Sunday, 28 February 2021
W.E.B. of Almighty is very strong now Myanmar entangled in it. (Allah’s) Holy forces.
W.E.B. of Almighty is very strong now Myanmar entangled
in it. (Allah’s) Holy forces.
https://autojourna.wordpress.com/2021/02/28/w-e-b-of-almighty-is-very-strong-now-myanmar-entangled-in-it-allahs-holy-forces/
Saturday, 27 February 2021
नई तरह की सियासत का आगाज़ हो रहा है।
अज़ीज़ नाज़रीन
२०वी सदी बोहोत सी बातों के लिए तारिख में याद रखी जाएगी उनमे से एक होगी मुल्के हिन्द में मुस्लिम अवाम के ऊपर ज़ाफ़रानी दरिंदगी, ज़ुल्म जिसने अपनी तमाम तर हदें पार कर के मंगोलों की दरिंदगी को भी मात दे डाली है। हक़ीक़त में देखा जाए तो हिन्द में इस दौर को ज़ाफ़रानी साजिश, क़त्ले आम, ज़िना बिल जब्र, जालसाज़ी, फरेब के लिए भी याद रखा जाएगा।
नाज़रीन इसी सदी में कांग्रेस का ज़वाल और ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी
का ऊरूज और ज़वाल भी तारीख़ के सफों में शाहिद होंगे। कांग्रेस के मुफ़लिस होने के बाद बीजेपी का किरदार
मशकूक और मुफ़लिसाना होता चला गया और इस का फायदा दीगर तंज़ीमों ने खूब उठाया। इस ज़िम्न में असद उद्दीन की मजलिस की मक़बूलियत ना
सिर्फ मुस्लिम अवाम में बेशुमार बड़ी है बल्कि दलित, क्रिस्टी, सिख और सेक्युलर हिन्दू अवाम के दिलों दिमाग़ में भी असद उद्दीन
और उनकी मजलिस दस्तक देने में कामयाब हुए हैं।
इस सहाफी को ज़र्रा बराबर शक और शुबाह नहीं की यह तंज़ीम मुस्तक़बिल में परचम,
दस्तूर, इन्साफ और एवान की आबरू
बरक़ार रखने में कामयाब रहेगी।
बिहार असेंबली उसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात बल्दिया में जिस
कारगरदेगी का मुज़ाहेरा किया है उससे कांग्रेस के वोट बैंक को तो ज़बरदस्त झटका लगा ही बरक्स ज़ाफ़रानी तंज़ीम के लिए भी ख़तरे की घंटियां बजने लगी हैं। भले हैं वज़ीरे आज़म अमहदाबाद,
सूरत बल्दिया नतीजों पर मुत्मइन नज़र आ कर गुजरात के अवाम
का शुक्रिया करें लेकिन इस बात को इस सहाफी ने महसूस किया है की अब गुजरात से ज़ाफ़रानी
तंज़ीम के तम्बू उखड़ना शुरू हो गए हैं।
इस सदी में जो एक बात और मन्ज़रे आम होगी वोह अददशुमार की निस्बत से होगी और अदद २, ३ और ५ की मक़बूलियत होगी। अदद २ का ज़िक्र उर्दू नज़्मों के ब्लॉग http://zuberpakshayri.blogspot.com/ में हर थोड़े वक़्फ़े के बाद कई नज़्मों में मिल जाएगा जिनकी शुरूवात अप्रैल २०१८ में की थी। अदद ३ और ५ का ज़िक्र २०१४ के बाद से तक़रीबन ज़्यादातर मज़मूनों में मिलेगा।
नाज़रीन इस सहाफी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही सियासी तंज़ीमों
के ज़वाल की बात कही है उसकी वजह साफ़ है क्योंकि जिस रस्ते को इख़्तेयार कर के कांग्रेस
का ज़वाल हुआ उसी पर बीजेपी भी गामज़न है तो कैसे सरसब्ज़ होगी।
आज कांग्रेस के ज़वाल और पस्ती की वजह ही दोगली हिकमते अमली है
और हर वक़्त महज़ इन्तेख़ाब से क़ब्ल अवाम के ज़ेहनों में शक शुकूक भर देना और ख़ास मुस्लिम
अवाम को ख़ौफ़ज़दा करते रहना अगर कांग्रेस को वोट नहीं दिया तो बेजीपी आ जाएगी। अगर बीजेपी आई तो दंगे होंगे, अगर बीजेपी आई तो मुस्लिम क़त्ले आम होगा। वही तजुर्बा भारतीय जनखा पार्टी हिन्दू अवाम पर कर रही है अगर बीजेपी को
वोट नहीं दिया तो भारत मुस्लिम राष्ट्र बन जाएगा, अगर बीजेपी को वोट नहीं दिया तो हिन्दू
अक़लियत हो जायेगें। अगर बीजेपी को वोट नहीं
दिया तो हिन्दू बच्चियों को लव जिहाद में फसा कर उनका इसतेसाल किया जाएगा। फिर इंतेखाब ख़तम होने के बाद तमाम वादे महज़ अपनी
तंज़ीम और उनसे जुड़े हुए अफ़राद के लिए वक़्फ़ हो जातें हैं,
जहाँ तक सवाल है आम हिन्दू का तो उसको कोल्हू के बैल के जैसे
तेल निकालने के लिए रख लिया जाता है। जैसे
नोट बंदी,
जीएसटी, आसाम में ऐन.आर.सी. रही सही कसर बा एक वक़्त
तमाम हिन्द को क़ैद कर दिया, बिल आखिर अपने गुनाहों का कफ़्फ़ारा किसानों के साथ ज़ुल्म बर्बरियत कर के पूरा किया। तमाम भारत में ताला बंदी के चलते गुजराती,
मारवाड़ी, बनिया, सिंधी दिवालिये हो गए।
बड़े बड़े ताजिरों के घरों की मस्तूरातें सब्ज़ी भाजी और फल बेच कर अपना और अपने
एहले ख़ाना का पेट रही थी। अच्छा बच्चो मुझे बतलाओ की इन पांच मुद्दों से सबसे
ज़्यादा नुकसान क्या किसी मियां का हुआ या खुद हिन्दू अवाम का हुआ। जिस गुजरात में आज बीजेपी कमो बैश २० साल से क़ाबिज़
है उसी गुजरात में नोट बंदी के सबब गुजराती हिन्दू छोटे और मझोले ताजिर दिवालिये हो
गए; नोट बंदी और ताला बंदी के चलते तमाम भारत में
बोहोत से ताजिरों ने मुफलिसी और ग़ुरबत के सबब खुदकशी कर ली।
कांग्रेस के पास एक भी ऐसा नुमाइंदा नहीं है जो बीजेपी के ग़ैर
ज़रूरी दबाव का जवाब दे सके। यही वजह है की
बीजेपी को कांग्रेस से मुस्लिम नुमाइंदों की जीत पर उतना बवाल नहीं मचाना पड़ता है जितना
