Wednesday, 29 December 2021

हक़ वाली बात।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मुद्दा सियासत को रूहानी जामा पहनाने से ले कर तो उसको इन्साफ और हक़ के पैमाने पर तोलने की निस्बत से है।  नबी करीम सल्ललाहो अलैहे वस्सलाम आलमे इंसानियत के लिए नहीं बल्कि रूहे ज़मीन पर जितनी भी मख्लूक़ पैदा की गयी है ख़्वाहा जानदार या बेजान के लिए नबी बन कर तशरीफ़ लाये थे। हर शै नबी की हम्दो सना करती आपकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई में आपके ताबे रहते।  

बेजान कंकारियाँ अबू जेहल के हाथ में और नबी से उसने पुछा की अगर आप अल्लाह के सच्चे नबी हैं तो बताएं की मेरे हाथ में क्या है।  आप बोले में बताऊँ या तेरे हाथ की कंकारियाँ खुद बयान करें।इतना कहना था की कंकारियाँ कलमा ऐ तय्यबा पड़ने लगी। ऐसे ही एक बार अबू जेहल खजूर ले कर आया और खजूर खा कर उसकी गुटली फैक दी और बोला की अगर आप अल्लाह के नबी हैं तो अब उस खजूर की पैदवार कर के दिखाओ।  आपने अपनी अगशतरी मुबारक ज़मीन में पेवस्त कर दी और खजूर का दरख़्त निकल आया।  आज भी अरब में बग़ैर गुटली की नस्ल वाला वोह खजूर बोहोत पाया जाता है। 

नबी सल्लम का एक मोज़ेज़ा था की कोई भी एहले ईमान या बद ईमान इंसान उनको देखते ही अपनी ख़ुद की सिफ़त बयान करने लगता था।  एक बार नबी सल्लम सहाबा ऐ किराम को दर्स दे रहे थे, एक सहाबी आपकी शान में कसीदे पड़ रहे थे आपकी अज़मत बयान कर रहे थे। इतने में इस्लामिक लिबास में एक काली भेड़ मुनाफ़िक़ आया और उसने नबी सल्लम को खूब ऊल जलूल बकना शुरू कर दिया तोहमत तराशी करना शुरू कर दिया।  आप नबी सल्लम उसकी ना ज़ेबा बातें सुन कर मुस्कुराते रहे, सहाबा को बोहोत गुस्सा आया लेकिन आप नबी की अज़मत को देखते हुए कुछ बोल ना सके।  उसके जाने के बाद सहाबा ने नबी से पुछा या नबी अल्लाह फलां सहाबी आपकी अज़मत बयान कर रहे थे उनको आपके अंदर खूबिया ही खूबिया नज़र आई फिर यह मुनाफ़िक़ ऐसी बातें कर रहा था। आप नबी सल्लम ने बताया जो सिफ़त उस मुनाफ़िक़ की थी उसने मुझको देखते ही अपनी सिफ़त बयान की और जो सिफ़त उन सहाबा की थी वोह मुझको देखते ही उन्होंने अपनी सिफ़त बयान की।

नाज़रीन ऐसा काम जो आम इंसान से हट कर हो उसको नबी करें तो उसको मोज़ेज़ा कहते हैं वही काम अगर नबी के बाद उनकी उम्मत का कोई वली करे तो उसको करामात कहते हैं।  दौरे हाजरा में नहीं बल्कि नबी सल्लम के पर्दा करने के बाद भी कई वली कामिल ज़ाहिर हुए जिनके रोज़ मर्रा के अमल से बातों से कश्फ़ और करामात ज़ाहिर होती थी।  

नाज़रीन आज के दौरे हाजरा में जो उम्मत की काली भेड़ें,  शिद्दत पसंद काफ़िर, लंगूर और लँगूरनियाँ असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मजलिस पर जो तोहमत तराशी लगाते हैं दर असल वोह अपनी ख़ुद की कैफियत बयान करतें हैं।   किसी भी दीन दार मज़हबी इंसान पर बग़ैर किसी वाजिब सबूत के सिर्फ जुबां  को तालू से लगाने की इस्लामिक सज़ा भी बोहोत बड़ी है।  अगर असदुद्दीन बीजेपी की बी टीम हैं और पैसा ले कर उम्मत का सौदा करतें हैं या क़सदन अपनी तंज़ीम की नुमाइंदगी इसलिए खड़ी करतें हैं की उसका फायदा ज़ाफ़रानी महाज़ को हो तो यह साबित करें की असदुद्दीन ने किस ज़ाफ़रानी वज़ीर या आला ओहदेदार से रक़म ली और क़ौम का सौदा किया। अगर जुम्मन चाचा यह बात साबित नहीं कर पाए तो वोह इत्तेहान होगा एक दीन दार इंसान पर बोहतान लगाने की इस्लामिक जरस्पोंडेंस (शरीयत क़ानून) में क्या सज़ा है इनको मालूम होना चाहिए।   

यह बात दुर्सुत है की भारत एक जमुहरी निज़ाम का पैरोकार है, और हूकूमते हिन्द में इज़हारे तास्सुरात की आज़ादी है, बरक्स वोह तास्सुरात हक़ पर मब्नी होना चाहिए ना की झूट फरेब जालसाज़ पर होना चाहिए।   किसी शख़्स में सच्ची बात अगरचे कड़वी है तो भी कहो लेकिन उसके ख़िलाफ़ झूट कितना भी मीठा कियूं ना हो उसको फैलाने से गुरेज़ करो।   


Zuber

Tuesday, 28 December 2021

फिर तुम को अब्बू से कौन बचाएगा।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आप लोगों के दरमियान दो तीन मुद्दों को ले कर हाज़िर हुआ हूँ।   पहला उत्तराखंड में भगवा दहशतगर्दों की जानिब से हूकूमते हिन्द के खिलाफ जंग का एलान करना।  दूसरा मुस्लिम नस्ल कुशी का एलान करना और तीसरा भगवा कीड़ों की जानिब से ऊल जलूल बयानबाज़ी करना।  

ऐसी ही हिमाक़त लंगूर और लँगूरनियों ने मई जून २०१९ में की थी जब उन्होंने इंतेखाब को जंग का नाम दे कर मौत के उस ख़ौफ़ से अपने जिस्म की दर्जे हरारत को मज़ीद बरक़रार रखने की नाकाम कोशिश की थी।   उस ऐलाने जंग के बाद इतने जूते इन भगवा लंगूर और लँगूरनियों  को पड़े थे आज तक लंगूर और लँगूरनियों के बच्चे गंजे पैदा हो रहें हैं।  उस जंग के एलान के बाद कई काफिर ज़हरीले लंगूर और लँगूरनियाँ जहन्नुम रसीद हो चुके हैं।  और होने की कगार पर हैं।  आगे और है, और है। 

