Saturday, 26 December 2020

कामिल यक़ीन और नियत का इस्लामिक उसूल

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आपके दरमियान अल्लाह उसके नबी और रूहानी शख़्सियत (अपने मुर्शिद) पर कामिल यक़ीन और नियत का इस्लामिक उसूल क्या हैं उस दर्स को ले कर हाज़िरे ख़िदमत हूँ।  नाज़रीन नियत का दारो मदार मोमिन के दिल में किये हुए उस पुख्ता अज़्म जिसको वोह करना चाहता है।  दिल से किसी बात को मान लेना और ज़ुबान से उसका इक़रार करना ही तो इस्लाम है।  नाज़रीन इस्लामिक अव्वल कलमा ही मुल्हिद (नास्तिक) या इन्कार और इक़रार के उसूल से शुरू होता हैयानी यह कहना ग़लत नहीं होगा की हर काफिर या मुल्हिद ख़ुदा की ज़ात का इन्कार करता है बाद में ख़ुदा को जांचने परखने और महसूस करने के बाद वोह उसका इक़रार करता है और   मुस्लिम या इस्लामिक हो जाता है।  वोह कैसे इस फलसफे की तशरीह करता हूँ।  इस्लाम का पहला कलमा है, "नहीं है कोई इबादत के लायक, मगर अल्लाह के"।

नाज़रीन यहाँ यह बात वाज़े कर दूँ की हर मुल्हिद (नास्तिक) या मूर्ती पूजक इस्लाम का आधा कलमा ही तो पढ़ते हैंमुलहिदों को किसी ख़ुदा पर यक़ीन ही नहीं होता और उनका मानना भी यही होता है की सदियों से कायनात का निज़ाम यूं ही चलता आ रहा है और चलता रहेगा।   और मूर्ती पूजकों ने अपने अपने ख़ुदा बना लिए।  किसी ने इंसान को ही भगवान् का दर्जा दे दिया, किसी ने छोला छाप फ़क़ीर को ही भगवान बना कर उसका मंदर बना दिया।   लेकिन जिन्होंने उस आधे कलमे से पूरे कलमे पर जाने से पहले तमाम तहक़ीक़ात की और इस्लाम, ख़ुदा, पैगम्बर और क़ुरान पर दौरान तहक़ीक़ उस ख़ुदा के जलवे उसकी रेहमत को महसूस किया अपने बिगड़ते हुए कामों को सही होते देखा और दुश्मन के दुरुस्त और सही कामों को उल्टा होते देखा तो फिर आ गए मालिके कायनात की गुलामी में और पढ़ लिया पूरा कलमा मगर अल्लाह के।   नाज़रीन इस्लामिक क़ानून और उसूल भी यही है "ला इकराहा फिद दीन"  दीन में कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है।

आज अगर कोई मज़हब सबसे ज़्यादा फ़ैल रहा है तो वोह है इस्लाम उसकी वजह है रसूले अरबी के मौजज़ात उसके बाद बुज़ुर्गाने दीन की करामात जिसको देख कर इंसान के मुँह से बेसाख़्ता निकला हक़ है तेरा मज़हब और हम गुमराही के अंधेरों में भटक रहे थे अब हम तेरे मज़हब की पैरवी करेंगें।  इस्लाम तलवार के ज़ोर पर नहीं फैला है, जो लोग ऐसा मनफ़ी अक़्स इस्लाम का पेश करतें हैं वोह खुद ही अपने मुल्क में दीगर अक़लियतों को पीट पीट करउसकी गर्दन पर तलवार रख कर अपना पसंदीदा नारा लगवाते हैं।   बोल जय जय…………………  नहीं तो तेरी गर्दन क़लम कर देंगे।   और मौत के घाट उतारा भी गया है।   फिर खुले आम एक ख़ास मज़हब के लोगों के घरों पर तलवार तक़सीम की जाती है, ताके उस तलवार से वोह अपनी हिफाज़त कर सकें।  तीन मूही ६ धारी तलवार उसको त्रिशूल बोला जाता है लेकिन वोह होती कितनी जानलेवा है, लेकिन अपनी करतूतों पर कोई नज़र नहीं और इलज़ाम दूसरों पर की तलवार के ज़ोर पर मुस्लिम बनाया गया।

फिर जब तहक़ीक़ कर के तमाम चीज़ों और उस रूहानी एहसास को महसूस कर के इस्लाम में दाखिल हो गए तो अब उसके ऊपर कामिल यक़ीन भी करना होगा।   क्योंकि तहक़ीक़ में वही तमाम चीज़ें सही और दुर्सुत पाई गई थी।  ना के किसी बादशाह के झूट, फरेब, धोखेबाज़ी, जालसाज़ी की तरह पाई थी।   और जो झूट पर फरेब धोखेबाज़ी पर अपना महल बनता है वोह हमेशां हमेशां नहीं रहता बल्कि रेत का क़िला साबित होता है जो बरसात आते ही ढह जाता है लेकिन यक़ीन की जो पक्की इमारत होती है  वोह तहक़ीक़ कर के महसूस कर के बनाई जाती है तो वोह ऐसी ही मज़बूत होती है जैसे की फौलाद फिर उसमे किसी भी दुश्मन और शैतान को दाखिल होने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती।  