की AIMIM के नुमाइंदों की जीत पर आग बबूला हो जाती
है।
बीजेपी को इल्म है की तंज़ीम के सरबराह को धमकी दे दो बाक़ी का काम हस्बे मंशा हो जाएगा और तमाम गुलाम क्या मुस्लिम क्या हिन्दू वही करेगें जो तंज़ीम का सरबराह कहेगा। कोंग्रेसी गुलाम सोच की एक ताज़ा मिसाल अभी हाल ही में देखने को मिली। राज्य सभा से एक ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद हुआ। फिर उसने एवान में मुस्लिम मुखालिफ तक़रीर कर डाली। यही फ़र्क़ है ग़ुलाम कोंग्रेसीयों में और AIMIM के नुमाइंदों में। ग़ुलाम कोंग्रेसी कहता है आज तमाम आलम में मुस्लिम बदनाम हैं और हर मुस्लिम मुल्क में मुस्लिम एक दुसरे को ही मार काट रहें हैं।
यही ज़ुबान संघी दहशतगर्द बोलतें हैं और यही बीजेपी वाले फिर वही ज़ुबान अगर कोंग्रेसी बोलेगें तो उनमे और शिद्दत पसंद हिन्दुओं में फ़र्क़ क्या रहा। उस ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद को में सहाफी जुबेर जवाब देना चाहूंगा। पहली बात तो तमाम आलम में मुस्लिम मुल्कों में अगर आपस में झगडे हो रहें हैं तो उसके लिए यहूद और नसारा साजिशें ज़िम्मेदार हैं। और उन मुमालिकों में मौजूद मुनाफ़िक़ ज़िम्मेदार हैं जो उन तमाम मुल्कों के पेट्रोल, सोना और अरबों खरबों की माश पर यह यहूद और नसारा का क़ब्ज़ा कर उनकी हुदूत में इज़ाफ़ा चाहतें हैं। यह मुनाफ़िक़ मुसलमानों में ना इत्तेफ़ाक़ी पैदा कर के भाई को भाई से लाडवा रहें हैं और यह महज़ ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि इस सहाफी के पास ऐसे सबूत मौजूद हैं। रहा सवाल पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान मुल्क कश्मीर में तो वहां पर भारत साजिश कर रहा है। अपने दरअंदाज़ कश्मीर में भेज कर वहां के हालात को तबाह कर रहा है। जब तक पाकिस्तान में इमरान खान की हुकूमत नहीं आई थी तो वहां मुनाफ़िक़ सलमान (कुल भूषन जादव) जैसे भरे पड़े थे जो क़ौम में इन्तेशार डाल कर मुसलमानों को आपस में लाडवा रहे थे, और पाकिस्तान को कमज़ोर कर उसको तोड़ने की साजिश में शामिल थे। कुछ को तो फ़ासी पर टांग दिया कुछ का सर क़लम कर दिया और कुछ जेल में क़ैद कर दिए गए। फिर जब जब अफ़ग़ानिस्तान में अमन मोहायेदा इमरान खान ने किये की उस प्रोसेस को वहां पर मौजूद भारत के वाज़ारतखाने ने डेरेल कर दिया। ईरान ने जनवरी २१ में एक इसरायली जासूस को फ़ासी पर टाँगा जो मुस्लिम भेस में जासूसी इजराइल के लिए कर रहा था और ईरान में तबाही मचा रहा था। नाज़रीन ख़िलाफ़ते उस्मानियाँ याद है, उस अज़ीम ख़िलाफ़त को तबाह बर्बाद एक मुनाफ़िक़ सोच ने किया था. पाशा कमाल जो की दरअसल एक यहूदी जासूस था और मुस्लिम भेस बना कर मुस्लिम हमदर्द बन कर ख़लीफ़ा के खिलाफ बग़ावत कर डाली। साजिश। तुर्की को बर्बाद करने में मुनाफ़ेक़त शामिल है.
आज कोंग्रेसी मुस्लिम भी वही बोली बोलतें हैं जो बीजेपी और संघ को अज़ीज़ होती है या जैसा की हाई कमान से हुकुम जारी हो जाता है वैसा ही बोलना पड़ता है अगर ज़रा सा हक़ बयानी की तो हो गए तंज़ीम में रूसवा। लेकिन ऐसा असद के साथ नहीं है, तभी बीजेपी को ज़्यदा अंगार असद की बातों पर लगती है। यही फ़र्क़ है ग़ुलाम कोंग्रेसी मुस्लिम सोच में और असदुद्दीन की सोच में। उस ग़ुलाम कोंग्रेसी आज़ाद को हक़ बोलना था और राज्य सभा में कहना था की आज मुस्लिम अवाम और मुस्लिम मुमालिकों के साथ साजिशें हो रही हैं, उनको आपस में लाडवा कर ना इत्तेफ़ाक़ी को बढ़ा कर कमज़ोर किया जा रहा है। हिन्द में मुस्लिम अवाम को बर्बाद तबाह करने के जेलों में ठूसने के क़ानून एवानों में बनाये जा रहें हैं। लेकिन उस क़ौम के गद्दार ने क़ौम को ही कोसना शुरू कर दिया। यही वजह है की ऐसे लोग जुम्मन के नाम से मशहूर हुए।
महज़ नाम मुस्लिम रख लेने से कुछ नहीं होता है अगर तुमको उस दर्द और तकलीफ का एहसास नहीं है जो दुसरे मुस्लिम को किसी शिद्दत पसंद काफिर, संघी दहशतगर्द, ख़ाकी दहशतगर्द (पुलिस), काफिर दहशतगर्द फाॅर्स (फौज), काफ़िर इन्तेज़ामियाँ (हुकूमत), काफ़िर रखैल कचेरी (सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट) से पहुँचती है। नाम चाहे कुछ भी हो बल्कि वोह दर्द और तकलीफ का एहसास होना ज़रूरी होता है जो एक मुस्लिम के ज़ख़्मी होने पर दुसरे को पहुँचती है तब तो तुम असली मुस्लिम हो, नहीं तो भरे पड़े हैं बाज़ारों में मुनाफ़िक़ जो हक़ बात को महज़ तंज़ीम के हुकुम पर दबा डालतें हैं चबा डालतें हैं। इन सब चीज़ों का एक ही हल है बदला, क़िसास।
भारत में मुस्लिम मुखालिफ बात है, नहीं मुझे तो ऐसा महसूस नहीं होता और ना ही मुझे कभी मुतस्सिब और फ़िरक़ावारना ज़ेहनियत का एहसास हुआ. ऐसी ज़ेहनियत वही है जो मुस्लिम हो कर हुकूमत के नुमाइंदों के आगे सर झुका लेती है और ख़ौफ़ज़दा हो जाती है.
