Tuesday, 31 October 2023

पैग़ाम ए ताज़ियत

हम अल्लाह के हैं और उसकी तरफ़ लौट कर जाना है।

मौलाना जमील साहब और उनके अहल ए ख़ाना का बोहोत बड़ा ज़र्फ़ है जिस हिसाब से मौलाना साहब बयान कर रहें हैं कोई भी दीन दार ऐसा काम नहीं कर सकता जिसकी रूस्वाई का बोझ ले कर वोह अपने मालिक ए हक़ीक़ी से मिले।  जब उस बच्चे में अल्लाह की मोहब्बत भरी हुई थी वाल्दैन का फ़र्माबरदार था ग़रीबों का मसीहा था तो अल्लाह ने उनके तमाम गुनाह तो दुनियां में ही पाक कर दिए होंगे।  फिर अपने पास बुलाने से क़ब्ल उनसे ऐसा काम काहे को करवाएगा जिसका बोझ अपने नेक बन्दे के सर पर हो। 

यह तो आला ज़र्फ़ और मौलाना साहब की रूहानियत है जो अपने होनहार बेटे के क़त्ल को ख़ुदकशी का नाम दे कर उस क़ातिल को भी बचा लिया जिसने उनके इतने होनहार नेक फ़र्माबरदार अल्लाह से सच्ची मोहब्बत करने वाले फ़रज़न्द का क़त्ल किया।  ख़ास पाकिस्तान की फ़िज़ा खराब ना हो जाए।   क़त्ल ए आम ना शुरू हो जाए।  आप जैसी रूहानी शख़्सियत का पाकिस्तान पर और उम्मा पर बोहोत बड़ा एहसान हैं।  

में सहाफ़ी ज़ुबेर और तमाम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम मौलाना साहब के दुःख में उनके शाना बा शाना खड़े हैं।  अल्लाह मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे और मरहूम के अहल ए ख़ाना ख़ास उनके वाल्दैन मौलाना तारिक़ जमील साहब और मरहूम के भाई को सब्र ए जमील अता करे।  आमीन। 

सहाफ़ी ज़ुबेर की क़लम से पैग़ाम ए ताज़ियत

कंगना का बाण टुस्स, तेजस हो गई फ़ुस्स।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आलमी "काल गर्ल" और मौज का सामान घरेलू सामान के मुक़ाबले जल्दी ही दम तोड़ देता है।  यह बात सो फि सद दुरुस्त साबित होती है।  हमास आधुनिक रावण फ़ेम बीजेपी की आइटम गर्ल के दिन अच्छे नहीं चल रहें हैं।  जहाँ देखो बदनामी ज़िल्लत और रुस्वाई हाथ लग रही है।  एक तो उससे रावण ख़तम नहीं हुआ तीर चला ही नहीं दूसरी उसकी थेटर "तेजस" जदबर्दस्त धूम मचा रही है।  धूम मतलब फ्लॉप होने में धूम मचा रही है।  गुजरात, बिहार, दिल्ली में थेटर मालिकों ने एक हफ़ते में ही - दिन के तमाम शो केंसिल कर दिए।  कियोंके एक भी टिकट नहीं बिका था। 

बीजेपी की आइटम गर्ल ने हमास को आधुनिक रावण बोला था उसको ख़तम होना पडेगा।  लेकिन जब तीर चलाने की बारी आई जल्दी ही ठंडी पड़ गई।   इन जैसी नचौड़ियों के लिए अर्ज़ किया है।    

ना तीर चलेगा ना तलवार उठेगी इन हाथों से

यह बाज़ू मेरे आज़माये हुए है।

नाज़रीन दूसरी है आलमी टॉनिक वाली बाई जिसके पास हुनर है ज़ईफ़ मर्दों को टॉनिक पिला कर जवान करती है, फिर उनसे पूछती है क्या आपको काम करने में मज़ा आता है।  यह टॉनिक वाली बाई कभी कभी अपने शोहर को भी मना कर देती है नहीं आज नहीं आज बोहोत थक गई लेकिन एक ज़ईफ़ को टॉनिक पिला कर पूछती है आपको मज़ा रहा है।  बेशर्म रंग। 