आइये अब तब्सिरा नियत पर कर लेते हैं।   नाज़रीन नियत की निस्बत से इस्लामिक फलसफा और क़ानून एक दम वाज़े है मोमीन के क़ल्ब में किसी काम को करने के बारे में अज़्म करना ही नियत होता है।  फिर हर ईमान वाला और बद ईमान जिसने अपने दिल में कोई नियत की है तो उसके हिसाब से उसके आमाल  होतें हैं और अल्लाह की सज़ा और जज़ा भी उसको उसके नियत के पूरा करने और ना करने पर होती है।  

कोई बंदा ऐ मोमीन नेक नियती से किसी नेक काम करने का इरादा करता तो उसको पूरा करने के लिए तमाम कायनात की मदद होती है और अल्लाह के फ़रिश्ते उस बन्दे के काम को आगे से आगे पूरा करतें हैं ताके उस सवाब का वोह मुस्तहिक़ हो जाए और उस पर सवाब की मोहर लग जाए।   दो सच्चे मोमीनों में ज़ुबान से की हुई नियत ही काफी है उसके लिए मोहायेदे की शक़्ल में कोई क़ानूनी दस्तावज तैयार करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है।   दिल में नियत कर ली और उसको ज़ाहिर कर दी तो काफी है।   लेकिन बेहतर है की रक़म, दौलत, जायदात के मसले पर अगर कोई तहरीरी दस्तावेज़ तैयार कर लिया जाए, और अगर मुक़ाबिल कोई ग़ैर मुस्लिम है तो हर हाल में तहरीर करवालेना क़ुरान के हुकुम के हिसाब से दुरस्त है।   और मोमिनीन के लिए ऐसा ही करना अफ़ज़ल अमल होगा।  

हज़रते उमरे फ़ारूक़ के दौरे ख़िलाफ़त में जब जेरुशलम फतह करने को चले तो ग़ुलाम और हाकिमे वक़्त खलीफा उमर के दरमियान एक मोहायेदा हुआ उस पर दोनों सख़्ती से अमल करते रहे लेकिन जब जेरुशलम नज़दीक आया तो ग़ुलाम के दिल में शैतान ने वसवसा डाला लेकिन हाकिम वोह थे जिनको देख कर शैतान अपना रास्ता बदल देता था।   हज़रते फ़ारूक़ बोले नहीं कुछ भी हो जो मोहायदा हो गया सो हो गया अब दुनिया से क्या करना है, यहूद हाकिम या आला तालीमी अफ्ता माशी क़वी हमें  कुछ भी तस्लीम करें हम वही करेंगे जो मोहायदा चलने से क़ब्ल ते हो चूका था।  जब उमरे फ़ारूक़ का यह अज़्म और सख़त बर्ताव देखा तो शैतान पिटा,  शैतान का वोह हरबा नाकाम साबित हुआ और जेरुशलम फतह हुआ।

नाज़रीन बताने का मक़सद वही है हाकिम हो या मुर्शिद एक बार दो बार या तीन बार हाकिम की हरामकारी, बदबख़्ती, जालसाज़ी या मुर्शिद के कश्फ़ करामात, दीनी तालीम, शरीयत का पासो लिहाज़ का इल्म हो गया तो अब यह नाज़रीन आपके हाथ है की किसके ऊपर अँधा यक़ीन किया जाए और किसके ऊपर ना किया जाए। 

और बार बार सवाल मुस्लिम अवाम से ही किया जाता है, वही बक़ौल फ़्रांस के सदर और संघी एजेंटों के की तमाम आलम में मुसलमानों से ही उनके ख़रा और सही होने का सबूत माँगा जाता है और वही देतें फिरते हैं।   पाकिस्तान को जितना हिन्द के अवाम लंगूर और लँगूरनियाँ, फ़ौज से किनाराकश हुए दिफ़ाई महरीन बदनाम करतें हैं और उससे उसका ख़रा होने का सबूत मांगते हैं तो जो सच्चा होता है ख़रा होता है महंगा होता है अनमोल होता है उसकी ही जांच की जाती है।  नहीं तो मोदी और भारत की ज़ाफ़रानी हुकूमत को कोई कोड़ी के भाव पाकिस्तान, अफगानिस्तान, या अरबिस्तान में नहीं पूछता।   आते हो आओ जाते हो जाओ तुम तो बरसात में स्टॉक हाल के बहार पड़े पड़े जंग खाते हुए उस लोहे की मिसाल हो जिसकी क़दर सिर्फ भंगार वाला ही कर सकता है ना की सुनार की हज़ारों लाखों के आला तरीन शो रूम में कांच की संदूक में सजा सकता है। 