Sunday, 21 February 2021
ज़ाफ़रानी सियासी इश्क़।
मुक़ाम : नई बंबई हिन्द
तारीख़ २१ फरवरी २०२१ बरोज़ इतवार वक़्त सुब ११:३३ मिनिट.
अज़ीज़ नाज़रीन और मेरे हमवतनों,
मरकज़ी ज़ाफ़रानी हाकिमों का दोहरा रुख़ बखूबी अवाम के सामने आ चूका है। जिस सिख अवाम को सियासी मोहरे के जैसे इस्तेमाल करते आये थे यह ज़ाफ़रानी भारतीय जनखा पार्टी (बीजेपी) के कारकून अब वही सिख समाज उनको तकलीफ का सामान नज़र आने लगे हैं। ज़ाफ़रानी मीडया के ग़ुलाम लंगूर और लँगूरनियों के सामने हर ज़ाफ़रानी या संघ का मुहाफ़िज़ १९८४ को बखूबी याद करता था और उनकी सिख मोहब्बत परवान चढ़ती थी लेकिन महज़ ९ महीनों में सिख अवाम ने ऐसा क्या कर दिया की वोह तुम्हारे, वतन के, इंसानियत के दुश्मन हो गए। कहीं ऐसा तो नहीं जिस विकास को पापा पैदा करना चाहते थे सिख अवाम ने लँगूरनियों के साथ मिल कर पैदा कर दिया, तभी सिखों से इतने ख़फ़ा दिख रहे हो।
अब हालात ऐसे हो गए की मरकज़ी ज़ाफ़रानी हुकूमत ने साका श्री ननकाना साहिब का सदी के इजलास में शामिल होने के लिए पाकिस्तान जाने वाले सिखों के जत्थे पर रोक लगा दी है। मरकज़ी ज़ाफ़रानी हुकुम से सूबे पंजाब में मज़हबी ख़ुमार चढ़ने लगा है। जिसकी ज़द में अब हिन्दू मज़हबी इजलास कुंभ के भी आने का खदशा है। श्री अकाल तख़्त के जत्थेदार जनाब ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने इस फैसले को फौरी वापिस लेने की गुज़ारिश की है साथ ही उन्होंने इस बात को भी दोहराया है, अगर करोना वबा के चलते ही यह सब किया है तो हुकूमत मार्च में होने वाले हिन्दू मज़हबी रिवायत कुंभ पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है।
जत्थेदार जनाब ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने एक सहाफी इजलास में कहा
साका श्री ननकाना साहिब का इस सदी का इजलास सिखों के लिए एक तारीखी मरहला है। इजलास में शरीक होने के लिए एक सदी तक इंतज़ार करने
वाले सिख अवाम के जज़्बात और उनके मज़हबी रिवायत का मरकज़ को क़द्र करनी चाहिए। तारिख से जुड़ा हुआ यह पल अब एक सदी के बाद आएगा
उन्होंने आगे मज़ीद कहा। अकाली सियासी रहनुमा
विक्रम सिंह मजीठिया ने भी इस मौज़ूं पर मरकज़ के लिए अपना ग़ुबार निकाला उन्होंने कहा
मरकज़ का यह फैसला सिख मुखालिफ है। उन्होंने
मज़ीद कहा मरकज़ ने जत्थे को पकिस्तान जाने पर रोक लगा कर सिख मज़हबी क़ियादत के जज़बात
को इज़ा पहुंचाई है और उनकी दिल शिकनी की है।
हुकूमते हिन्द किसान एहतेजाज का क़िसास और गुस्सा सिखों पर निकाल रही है।
आज ज़ाफ़रानी हाकिम अपने हर महाज़ पर और उलटी गिनती गिनने के सबब
रूसवा और ज़लील हो रहें हैं। हर उस मुद्दे
पर ज़लालत इनका मुक्क़द्दर बन गई है, जिसको यह अनासिर अपना सबसे मज़बूत और मेहफ़ूज़ क़िला समझ कर अवाम
के ज़ेहनों में शक-शुकूक, वस्वसे और ज़हर पेवस्त करते थे। पहले
इनकी जंग मुसलमानों से हुई और हर मुद्दे पर हर मुद्दे पर सख़्त ज़लील हुए,
सल्तनते मुग़लिया, राम मंदिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बनवाई, वतन परस्ती,
वन्दे…….., भारत………, गौ कुशी,
गौ तस्करी, लव जिहाद, ट्रिपल तलाक़, अज़ान, कसरते अज़वाज, दहशतगर्दी, तब्लीग़ी, पाकिस्तान, कश्मीर, दरन्दाज़
(घुस्पेठिये), शहरियत क़ानून, हिन्दू
अक़लियत हो जायेगें.