यह लँगूरनी भारत से कई हज़ार किलोमीटर दूर इजराइल और हमास लड़ाकों की जंग देखने चली गई लेकिन ख़ुद के वतन में मणिपुर में क्रिस्टी समाज के साथ हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम दहशत, क़तल आम, ख़ातूनों को नंगा घूमाने के बाद इज्तेमाई ज़िना की वारदात देखने नहीं पहुंची। 

अपनी बात अपने हक़ के लिए कहिये ग़ुलाम मत बनिये। इंसाफ़ की बात कहिये, रोज़गार की बात कहिये, फ़िर्क़ापरस्ती के ख़िलाफ़ बोलिये। हुकूमत की चाटुकारिता छोड़िये उससे आँखों में आँखे डाल कर सवाल करने की आदत डालिये।  इंसान बनिये ग़ुलाम नहीं। नहीं तो तुम में और एक पत्थर की मूर्ती में क्या फ़र्क़ रहेगा। बड़े बड़े नेताओं की पत्थर की विशाल मूर्ती लगा दी लेकिन उसके ऊपर चील कव्वे बैठ कर हगते हैं और उसमे इतनी ताक़त नहीं की उनको उड़ा सके। ग़ुलाम बनोगे #तेजस जैसा हाल होगा सवाल करोगे #जवान जैसा हाल होगा। फैसला है आपका।

इन सभी के मुक़द्दर में ज़लालत लिख दी गई है।  जो भक्त गण शाहरुख को भीक मगवाना चाहते थे उसकी फिल्म को फ्लॉप करवाना चाहते थे उसके तो वारे न्यारे हो गए बल्कि अपनी ही दीदी को चौराहे पर ला खड़ा किया। 

योगी जी आप तो शाहीन बाग़ की ख़ातूनों को चौराहे की ज़ीनत बोलते थे।  शोहर रज़ाई में सो रहें हैं और अपने घर की बेहेन बेटिओं बीविओं को चौराहे पर बिठा दिया।  अब आपकी चहेती जिसकी फिल्म आप देखने को बेताब थे।  चकले पर बैठ गई।  कहिये क्या बोलते हो। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

Sunday, 29 October 2023

जब पीर होंगे नायाब तब मुरीद होंगे कामयाब

 अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मौजूं पीरी मुरीदी की निस्बत से हासिल रूहानी फैज़ के ऊपर इस गुनाहगार को तहरीर करने का शर्फ़ हासिल हुआ है। 

किसी शहर में एक पीर साहब थे जिनको अल्लाह ने वोह सलाहियत दी थी उन्होंने अपने नफ़स पर क़ाबू पा लिया था।  उनको शैतान, जादू, टोना टोटका और कोई भी ख़बीस अमल ईज़ा नहीं पहुंचा सकता था।  हत्ता के अब उनके रूहानी उरूज का वोह आलम हो गया था की कोई भी तकलीफ़ परेशानी अगरचे वोह शैतानी अमल की वजह से उनके मुरीदीन की जानिब आती थी तो पीर साहब फ़ौरन एक ढाल के जैसे अपने मुरीद को बचा लेते थे और वोह तमाम तर तकलीफ़ ज़ाईल हो जाती थी।  

उनके रूहानी फ़ैज़ और नफ़स पर फ़तह हासिल करने के चर्चे अब मोहल्ले से निकल कर शहर फिर सूबे अल ग़र्ज़ तमाम मुल्क में फ़ैल गए।  हम जैसे किसी गुनहगार को भी उनकी बुज़ुर्गी के क़िस्से मालूम हुए तो दिल में इश्तियाक़ पैदा हुआ।  जब उनकी ख़ानक़ाह में पहुंचे तो देखा की दरवाज़े पर एक शख़्स को नैज़ों से भेद कर सूली पर लटकाया हुआ है और उसके जिस्म से ताज़ा ख़ून बह रहा है।  बोहत रंजीदा हुआ की कैसे पीर साहब है एक इंसान का क़तल कर दिया।  एक आवाज़ बुलंद हुई चले आओ, एक दरवाज़ा दो दरवाज़ा तीन दरवाज़ा हर दरवाज़े पर आवाज़ आती गई चले आओ और मुरीद अंदर दाख़िल हो जाता एक एक कर के दरवाज़े ख़ुलते गए और मुरीद मज़ीद अंदर दाख़िल होता गया। जब सारे दरवाज़े ख़ुल गए अब वोह उस हुजरे में दाख़िल हुआ जहाँ पर पीर साहब तशरीफ़ फ़रमा थे।  वहां का नज़ारा देख कर मुरीद के पैरों तले ज़मीन खसक गयी।     