नाज़रीन जिस तरह से सोने को गन्दा और मिलावट कर के कुछ लोग अपना नफा बढ़ाते हैं उसी तर्ज़ पर कुछ लोग मुस्लिम अवाम में और इस्लाम में मिलावट कर के मुनाफ़िक़ों को पैदा करतें हैं।   अब यहाँ पर भी सच्चे और ईमान वाले की जांच में जो ईमान वाला होगा वोह सोने की तरह ख़रा पाया जाएगा उसकी सिफ़त क़ुरान, हदीस में बा खूबी बता दी गई हैं, वहीँ मिलावटी मुनाफ़िक़ नक़वी, शाहनवाज़, ज़फर, मोहसिन जैसे लोग पीतल में सोने का पानी चढ़ाये हुए पाए जायेगेंहर मुद्दे पर झूट, फरेब दग़ाबाज़।  हक़ और ईमान वाली कोई भी सिफ़त उनमे नहीं होंगी।   

और यही लोग इमाम हुसैन के क़ातिलों के साथ पाए जायेगे और ऐन मौक़े पर अपने एहद और ख़ुतूत को झुटला देंगे।   कश्मीर पर अपना खुद का दस्तूर को तोड़ डाला।   दग़ा किया, फरेब मचाया।   ३७० हटाना ग़लत नहीं था, लेकिन जिस अंदाज़ में बंदूक की नौक पर तलवार गर्दन पर रख कर झूट फरेब जालसाज़ी से अवाम को गुमराह कर के किया वोह ग़लत था। 

१.         कश्मीर के अवाम के हक़ में फैसला और उन्ही से नहीं पुछा गया।  

२.     ट्रिपल तलाक़ पर मुस्लिम नौजवानों, नस्लों को तबाह, इस्लामिक शरीयत तब्दील पर फैसला और ओलेमा दीन से कुछ भी नहीं पुछा।

३.      भारत के असासे बेच दिए लाल क़िला बरतानिया ताजिर को ताज पाकिस्तान को और भारत के अवाम से नहीं पुछा।

४.          मुस्लिम शहरियत का मसला और मुस्लिम अवाम से मुस्लिम क़ियादत से नहीं पुछा।

५.         किसानों के हक़ का फैसला और किसानों से नहीं पुछा गया।  

Friday, 25 December 2020

वलियों की अजब करामात।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आप हज़रात के रूबरू सियासत से अलहदा वलियों की रूहानी बातें उनकी कश्फ़ और करामात बताने के लिए हाज़िर हुआ हूँ।  नाज़रीन  बुज़ुर्गी और रूहानियत में दो चीज़ें ख़ास अल्लाह ताला ने अपने नबियों और बन्दों को अता की होती हैं।   बारी इलाह ने अपने ख़ास बन्दों  को एहलाम की क़ुव्वत और ताक़त फ़राहम की होती है।  दूसरी बात कोई ऐसा काम जो एक आम इंसान के बस और क़ब्ज़े क़ुव्वत में ना हो लेकिन नबी उसको बार बार करे हर बार करे तो उसको मोज़ेज़ा कहतें हैं और वहीँ काम किसी वली से ज़ाहिर हो तो उसको करामात बोलतें हैं।   यह मोजज़ा और करामात अल्लाह की तरफ से अताई होतें हैं और अल्लाह के हुकुम से ज़हीर भी होतें हैं। 

आइये सफर के रास्तें में आप हज़रात को हज़रत निज़ामुद्दीन ओलिया रेहमतुल्लाह अलैहे के एक क़िस्से का बयान करता हूँ।  

हज़रत निज़ामुद्दीन ओलिया के दौरे वलियत में एक शराब का ताजिर बोहोत परेशान था उसकी शराब की तिजारत चल ही नहीं रही थी क्योंकि वोह दौर इस्लामिक बादशाहत का था, और शराब इस्लाम में हराम है।  जब हज़रत के रूहानी फैज़ के चर्चे दिल्ली के कूचों से निकल कर बस्ती से बहार होने लगे और बोहोत से लोग उनसे फ़ैज़याब होने लगे तो उस शराब के ताजिर ने सोचा की हज़रत से में भी जा कर अपनी तिजारत के लिए कोई तावीज़ या दुआ के लिए अर्ज़ करता हूँ।  हज़रत की दुआ से मेरा भी कारोबार चलने लगेगा।