लंगूरों के उस जंग के एलान के बाद गोली मारो मोहीम का आगाज़ किया गया।  जो अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है।  जिस जिस भगवा वाइरस ने गोली मारो मोहीम का नारा दिया था अब पचता रहे होंगे क्योंकि ८० फीसद भगवा कीड़े ही गोली मार के हलाक किये गए मतलब यही देश के ग़द्दार थे।  गोली मारो मोहीम के बाद ९९ फीसद अवाम गोली मारो के तहत हिन्दू ही निकले।  इसमें से कुछ ने खुद ही गोली मार कर खुदकशी कर ली और कुछ को गोली मारी गई।  आगे और है।  हिन्दू मज़हब ख़तरे में भगवा धारी गुंडों की वजह से हो रहा है।    ना की किसी मुस्लिम, क्रिस्टी, सिख या दलित की वजह से हो रहा है।  

इस गोली मारो मोहीम में एक और मक़तूल का नाम जुड़ गया है।  सूबे शुमाल के अलीगढ़ में बरोज़ पीर शाम को एक अज़ीम और क़वी सीमेंट ताजिर संदीप गुप्ता को पुलिस के हिफ़ाज़ती घेरे को तोड़ते हुए गोली मार कर हलाक कर दिया है। 

इस ज़ाफ़रानी ताजिर संदीप गुप्ता का क़त्ल उस वक़्त हुआ जब उसके साथ हूकूमती गनर और पुलिस का तहफ़्फ़ुज़ अमला भी साथ था।  इस ज़ाफ़रानी ताजिर को किसी नावाक़िफ़ अमले ने उसकी सियाह फार्च्यून गाडी में ताबड़तोड़ गोली मार के हलाक कर दिया।    आगे और है, और है। 

नाज़रीन २०१९ में ही इस सहाफ़ी ने वज़ीरे दरिंदा अमित शाह और मोदी को चूनौती दी थी की तुम इस सहाफ़ी को १५ दिनों के अंदर गिरफ्तार करो अगर गिरफ्तार करने में कामयाब हो गए तो समझो तुम कामयाब हो गए नहीं तो हुकूमत मुसलमानों के हाथों में दे देना या जंग करना लेकिन तुम यह जंग किसी सूरत से फतह नहीं कर सकोगे।   फिर १५ दिनों का वक़्फ़ा गुज़र जाने के बाद भी वज़ीरे दरिंदा अमित शाह और मोदी को हुकूमत मुसलमानों के हाथ में सौपने की बात कही थी, क्योंकि तुम हमें गिरफ्तार नहीं कर पाए।  लेकिन बजाये अमन के मोदी इन्तेज़ामियाँ ने जंग को तरजीह दी और नतीजा आपके सामने हाज़िर है।  २० जनवरी २०२० को जो पहला करोना का केस सामने आया था तब से ले कर अब तक ग़ालिबन ७ लाख से ज़ाइद अफ़राद मारे गाये।

नाज़रीन वही हिमाक़त अब भगवा दरिंदों ने की है इन लोगों को जंग का क्या भूत सवार है हर मुद्दे पर जंग की जानिब सोचने लगते हैं।  क़ुव्वत और ताक़त का पता नहीं अपनी लुगाई संभाली जाती नहीं और जंग की बात करतें हैं।  लठ में नहीं ताक़त, करें जंग की बातें।  

नाज़रीन इन भगवा जनखों ने जंग का एलान तो कर दिया, लेकिन उनके हाथों में इतनी ताक़त और क़ुव्वत ही नहीं है की लठ उठा सकें, तो ऐसी सूरत में फिर वही पुराना रास्ता इख़्तेयार करने की फ़िराक़ में है, "फरारी", जनखा साधू और बीजेपी की इंतेखाब को मन्सूख़ करना चाहतें हैं।     

सूबे शुमाल में असेंबली इंतेख़ाब (UP Election 2022) से क़ब्ल इंतेख़ाब कमीशन का एक वफंद वहां अहम दौरे पर पहुंच रहा है।  इस दौरे से इंतेखाब कमीशन की टीम सियासी तंज़ीमों से उनकी राये ले कर उनका दिल टटोलने की कोशिश करेगा और हालात का जायज़ा लेने के बाद ते करेगा की सूबे शुमाल के इंतेखाब अपने वक़्ते मुक़्क़र्रा पर करवाए जाएँ या उनमे ताख़ीर की जाए।  ऐसी हिकमत एक गुलाम तंज़ीम चुनाव आयोग की जानिब से सिर्फ और सिर्फ ज़ाफ़रानी ब्रिगेड की मुमकिना शाकिस्त को देखते हुए ली गई है।   गुलाम सोच इन्तेख़ाबी आयोग का यह मशकूक दौरे का आगाज़ आज से हो रहा है।

कोई ज़ाफ़रानी कीड़ा साधू के लठ की हूल पट्टी दे रहा था।   बस हमारा एक ही झटका देख कर में फट गया साधू का लठ,  इस जनखे के लठ में इतनी ताक़त नहीं की हमारे लठ के बाद तक खड़ा रहे।  अगर हिजड़े में ताक़त होती तो विवाह करता लेकिन डर गया की कही पड़ोस में रहने वाले अब्दुल के बेटे से तो मेरी  लुगाई मोहब्बत नहीं कर बैठेगी।  साहेब यह तो लव जिहाद है।  

में उस ज़ाफ़रानी कीड़े से सवाल करता हूँ, तू जिस साधू के लठ की ताक़त की बात करता था वोह तो उठने से पहले ही लूल हो रहा है, तभी तो दस्तूरी नुमाइंदों की मदद लेने की ज़रुरत पड़ी।   अगर लठ में ताक़त और क़ुव्वत होती तो चुनाव आयोग इंतेखाब को मुल्तवी करने की बात नहीं करता।   भगवा लठ ठीला होता दिख रहा है।   उसमे इतनी क़ुव्वत और ताक़त नहीं की हमारे लठ से देर तक खड़ा रह सके। 

अबे तू तो लूल लठ पर भरोसा कर के बकवास कर के चला जाएगा लेकिन फिर तेरे को और तेरी जमात के लोगों को अब्बू से कौन बचाएगा।  जी अब्बू।  