उसने देखा की पीर साहब ज़मीन पर सो रहें हैं और उनके साथ एक हसीन ख़ातून सो रही है पीर साहब उससे पीठ किये हुए है और वोह ख़ातून उनके जानिब मुँह किये हुए है।  यह माजरा देख कर मुरीद को बड़ी ईज़ा हुई। यह सारा हर्बा शैतानी अमलियत और ख़बीसों का बुना हुआ जाल था।  अब शैतान ने मज़ीद दिल में शक शुकूक ओर वस्वसे डालना शुरू किये। 

कैसे पीर साहब है एक पराई ख़ातून की आग़ोश में सो रहें हैं, यह ख़ानक़ाह किसी वली की नहीं बल्कि क़ातिल, ज़िनाकार की अय्याश गाह है।   फिर उसने सोचा जो बहार दरवाज़े पर शख़्स को सूली दी थी हो सकता है वोह शख़्स इसका मर्द होगा और इन पीर साहब ने उसको भी ऐसे ही अपने जाल में फंसाया होगा।  बाद में उनका क़तल कर के इसकी बीवी के साथ ज़िना कर रहें हैं। 

ग़लत जगह पर आ गया दिल में यह मलाल ले कर मुरीद जाने को पलटा था फिर आवाज़ आई कहाँ जा रहे हो जो काम करने आये थे क्या वोह पूरा हो गया।  अब मुरीद से रहा ना गया उसने कहा कुछ काम नहीं जब आँखों से देख लिया तो उसको यक़ीन करना ही पडेगा यह किसी वली की ख़ानक़ाह नहीं अय्याशगाह है।  अब पीर साहब बेख़बरी से बेदार हुए और आलम ए अर्वाह से आलम ए असबाब में आये और बोले बैठो। 

जो तुमने देखा वोह एक शैतानी साया था तुम्हारी आखों पर ग़फ़लत का पर्दा।  इस ख़ानक़ाह में कहाँ है कोई ख़ातून एक कमरा है और सिर्फ एक आने का दरवाज़ा कहीं कोई ख़ातून नज़र आ रही है।  जब मुरीद की आँखों से शैतानी ग़फ़लत के परदे दूर हुए तो कहीं कोई ख़ातून नज़र नहीं आई।  पीर साहब ने सूली वाले शख़्स की हिकमत मुरीद को बताई।  जो शख़्स दरवाज़े पर सूली पर लटका देखा था वोह दरअसल मेरा नफ़्स था।  जिसको मेने नैज़ों की तेज़ नोक से भेद रखा है और उसको सूली पर टांग रखा है।  जो ख़ातून देखी वोह दुनियां और आलम के असबाब थे जो मेरे जानिब मुतवज्जो थी और में उनसे पीठ कर के ग़ाफ़िल सो रहा था।  मेरे को ना माल दौलत और ना ही दुनयावी साज सामान की हिर्स।  जब मुरीद पर हक़ीक़त आशकार हुई तो बोहोत रंजीदा हुए और अपने पीर के क़दम पकड़ लिए मुझे आपको समझने में ग़लती हुई।  फिर उन्होंने उस बन्दे को मुरीद किया।  

नाज़रीन बताने का मक़सद वही है कभी कभी जब बन्दे के अच्छे दिन का आग़ाज़ होता है तब शैतान जो नहीं चाहता की उसका कुछ भला हो तो ऐसे हर्बे खेलता है ग़ाफ़िल करता है शक और शुकूक में मुब्तला करता है ताके उस बन्दे तक अल्लाह की वोह रेहमत ना पहुंच पाए जो की अल्लाह ने उसके लिए शर्तिया लिखी है।  अब ऐसे मौके पर कामिल पीर का होना बोहोत लाज़िम है जो हर दुनियावी लज़्ज़त और नफ़स पर क़ाबू पा चूका हो। 