चुनाचे वोह हज़रत की कुटिया पर पंहुचा और अर्ज़ की में शराब का ताजिर हूँ, आपका बोहोत नाम सूना है, और में आपसे एक तावीज़ की अर्ज़ ले कर आया हूँ, की मेरा शराब का कारोबार खूब चले।   हज़रत ने उससे अगले रोज़ आ कर तावीज़ ले जाने को कहा।  

महफ़िल में बैठे कुछ हम जैसे गुनाहगार और वलियों के बारे में बदगुमानी रखने वाले, सिर्फ अल्लाह वाले भी थे जो अपने आपको बोहोत बड़ा फ़क़ीह, जदीद आलिम और मुफ्ती तस्सव्वुर करते थे,  उनके दिल में कराहियत आई की हज़रत शराबखोरी के लिए तावीज़ दे रहें हैं कैसे वली हैं।  इसको नमाज़ की तरग़ीब करना थी इस्लाम का दर्स देना था, अल्लाह के एहकाम बताना थे।

नाज़रीन यहाँ यह बताता चलूँ की अल्लाह का हर सच्चा वली दिलों का चोर होता है और वोह इंसान की शक्ल और सूरत देख कर उसके ईमान की दर्जे हरारत को भांप लेता है।   दूसरी बात जैसा की इससे पेश्तर इस सहाफी के सूफियाना मज़मूनों में लिखा जा चूका है, की कोई भी वली एक बदकार, गुनाहगार, ज़ानी को हक़ की तरग़ीब नहीं करता है।  और ना ही उसको नमाज़ रोज़े अल्लाह और उसके रसूल की बातें बताता है।   क्योंकि गुनाहों की गंदगी से लिपटे उस शख्स को अगर मज़हब और हक़ की बात बताई तो उसको कोफ़्त होने लगेगी और वोह उस महफ़िल से ही उठ कर चला जाएगा।   तो हर सच्चा वली पहले इंसान के दिल के अंदर पोशीदा कुदूरत, गंदगी, ग़लाज़त को बहार करता है उसका दिल पाक करता है उसका नफ़्स पाक करता है उसका बातिन पाक करता है फिर उसको ज़ाहिरी ग़ुस्ल दिलवा कर पाक करता है,  जब उसका ज़ाहिर और बातिन पाक हो जाता है, तब उसको हक़ की दावत देता है।  अब उसको अल्लाह के क़ानून और हदीस बताता है फिर उसको वोह महफ़िल अच्छी लगती है और उस महफ़िल में उसका दिल लगता है और गुनाहों की जो लज़्ज़त पहले थी अब गुनाहों से उसको कोफ़्त होती है।  मतलब हर अमल उस बन्दे के उलटे हो जातें हैं,  पहले जिस रूहानी महफ़िल से कोफ़्त होती थी अब उसको ऐसी महफिले अच्छी लगती है और पहले गुनाहों में लज़्ज़त अब उसको कोफ़्त देती है।  

अब वोह बन्दा अगले रोज़ तावीज़ लेने आया, हज़रत ने उसको तावीज़ दिया और कहा इसको अपनी दूकान के दरवाज़े पर लटका देना।   कुछ ही अर्से के अंदर उसकी शराब की दूकान चलने लगी,  अब उसका क़ुरब हज़रत से भी बढ़ने लगा।  जब जब वोह हज़रत की महफ़िल में जाता शाराब की बिक्री खूब होने लगती।  जैसे जैसे शाराबख़ाने की बिक्री बढ़ती गई उसका हज़रत के लिए इश्क़ भी बढ़ता गया।  हज़रत की बातें उसके दिल में पेवस्त होने लगी, एक अलग ही कशिश और खिचाव हज़रत की जानिब बढ़ने लगा।  अब उसका यह आलम हो गया की जहाँ पहले ३ या ४ दिन में ५-१० मिनिट हज़रत की महफ़िल में बैठता था अब १ या कभी २ घंटा बैठने लगा।   फिर धीरे धीरे उसने कारोबार की जानिब तवज्जो देना बिलकुल बंद कर दी और अब दिन के १२ या कभी २४ घटें ही हज़रत की ख़िदमत में रहने लगा।  जब क़ुरब और इश्क़ बढ़ा तो बेतकल्लुफी भी बढ़ गई, अब एक रोज़ उसने हज़रत से बोल दिया मुझको दायरे इस्लाम में दाखिल कर लीजिये।   हज़रत ने कहा तुम्हारा शराब का कारोबार उसका क्या होगा, बोला वोह तो पहले ही बंद कर दिया।   फिर हज़रत ने उसको ग़ुस्ल करवा कर कलमा पढ़वाया।   और कहा ठीक है जो तावीज़ हमने तुमको दिया था उसको वापिस कर दो अब उसकी तुमको कोई ज़रुरत नहीं है।  