Zuber

Sunday, 26 December 2021

आ गए जंग में बाबर और औरंगज़ेब

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मौज़ूं कुछ अलग नहीं है बल्कि वही पुराना क़िस्सा है जिसको आश्रम बोल कर मुख़ातिब किया जाता है।  और ऐसे आश्रमों के ख़िलाफ़ २०१५ से कई मज़मून शाया किये हैं।   जिसमे इन ज़ाफ़रानी पैराहन पहनी ख़ातूनों और उस आश्रम के ताल्लुक़ात को बरहना कर दिया है।   नाज़रीन जैसा की गुजिश्ता हर मज़मून में दुर्गा वाहिनी और उससे मुनसलिक ख़ातूनों के बारे में बताया गया है की ऐसी ख़ातूने जिन्सी ग़ुलाम की हैसियत से काम करती है और दहशत की नस्ल को आगे बढ़ाती हैं।   


 

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नाज़रीन इन ज़ाफ़रानियों का किसी और मज़हब के ख़िलाफ़ ज़हर अंगेशी करने और गिरजाघरों, मदरसों या गुरूद्वारों पर हमला करने के पीछे भी मक़सद अपने गुनाहों से पोशीदगी रखना होता है।   बाक़ी का बचा हुआ काम इन आश्रमों की भीक में पल रहे छी न्यूज़ जैसे मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ पूरा कर देती हैं।   किसी भी खबर को तोड़ मरोड़ कर पेश कर के ऐसे आश्रमों की बदनामी होने से पहले ही छोटी सी बात का बतंगड़ बना कर जो एहम और ख़ास खबर है उसको ब्लैक आउट कर दिया जाता है।  


नाज़रीन इस सहाफ़ी के पास पूरी तहक़ीक़ात और सबूत मौजूद हैं जिसके ऊपर कई मज़मून शाया भी किये जा चुके हैं की किस तरह से इन आश्रमों में दुर्गा वाहिनी की जवान और हसींन हिन्दू बच्चिओं को मज़हब के नाम पर ज़हर भर कर आलमी सतह पर दहशत को फ़रोग़ देने और हिन्दू मज़हब फ़ैलाने के लिए भेजा जाता है।   जवान लड़कियों को एक हदफ़ दिया जाता है उसमे किसी भी मुल्क के सरबराह से अपने मक़सद को पूरा करने से ले कर तो उस मुल्क की फौजी ताक़त और क़ुव्वत की जानकारी फ़राहम करने की ज़िम्मेदारी होती है।  इस काम में अगर जिन्सी ताल्लुक़ात भी कायम करना पड़े तो यह लड़कियां उसके लिए भी तैयार रहती हैं।  इनके ज़हन को आश्रमों में जालसाज़, ज़ेहनी मरीज़ ज़ाफ़रानी गुंडों की सोहबत में रह कर उसी तरीके से तैयार किया जाता है।   पहले इनका इस्तासाल साधू करतें हैं जो भी आश्रम का सरदार होता है वोह खूब मौज उड़ाता है उसके बाद उसके चमचे फिर जब वोह पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी होती है तो उसको ज़ेहनी और जिस्मानी तरीक़े से मज़हब के नाम पर ज़हर की मिक़्दार दे दे कर उस काम के लिए तैयार किया जाता है।  अब यह लड़की तालीमी आफ़ता या उमंग से भरी हुई अवाम के लिए मुल्क के लिए कुछ करने की आशा ली हुई नहीं रह जाती है बल्कि बन जाती है एक खतरनाक शातिर मसूबे वाली ज़हरीली बदमाश लड़की जिसको उसका हदफ़ हर दम याद रखना होता है।  


नाज़रीन इन सघ, विहिपी, बजरंगदल के आश्रम हिंदुस्तान से ले कर ब्रतानियाँ, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड जैसे मुल्कों में बेतहाशा शिद्दत से चल रहें हैं।  इनमे से कुछ योग की तालीम के नाम पर फरेब कर रहें हैं।  


नाज़रीन छी न्यूज़ के लंगूर और लँगूरनियाँ ओवेसी के बयान पर बवाल मचा रहें हैं उसकी वजह ही उत्तराखंड में जो क़सम मोहीम ज़ाफ़रानी शैतानों और उनकी पालतू आश्रम की पैदाइश वोह तवाइफ़ है उसकी कारगरदेगी पर पर्दापोशी करना है।  ओवेसी ने कुछ भी गलत नहीं कहा, उन्होंने तमाम पुलिस वालों के लिए कुछ नहीं कहा उन पुलिस वालों के लिए बयान दिया जो ना इन्साफ हैं, नाहक़ अपनी फ़िर्क़ावाराना ज़ेहनियत का मुज़ाहिरा करते हुए मासूमों पर गोलियां चलातें हैं।  उन्होंने सही कहा मोदी और योगी आज हैं कल नहीं रहेगें लेकिन क़ानून हमेशा है और रहेगा और जब वोह नहीं रहेगें तब तुमको कौन बचाने आएगा।  और उन्होंने मालिके मुतलक़ से बद्दुआ की है।   जब दिल दुखता है तब बद्दुआ मुँह से करो या ना करो मालिक सुनता है। ओवेसी जी का दिल दुखा उन्होंने बद्दुआ दे दी अब उसमे हाय तोबा इसलिए मचाई जा रही है की उत्तराखंड के देहशती इजलास पर पर्दा डाल दिया जाए।  लेकिन उत्तराखंड में नाम बनाम मुस्लिम अवाम की नस्ल कुशी की बात कही है और पुलिस, फौज को भी इस मरदूदे हरम में शामिल होने की दवात दी है।   साबिक़ वज़ीरे आज़म को गोलियों से भून देने की बात कही है।


हम भी याद रखेगें एक एक ज़ुल्म और बर्बरियत को याद रखेंगे, २० साल तक भी याद रखा जाएगा और जो जो पुलिस वाले, फौज के अराकीन, संघी ज़हर, शिद्दत पसंद हिन्दू ज़ुल्म और बर्बरियत में शामिल हैं उनको चुन चुन के मारेगें।  जिस तरह से दिल्ली हिन्दू दहशतगर्द हमले के तमाम पुलिस वाले, हिन्दू शिद्दत पसंद हमलावर और वोह ताजिर जिन्होंने इस हमले के लिए माशी इमदाद की थी उसमे से ज़्यादातर सभी महज़ १ साल के वक़्फ़े में जहन्नुम रसीद हो गए।   भाजपा का एक दहशतगर्द बोहोत उड़ रहा है जब जब औरग़ज़ेब और बाबर की बादशाहत आई राणा प्रताप और पृथ्वी राज उठे हैं।  उसको बता दूँ जब जब राणा या पृथ्वी उठेगा उसको धुल चटा दी जाएगी और पत्तल पर सूला दिया जाएगा घास की रोटी खाने पर मजबूर कर दिया जाएगा, और क़ैद कर दिया जाएगा महदूत कर दिया जाएगा महज़ पहाड़ों की ज़ीनत बना दिया जाएगा।  अगर माज़ी की बात करते हो मौजूदा वक़्त में तो वैसा ही होगा जो माज़ी में हुआ था।   