ऐसे कामिल पीर शैतान के हर हर्बे की बख़ूबी काट जानते हैं और उसको ना सिर्फ काट डालते हैं बल्कि अपने मुरीदों की किफ़ालत भी बख़ूबी करते हैं।  कियोंके शैतान को तमाम क़ुव्वत और ताक़त खुद अल्लाह ने फ़राहम की है और वोह मोमीनों के हर अच्छे काम पर डाकाज़नी करने को बेताब होता है।  लेकिन अगर पीर कामिल होता है ताक़त वाला क़ुव्वत वाला होता है हर शैतानी हर्बे से अपने मुरीद को बचा लेता है और एक ढाल के जैसे उसको मेहफ़ूज़ करता है।    

सहाफ़ी ज़ुबेर

Thursday, 26 October 2023

लंगूर नहीं अभिसार

अज़ीज़ नाज़रीन,

जब से इजराइल की दहशत को हमास ने अपने जंगजू से तोला है और उसके आयरन डॉम को पंचर कर के उसकी हवा निकाल दी है तब से लंगूर लँगूरनियों और ज़ाफ़रानी बरादरी में अंगार ऐसी लगी है की ज़बरदस्त जलन देखने को मिल रही है।  नाज़ेबा कलेमात के साथ हमास की किरदार कूशी करना अदना दर्जे की झूठी ख़बरे चलाना और इज़राइल के साथ यकजेहदी दिखाना। 

इन सब में अभिसार शर्मा, आदित्य कुमार जैसे कुछ यू ट्यूब के सहाफ़ी हमास को आतंकवादी बोल कर मुख़ातिब कर रहे थे।  लेकिन यू टियूब के  वोह तमाम आला ज़र्फ़ सहाफ़ी लंगूर नहीं हैं।  कियोंके उनकी ख़बरों में लंगूर लँगूरनियों की तरह ज़हर नहीं परोसा जाता है। 

ठीक है उनकी अपनी एक सोच है उसके तहत उनको हक़ है की किसी भी मुद्दे पर अपनी राये रखें।  अगरचे हमास को वोह आतंकी बोलतें हैं तो भी ऐसे तमाम आला ज़र्फ़ सहाफ़ी लंगूरों की जमात का हिस्सा नहीं बन सकते जो सदा ही ज़हर परोसने का काम करतें हैं। 

यू टियूब के आला ज़र्फ़ सहाफ़ियों की तहे दिल से इज़्ज़त करता हूँ जिसमे से ८० फीसद तो ब्राह्मण हैं।  ख़ास साक्षी जोशी, प्रज्ञा मिश्रा, अभिसार शर्मा, पीयूरेश शर्मा, प्रसून कुमार वाजपाई और बोहोत से नाम हैं जो बग़ैर ज़हर मिलाये हुकूमत की चाटुकारिता किये बग़ैर हक़ीक़त से आगाह करतें हैं इन सब को दुआ। 

इज़राइल को अपनी तहक़ीक़ाती तंज़ीम मोसाद की ज़हानत और आयरन डॉम के ऊपर बोहोत ग़ुरूर था। यही इज़राइल अपनी ज़हानत भारत जैसे मुफ़लिस देशों में बेचता था जो ख़ुद अपने अवाम की हिफ़ाज़त नहीं कर पाया वोह दूसरों की हिफ़ाज़त करने का दावा कर रहा था।   एक छोटी सी सूई की नोक ने फुग्गे को ऐसा फोड़ा है की उसकी जलन मिटाये नहीं मिट रही है।  

इंसानियत के मुजाहिद "हमास" और जदीद रावण, जल्लाद, दहशत का सरग़ना उर्फ ज़ालिम तरीन हिटलर राजा नेतन्याहू के माबेन जंग १९वें दिन में दाख़िल कर गया है। यह महसूस किया जा रहा है कि यह जंग इस बार तब तक ख़तम नहीं होगा जब तक फ़लस्तीन की पाक सरज़मीन से इज़राइल की दहशत, बर्बरियत, नाइन्साफ़ी ग़ायब नहीं हो जाती है।