वोह शख़्स गया और दूकान से तावीज़ खोल कर हज़रत को दे दिया, इस बार भी वही तमाम हम जैसे गुनाहगार और वलिओं से हसद रखने वाले बदगुमान लोग मौजूद थे जिन्होंने हज़रत को तावीज़ देने पर कराहियत महसूस की थी।  हज़रत ने तावीज़ जहाँ बैठे थे वही रख दी और उन लोगों को दिखाने के लिए अपनी जगह से उठ कर दुसरे हुजरे में चले गए।   इन लोगों के दिल में वस्वसा आया की तावीज़ में क्या लिखा था कहीं हिनसे खींच कर उर्दू अलफ़ाज़ में कुछ तो नहीं लिखा था।   सो उन्होंने तावीज़ खोल कर देखा उसमे हज़रत ने अल्लाह से मुनाजात की थी, या अल्लाह माना की शराब हराम है, फिर भी लोग पी रहें हैं तो ऐसा करम कर की जो पियें तो इसी की दूकान से पियें।

तो ऐसी होती है वलियों की शान, अगर यही वोह शख़्स जिसका खुदा के ऊपर यक़ीन ही नहीं था और वोह तो मुशरिक था, किसी मुफ़्ती या आलिम के पास जाता तो क्या वोह दाखिले इस्लाम हो पाता, नहीं हरगिज़ नहीं।   फ़ौरन मुफ्ती साहब उसको धक्के मार मार कर बहार कर देते।  वहीँ अल्लाह के एक सच्चे फ़क़ीर के दर से उसको हक़ीक़ी रौशनी मिली और दाखिले इस्लाम हुआ।  

बताने का मक़सद यही है अल्लाह के वलियों की अज़मत वही इंसान जान सकता है जो खुद उस हस्ती को पा चूका होगा।   वैसे तो झोला छाप भरे पड़े हैं मार्किट में जो सभी अपने आप को अल्लाह का वली और फ़क़ीर बोलतें हैं।   लेकिन देखने वाली बात वही है की अल्ल्हा ने करामात ज़ाहिर किस फ़क़ीर के ज़रिये करवाई और किस को रूसवा किया।   बस जिस की करामात ज़ाहिर हो गई उसी को विलायत मिली है बाक़ी तो बस फानी हैं।

Thursday, 24 December 2020

एहले हुनुद पुर अमन नहीं: चाहतें हैं वतन वापसी।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

 

भारत की ज़ाफ़रानी हुकूमत ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के सताये गए जिन ग़ैर मुस्लिम अक़लियतों के लिए काला क़ानून बना कर भारत को आलमी बरादरी के सामने सख़्त रुसवा और ज़लील किया था, अब उसी भारत में पकिस्तान से आये हिन्दू अपने आपको मेहफ़ूज़ नहीं समझतें हैं। 

इस्लामाबाद पाकिस्तान क़ौमी अकलियती कमीशन (NCM)  की एक मीटिंग बरोज़ बुध २३ दिसम्बर २०२० को जनाब चेला राम केवलानी की सदारत में मुनक़्क़िद की गई।  यहां कमीशन की छठी बैठक के मौक़े पर उन्होंने भारत से मज़हबी अक़लियतों के हरसा को रोकने की गुज़ारिश की है। सदर जनाब चेला राम केवलानी ने कहा है कि हिंदू अक़लियती बरादरी के मेमब्रान, जो पाकिस्तान से भारत चले गए हैं, अब पड़ोसी मुल्क में मजमूई इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी के सबब वापिस अपने वतन पाकिस्तान लौटना चाहतें हैं।

बरोज़ बुध को यहां कमीशन की छठी बैठक की सदारत करते हुए उन्होंने भारत से मज़हबी अक़लियतों के हरसा को रोकने की गुज़ारिश की है।

उन्होंने महसूस किया कि पाकिस्तान में मज़हबी अक़लियतों के मुद्दों को रियासत की जानिब से ख़िताब किया जाना चाहिए, और कमीशन इस मौज़ूं में अपना नुमाया और आला किरदार निभाएगा।

केवलाणी ने कहा, "हमें वतन के सभी अक़लियतों की इबादत गाहों के तहफूज़ के लिए  मुताल्लिक़ा सभी ओहदेदारों के साथ मिलकर काम करना होगा," अक़लियतों के तहफ़्फ़ुज़ की ज़िम्मेदारी रियासत की है।

बैठक में हुकूमते हिन्द की जानिब से सिख किसानों के एहतेजाज पर ज़ुल्म और हरसा की मज़म्मत की गई और मेमबराने  कमीशन ने कहा कि भारत ने आलम का सबसे बड़ा जमुहरियत होने का दावा किया है, लेकिन मज़हबी अक़लियत और यहां तक ​​कि अदना ज़ात के हिंदू हमेशा अपने हुक़ूक़ से महरूम रहे हैं।

भारत इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वरज़ी करना बंद करना चाहिए। हमारे पास उन हिंदुओं की रिपोर्टें हैं, जो पाकिस्तान से भारत हिजरत कर  गए थे, वे इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वरज़ी, भेदभाव, बदतमीज़ी और वहां मस्तूरातों और बच्चों के ख़िलाफ बड़े पैमाने पर जुर्म की वजह से  वतन लौटना चाहते हैं।  जनाब केवलानी ने मज़ीद कहा.