जब यह ज़ाफ़रानी अनासिर मुसलमानों से जंग में सख़्त तरीन शिकस्त
खा गए तो अब अपने ही मुहाफिजों और हम ख़याल अवाम पर तशद्दुत और जब्र करने लगे। जैसा की अमूमन इन ज़ाफ़रानियों के लिए "ग़ द्दा
री" लफ्ज़
वक़्फ़ है, हस्बे
रिवायत पहले मराठा सूबे की सियासी तंज़ीम शिव सेना के साथ ग़द्दारी की और जंग से क़ब्ल
किये हुए मुहायदे की ख़िलाफ़वर्ज़ी जिसके तहत शिव सेना के वज़ीरे आला होना ते क़रार पाया
गया था। लेकिन जंग फतह होने के बाद कर दी
ग़द्दारी क्योंकि जंग में ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने ज़्यादा क़िले फतह किये थे और शिव सेना ने
कम,
बस हो गया नफ़्स हावी और शुरू हो गयी नफ़्स और हक़ के दरमियान जंग। फिर हुआ वही जो होता आया है शैतान जब किसी भी शख़्स
के पीछे पड़ता है तो उसको बर्बाद कर के ही छोड़ता है। ज़ाफ़रानियों के नफ़्स के जंजाल में उनके नफ़्स की
जीत हुई और हक़ की हार। फिर यहाँ से शुरू होता
है क़ुदरत का खेल और नफ़्स की जंग में हारे हुए उस ग़ुलाम अफ़राद का ज़वाल। सच्चाई के रस्ते पर चलना बड़ा ही कठिन है और उसपर
चलने वाले को बेशुमार तकलीफों का सामना करना होता है।
महाराष्ट्र के बाद बिहार में वही हालात बने थे लेकिन ज़ाफ़रानियों
की महाराष्ट्र में इतनी रूस्वाई हो चुकी थी की मज़ीद सेहेन करने की ताप और क़ुव्वत बाक़ी
नहीं बची थी तो अब मरता क्या ना करता वाले फलसफे पर अमल करते हुए दरी चादरे उठाने और
कुर्सी लगाने का काम भी इन ज़ाफ़रानियों को माक़ूल लगा, और बावजूद ज़्यादा क़िले फतह करने के दोयम दर्जे के शहरी बनने
पर मजबूर हो गए।
बिल आख़िर जंग अपने हतमी मरहले को पहुंच गई और अब मुक़ाबले में
सिख ब्रादरान हैं। किसान एहतेजाज में जिस हिसाब
से सिखों को हदफ़ बनाया और झूटी बातों पर उन पर निशाना लगाया ऐसे ही हालात कभी मुस्लिम
अवाम के साथ थे। हर मुद्दे पर कहीं ना कहीं
से मुस्लिम नज़र आ ही जाते थे। किसान एहतेजाज
में सिर्फ सिख नहीं बल्कि हरयाणा का जाट, राजिस्थान का गुज्जर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश का हिन्दू, और तमाम मुल्क का मुस्लिम किसान एहतेजाज का हिस्सा है। लेकिन गोली चली तो किस पर सिर्फ सिख किसानों पर
इलज़ाम लगा तो किस पर सिर्फ सिख समाज पर किसान एहतेजाज की क़यादत खालिस्तानी दहशतगर्द
कर रहें हैं।
नाज़रीन इस बात को मन्ज़रे आम करने में इस सहाफी को ज़र्रा बराबर शक नहीं की अगले ५० साल मुस्लिम अवाम के लिए ऊरूज देने वाले साबित होने वाले हैं। अगले ५० साल मुस्लिम अवाम के लिए सुनहरे होंगे और वह तमाम आलम में अपने हदफ़ को पाएंगे, इल्म, रूहानियत, मज़हब, तिब्बी, साइंस-टेक्नोलॉजी, तारिख़, जोग्राफिया, ज़ाहानत हर हदफ़ पर मुस्लिम अवाम चढ़ाई करेंगे और यह सिलसिला अगले ५० साल तक जारी रहेगा जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने कई अंग्रेज़ी मज़मूनों में किया है। जिसमे से एक हाल ही में लिखे Muslims are shining across the world. मज़मून में है। जब मुस्लिम फौजी पहाड़ की चोटी पर चढ़ जायेगे तब एक सेचुरेशन (saturation) के हालात बनेगे। फिर मुस्लिम कब तक उस हालात पर मुक़ीम होंगे सिवाए मालिके कायनात के कोई नहीं जानता।
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करीना भाभी ने पाटोदी खानदान और सैफ भाईजान को दिया एक और फ़रज़न्द। सहाफी जुबेर ने अपने ही अंदाज़ में दी मुबारक बाद
सल्तनते मुग़लिया के आमद की सुगबुगाहट मुबारक हो।
Zuber Ahmed Khan
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सल्तनते मुग़लिया के आमद की सुगबुगाहट मुबारक हो।
बाबर बाबर बाबर तैमूर के बाद बाबर. सैफ भाई क्या करीना भाभी से मुग़लिया सल्तनत की नई नीव रख रहे हो. अगर ऐसा है तो आपका ख़ैरमक़दम है, शिद्दत पसंदों से हरगिज़ ख़ौफ़ज़दा ना होना। हक़ और इन्साफ में अपने रब से डरते रहो दुनिया तुमसे डरेगी। रब की रस्सी मज़बूती से थाम लो, दुनिया इज़ा पहुंचने से पहले १००० बार सोचेगी।
आपकी हौसला अफ़ज़ाई पर तवज्जो दें।
अज़ीज़
मरकज़ी वज़ारत रेलवे
वज़ीरे आला राजिस्थान
पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन इन्तेज़ामियाँ
हर साल की तरह इम साल भी ख़ाकसार को ग़रीब नवाज़ के दरबार में हाज़िर होने का शर्फ़ हासिल हुआ। पिछले दो सालों से यह सहाफी अपने मज़हबी वफंद के साथ हर साल के मार्ग से जाने के बजाये पाली मारवाड़ पे थोड़ा वक़्फ़ा गुज़ारने के बाद ख्वाजा की नगरी (अजमेर) की जानिब रवाना होता था। लेकिन कुछ ख़ास बातें जो इस सहाफी ने गुजिश्ता साल महसूस की थी उसमे इम साल ख़ासा इज़ाफ़ा होते हुए महसूस किया है। जिसके लिए रेलवे स्टेशन पाली मारवाड़ और पाली मारवाड़ शहर की इन्तेज़ामियाँ (कलेक्टर) ख़ास मुबारकबाद के हक़दार हैं।
१. रेलवे स्टेशन और उसकी कारवाँ सराय पर साफ़ सफाई, तहारतख़ाने, ग़ुसलख़ाने में पानी वग़ैरा का बेहतरीन एहतेमाम।
२. पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन और दीगर हल्क़ों में इस सहाफी का बावजूद टोपी और अरबी लिबास होने अवाम का खुले ज़हन और दिल से खैर मक़दम करना।
३. स्टेशन से नज़दीक मस्जिद जिससे जाते वक़्त क़ब्ल अज़ सुबह और लौटते वक़्त असर, मग़रिब और ईशा की नमाज़ तर्क होने का खदशा और मलाल ना हुआ।