दहशत का सरग़ना नेतन्याहू और अमेरिकी इन्तेज़ामियाँ ने सख़्त अज़्म किया है कि जिस तरह उन्होंने आई.एस.आई.एस. की मौजूदगी को ख़तम  किया है, उसी तरह वे हमास को भी ख़त्म कर देंगे। कितना अहमक़ाना मुशाहेदा है।  बतौर एक मुसन्निफ़ मैं तमाम आलमी बरादरी को कुछ बातें साफ़ गोई से करना चाहता हूं, जिनमें इज़राइल की दहशत उसका आक़ा अमेरिका और सभी भारतीय ज़ाफ़रानी लंगूर शिद्दत पसंद हिंदू भी शामिल हैं, जो हमास को दहशतगर्द कहकर मुख़ातिब कर रहे हैं और उनका मुवाज़ना आई.एस.आई.एस. से कर रहे हैं। आई.एस.आई.एस. और हमास में बहुत फ़र्क़ है।आई.एस.आई.एस. इजराइल की पैदा कर्दा नतीजा था, वे इंसानियत के क़ातिल थे, उनका जंग को ख़तम करने की कोई हतमी मियाद नहीं थी ना ही कोई हद थी।  बल्कि मोमीनों के दिल में शक़ वसवसों में मुब्तेला पैदा करना और आलमी बरादरी को इस्लाम की तालीम से गुमराह करना था।  जब इराक़ इस्लामीक ममलेकत है तो किस के साथ अपनी ही हुकूमत और लोगों के साथ उन्होंने जंग लड़ी थी। 

जबकि हमास फ़लस्तीन की ज़मीन पर इज़राइल के नाजाइज़ क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा है. यह इज़राइल के ७० साल के दहशत, बर्बरियत, नाइन्साफ़ी,  ग़ैर क़ानूनी मुक़दमे, फ़लस्तीनी अवाम की नस्ल कूशी के ख़िलाफ़ उसूलों पर मब्नी जंग है। कोई भी आलमी मुमालिक इस पाक जंग की मुवाज़ना दहशतगर्दी से नहीं कर सकता।

जैसा कि अमेरिका, इजराइल और भारत का मानना ​​है कि इजराइल के लोगों को दिफ़ा का हक़ है, वही उसूल फ़लस्तीन के अवाम पर भी लागू होना चाहिए जो ७० सालों से अपनी ज़मीन से बेघर किये हुए हैं। फ़िलिस्तीन के अवाम को भी बाइज़्ज़त जीने और अपनी दिफ़ा का पूरा हक़  है।

भारतीय ज़ाफ़रानी मीडिया में मौजूद और शिद्दत पसंद लोग हमास को आतंकवादी बता रहे हैं और उसकी तुलना आई.एस.आई.एस. से कर रहे हैं। हमास की हिकमते अमली आई.एस.आई.एस. जैसी नहीं हैं, बल्कि आर.एस.एस. और सभी ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंदों की सरगर्मियों की तुलना आई.एस.आई.एस. से की जा सकती है।

ज़ाफ़रानी दहशत और आई.एस.आई.एस. के बीच काफ़ी समानताएं हैं। दोनों दहशतगर्द तंज़ीमों में सजा देने का तरीक़ा एक जैसा है. दोनों आम अवाम पर ज़ुल्म करते हैं। दोनों अपनी ही हुकूमत से लड़ रहे हैं. चूंकि २०१४ के बाद जब भाजपा ने मर्कज़ और २२ सूबों में हुकूमत क़ायम की तो वतन के अवाम के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का कोई मतलब नहीं है। मोदी की क़ियादत में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार बनाने का जो भी हदफ़ था वह पूरा हो गया। लेकिन फिर भी संघ और सभी दीगर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द तंज़ीमों ने अक़लियतों ख़ास कर मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों पर लगातार ज़ुल्म किया, उनका क़त्ल और उनकी अनदेखी की। क्योंकि यह ज़ाफ़रानी हिंदू राष्ट्र क़ायम करना चाहते हैं, इसलिए वे हर हूकूमाती आला ओहदे पर अपने दहशतगर्द लेफ्टिनेंटों की दरअंदाज़ी (घुसपैठ) कराते हैं। एवान से रिजर्व बैंक तक, अदलिया से सदर ए जम्हूरिया तक, पुलिस से इन्तेज़ामियाँ तक, चुनाव आयोग से फौज तक। अगर मर्कज़ में आपके मनपसंद आदमी का क़ब्ज़ा है और ज़ाफ़रानी तंज़ीम है, २२ सूबों में ज़ाफ़रानी रंग में हैं तो आप किससे जंग कर रहे हैं, क्या अपनी ही सरकार से नहीं, वह दहशतगर्दी है।

