अज़ीज़
नाज़रीन,
आज का मुद्दा सियासत को रूहानी जामा पहनाने से ले कर तो उसको इन्साफ और हक़ के पैमाने पर तोलने की निस्बत से है। नबी करीम सल्ललाहो अलैहे वस्सलाम आलमे इंसानियत के लिए नहीं बल्कि रूहे ज़मीन पर जितनी भी मख्लूक़ पैदा की गयी है ख़्वाहा जानदार या बेजान के लिए नबी बन कर तशरीफ़ लाये थे। हर शै नबी की हम्दो सना करती आपकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई में आपके ताबे रहते।
बेजान कंकारियाँ अबू जेहल के हाथ में और नबी से उसने पुछा की अगर आप अल्लाह के सच्चे नबी हैं तो बताएं की मेरे हाथ में क्या है। आप बोले में बताऊँ या तेरे हाथ की कंकारियाँ खुद बयान करें।इतना कहना था की कंकारियाँ कलमा ऐ तय्यबा पड़ने लगी। ऐसे ही एक बार अबू जेहल खजूर ले कर आया और खजूर खा कर उसकी गुटली फैक दी और बोला की अगर आप अल्लाह के नबी हैं तो अब उस खजूर की पैदवार कर के दिखाओ। आपने अपनी अगशतरी मुबारक ज़मीन में पेवस्त कर दी और खजूर का दरख़्त निकल आया। आज भी अरब में बग़ैर गुटली की नस्ल वाला वोह खजूर बोहोत पाया जाता है।
नबी सल्लम का एक मोज़ेज़ा था की कोई भी एहले ईमान या बद ईमान इंसान उनको देखते ही अपनी ख़ुद की सिफ़त बयान करने लगता था। एक बार नबी सल्लम सहाबा ऐ किराम को दर्स दे रहे थे, एक सहाबी आपकी शान में कसीदे पड़ रहे थे आपकी अज़मत बयान कर रहे थे। इतने में इस्लामिक लिबास में एक काली भेड़ मुनाफ़िक़ आया और उसने नबी सल्लम को खूब ऊल जलूल बकना शुरू कर दिया तोहमत तराशी करना शुरू कर दिया। आप नबी सल्लम उसकी ना ज़ेबा बातें सुन कर मुस्कुराते रहे, सहाबा को बोहोत गुस्सा आया लेकिन आप नबी की अज़मत को देखते हुए कुछ बोल ना सके। उसके जाने के बाद सहाबा ने नबी से पुछा या नबी अल्लाह फलां सहाबी आपकी अज़मत बयान कर रहे थे उनको आपके अंदर खूबिया ही खूबिया नज़र आई फिर यह मुनाफ़िक़ ऐसी बातें कर रहा था। आप नबी सल्लम ने बताया जो सिफ़त उस मुनाफ़िक़ की थी उसने मुझको देखते ही अपनी सिफ़त बयान की और जो सिफ़त उन सहाबा की थी वोह मुझको देखते ही उन्होंने अपनी सिफ़त बयान की।
नाज़रीन ऐसा काम जो आम इंसान से हट कर हो उसको नबी करें तो उसको मोज़ेज़ा कहते हैं वही काम अगर नबी के बाद उनकी उम्मत का कोई वली करे तो उसको करामात कहते हैं। दौरे हाजरा में नहीं बल्कि नबी सल्लम के पर्दा करने के बाद भी कई वली कामिल ज़ाहिर हुए जिनके रोज़ मर्रा के अमल से बातों से कश्फ़ और करामात ज़ाहिर होती थी।
नाज़रीन आज के दौरे हाजरा में जो उम्मत की काली भेड़ें, शिद्दत पसंद काफ़िर, लंगूर और लँगूरनियाँ असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मजलिस पर जो तोहमत तराशी लगाते हैं दर असल वोह अपनी ख़ुद की कैफियत बयान करतें हैं। किसी भी दीन दार मज़हबी इंसान पर बग़ैर किसी वाजिब सबूत के सिर्फ जुबां को तालू से लगाने की इस्लामिक सज़ा भी बोहोत बड़ी है। अगर असदुद्दीन बीजेपी की बी टीम हैं और पैसा ले कर उम्मत का सौदा करतें हैं या क़सदन अपनी तंज़ीम की नुमाइंदगी इसलिए खड़ी करतें हैं की उसका फायदा ज़ाफ़रानी महाज़ को हो तो यह साबित करें की असदुद्दीन ने किस ज़ाफ़रानी वज़ीर या आला ओहदेदार से रक़म ली और क़ौम का सौदा किया। अगर जुम्मन चाचा यह बात साबित नहीं कर पाए तो वोह इत्तेहान होगा एक दीन दार इंसान पर बोहतान लगाने की इस्लामिक जरस्पोंडेंस (शरीयत क़ानून) में क्या सज़ा है इनको मालूम होना चाहिए।
यह
बात दुर्सुत है की भारत एक जमुहरी निज़ाम का पैरोकार है, और हूकूमते हिन्द में इज़हारे
तास्सुरात की आज़ादी है, बरक्स वोह तास्सुरात हक़ पर मब्नी होना चाहिए ना की झूट फरेब
जालसाज़ पर होना चाहिए। किसी शख़्स में सच्ची
बात अगरचे कड़वी है तो भी कहो लेकिन उसके ख़िलाफ़ झूट कितना भी मीठा कियूं ना हो उसको
फैलाने से गुरेज़ करो।
Zuber