तुम्हारे अंदर पेवस्त ज़हर को निकालने या ख़त्म करने के दो ही रास्तें हैं।  


१. गर्म सूजे तैयार कर के तुम्हारे अंदर पेवस्त ज़हर को उससे निकाला जाए नहीं तो ज़हर पूरे जिस्म में फेल जाएगा।  


२. जिस्म के उस हिस्से को ही काट दिया जाए जो ज़हरीला हो चूका है।  नहीं तो ज़हर पूरे जिस्म में फ़ैल जाएगा। 


Zuber

Saturday, 18 December 2021

बिच्छू और उसके ज़हर का ख़ात्मा।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

बोलीवूड में एक फिल्म बनी थी बिच्छू जिसमे आशीष विद्यार्थी ने जो किरदार किया है वही असल ज़िन्दगी और नारकोटिक्स डिपार्टमेंट में रह कर समीर वानखेड़े ने जो ग़द्दारी, ज़लालत और मनफ़ी अस्क पेश किया है उससे मंशियाती महकमे की काफी बदनामी हुई है।   फिल्म में आशीष विद्यार्थी भी नारकोटिक्स का सरबराह था जो ड्रग पेडलरों से मिला हुआ था।  असल ज़िन्दगी में भी यह ग़द्दार शातिर मुजरिम गुंडा समीर वानखेड़े भी वही था।  

अब यह वतन का ग़द्दार, ड्रग माफिया समीर वानखेड़े ३१ दिसम्बर को आई आर अस नारकोटिक्स कंटोल ब्यूरो के अपने ओहदे से बरतरफ़ हो जाएगा।  इसको इसके गुनाहों की सज़ा मिली है और आगे मज़ीद इसको फ़ज़ीहत और परेशानी दूर नहीं होने वाली हैं।  

नाज़रीन जिस तरह से बॉलीवुड में हर मनफ़ी किरदार वाले के लिए एक हीरो होता है बिच्छू फिल्म में भी आशीष विद्याथी को उसको अंजाम तक हीरो बॉबी देओल ने पहुंचाया था।   क्योंकि उस फिल्म में उस ड्रैग माफियां ने हीरो के घर वालों को गलत इलज़ाम में ड्रग का केस बना कर जेल भेज दिया था। 

असल ज़िन्दगी में इस ग़द्दार, ड्रग माफिया विलन समीर वानखेड़े को उसके अंजाम तक पहुंचाने वाला हीरो और कोई नहीं हर दिल अज़ीज़ मज़लूमों की आवाज़ नवाब मालिक हैं।   जिनको इस ग़द्दार ने मामूली इंसान समझ कर ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के बहकावे में आ कर उनके अहले खाना में से किसी एक शख्स पर झूठा और फरेबी केस बना दिया।   फिर क्या था शुरू हो गयी उसकी उलटी गिनती।  उसने पंगा भी तो हीरो से लिया था।  नवाब मालिक ठहरे अल्लाह पर कामिल यक़ीन रखने वाले वली सिफ़त इंसान उनके ऊपर ख़ास करम है जभी तो कब्रस्तान से गड़े हुए मुर्दों का हसब और नसब निकाल लाये।

अज़ीज़ नाज़रीन इस समीर वानखेड़े से यह सहाफ़ी २०२० में उसके दफ्तर शहीद भगत सिंह रोड फोर्ट मुंबई में मिल चूका है।  इसको मिलवाने वाले एक हमारे क़दीमी दोस्त नवनीत वानखेड़े थे।  जब हम डॉ पद्मसिंह पाटिल के यहाँ रॉयल स्टोन पर PA की हैसियत से काम करते थे तब से इन नवनीत वानखेड़े से मरासिम थे। जो पुलिस प्रोटेक्शन में आला ओहदेदार की हैसियत से हैं।   यह समीर वानखेड़े हमको भी ड्रग केस में मुलव्विस करने की फ़िराक़ में था।  और अपने ३-४ आला ऑफिसरों के साथ आया था। 

लेकिन उसी वक़्त जो जो नवनीत के सामने उस ख़बीस समीर वानखेड़े को बोल दिया था वही हू बा हू हुआ अब मुझको वही दिन याद आ रहा है।  तब तो में क्या कह रहा हूँ मुझको खुद भी पता नहीं था।  उस वक़्त शाहरुख़ का नाम भी लिया था और उनके फ़रज़न्द आर्यन का भी नाम लिया था।  और वही हुआ। जब सब कुछ कैफियत में बोलता चाला गया तब समीर को एहसास हुआ की उसने गलत शख्स से पन्गा ले लिया है।   उसने बोला भी खान साहब कुछ करना मत में तो मज़ाक कर रहा था।  लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चूका था।   और बात अर्शे इलाही पर जा पहुंची थी।  वही हुआ हो गया वाटला और पद से नीचे भी आ गया।   

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Monday, 13 December 2021

तुमने ज़ाफ़रानी क्या पहना की ख़तरे में हिन्दू मज़हब आ गया।

अज़ीज़ नाज़रीन,

फलां बिन फलां बड़ा चौधरी बना फिरता था और उसने ज़ाफ़रानी इख़्तेयार किया था इस ग़फलत में की उसके पीछे मुसलमानों की फौज की फौज हिन्दू मज़हब इख़्तेयार कर लेगी, जैसा की ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की करामात देख कर कमो बैश २ लाख हिन्दू बा एक वक़्त इस्लाम में दाखिल हो गए थे। और उसके बाद भी होते ही चले गए रुके नहीं और यह तारीख़ है इसको कोई झुटला नहीं सकता। जब ख़्वाजा साहब हिन्द में तशरीफ़ लाये तब उन्होंने सबसे ज़्यादा मुत्तसिब और फ़िर्क़ा वाराना हिन्दू शिद्दत पसंद जगह राजिस्थान के अजमेर का इंतेखाब किया।  फलां बिन फलां हिन्दू बना उसके पीछे एक भी नहीं गया और ख़्वाजा साहब के पीछे तमाम पृथ्वीराज चौहान की रियाया इस्लाम में दाखिल हो गयी थी।  क्योंकि फलां बिन फलां के पास अल्लाह की ताक़त नहीं थी और ख़्वाजा साहब को अल्लाह ने क़ुव्वत और ताक़त बख़्शी थी उनको इसी काम के लिए मुतय्यन किया था की तुम हिन्द में जा कर इस्लाम का परचम लेहराओ। 