बैठक में बताया गया कि बतौर सदर और इनकी सदारत में कमीशन के मेंबरान ने सिंध के सुक्कुर में साधु बेला आश्रम का दौरा किया और इन्तेज़ामियाँ से मुलाकात की। उन्होंने देखा कि आश्रम की इमारत और दीगर दूसरी बुनियादी ढांचा बोसीदा हालत में था।

बैठक ने इत्तेफ़ाक़ राये से सिफारिश की कि मुतलक़ा एजेंसियां ​​आश्रम की जल्द अज़ जल्द मरम्मत के लिए ज़रूरी इक़दाम करे।

बैठक में शरीक अफ़रादों ने कहा कि आलमी सतह पर पाकिस्तान के खिलाफ मनफ़ी तश्हीर को खत्म करने में मदद करना भी उनकी जिम्मेदारी थी। 

अवामी अक़लियती कमीशन बिल २०२० के मसौदे पर एक गुफ्तुगू के दौरान, बैठक में बताया गया कि सभी मुत्तासेरीनों के साथ वसीह  गुफ्तुगू कर के बाद में मसौदा बिल को मंजूरी के लिए यूनियन कैबिनेट को भेज दिया जाएगा।

सभी शिरका ने कहा कि अक़लियतों को वतन अज़ीज़ में उनके हुक़ूक़ को क़ायद -ए-आज़म के नज़रिये और पाकिस्तान के आईन के हिसाब से दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि कमीशन वतन में एतेमाद  हम आहंगी को बढ़ावा देने के लिए अपनी क़ाबलियत का इस्तेमाल करेगा।

Wednesday, 23 December 2020

भगवा दहशत के ज़ेरे साये तलाक़ तलाक़ तलाक़

अज़ीज़ नाज़रीन

 कोलकाता: २३ दिसम्बर २०२० 

ख़बरनामा पेश खिदमत है मिनजानिब सहाफी जुबेर 

ऐसा कहतें हैं जो जितना बड़ा गड़ा दूसरों के लिए गलीज़ और गन्दी नियत से खोदता है वोह वोह शख़्स उसी गढ़े में उतनी ही शिद्दत से गिरता है।  भारतीय जनखा पार्टी (बीजेपी) ने ट्रिपल तलाक़ पर मुस्लिम मस्तूरातों के आंसूं पोछने वाला अदा अधूरा क़ानून बनाया था।   अब उसको बनाने के पीछे इन ज़ाफ़रानी जनखों की नियत खराब थी, सो उसका ख़मयाज़ा अब खुद ही भुगत रहें हैं।   इस क़ानून को बनाने के बाद ज़ाफ़रानी शोहर को ३ साल की क़ैद कर के उसकी ज़िन्दगी बर्बाद करना चाहते थे और अगर उसको कोई वारिस है तो मासूम नस्लें बर्बाद तबाह।   

जिस तरह से हर क़िस्म की तलाक़ को ख़तम करने के पीछे बीजेपी के वकील अदालत में पुर ज़ोर जिरह कर रहे थे और आधा अधूरा क़ानून बनने  के बाद लँगूरनियाँ बरहना रक़्स कर रही थी अब वही तलाक़ बिल भारतीय जनखा पार्टी के गले की हड्डी बन गया है। 

भारतीय जनखा पार्टी के रकूने पार्लिअमान सौमित्र खान और उनकी एहलिया के दरमियान कशीदगी बढ़ती जा रही है।   सुजाता मंडल खान जो कभी अपने मुस्लिम शौहर के साथ हर मुद्दे पर शाना बा शाना भारतीय जनखा पार्टी के हर अमल की हिफाज़त करती थी कशीदगी के चलते अब तृणमूल में शरीक हो गई हैं।   लेकिन योगी, भोगी, शिवराज और कट्टर को यहाँ लव जिहाद नहीं दिखेगा।  वही अगर वेस्ट बंगाल में कोई गरीब मुस्लिम किसी हिन्दू खातून से शादी करता तो बड़े बड़े परचम लगा दिए जाते, वेस्ट बंगाल में लव जिहाद को रोकेगी भाजपा।   जागो हिन्दू जागो।  