इस सहाफी ने अपने ही अंदाज़ में शहर की अवाम से मस्जिद में क़ब्ल अज़ सुबह की बा आवाज़े बुलंद अज़ान से तकलीफ के बारे में दरयाफ्त किया। तमाम ताजिरों और होटल वालों का कहना था हमें इससे कोई तकलीफ ना होती है। बल्कि हम तो इस अज़ान की आवाज़ से जल्दी उठ जातें हैं और अपने होटल वग़ैरा में खाना पकाने और दीगर कामों में जल्दी जल्दी मशगूल हो जातें हैं।
इस सहाफी के अरबी लिबास और टोपी दाढ़ी को देख कर कोई भी यह गुमान ना कर सकता था की यह शख़्स एक सहाफी है और जो कुछ भी बातें हो रहीं हैं वह लायानी और महज़ लफ़्फ़ाज़ी ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि उसके ऊपर अपने मज़मूनों के ज़रिये हूकूमते हिन्द को आगाही देगा। जो अच्छी बातें हैं उनपर मुबारकबाद और जो ना ज़ेबा तास्सुरात हैं उन पर तनक़ीद के अक़्स नुमाया होंगें।
एक बात जो ख़ास महसूस की है उसको ग़रीब नवाज़ की करामत कहा जाएगा या इन्तेज़ामियाँ का कुछ अमल दख़ल समझने से क़ासिर हूँ। सुबह के क़रीब ३ बज कर ३० मिनिट पर जब गाडी पहुंची तो मौसम की दर्जे हरारत करीबन ११-१२ डिग्री सिन्टीग्रेट सर्द रही होगी। वफंद के एक अफ़राद को ग़ुस्ल की हाजत थी लेकिन पानी इतनी सर्दी में भी मोतदिल (गुनगुना) था, जबकी वोह ऊपर की टंकी से आ रहा था। ऐसे गुनगुने पानी से उनको ग़ुस्ल करने में किसी किस्म की दुशवारी नहीं आई। वहीँ मस्जिद के नलों का पानी खासा ठंडा था। जब मोतदिल (गुनगुना) पानी की वजह स्टेशन पर मौजूद आला एहलेकार से दरयाफ्त की तो उन्होंने बताया की हमारे यहाँ बोरिंग है और हम पानी ऊपर चढ़ा देतें हैं। लेकिन सवाल यही बड़ा है बोरिंग है भी तो रात भर टंकी में रहने के बाद पानी कैसे गुनगुना रहा और मस्जिद के नलों का पानी कैसे ठंडा हो गया। क्योंकि स्टेशन पर मौजूद ओहदेदार साफ़ सफाई पानी वग़ैरा का बेहतर एहतेमाम कर सकतें हैं लेकिन दर्जे हरारत ११-१२ डिग्री में उसको बग़ैर किसी इंसानी अमल के हीटर लगा कर या आग जला कर गर्म नहीं कर सकते। ख़ैर वजह चाहे कुछ भी हो हर कारे ख़ैर का सेहरा इन्तेज़ामियाँ के सर ही होता है। अब जो एहले तरीक़त होते हैं वोह बुज़ुर्गों की कश्फ़ और करामात को बाखूबी भांप लेते हैं।
पानी के गुनगुने या मोतदिल रहने में ज़्यादा इमकान ग़रीब नवाज़ की करामात के नज़र आतें
हैं, क्योंकि वोह नहीं चाहतें
होंगे की वफंद का एक आला अराकीन उनके शहर में ग़ुस्ल की हाजत में दाख़िल हो दूसरी वजह
उसकी नमाज़ तर्क हो।
कुल मिला कर इस सहाफी को पाली मारवाड़ रेलवे स्टेशन इन्तेज़ामियाँ और शहर की इन्तेज़ामियाँ को मुबारकबाद देने में ज़र्रा बराबर हिचकिचाहट नहीं है, जिसके वोह हक़दार हैं। सुबह का तमाम काम पुर सुकून और हस्बे मंशा मुकम्मल होने के सबब पाली मारवाड़ शहर और सूबे राजिस्थान के लिए दिल से दुआ निकली। दूसरी एक और बात जो राजिस्थान में महसूस की वोह किसी करामात से कम नहीं है. चारों जानिब रेगिस्थान है लेकिन फिर भी पानी की कहीं भी कोई कमी नहीं दिखी। नलों से पानी ऐसे बहता है जैसे दरिया का तेज़ बहाव. वहीँ जो इलाक़े साहिल पर हैं, ख़ास बम्बई वहां पर एक एक बूंद पानी के लिए अवाम को तरसना पड़ता है। जो इलाक़े दरिया के साहिल पर बसे हैं उन साहिली इलाक़ों पर ऊपर वाले की लानत कह सकतें हैं जो वहां पर पानी की क़िल्लत है लेकिन रेगिस्तान में ग़रीब नवाज़ का करम, की पानी ऐसे बहता है जैसे की दरिया।
अगर शहर का अवाम पुर सुकून है, हर चीज़ की फ़राग़त है तो उसका सेहरा पाक साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ इन्तेज़ामियाँ के सर पर होता है. अगर चीज़ें दुरुस्त हो रहीं हैं तो उसकी शुरूवात कहीं तो किसी एक शख़्स ने की होगी जिसके अच्छे नताइज तमाम अवाम में दिख रहा है. जैसा की इस सहाफी का यक़ीन है और वोह उसपर अमल भी करता है अगर चीज़ों को दुरुस्त
करना है तो सबसे क़ब्ल अपने आपसे शुरूवात करनी होगी। अगर सच्ची और हक़ के रस्ते पर चलना है तो सबसे पहले
अपने आपको उस गंदगी, गलाज़त और कूदूरत से बहार निकालना होगा जो अपने दिलों में पेवस्त कर दी गई है। फिर अपने घर वालों को, मोहल्ला, क़स्बा बस्ती और समाज
धीरे धीरे चीज़ें दुरुस्त होंगी।
सच्चाई और हक़ के रस्ते पर चलते हुए बोहोत सी दुशवारियाँ, तकलीफ का सामना करना
पड़ता है, हर मौक़े पर हक़ और नाहक़
के दरमियान अपने नफ़्स से जंग करना होती है।
जो शख्स नफ़्स के जंजाल में फस गया और ग़लत फैसले कर लिए वही गुमराह है। और जिसने नफ़्स को शक्सित दे दी और इन्साफ का दामन
थामे रखा हक़ और ना हक़ के दरमियान जंग में हक़ का साथ दिया वही फलाह पाता है और कामयाब
है।
सीधा सा फलसफा है मंज़िल को वही फ़ौजी हासिल करतें हैं जिनका घोडा तंदुरस्त हो और उस पर सवार हो कर वोह तमाम रुकावटों, और बाधाओं को पार करते हैं। वहीँ एक शख़्स घोड़े को अपने कन्धों पर लाद कर भाग रहा है तो कैसे मंज़िल पर पहुंचेगा वोह तो वक़्ते मुक़र्र से पहले ही थक जाएगा, एक तो रुकावटों का सामना करना दूसरा कन्धों पर सवार सवारी, दो गुनी तकलीफ और मशक़्क़त, डबल इंजीन की तकलीफ कभी कामयाब नहीं होती है।
Wednesday, 17 February 2021
Pakistan raised Kashmir issue in front of ambassadors, India raised strong objection.