नाज़रीन एक बात समझने से यह सहाफी क़ासिर है की एक फलां बिन फलां के इस्लाम से जाने पर छी न्यूज़ ने धमाल मचा कर रख दिया था, महसूस ऐसा होता था जैसे की पूरा भारत मुसलमानों से फ्री हो कर ज़ाफ़रानी रंग का हो गया हो।   फिर अगर तमाम मुसलमान मर्द और ख़ातून इस्लाम से आजिज़ आ चुके हैं बक़ौल छी न्यूज़ के तो ११ दिसम्बर २०२१ बरोज़ हफ्ता (सनीचर) एक सहाफी इजलास में तोगड़िया काहे को मरकज़ की हुकूमत से गुज़ारिश करता है की आबादी इख़्तेयार बिल एवान में लाया जाए।  मज़ीद वोह बोलता है की हिन्दुस्तान में ८४ फीसद हिन्दू थे जो घट कर ७० और फिर ५५ फीसद रह गए अगले २० सालों में हिन्दू ३० फीसद और मुस्लिम ५५ फीसद हो जायेगें।


छी न्यूज़ जैसे ज़ाफ़रानी ग़द्दार इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मन एक आधा इस्लाम दुशमन मुनाफ़िक़ को अपने स्टुडिओं में बिठा कर मुबाइसा करते हैं और समझतें हैं की तमाम मर्द और दुख्तराने मिल्लत इस्लाम की तालीम से घुटन महसूस करतें हैं।  ख़ातून बुर्का पहनने में शर्म महसूस करती हैं और उनको जबरन पहनाया जाता है।  जबकि ऐसा नहीं है।  इस सहाफी ने तक़रीबन जितनी भी बुर्का पोश ख़ातून थी उनसे अपनी पहचान पोशीदा रखते हुए एक मुबाहिसा किया की आप बुर्का अपनी मर्ज़ी से पहनती हो या आपको आपके शोहर, ससुराल या वाल्देन के दबाओ में पहनना पड़ता है।  तक़रीन ९८ फीसद बच्चिओं और मस्तूरातों का जवाब था हम अपनी मर्ज़ी से पहनते हैं और हम इस लिबास में  अपने आपको ज़्यादा मेहफ़ूज़ महसूस करतें हैं। हमारे इस लिबास की वजह से ग़ैर मेहरम, स्कूल कॉलेज में ख़ास मज़हब के शोहदों गुंडों और मवालिओं की गन्दी नज़रों से हम मेहफ़ूज़ रहतें हैं।  जो सिर्फ मुस्लिम बच्चिओं के पीछे ही रहतें हैं. यहाँ तक की कई शादी शुदा खातूनों ने कहा की हमने बुर्का शादी की ११-१२ साल बाद इख़्तेयार किया है पहले पहले हम पूरी तरह मग़रिबी तहज़ीब का हिस्सा थी या बुर्का कभी नहीं पहना था।  लेकिन यकायक दिल में एक कैफियत हुई आखों से अश्क जारी हुए और बुर्का पहन कर पूरी तरह से इस्लाम में दाखिल हो गए। और वही हाल मर्दों का हुआ जिन्होंने दाढ़ी रख ली और इस्लामिक हिसाब से ज़िन्दगी बसर करना शुरू की उनकी भी वही कैफियत थी जो मुस्लिम ख़ातूनों ने बयान की।  बॉलिवुड में कई अदाकाराओं ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी मर्ज़ी से सब कुछ छोड़ दिया।  जिस के ऊपर संघी और शिद्दतपसंदों को बोहोत अंगार लगी. ज़ायरा वसीम, सना खान.


फिर अगर मुसलमान इस्लाम से बर्गश्ता हो कर हिन्दू मज़हब में जा रहें हैं तो कल बरोज़ इतवार तारीख़ १२ दिसम्बर २०२१ काहे को एक सहाफी इजलास में कर्णाटक का वज़ीरे आला तब्दीली मज़हब के खिलाफ क़ानून बनाने की बात करता है।  उसका भी यही कहना था कर्नाटक में हिन्दू तेज़ी से घट रहें हैं और इस्लाम, क्रिस्टी मज़हब के अवाम बढ़ते जा रहें हैं।  

तुम्हारी नामर्दानगी पर हसी आती है। सिर्फ एक मुनाफ़िक़ के इस्लाम से हिन्दू मज़हब में जाने पर आसमान तक कूद रहे थे।  और कुछ  ज़मीर फ़रोश लोगों को स्टुडिओं में बिठा कर मुबाहिसा कर रहे थे जिनका किरदार ही मशकूक है।  जो ना तो अपने वतन पाकिस्तान के वफादार हो सके और ना ही इस्लाम के और ना ही हिन्दुइज़्म के वफादार साबित होंगे।  ऐसे ही गद्दारों के लिए कहा गया है "धोबी का गधा ना घर का और ना घाट का।"  जिनके साथ छी न्यूज़ ने मुबाहिसा किया और उस मुनाफ़िक़ के हिसाब से उसको इस्लाम में घुटन महसूस होती है, अब जो पहले ही हिन्दू था या थे सिर्फ नाम मुसलमान रख रखा था तो उनको घुटन ही मह्सूस होगी।  क्योंकि अल्लाह ने उनको ना तो ऐसी बसारत दी है की आगे की चीज़ें देख सके और ना ही ऐसी सलाहियत की उनको रूहानी अलफ़ाज़ से सुकून मिल सके।  यह सब शैतान हैं और शैतान को अल्लाह के ज़िक्र से घुटन महसूस होती है जहाँ अल्लाह का ज़िक्र होता है उसको कोफ़्त होती है।फिर अगर ऐसे दोग़ले, मुनाफ़िक़ वापिस से हिन्दू मज़हब में चले भी जातें हैं तो कोई ग़म नहीं।


