मार डाला उनके यतीम बच्चों की परवरिश कौन करेगा उन तमाम मारे गए मुस्लिम नौजवानों की बेवायें कहाँ जाएगी क्या खायेगी।  मतलब साफ़ है यह लोग हर उस मुद्दे में टांग फ़सातें हैं जहाँ इनकी कोई ज़रुरत नहीं होती।  लेकिन जब फजीती होती है तो करतें हैं फ़रारी इख़्तेयार। 

संघियों, बीजेपी, कट्टरपंथी हिन्दू और ज़ाफ़रानी लंगूर लँगूरनियों की यह वही सोच है जो बाबरी मस्जिद पर डाका डालने के बाद उनके हर शो हर डिबेट में निकल कर आती थी।  भारत के मुसलमानों के लिए तो हज़ारों मस्जिदें हैं सारी दुनियां के मुसलमानों के लिए तो मक्का है हिन्दू कहाँ जाएगा।  क्या मुस्लिम बड़ा दिल कर के हिन्दू समाज के लिए उनके राम के लिए बाबरी पर से अपना दावा छोड़ नहीं सकते।  क्या मुस्लिम बड़ा दिल नहीं करेगें।  वही सोच अब यह तमाम कट्टरपंथी फ़लस्तीन की एक सभ्यता को यहूदियों और इजराइल के लिए छोड़ने के लिए कह रहें हैं। 

यही मुनाफ़ेक़त है हिप्पोक्रेसी जो काम ख़ुद नहीं कर सकते दूसरों को उसकी नसीहत ख़ूब करेगें।  जिस मुद्दे से कोई ताल्लुक़ नहीं वहां पर भी अपनी ख़ाकी चड्डी जांघिया निकर दिखाने पहुंच जायेगें। 

टॉनिक वाली बाई हर उस मुद्दे पर  बेवा (विधवा) विलाप करना शुरू कर देती है जहाँ मुसलमान मौजूद होतें हैं।  लेकिन जब वही मुद्दा मुसलमानों की निस्बत से उसके सामने आता है तो उसके घर में मौत की ख़ामोशी छा जाती है।  "निल बटे सन्नाटा"।  हैदराबाद में उस डॉक्टर की अस्मत दरी पर आंसूं बहाने लगी थी।  उस बच्ची ने क्या सोचा होगा किस किस को याद किया होगा।  इस्लाम यह तो नहीं सिखाता।  लेकिन जब मुस्लिम बच्चिओं के ज़िना के हिन्दू मुजरिम छोड़े गए तो सन्नाटा छा गया। बिल्क़ीस बानों पर अभी तक ख़ामोशी है।  मणिपुर की क्रिस्टी खातूनों को नंगा घूमाने के मसले पर ख़ामोशी छाई थी।  

मोहतरमा इसराइल गई गला भर आया आंसूं थे की रूक ही नहीं रहे थे।  रूंधे गले से रिपोर्टिंग करने को मजबूर थी।  यहूदी बच्चों के लिए इसकी ५६ इंची छाती से दूध की धार बह रही थी।  जैसे इस ही ने किसी यहूदी को टॉनिक पिला कर उसके साथ मुँह काला कर के पैदा किये होंगे।  वहीँ ग़ज़ा के ५००० से ज़्यादा मासूम बच्चों की मौत पर एक नस्ल को मार डालने की हिकमत पर मोहतरमा की रिपोर्टिंग में सन्नाटा छाया हुआ था।   

दूसरों को नसीहत देना बोहोत आसान है पर ख़ुद उस पर अमल करना उतना ही दुश्वार जितना शीशे के घरों में कपडे बदलना।  "जिनके घर शीशे के होतें हैं ना, वोह बेसमेंट में कपड़े बदलते हैं"।  

सहाफ़ी ज़ुबेर की क़लम से।

Monday, 20 November 2023

बंबई ने निभाई वफ़ादारी, गुज्जू ने की ग़द्दारी।

अज़ीज़ नाज़रीन,

२०११ का फाइनल इंडिया जीती, २०२३ का फाइनल तमाम मैच जीत कर आख़िर में इंडिया हारी।  फ़र्क़ देख लो।  कौन है ग़द्दार और कौन वफ़ादार। 

क्रिकेट का ख़ुमार ऑस्ट्रेलिआ के एक बार फिर ख़िताब हासिल कर के हुआ ख़तम।  जैसा की हस्बे आदत संघी शिद्दत, हिन्दू दहशत, लंगूर-लँगूरनियाँ इस बार भी पाकिस्तान की निस्बत से ज़हरीले बोलों से बाज़ नहीं आये और अपने ही मुल्क की अज़मत वेक़ार को कोड़ी भर का कर दिया।  जिसकी वजह से आलमी हल्क़े में भारत की खूब फ़ज़ीहत हो रही है। 

फिर जिस इंडिया नाम से बीजेपी, संघी दहशत, शिद्दत पसंद हिन्दू लंगूर लँगूरनियों को ईज़ा और तकलीफ़ थी तो वोह इंडिया हिन्दू दहशत के गढ़ में कैसे जीत सकता था।   अब पापले पीट रहे हैं।  तभी बोला गया है खेल कूद, कला संस्कृती और संगीत को सियासत से अलहदा रखो नहीं तो ख़मयाज़ा तुमको ही भुगतना पडेगा।