Pakistan raised Kashmir issue in front of ambassadors, India raised strong objection.
https://autojourna.wordpress.com/2021/02/17/pakistan-raised-kashmir-issue-in-front-of-ambassadors-india-raised-strong-objection/
Tuesday, 16 February 2021
रिहाना का इस बार एटम बम से हमला।
अज़ीज़ नाज़रीन,
ऐसा कहतें हैं जो जितना बड़ा ज़ालिम होता है और झूट फरेब के ऊपर अपना महल बनाता है, दोग़ला चेहरा अवाम के सामने रखता है हर मुद्दे पर दोहरा रवैया अपनाता है तो मालिके कायनात उसको उस ही ग़ार में गिराता है जो वोह दूसरों के लिए खोदता है। नाज़रीन आपको चार्ली एब्दो के पैग़म्बर सल्लम और इस्लाम मुख़ालिफ बयानात और कार्टून का इल्म तो होगा, लेकिन उन कार्टून को जब हूकूमते फ्रांस की जानिब से हर हूकूमती इमारतों पर चस्पा किया गया तो आलमे इस्लाम में सख़्त तशवीश और गुस्से को देखा गया। अब यह कैसे मुमकिन होता की मुस्लिम दिल शिकनी की बात हो इस्लाम मुख़ालिफ बात हो पैग़म्बर की बेहुरमती हो और कुफ्रिस्तान (भारत) का हिन्दू शिद्दत पसंद, संघी दहशतगर्द और हुकूमत उस मसले पर इज़हारे खुशी ना ज़ाहिर करे। होना क्या चाहिए था ऐसी बेहुरमती पर इज़हारे ख़्यालात की दोहाई देने और फ्रांस हुकूमत के हमक़दम खड़े होने के बजाये उन ना मुरादों को अपने हमवतन मुस्लिम अवाम की दिल अज़ारी में उनके शाना बा शाना खड़े होना था।
ख़ैर मुस्लिम अवाम के साथ जो होना था हो गया अब दिल अज़ारी की बारी उन हिन्दू शिद्दत पसंदों की थी जो फ्रांस के चार्ली एब्दो कार्टून पर खुशी का इज़हार कर रहे थे। ऊपर वाले की लाठी बे आवाज़ है और जब ज़ालिमों, जल्लादों, शिद्दत पसंद काफिरों पर पड़ती है उनको तड़पने का मौक़ा भी नहीं मिलता है और जगह पर ही ढेर हो जातें हैं।
नाज़रीन इस जंग में भारत के ऊपर हॉलीवुड अदाकारा और पॉप सिंगर रिहाना का किसान मुद्दे पर ट्वीट बम की तबाही का हुकूमत जायज़ा भी ले पाती के रिहाना ने एटम बम से भारत के ऊपर हमला कर दिया है। दरअसल रिहाना ने लॉन्जरी ब्रांड के लिए फोटोशूट कराया है. इस फोटोशूट में वो टॉपलेस पोज दे रही हैं. और उन्होंने गणेश की मूर्थी को पहन रखा है। यह हमला तमाम हिन्दू मज़हब के मानने वालों के मज़हबी अक़ीदे के ऊपर है। ठीक उसी तरह जिस तरह से फ्रांस ने तमाम आलम के इस्लाम मज़हब के मानने वालों के मज़हबी अक़ीदे के ऊपर हमला किया था।
अब यह सहाफी उन तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम,
संघी दहशतगर्द दहशतगर्दों से कहना चाहेगा की तुम लोग तो चार्ली
एब्दो के साथ खड़े थे, और उसके कार्टून सराह रहे थे। ख़ास हूकूमते
झांसाराम से सवाल करता है, जिसने इस्लाम के पैग़म्बर की बेहुरमती पर हूकूमते फ़्रांस की हिमायत की थी, तो क्या अब भी उसका अक़ीदा इज़हारे राये और तासुरात
ख़यालात की आज़ादी पर क़ायम है।
अब क्या कहोगे झांसा राम। क्या अब फ्रांस के जैसे रिहाना के
साथ खड़े हो या अपनी आदत के हिसाब से जैसा की हर बार ग़द्दारी करते हो इस बार भी गद्दारी
करोगे,
और अपने फ्रांस वाले बयान के साथ ना खड़े हो कर रिहाना पर लानत
भेजोगे ताके गुजरात बल्दिया, उत्तर प्रदेश, वेस्ट बंगाल असेंबली में उसका फायदा मिल सके।
अब तुम्हारे आगे कुँवा और पीछे खाई वाली बात हो गई है। अगर रिहाना पर लानत भेजते हो तुम गद्दार साबित
होंगे,
अवाम तुमको एक जनखा तसव्वुर करेगा जो अपनी कही हुई बात पर एक
महीना भी क़ायम नहीं रह सकता। दूसरी बात जिस
रिहाना के किसान मुद्दे पर ट्वीट बम पर तुम उसको अपने मुल्क के अंदुरुनी मसलों में
मुदाख़ेलत बोल रहे थे तो अगर तनक़ीद की तो वोह अमेरिका के अंदुरुनी मुद्दों पर मुदाख़ेलत
जैसा होगा। और अगर लानत नहीं भेजी अपने गुजिश्ता
बयान फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन पर क़ायम रहे तो हिन्दू तुमसे झिटक जाएगा।
कुल मिला कर यह सहाफी इतना ही कहना चाहेगा की हर शख़्स को अपना मज़हब अपने मज़हबी रहनुमा अज़ीम और मक़बूल होतें हैं उनसे मोहब्बत होती है। दूसरों के मज़हबी रहनुमाओं पर ऐसी नाज़ेबा हरकत पर अगर तुम तास्सुरात और ख़यालात की आज़ादी का कफ़न डालोगे फिर जब तुम्हारे ऊपर वही हालात आये तो क्या करोगे। इसीलिए हमेशा हक़ का साथ दो जो सच्चा है उसके साथ खड़े रहो और तास्सुरात की आज़ादी का दायरा महदूत करो क़ानून बनाओ उसमे तास्सुरात और खयालात की आज़ादी में कोई भी मज़हबी रहनुमा ना आता हो।