एक बात ते है कितना ही छी न्यूज़ जैसे ग़द्दार और संघ जैसी तंज़ीमें आसमान तक उछल जाएँ या हिन्दुओं को अपने मज़हब में रखने के लिए कुछ भी क़ानून बना लें, जो हिन्दू इस्लाम में आने वाले हैं वोह तो आ कर रहेगें। और यही इन्साफ का तक़ाज़ा है। तुम्हारी नाइंसाफी का जवाब। इस्लाम एक इंक़लाब है। जो लोग इस्लाम के ख़िलाफ़ ग़लतफहमी फैलाते हैं ऊल जलूल बकतें हैं, हम तो कभी ऐसे क़ानून की पैरवी नहीं करते, की इस्लाम से जाने वालों पर पाबन्दी लगाई जाए।  तुम लोगों ने लव जिहाद के ऊपर क़ानून बनाया।  अपने मज़हबी इजलास (धर्म संसद) में क़ानून बनाया की मुस्लिम बच्चिओं से शादी करो और शादी का सबूत दिखाओ ३ साल का राशन रहना और रुपए ५००० महाना पाओ, हमने तो ऐसे तुम्हारी सभाओ के क़रारदार पर भी कुछ एतेराज़ नहीं उठाया। क्योंकि हमें हमारे रब पर पूरा भरोसा है और हम यह भी जानतें है जिसको अल्लाह हिदायत देगा उसको दुनियां की कोई ताक़त गुमराह नहीं कर सकती और जिसको नहीं मिलेगी हिदायत वही गुमराह होगा। हमारा यक़ीन इतना पुख्ता है। अरे तुम क्या इस्लाम को इज़ा पहुँचाओगे। खुद घबरा रहे हो। यह घबराहट नहीं तो और क्या है, की कभी इधर की कभी उधर की बातों को ले कर क़ानून बनवा रहे हो।  मुस्लिम मौलानाओं को झूठे और फरेबी इलज़ाम लगा कर गिरफ्तार कर रहे हो। 

छी मीडिया तो महज़ एक मुस्लिम का इस्लामिक चौला उतार फेकने पर बोहोत खुशी से झूम रहा था, जो की दरअसल हिन्दू ही था।  जिसकी असलियत खुल कर अवाम के रू बरू आ गई।  फिर अगर मुस्लिम अवाम सैलाब के जैसे हिन्दू मज़हब की जानिब जा रहें हैं जैसा की तोगड़िया, नरसिंहानंद, चक्रपाणि बोल रहा है की मुस्लिम इस्लाम छोड़ कर हिन्दू मज़हब में आ रहें हैं तो फिर यह घबराहट क्यों।  ख़ौफ़ और घबराहट इतनी की हुकूमत के नुमाइंदे परेशान हैं और क़ानून बनाने की बातें करने लगे।  हम मुसलमान तो एक दम बिंदास हैं, बेख़ौफ़ हैं और मुत्मइन हैं। क्योंकि हमको हमारे रब पर और इस्लाम की तालीम पर पूरा यक़ीन हैं जो होना है हो कर रहेगा।

Zuber

Sunday, 12 December 2021

"ग़द्दार" मायने मुख़्तलिफ़, तुम्हारा ग़द्दार हमारी मोहब्बात।


अज़ीज़ नाज़रीन, मज़मून का पूरा मुताला करें तब बात समझ आएगी। 

आज का मज़मून अलग ही कैफियत में शाया कर रहा हूँ।   नाज़रीन आज आप तमाम हज़रात को ग़द्दार की सिफ़त और मायने बयान करूंगा।  आज के दौरे हाजरा में हर मुसलमान या उस शख़्स को जो हक़ गोई की बात करे अवाम के अंदर बग़ैर किसी मज़हबी तास्सुब के इन्साफ करे जो ज़ाफ़रानी मुतस्सिब हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी करे और इन्साफ के परचम के नीचे खड़ा रहे उसको हिन्दुस्तान में ग़द्दार तसव्वुर किया जाता है।  ग़द्दार की भी दो सिफ़त होतीं हैं।  एक वोह जिसको की हाकिम ग़द्दार समझे और दूसरा वोह जिसको हाकिमों का हाकिम यानी बारी इलाहा ग़द्दार समझे।   

चलिए अब मज़मून के हिज्जे करते हैं जराहत या ऑपरेशन।  हाकिम का ग़द्दार तस्सव्वुर करने का एक सीधा सा पैमाना है, हिंदुस्तान में जिसने वक़्त के फ़िरोन या हिटलर के हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी की और हक़ की बात कही वही ग़द्दार तस्सव्वुर कर लिया जाता है।  अब उसको किम जोग की हुकूमत हरासा करना शुरू करती है।   जेल में डालने से ले कर बोगस और झूठे इलज़ाम लगना, उसकी इज़्ज़त को पामाल करना यहाँ तक की उसको ना वाक़िफ़ हाथों से क़त्ल करवाने की हिकमत की जाती है।   ज़ाफ़रानी ट्रोल उसके पीछे लग जातें हैं।  

नाज़रीन अमूमन भारत में एक आम तस्सव्वुर ग़द्दार का जो है वोह ग़लत है।  भारत में मोदी हुकूमत के ख़िलाफ़ किसी ने हक़ गोई की बात कर दी, हुकूमत को उसकी ग़लती का एहसास करवा दिया भारतीय फौज की दहशत, बंदूक, मिसाइल, बोम, तलवार से ख़ास मज़हब के बेगुनाह अवाम को ख़ास सूबे में क़त्ले आम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाला ग़द्दार तस्सव्वुर किया जाता है।  जबकी ऐसा नहीं है।  वोह शख्स ग़द्दार कब होता है जब वोह अपनी शिनाख़्त पोशीदा कर के यह तमाम काम करता है।  या सब कुछ जानते हुए हुकूमत की चाटुकारिता चापलूसी करता है और वतन की आज़ादी को फरामोश कर के २०१४ बोल रहा है तो वोह असली ग़द्दार है. एक हिन्दू अपनी शिनाख़्स्त पोशीदा कर के मुस्लिम नाम से कश्मीर और हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ कुछ बोल रहा है तो वोह असल ग़द्दार है।  जबकी अगर उन तमाम ज्यात्तियो के ख़िलाफ़ कोई मुसलमान या हिन्दू अपनी शिनाख़्त ज़ाहिर कर असल नाम से बोलता है तो वोह ग़द्दार नहीं बल्कि अपने हक़ के लिए लड़ रहा है।   

अब चलिए मज़हबी ग़द्दार के बारे में जान लेते हैं।   मज़हबी ग़द्दार का तस्सव्वुर भी कमो बेश वतन के ग़द्दार जैसा ही है।  अगर कोई भी मज़हब का मानने वाला अपने ही मज़हब को झूठा और फरेबी नाम रख कर कोसता है तो वोह मज़हबी ग़द्दार है।   जैसे तारिक़ फ़तेह, वसीम रिज़वी, अली अकबर जैसे वोह ग़द्दार है जो दरअसल हैं तो काफिर लेकिन इन लोगों ने अपने नाम मुसलमानों जैसे रख रखें हैं।   ताके जब वोह मज़हबे इस्लाम के ऊपर नुक़्ता चीनी करें तो आम इंसान के ऊपर उस मज़हब का तस्सव्वुर और अक्स ग़लत जाएगा।   