आई.एस.आई.एस. की सरगर्मियों की तुलना हमास से करना बेवक़ूफ़ी है। कोई भी आलमी बरादरी आई.एस. की सरगर्मियों के साथ नहीं था लेकिन रूस, चीन और ज़्यादातर मग़रिब के साथ सभी मुस्लिम मुमालिक फ़लस्तीन के मुद्दे की हिमायत कर रहे हैं।

जंग के आख़िर में इसराइल ख़ुद को इस जंग में तनहा पाएगा। क्योंकि यह जंग हक़ और नाहक़,  सही और ग़लत,  दहशत और इंसानियत पर मब्नी है। ७० सालों तक आलमी बरादरी गूंगी तमाशाई बन रह सकती है, लेकिन अब धीरे-धीरे वे मुल्क जो कभी इज़राइल के साथ थे, इंसानियत और फ़िलिस्तीन के हित का समर्थन करेंगे। फिलिस्तीन के अवाम की ७० साल की क़ुर्बानी और नस्लकुशी बेकार नहीं जाएगा। आख़िरकार अमेरिका भी इसरायली नाजाइज़ क़ब्ज़े की मुख़ालेफ़त करेगा.

आलमी बरादरी में से कोई भी कभी भी गूंगा तमाशबीन नहीं बना रह सकता जब उन्हें फिलिस्तीन के बेगुनाह अवाम पर दहशत की मनमानी का पता चलेगा।

जब तमाम आलमी बरादरी इजराइल के दहशत पर दहाड़ेगा तब भारत में शिद्दत पसंद हिंदुओं को माक़ूल जवाब मिलेगा। पहले हिस्से मरहले  में मोदी और तमाम भक्त मंडली इजराइल के साथ खड़ी थी. आहिस्ता आहिस्ता उनकी ताक़त थकान में तब्दील हो जाती है। पहले ज़ाफ़रानी हुकूमत ने फिलिस्तीन के साथ एकजेहदी दिखाई, फिर मोदी ने ख़ुद इजराइल को जारहाना बताया और कहा कि वह फिलिस्तीन के लोगों के साथ हैं और इमदादी मवाद भेजा।  धीरे-धीरे भक्त और ज़ाफ़रानी लोग भी इजराइल के साथ खड़े होने में थकने लगे और मोदी और आलमी  बरादरी की सफ़ों में बैठने लगे। इंसानियत का साथ देने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है.

सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश

Wednesday, 18 October 2023

इनके बारे में भी कुछ बोल दो, ना जिगर ना क़ुर्बानी का जज़बा।

अज़ीज़ नाज़रीन,

भारत का अक्सरियत अवाम मौजूदा हालात में जंग का पसमंज़र और तारीख़ जाने बिना इजराइल की हिमायत में खड़ा है।   यह जंग उसूलों की बुनयाद पर फ़लस्तीन पर इजराइल के नाजाइज़ क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ है।  भारत का अक्सरियत अवाम इज़राइल की हिमायत कर रहा है, भले ही उनकी मज़हबी अक़ाइद हिंदुओं के साथ एक जैसे न हों, इज़राइल भारत का नज़दीकी पड़ोसी नहीं है, और ना ही उनकी मादरी ज़ुबान एक है। यहूदी हिब्रू का इस्तेमाल करते हैं जबकि भारतीय हिन्दी का।  लेकिन फिर भी भारत का अक्सरियत तब्क़ा इजराइल के साथ है क्योंकि इजराइल फिलिस्तीन के लोगों पर ज़ुल्म और दहशत कर रहा है।