अभी हाल ही में जनवरी २०२१ में ख़्वाजा गरीब नवाज़ मोईनुद्दीन चिस्ती रेहमतुल्लाह अलैहे के खिलाफ एक ज़ाफ़रानी साधू बेहद अदना दर्जे की बात कर रहा था और उनके ऊपर झूठे बोहतान लगा रहा था ज़िनाकार, आतंकी और ना जाने कैसे कैसे अलफ़ाज़ बोल रहा था उसके ऊपर क्या हिकमते अमली की है। इतना सब होने के बाद तुम बेशर्मों की तरह ख़्वाजा साहब के दर पर चादर पेश करते हो। यह तो वही मिसाल हो गई, मुँह में राम बगल में छुरी।
अरे जब तुम उस भगवा साधू को गिरफ्तार नहीं कर सके तो तुमको कोई हक़ नहीं था की तुम गरीब नवाज़ के दर पर हाज़िर होते। किस हैसियत से तुमने चादर भेजी है। जब तुम्हारे अपने पालतू तो उनकी शान में बेहद अदना झूटी बात करतें हैं, तोहमत लगाते हैं।
Sunday, 14 February 2021
पाक मजलिस की ताक़त के आगे हुए ज़ाफ़रानी पस्त और नतमस्तक।
अज़ीज़ नाज़रीन,
किसी भी ज़ालिम, दरिंदे, दहशतगर्द, क़साई, जल्लाद का ज़ुल्म कमज़ोर पर तब तक ही रहता है जब तक उस ज़ालिम की तलवार को कोई इन्साफ पसंद, अमनपसंद उससे ज़्यादा ताक़तवर रोक नहीं देता है। और उस ज़ालिम की तलवार, नाइंसाफी, हक़तल्फ़ी, ज़ुल्म, दहशत, क़त्लो ग़ारत और उसकी हर नाज़ेबा हिकमते अमली का जवाब उसको बाखूबी उसके अपनों के खून से देना होता है। ऐसे ज़ालिम, दरिंदे तब तक ही कमज़ोर को दबाते हैं उन पर शिद्दत करतें हैं जब तक उनके रू बरू उनकी हर हिमाक़त का जवाब कोई उनसे ज़्यादा ताक़तवर आ कर देना शुरू नहीं कर देता है। अब ऐसे ज़ालिमों के सरों पर उनसे ज़्यादा ताक़तवाला मुसल्लद हो जाता है। आज का मजमून यह सहाफी का हूकूमते हिन्द में मौजूद साँपों, ज़ालिमों, गद्दारों, वतन फरोशों (वतन को बेचने वाले) बमुक़ाबिल इन्साफ पसंद, अमन पसंद, हक़बाजानिब शख़्स और उसकी तंज़ीम के दरमियान है। आज के मज़मून का आग़ाज़ यह सहाफी अपने कुछ मख़सूस शेरो शायरी से करना चाहेगा और उस पर फर्जांदाने तौहीद के ग़ुलामों से ख़ास तवज्जो की गुज़ारिश है।
झुकती है दुनिया,
झुकाने वाला चाहिए,
मिटेगी तेरी हस्ती, मिटाने वाला चाहिए।
सुर्ख़ कर दो ज़मीने बातिन
हर जानिब सब्ज़ा उगाने वाला चाहिए।
नाज़रीन जो कभी भी ज़ाफ़रानी तंज़ीम में नहीं हुआ वोह असदउद्दीन की मक़बूलियत उनके ख़ौफ़, उनकी फौजों की यलग़ार
और तंज़ीम के बढ़ते हुए क़दमों के सबब हो रहा है।
ज़ाफ़रानी जनखा पार्टी ने भरुच बल्दिया में ३१ मुस्लिम मेम्बरान को नुमाइंदगी
दी है। वहीँ दूसरी जानिब बिहार में उस बेकार
बेरोज़गार गली के नुक्कड़ (मीडिया इजलास) में झूटी सच्ची फरेबी बातें करने वाले मुस्लिम
को वज़ीर बना दिया। जो कहता था "ताज महल शाहजहां ने बनाया, लेकिन हाथ तो हमारे कटे
थे" इस शख़्स के इस झूट का पर्दा फाश इस सहाफी ने अक्टूबर २०१८ में तारिख के सफों में सबूतों
के साथ ही कर दिया था। आलमगीर औरंगज़ेब जिन्होंने
तमाम हिन्द पर हुकूमत की या शाहजहाँ फिर दोनों बादशाहों की हुकूमत का वक़त दे कर मसले
का दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया था।
ख़ैर यह तो शुरूवात है असद उद्दीन और अकबरुद्दीन जिस तरह से बग़ैर किसी बातिल ताक़त
से ख़ौफ़ ज़दा होने के और बग़ैर किसी लालच के जंग की क़यादत कर रहें हैं तो वोह दिन दूर
नहीं जब इस साहाफी की एक और पेशनगोई हक़ साबित होगी के इन ज़ाफ़रानियों का तारीख़ में महज़
नाम रह जाएगा। जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी
उर्दू नज़म माशाल्लाह में किया है।
ماشااللہ
तमाम ऐसे ज़ालिम अनासिर, नाइंसाफ, हक़तल्फ़ी करने वाले, वतन, परचम और आईन की आबरुरेज़ी करने वाले, उसकी अस्मत मट्टी में मिलाने वाले, ग़द्दार नेस्त नाबूत हो जायेगें फ़ना हो जायेगे ख़तम और ज़मीनदोज़ हो जायेगें। मौजूदा दौर का हिटलर और ज़ालिम तरीन हाकिम को अवाम उस ही बेदर्दी और बेक़दरी से मुख़ातिब करेगें जिसका वोह हक़दार है। और पस यह जान लो सख़्त तरीन तबाही, बर्बादी, तूफ़ान, अमवात तुम्हारा मुक्क़द्दर है। अल्लाह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता।
नाज़रीन दुबूर फरोश अमित शाह और शैतानी इल्मी वेलू बिल्जी हैदरबाद में बड़ी बड़ी बातें कर के आये थे। दुबूर फरोश बोलता था इस बार मेयर हमारा होगा, पिछवाड़े पर ऐसा ज़ूता छपा की ना ही मेयर और ना ही नायब मेयर की कुर्सी हाथ लगी। अब किस्मत में महज़ ऐवान में हर मुद्दे पर हू हल्ला करने के अलावा कुछ नहीं रहा। जिसके लिए यह ज़ालिम मशहूर हैं। या तो जो नया काम बिहार की सियासत के बाद मिला है, वोह करेंगें मेयर और डिपुटी मेयर के आने से पेश्तर और उनके जाने के बाद दरी चादरे उठाना और कुर्सी लगाना।