फाइनल मैच में ऑस्ट्रेलिया की भारत पर करारी फ़तह हुई।  मैच के हर शोबे में ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत से बोहोत बेहतर साबित हो रही थी।  भारत के खिलाड़िओं को खेलते देख ऐसा हरगिज़ नहीं लग रहा था की उनकी टीम एक आलमी टीम है और तमाम लीग मैच जीत कर सेमी फाइनल में न्यू ज़ीलैण्ड जैसे ख़िताब की मज़बूत टीम के सामने ४०० रनों का पहाड़ खड़ा किया होगा।  

में बहैसियत सहाफ़ी अवाम की इस जानिब ज़रूर तवज्जो करना चाहूंगा या तो भारत की टीम ज़रूर बेईमानी कर के जीत रही थी और विराट कोहली को एम्पायर ग़ैर ज़रूरी ग़ैर मुनासिब फायदा दे रहे थे। या वर्ल्ड कप २०२३ के तमाम लीग मैच फिक्स थे।  या सटोरियों ने मैच पर ज़बरदस्त सट्टा लयाया था।  कियोंके अगर ऐसा नहीं था तो जो टीम पूरे टूर्नामेंट में ज़्यादातर टीमों के खिलाफ ३०० रनों तक के स्कोर को पूरा कर रही थी वोह फाइनल में टायें टाये फिस्स कैसे हो गई।   जिस ऑस्ट्रेलिआ को मद्रास में भारत ने डबल के अदद पर भी नहीं पहुंचने दिया था उसी ऑस्ट्रेलिआ से भारत फाइनल में ऐसे पिटा, लग रहा था चूहा अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा है। 

मैच के बाद कप्तान रोहित शर्मा का दर्द झलका उन्होंने कहा की हमें २० से ३० रन कम पड़ गए नहीं तो फाइनल भारत जीत जाता।  उनका यह सोचना एक दम ग़लत है अगर भारत ३००+ भी बना लेता तो ऑस्ट्रेलिया जीत जाता।  कियोंके ४० ओवर में ऑस्ट्रेलिया ने २३९ रन बना लिए थे उसके बाद पूरे १० ओवर बचतें हैं उस वक़्त उनके ७ विकेट मेहफ़ूज़ थे।  इस बात को मानना पडेगा की भारत के काग़ज़ी शेर सिर्फ़ मवाफ़िक़ एम्पिरिंग और बेईमानी पर जीत दर्ज करतें हैं। 

फाइनल में हार की एक अहम वजह बेईमानी नहीं कर सकने की हो सकती है।  कियोके भारत के वज़ीर ए अज़ाम, वज़ीर ए दाख़ला फिर औस्ट्रेलिया के वज़ीर ए अज़ाम, नायब वज़ीर ए आज़म और तमाम अवामी हस्तियाँ मैच देख रही थी।  अगर थोड़ी सी भी बेईमानी होती तो मसला सियासत की रंग चढ़ जाता और हो सकता है ऑस्ट्रेलिया के वज़ीर ए आज़म की दरख़ास्त आलमी क्रिकेट कौंसिल श्री लंका के जैसे भारत को बेन करने के बारे सोच सकता था। 

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में अवाम ने कैसा नंगा नाच किया था।  इन दहशतगर्दों ने अपने मुल्क का नाम एवान में मुस्लिम नुमाइंदों की हलफ़बरदारी लेने आने पर जो नंगा नाच किया था वही मुस्लिम अवाम का क़त्ल करते वक़्त वही पाकिस्तान के साथ मैच में देखने को मिला। 

जितना ज़हर भारत के अवाम खेल की हस्तियों सियासतदानों और लंगूर-लँगूरनियों में भरा है उतना ही यह लोग अपने मुल्क को रूसवा कर रहें हैं।  

ज़हर का पैमाना देखिये पाकिस्तान का मैच अफ़ग़ानिस्तान से हुआ और अवाम के सामने मैदान में कूल्हे भारत के नचौड़े ने मटकाये।  अगर भारत से होता तो भी समझ में आता की अपने मुल्क के लिए उस ज़न्खे ने अपने कूल्हे पेश किये हैं।  दूसरा ज़हरीला कीड़ा यह लोग कैसे खेल कूद का या किसी भी सकाफत का हिस्सा बन गए जब इनके ज़ेहन में इतना ज़हर भरा है।  बोला था "पाकस्तान ज़िन्दाभाग" बिलकुल सही बात है पाकिस्तानी टीम कुफ़्र, दहशत, हूजूमी मौत, हिन्दू शिद्दत और ज़हर, भारत की क़ैद से ज़िंदा और मेहफ़ूज़ अपने वतन लौट गयी तो यह बड़ी बात है।  वरना पाकिस्तान के ऊपर हैदराबाद से बहार गुजरात और दीगर शहरों में दहशतगर्द हमले का इमकान था।  जिसका ज़िक्र यह सहाफ़ी पहले ही कर चूका था।

क्या अब में बोल दूँ "हिंदुस्तान ज़नख़ा लोग

ज़ुबेर अहमद ख़ान

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...