जिस अंदाज़ में एक मुस्लिम की हिन्दू एहलिया सुजाता मंडल की भाजपा से कशीदगी मन्ज़रे आम हो गई उसी तरह अब उनकी ज़िन्दगी की अज़वाजी जंग भी मन्ज़रे आम पर आ गई है।  सुजाता मंडल ने बरोज़ पीर बीजेपी छोड़कर टीएमसी जॉइन कर ली थी, जिसके बाद उनके मुस्लिम शोहर सौमित्र खान ने अल एलानिया तौर पर सुजाता मंडल को ट्रिपल तलाक दे दी।  इतना ही नहीं बरोज़ मंगल को उन्होंने अपनी एहलिया को तलाक का नोटिस भेज दिया.  इसपर सुजाता मंडल ने बीजेपी पर हमला किया है. उन्होंने कहा कि 'जिस पार्टी ने तीन तलाक को खत्म किया, वो मेरे शोहर से मुझे तलाक देने को कह रही है.

मुस्लिम शोहर सौमित्र खान और हिन्दू एहलिया सुजाता मंडल १० सालों से साथ हैं, लेकिन सियासत में उनके मुख़तलिफ़ रिश्ते अपनाने के बाद अब उनका शादी शुदा रिश्ता खत्म होने के कगार पर आ गया है।  ३४ साला मंडल ने बरोज़ पीर टीएमसी जॉइन कर ली थी। 

४० साला मुस्लिम शोहर सौमित्र खान उसी दिन कुछ घंटों बाद ड्रामेबाज़ी करते हुए एक सहाफी इजलास में अश्क बार होते दिखाई दिए थे, उन्होंने अपनी बीवी से उनके नाम का अपनी उरफ़त या सरनेम हटाने को कहा और उनपर धोखा देने का इलज़ाम लगाया. उन्होंने तलाक की बात भी कही और अगले दिन ही चार सालों की शादी खत्म करने के लिए तलाक का नोटिस भी भेज दिया.

सुजाता मंडल ने गुजिश्ता साल के लोकसभा इन्तेख़ाब में अपने शोहर की जीत के लिए कड़ी मेहनत की थी. खान एक मुजरिमाना केस में  जमानत पर थाइस शर्त पर कि वो अपने इन्तेख़ाबी हल्क़े बिषनुपुर नहीं जाएंगे, उनकी बीवी मंडल ने इन्तेख़ाबी मरहले को अकेले संभाला था और खान की जीत हुई थी. मंडल ने पार्टी छोड़ने के बाद कहा था कि उन्हें बीजेपी में नजरअंदाज किया जा रहा था और अपने शोहर के लिए बड़ी क़ुर्बानी के बदले में भी उन्हें बदले में तंज़ीम ने कुछ नहीं दिया था.

उन्होंने मंगल को इलज़ाम लगाया कि उनके शोहर को बीजेपी के सियासतदां भड़का रहे हैं और तलाक के लिए उकसा रहे हैं. उनकी ग्रहस्ती को बर्बाद करने के लिए बीजेपी ज़िम्मेदार है।  उन्होंने यह भी सवाल किया कि आखिर बीजेपी में उन्हें कोई भी तलाक देने से रोक क्यों नहीं रहा है. सौमित्र खान ने अपने तलाक़नामे में तलाक़ लेने की वजह बताते हुए कहा है कि वो और उनके कुनबे और ख़ानदान में  'रवादारी, ज़ेहनी और जज़बाती अज़ीयत झेलनी पड़ी है.

सुजाता मंडल ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा, 'जब आपकी ज़ाती जिंदगी में सियासत दाख़िल हो जाती है, तो इससे रिश्ता खराब होता है. मेरे शोहर सौमित्र बीजेपी में गलत लोगों की संगत में हैं, जो उन्हें मेरे ख़िलाफ़ भड़का रहे हैं. जिस पार्टी ने ट्रिपल तलाक खत्म किया, वो आज सौमित्र से मुझे तलाक देने को कह रही है.'

मंडल ने कहा कि वो अपने शोहर से 'अभी भी मोहब्बत करती' हैं. उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि मुझे तलाक़नामा कैसे मिल रहा है. कैसे मेरे शोहर बीजेपी सांसद और बीजेपी युवा मोर्चा के सदर हैं, और एक सहाफी इजलास में खुल्लम खुल्ला प्रेस मीट में मुझे तलाक देतें हैं।  यह वही पार्टी है जो तीन तलाक के खिलाफ है. और अब इसी के सांसद मुझे इसलिए तलाक दे रहे हैं क्योंकि मैंने पार्टी बदल ली है.

नाज़रीन यह ही है बीजेपी का किरदार और दोहरा रूख़ जहाँ उनकी खुद की तंज़ीम का एक मुस्लिम रकूने पार्लिअमान एक हिन्दू से निकाह करता है लेकिन किसी भी बीजेपी वाले को लव जिहाद नहीं दिखता दूसरी जानिब वोह हिन्दू बीवी को ट्रिपल तलाक़ देतें हैं फिर भी सभी जनखा पार्टी के नुमाइंदे खामोश हैं।   हम करें तो गुनाह तुम करो तो शराफत।   यह कैसे चलेगा।  

Ballot defeated saffron bullets in Kashmir & Saffron Terror by the Global community.