दरअसल यह तमाम ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंद, संघ और उसकी सियासी रहनुमा बीजेपी से मुनसलिक लोग होतें हैं।  इन जैसे काफिरों और मुनाफ़िक़ों के बारे में ही अल्लामा इक़बाल ने शेर कहा है


"अगर बूत हैं जमात की आस्तीनों में मुझे है हुक्मे अज़ाँ ला इलाहा इलल्लाह।“


क्योंकी १४०० साल पहले काफिर मुस्लिम लिबास पहन कर इस्लामिक नाम रख कर मस्जिद में नमाज़ की जामात में घूस जाते थे और सजदे में जाते ही आस्तीनों से बूत निकाल कर हरामकारी करते थे।   यह देखो भगवान प्रकट हुए वग़ैरा।  लेकिन जब अज़ाँ दी जाती तो तमाम बूत गिर जाते थे।  तो यह आज के दौर से नहीं है सदिओं से चला आ रहा है।   तमाम ऐसे काफिर जो मुस्लिम नाम रख कर इस्लाम को बदनाम करते थे और मुसलमानों को गुमराह करते थे वोह सब एक के बाद एक बेनाकाब हो रहें हैं की दरसअल यह बन्दा काफिर था और इस्लाम का मुनाफ़िक़।

इससे पेश्तर २०१८ में दो तीन मज़मून सय्यद नाम की हुरमत और इज़्ज़त पामाल करने वालों के लिए लिखे हैं।  यह तमाम संघी फितरत और शिद्दत पसंद काफिर हर उस मुसलमान के नाम के आगे सय्यद लगा देते थे जो की ज़िनाकारी, चोरी, फरेब, झूट और तमाम दंड फंद में मुलव्विस रहता है।   फिर उसके गुनाहों की फेहरिस्त मीडिया के लंगूर आम कर के सय्यद ज़ादों या जादिओं के नाम पर शक और शुकूक के बीज गहरे करते हैं।  जिससे एक आम मुसलमान का तस्सवुर सय्यद के लिए ख़राब होता है। 

ऐसे ही १९९२-९३ तक शराबख़ाने में ओमूमन ज़्यादातर शराबी टोपी और दाढ़ी में देखे जाते थे।जब उनका हसब और नसब निकाला जाता तो उनमे से सो फीसद तो हिन्दू ही निकलते थे इल्ला माशाल्लाह अगर कोई मुस्लिम मिल गया तो बात अलहदा है।  फिर उन हिन्दुओं में से ८० फीसद संघी और बीजेपी के कारकून होते थे।  उनका पर्स, बेग या दीगर तहक़ीक़ात में उनके पास से बीजेपी या संघ से जुड़े होने के आशियात मिलते थे। 


नाज़रीन १९९३ के बाद जितने भी मुस्लिम बेगुनाह गिरफ्तार किये पुलिस बड़े बड़े अलफ़ाज़ में मीडिया में बयान देती थी की गिरफ्तार किये गए आतंकी के पास से जिहाद, पाकिस्तान से जुडी हुई सामग्री और उर्दू की किताबें मिली हैं।   जिसको मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चलते थे और एक मज़हब ख़ास की मोब लीचिंग करते थे। अब में मिडिया के लंगूरों और पुलिस से पूछता हूँ क्या पाकिस्तान से जुडी हुई जानकारी रखना या उर्दू फलसफे, मिंतक़, हुज्जत की किताबें रखना या जिहाद के ऊपर मज़ीद इल्म लेना और असली जिहाद किया है उसकी जानकारी के लिए किताब का मुताला करना कहाँ से कहाँ तक जुर्म हैं और क़ानून की किस किताब किस दफा में इल्म लेने को जुर्म क़रार दिया है।


फिर वही फलसफा इन वतन और मज़हब के ग़द्दारों के ख़िलाफ़ क्यों इस्तेमाल नहीं होता है।  जो होतें हिन्दू हैं और मुस्लिम नाम से भारत को कोसते हैं और नबी, इस्लाम, किताब पर तनक़ीद करतें हैं।  अगर इनको गिरफ्तार किया जाता है और इनके पास से बीजेपी, संघ या किसी और हिन्दू शिद्दत पसंद तंज़ीम से मुनसलिक होने के दस्तावेज़ मिलते हैं तो पुलिस काहे को मीडिया के रू बरू इस बात को नहीं रखती के फलां बिन फलां मुस्लिम नाम से बदगुमानी फैला रहा था दरअसल वोह हिन्दू शिद्दत पसंद था और उसके पास से संघ, बीजेपी, वीएचपी, बजरंगदल से जुड़े होने के और बोहोत से मशकूक दस्तावेज़ मिले हैं।  


भारतीय लंगूर-लँगूरनियों इन्तेज़ामियाँ (कमिशनर, कलेक्टर, पुलिस) असली ग़द्दारों को पहचानों यह तुम्हारे ही अंदर मिलेगें, हम ग़द्दार नहीं हैं हम हमारे हक़ की लड़ाई लड़ रहें हैं।  फिर अगर कोई हमारे नबी, क़ुरान की शान में बदकलामी करेगा इस्लाम के ख़िलाफ़ बदगुमानी झूट फरेब फैलाएगा तो हम हमारे असली नाम से तुम्हारे देश, फौज, हुकूमत को कोसेंगे।  

Zuber   

Friday, 10 December 2021

दीदी के बाद झारखण्ड ने कसा लीचड़ों पर फांसी का फंदा।

अज़ीज़ नाज़रीन 

वेस्ट बंगाल की वीरांगना दीदी की तर्ज़ पर अब झारखंड की हुकूमत भी चल पड़ी है।  लिच्चड़ आदमखोर झुंड जो एक अकेले इंसान को घेर कर पीट पीट कर हलाक कर डालता था अब ऐसे आदमखोर जानवरों का शिकार बाक़ायदा हुकूमत की ज़ेरे निगरानी में होगा।  अब इन्साफ हो कर रहेगा, और इसका सेहरा बंधेगा सबसे पहले वेस्ट बंगाल की वीरांगना काली के सर।  जी हाँ दोस्तों दीदी ने काली का रूप इख़्तेयार कर के तमाम खबीस, शैतान और रावणों को हलाक करने का क़ानून बना लिया है।   हस्बे रिवायत और हिन्दू मज़हब के पैरोकार काली को अपनी देवी मानते हैं।  और जिस देवी की पूजा की जाती है उसका क़ौल और फ़ैल भी माना जाता है।   अब काली देवी के बताये और बनाये हुए रस्ते पर झारखण्ड भी चल पड़ा है।  