मैंने बहुत पहले संन २०१८ में अपने मज़मून में ज़िक्र किया था, जब मोदी के इज़राइल दौरे के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत का दौरा किया था।  मोदी आठ साल के यहूदी लड़के रब्बी मोशे के लिए रोये, जिसके वालिद की नरीमन हाउस हमले में मौत हो गई थी।  मोदी जी अगर आपको इजराइल के लोगों से इतनी मोहब्बत है, इजराइल से सभी यहूदियों को बुला कर गोवा में बसा दें. १९६१ तक गोवा पुर्तगाली नौआबादी  था। भारत की हुकूमत ने फौजी हिकमत इख़्तेयार करने के बाद इस पर कब्ज़ा कर लिया, जिसमें ३००० से ज़ाइद अवाम हलाक हुए थे। क्या भारतीय वैसा बड़ा दिल दिखा पाएंगे जैसा फ़िलिस्तीन के मुसलमानों ने उखाड़े गए यहूदियों के लिए दिखाया था।

मैं उन तमाम लोगों से सीधा सवाल पूछना चाहता हूं जो इज़राइल की तारीफ़ करते हैं और उसके लिए दर्द महसूस करते हैं।  रोहिंग्या मोहाजिरों, बांग्लादेश, पाकिस्तान या म्यांमार से जाइज़ या नाजाइज़ मोहाजिरों पर उनका क्या कहना है।

अब मेरे सवाल के दूसरे हिस्से पर आते हैं। अगर वोह मोहाजिर आहिस्ता आहिस्ता ज़मीन ख़रीदना शुरू कर दें और तिजारती इदारे क़ायम कर लें, इन्तेज़ामियाँ के मामलों में हिस्सा लेना शुरू कर दें।  इतना ही नहीं बिल आख़िर वे हुकूमत क़ायम कर लेते हैं और भारतीयों पर हुकूमत करने लगते हैं। सिर्फ हुकूमत नहीं बल्कि भारतीयों पर ज़ुल्म, तशददुत भी करना शुरू कर दें। उनकी बिजली, पानी और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी की कमाई में कटौती करना शुरू कर दें।

मामला यहीं खत्म नहीं होगा, अगर ये पनाहगुज़ीन मोहाजिर नौजवानों को ग़ैर क़ानूनी हिकमत से हिरासत में लेकर, बद नियती पर मब्नी मुक़दमे चलाकर या यहां तक ​​कि बिना किसी वजह के उनको क़तल करके भारतीय अक्सरियत की नस्ल कूशी करना शुरू कर देंगे।  यह काफ़ी नहीं है अगर ऐसे ही हालात ७०-८० साल तक रहें, फिर भारतीय क्या करेंगे। क्या आप अब भी उन मोहाजिरों या जाइज़ ना जाइज़ पनाह गुज़ीनों की हिमायत करेगें। 

फ़िलिस्तीन के अवाम के साथ ऐसा ही हो रहा है। फ़िलिस्तीन के मुसलमान इस्लाम की अपनी तालीम की वजह से हमेशा ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं और साइल के लिए बड़ा दिल दिखाते हैं। जब हिटलर ने यहूदियों की नस्ल कूशी किया तो उन लुटे-पिटे और कमज़ोर यहूदियों को फ़िलिस्तीन के मुसलमानों ने पनाह दी थी। कुछ अर्से बाद जब उनमें ताकत आ गई तो उन्होंने शरारत करना शुरू कर दिया और साजिश के ज़ारिये फ़लस्तीन के लोगों की ज़मीन और घर हड़पना शुरू कर दिया। वक़्त के साथ इन कमज़ोर यहूदियों ने इन्तेज़ामियाई मामलों में दखल अंदाज़ी कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया और १९४८ में ख़ुद को इस जगह का हाकिम होने का एलान कर दिया और इसे इज़राइल नाम दिया गया।