नाज़रीन आपको हैदराबाद असेम्ब्ली इंतेख़ाब मालूम हैं, क्या बोल रहा था वेलू बिल्जी मित्रों में आपको विश्वास दिलाता हूँ अगर भारतीय जनखा पार्टी की हैदरबाद में हुकूमत बनी तो ओबेसी बंधुओं को ऐसे ही भागने पर मजबूर होना पड़ेगा जैसा की निज़ाम भागे थे। उसके बाद वोह खुद ही नेपाल भाग गया था, और पाक मजलिस की फोजों से कुछ २०-२५ दिन तक छुपा रहा बाद फिर से नमूदार हुआ और बल्दिया इंतेखाब में फिर आ कर गली के आवारा जानवर की तरह भोंकने लगा। मित्रों में आपको यक़ीन दिलाता हूँ अगर हम हुकूमत में आये तो हैदराबाद का नाम बदल कर भाग्य नगर कर देंगें। फिर पड़ा ज़ूता पहले बड़े भाई ने पेला (धोया) और अब छोटे ने। मतलब असेम्ली इंतेखाब में असद सामने आ गए और वेलू बिल्जी के तमाम फौजी ढेर कर दिए और बल्दिया में अकबर से सामना हुआ और क़िला तो निज़ाम के पास ही रहा जिस क़िले पर वतन से गद्दारी, हक़तलफ़ी, नाइंसाफी, ज़ुल्म, दहशत, क़त्ल, ज़िना का शैतानी ज़ाफ़रानी परचम लहराने की बात करता था वेलु बिल्जी।
नाज़रीन ओवेसी ब्रादरान से अंगार तो उसी बात की है, की उनको ना तो यह ग़द्दार रूपये पैसे, मौत के ख़ौफ़ से, हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम ग़ुलाम तंज़ीमों से तहक़ीक़ात करने और जेल में भेजने का ख़ौफ़ दिखा कर तोड़ पातें हैं और ना ही शाकिस्त दे पातें हैं। जैसा की कांग्रेस और दिगर मुख़ालिफ़ (Opposition) तंज़ीमों के सरबराहों को अपना ख़ौफ़ दिखा कर हक़ और ना हक़ की जंग में अपने साथ कर लेते हैं। फिर दस्तूर का क़त्ले आम हो या इन्साफ को फ़ासी सभी तंज़ीमें खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझती हैं। अगर मुँह खोला तो उनका क़त्ल हो जाएगा। लेकिन यह बात पाक मजलिस के सरबराह ना तो असद में है और ना ही उनके नायब अकबर या किसी और तंज़ीम के नुमाइंदे में देखने में आती है। ख़्वाह वोह मुस्लिम हों या गैर मुस्लिम एक बार तंज़ीम के ज़ेरे सरपरस्ती में आ गए की हो गए निडर बेबाक। और यह अलफ़ाज़, ताक़त और क़ुव्वत उनको किसी पोशीदा रूहानी फैज़ से मिल रही होती है। जो दिखाई तो नहीं देता लेकिन हौसला, हिम्मत और क़ुव्वत खूब देता है।
फिर तीन ज़र्ब जो इन ज़ाफ़रानी गधों, गद्दारों, वतन फरोशों, ज़ालिम, ना इन्साफ, हक़तलफ़ों को असद, अकबर और पाक तंज़ीम के फौजियों ने दिए हैं वोह ता उम्र याद रहेंगें और उसकी तपिश, जलन, अंगार गाहे बगाहे इनकी ज़ुबान से बयान हो ही जाएगी।
१. १५ मिनिट वाला ज़र्ब
२. असेंबली इंतेख़ाब में मित्रों ……. ओबेसी बंधुओं को भी निज़ाम की तरह भागना पडेगा।
३. हैदराबाद बल्दिया में हमारा मेयर होगा।
नाज़रीन यह काम इतना आसान नहीं है,
बरक्स कोई तो रूहानी ताक़त ओवेसी भाइयों पर मेहरबान है। जिसकी वजह से वोह हर महाज़ पर ग़द्दारे वतनों, हक़तल्फ़ों, नाइंसाफों, ज़ालिमों, दरिंदों, दहशतगर्दों से जीत हासिल
कर रहें हैं। अब वोह ताक़त चाहे किसी वली की
अता करदा हो या ख़ुदा की जानिब से अता की हुई इनायत। जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी उर्दू नज़म जुस्तजू
में किया है।
جستجو
अवामी जिस्म फरोश (रंडी), हिंदुस्तानी प्रोन (देसी माल), लोगों को मुफ्त लुत्फ़ अन्दोज़ करने वाली (free entertainment) वज़ीरे दरिंदा को सीख देती है की अपने वालिद दहशतगर्द, ज़ालिम, दरिंदे पृथ्वी राज की तरह गलती ना करें जिसने मोहतरम मोहम्मद ग़ोरी से हार का सामना किया था। नाज़रीन इस सहाफी को ऐसी रंडियों और लँगूरनियों की बातों और ट्वीट्स पर हँसी आती है। इंसान बोहोत कुछ जाल बिछाता है और बोहोत कुछ ततबीर करता है लेकिन असली ततबीर वही कामयाब होती है जो मेरा रब बनाता है। लाख कोशिश कर लो लेकिन होगा वही जो होना है और जो मेरे रब ने ते कर लिया है। मोहम्मद ग़ोरी पर गरीब नवाज़ मेहरबान थे सो ज़ालिम दरिंदे, कसाई, दहशतगर्द पृथ्वी राज चौहान को शाकिस्त हुई और अब और कोई वली उनके साथ होगा तो मौजूदा हिटलर, ज़ालिम, दरिंदे, क़साई, गौ मांस का कारोबारी को हर जानिब शाकिस्त हो रही है।
वोह वली यहाँ भी होगा, वहां भी, वहां भी होगा और वहां भी। जो तुम्हारे दरमियान हाज़िर और मौजूद भी होगा। और पस यह जान लो वही हक़ है।
जिन ५ बुज़ुर्गों से कल मुख़ातिब हुआ था उनको एक पैग़ाम है, आज बोहोत बेहतर महसूस कर रहा हूँ.
अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.
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