नाज़रीन यही वजह है के ज़ाफ़रानी तंज़ीम बेहद ख़ौफ़ज़दा थी और वेस्ट बंगाल में ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था की किसी भी सूरत से हम हुकूमत में जाएँ फिर जो ज़ुल्म करना होगा हम करेगें।  लेकिन यहां यह बात वाज़े करना चाहूंगा की रावण को अख़िरकार शाकिस्त होती ही है।

रावण, पिशाच, शैतान नाइंसाफ, नाहक़ अवाम को हलाक करने वाला ज़ालिम एक दिन रुस्वा और ज़लील हो कर रहता है।   यही वजह है की रावण एंड पार्टी वेस्ट बंगाल में काली के सामने टिक ना सकी और हार गई।  क्योंकि वोह लोग ज़ालिम थे। 

देखा जाए तो इस क़ानून की बीजेपी और ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों, शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम ने पुर ज़ोर मुख़ालेफ़त की थी।  कियोंकी जितने भी मोब लीचिंग हुए उसमे ७५% मुस्लिम अवाम थे और दहशतगर्द लिच्चड़ संघी शिद्दत पसंद।  

इस क़ानून के अंदर बोहोत सी अच्छी और उम्दा दफाएं हैं जिसके तहत हर संघी, बीजेपी वाले और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम की बेहद फ़ज़ीहत होने वाली है।  जो हिन्दू शिद्दत पसंद ख़ास मज़हब के अवाम के ख़िलाफ़, दुख्तराने मिल्लत के ख़िलाफ़, उनके पहनावे बुर्क़े वग़ैरा के ख़िलाफ़ ज़हर अंगेशी सोशल मीडिया पर करते थे, वोह तमाम शिद्दत पसंद अब होशियार हो जाएँ उन सभी के लिए इस नए क़ानून में जेल की हवा का प्रावधान है।    

नाज़रीन में ग़ैर ज़ाफ़रानी हुक्मरानों से एक गुज़ारिश करूंगा की इस क़ानून में शिद्दत पसंद ज़हरीले लंगूर और लँगूरनियों को भी लिया जाए।   में २०१० में सहाफत में आया था तब में अंग्रेज़ी में लिखता था।  २०१४- १५ तक बेहद शालीन मज़मून लिखा करता था।  एक्का दुक्का कुछ नाज़ेबा ज़ुबान के साथ लिखे होंगे तो वोह बात अलग है।  लेकिन जब लंगूर-लँगूरनियों और शिद्दत पसंद हिन्दू, ज़ाफ़रानी अवाम, संघी दहशतगर्दों से मुबाहिसे में बेहेस होती तो यह लोग तो अपनी पतलून ही निकाल देते थे।  बेहेस बाखूबी चल रही है जहाँ मोदी, बीजेपी, संघ की गलतियां बताई की सुव्वर का गोश्त, मज़हबे इस्लाम, नबी यहाँ तक की नबी की अज़वाज, नबी की दुख्तार तक के ख़िलाफ़ नाज़ेबा कलेमात, फिर इस सहाफी ने ते किया इन लोगों से जंग जीतना है तो इनकी ही ज़ुबान और मिसाइल से हमला कर के इनको हलाक करना होगा।   हालाँकि २०१८ या २०१९ में एक मज़मून में इस बात को वाज़े किया है की इस तरह की ज़ुबान बोलने की आदत नहीं थी और पहले पहले तो बोहोत ही अटपटा लगा लेकिन जब चीज़े बजाये दुर्सुत होने के बिगड़ती ही चली गई तो मेने भी अपनी तहज़ीब का लबादा उतार कर पूरी तरह इनकी ही ज़ुबान में जवाब देने लगा, बाद में अब आदत हो गयी है।

नाज़रीन ज़हर की काश्त उस हद तक बढ़ गई है की दिसम्बर २०२१ में दरिंदा, भगवा क़साई अमित शाह जो की हूकूमते हिन्द में वज़ीरे दाखला है उत्तराखंड में जा कर मुस्लिम अवाम के जुमे के रोज़ इकठ्ठा होने के ख़िलाफ़ ज़हर अंगेशी करता है।   सोचिये जब मरकज़ का वज़ीरे दाख़ला ज़ाफ़रानी सूबे वाले हुकूमत में मुसलमानों के एक जगह इकठ्ठा होने के मुद्दे पर अपने कारकूनों के उकसा सकता है तो कैसे मोब लीचिंग नहीं होगी।   और ऐसे ही आला ओहदे पर बैठे ज़ाफ़रानी कीड़े संघी शिद्दत और ज़ाफ़रानी दहशत को उकसाते हैं और मुसलमानों का क़त्ले आम होता है। 

ग़ैर ज़ाफ़रानी हुकूमत से गुज़ारिश है की ऐसे मरकज़ी दरिंदों के ख़िलाफ़ भी इस क़ानून में सज़ा का एहतेमाम किया जाए। अगर इन्साफ का आगाज़ हुआ ना इंसाफ़ी का ख़ात्मा हुआ ज़हर की काश्त काटी गई किसी को फ़ासी किसी को पुलिस एनकाउंटर में हलाक किया गया तो हम भी अपनी ज़ुबान काबू में कर लेंगें।   हूकूमते ग़ैर ज़ाफ़रान से गुज़ारिश है जो भी माज़ी में ऐसे लीचिंग में शामिल और  मुलव्विस थे उनको भी इस क़ानून के दायरे में लाया जाए.  दूसरी बात माज़ी के जितने भी ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंद सियासत दान थे जो ज़हर अंगेशी कर चुके जिसकी वजह  से मुलिम लीचिंग हुई, वोह वीएचपी का गुंडा जिसका विडिओ मेने इसी ब्लॉग पर है जो शिद्दत पसंद हिन्दू लड़कों को मुस्लिम लड़कियों को उठा कर ले आने  उकसा रहा है,  हिन्दू जनजागरण मंच का वोह क़रारदार जिसमे मुस्लिम लड़कियों से शादी करने के लिए हिन्दू लड़कों को उकसाया गया है.  जिसमे कहा गया है हिन्दू लड़कों शादी का सबूत दो और ३ साल तक राशन, रहना  और ५००० रूपये महाना फ्री. उन सब पर भी एक्शन होना चाहिए।   

यह जंग ही इन्साफ और हक़ की है।   मुस्लिम, सिख, क्रिस्टी और दलितों को उनका हक़ मिल जाए हमें क्या चाहिए अवाम जाग गया हम भर गए।   जो भी मुस्लिम अवाम के साथ नाइंसाफी हुई है बाबरी, कश्मीर से ले कर तो मुस्लिम रोज़गार, माश और तालीम तक वोह सब हक़ उनको मिल जाएँ तो इस इस जंग के खात्मे का हम ऐलान कर देंगे। 

 Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...