जब जब फ़िलिस्तीन के लोग उनसे कहा कि हमें इज़्ज़त के साथ जीने की आज़ादी चाहिए तो वे उन पर ज़ुल्म, तशददुत कर रहे हैं। अगर यहूदी बिना किसी आलूद और साजिश के साथ साफ़ हाथों से फ़िलिस्तीन आए थे तो वे फ़िलिस्तीनी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम बनाये गए कानूनों का तामील क्यों नहीं करते। वे फ़िलिस्तीन के अवाम की तरह क्यों नहीं रहते और क्यों यहुदिओं ने एक नया मुल्क बनाया की दुसरे उनके बनाये हुए क़ानून के ज़ेरे इंतज़ाम काम करें।

क्या भारत का अक्सरियत तबक़ा जो आज इजराइल की हिमायत में खड़ा है यह सब बर्दाश्त कर पायेगा।अगर हाँ तो क्यों हर इन्तेख़ाब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम और दीगर इन्तहा पसंद फ़र्ज़ी ख़बरों से अवाम को डराते और भड़काते हैं, "रोहिंगिया ने वोट किया", "रोहिंग्या आ जाएगा", "हम भारत में मौजूद हर बांग्लादेश या रोहिंग्या को बहार निकाल देंगें"।  अगर आप इज़राइल और इज़राइल के अवाम के मफ़ात की हिमायत करते हैं तो आपको बांग्लादेश, मयंमार और पाकिस्तान के क़ानूनी या ग़ैर क़ानूनी मोहाजिरों और पनाह गुज़ीन अवाम की भी हिमायत करना होगा। 

मुझे नहीं लगता कि भारतीयों ख़ास अक्सरियत हिंदुओं, सहाफ़ियों और हूकूमती नुमाइंदों के पास इतना बड़ा जिगर होगा जितना मुसलमानों के पास है। क्या वे इसराइल के यहूदियों को अपनी ज़मीन दे सकते हैं क्योंकि मुसलमानों ने उनके सबसे बुरे दिनों में मदद के लिए हाथ बढ़ाया था। इसी बात का ज़िक्र साबिक़ पाकिस्तानी क्रिकेटर और कप्तान शाहिद अफरीद ने भी किया है जब वो आलमी कप के लिए भारत आए थे।  लगातार मिल रही धमकियों और ट्रोल के चलते जब शाहिद पाकिस्तान पहुंचे तो उनका तास्सुर भारतीय अवाम के लिए बिल्कुल मनफ़ी था।   उन्होंने सहाफ़ी इजलास में कहा कि भारतीयों के पास पाकिस्तानियों और मुसलमानों जितना बड़ा दिल नहीं है।  भारत के सहाफ़ी, अवाम और खेल की अज़ीम हस्तियां भी पाकिस्तान के लिए ज़हरीला रवैया रखती हैं। उनमे मुसलमानों की तरह क़ुर्बानी देने का जज़बा नहीं है। 

आज भारत की फौज पर सहाफ़ी बड़े बड़े क़सीदे लिखतें हैं।  उनकी क़ुर्बानी का ज़िक्र होता है।  फौज की क़ुर्बानी के मुद्दे पर कई मज़मून लिख चूका हूँ।  फ़ौज को हर काम पर मज़बूत तनख़ा मिलती है।   पेंशन, ग्रेचुटी, घर से ले कर घर के सामान तक हर चीज़ पर रियायत मिलती है।  फ़ायदा तो ख़ूब मिलता है तो यह क़ुर्बानी थोड़ी हुई।  यह तो अदला बदली हो गई।  फ़ौज ने अपनी जान को ख़तरे में डाला  बदले में हुकूमत से तगड़ा फ़ायदा लिया।  फिर जंगी महाज़ पर मरने पर लाखों करोड़ों की मदद उनके वारिसों को मिल जातें हैं।  पेट्रोल पम्प के लिए ज़मीन और ना जाने क्या क्या?

क़ुर्बानी वोह जो अपनी जान को ख़तरे में डाल कर अवाम के लिए काम करे और उसका फ़ायदा ख़ुद ना भोगे।  

सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...