 

AUTONOMOUS JOURNALIST

Ballot defeated saffron bullets in Kashmir & Saffron Terror by the Global community.

https://autojourna.wordpress.com/2020/12/23/ballot-defeated-saffron-bullets-in-kashmir-saffron-terror-by-the-global-community/



कश्मीर की हुर्रियत में पाकिस्तान और अवाम की जीत।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

भारत की जानिब से ज़ाफ़रानी हुकूमत ने शिद्दत, जब्र और दहशत मचा कर कश्मीर की मुस्तक़िल दफा ३७० और ३५ A को ०५ अगस्त २०१९ के उस मनहूस और काले दिन मंसूख कर दिया था।  १५ अगस्त के उस मनहूस दिन बाद भारत ने पाकिस्तान के सूबे बाटलिस्तान और गिलगित पर अपना क़ब्ज़ा ज़ाहिर करना शुरू कर दिया था।   लेकिन हक़ीक़त से आप तमाम हज़रात भी वाक़िफ़ हो जाएँ की ३७० मंसूख करने के बाद भारत और पाकिस्तान की कश्मीर तनज़िया पर क्या असल हैसियत है।   

जहां एक जानिब पाकिस्तान के सूबे बाटलिस्तान और गिलगित में ३७० मंसूख करने के बाद इन्तेख़ाब में इमरान खान की तंज़ीम तहरीके इन्साफ को ज़बरदस्त कामयाबी मिली और जिस बाटलिस्तान और गिलगित पर भारत अपना दावा बताता था वहां नई हुकूमत इमरान ख़ान और तहरीक इन्साफ की क़ायम हुई।   वहीँ दूसरी जानिब जिस जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान अपना दावा बताता था या उसको आज़ाद करवाने की हिकमत पर अमल करदा था वहां पर हुर्रियत के परवानों की जीत हुई और भारत की ज़ेहरीली, फ़िरक़ापरस्त, दहशतगर्द तंज़ीम की ज़बरदस्त हार हुई।    

ज़ाफ़रानी मिडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ महज़ १ या २ ज़ाफ़रानी सीटों के जीतने पर जश्न बना रहें हैं।  श्रीनगर में भाजपा के फौजी हुए दाखिल १ सीट जीती।  तो उन तमाम लंगूरों को बता देना चाहता हूँ की यह इन्तेख़ाब १ या २ सीटों के लिए नहीं थे बल्कि यह इन्तेख़ाब उस फैसले का रेफरेंडम थे जो ज़ाफ़रानी हुकूमत ने शिद्दत और दहशत मचा कर लिया थायह इन्तेख़ाब ग़ुलामी से आज़ादी का रेफरेंडम था।   गुपकर की इस जीत ने इस बात को ज़ाहिर कर दिया है की अवाम क्या चाहता है।  

दूसरी बात ३७० हटाने के बाद फ़ौरन पहले इंतिख़ाब में अगर ज़ाफ़रानी तंज़ीम को मुतालिक अक्सरियत हासिल होती, वोह तमाम सियासी तंज़ीमों को पस्त कर के सूपड़ा साफ़ कर देती और ज़ाफ़रानी परचल लहरा देती तो ज़ाहिर होता की अवाम बीजेपी के फैसले के साथ है।  लेकिन हुआ उसका उल्टा और अवाम ने ज़ाफ़रानी तंज़ीम को धुल चटा दी उसको उसको औक़ात दिखा दी तो ज़ाहिर होता है की अवाम क्या चाहता है।   अब अगर आगे के किसी और इन्तेख़ाब में भारत जालसाज़ी कर के, फरेब से, धोख़ा दे कर, वोट की ख़रीद फ़रोख़्त कर के एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर इन्तेख़ाब को जीतने की कोशिश करता है तो वोह भारत के हक़ में रेफरेंडम नहीं माना जाएगा।  क्योंकि ३७० और ३५ A के बाद सबसे पहले इन्तेख़ाब को ही अवाम का फैसला तस्लीम किया जाएगा।   अब भारत को चाहिए की कश्मीर को एक आज़ाद रियासत का वही दर्जा दे जो १९४७ के वक़्त था या फिर उसको पाकिस्तान के साथ ज़म कर दे।  अगर मज़ीद भारत हठधर्मी दिखाता है तो होगी हक़ीक़ी जंग जो की अक़वामे मुत्तहेदा की सरपरस्ती और तमाम अमन पसंद मुमालिकों की जानिब से भारत के जब्र, शिद्दत, दहशत, ज़ुल्म, नाइंसाफी, क़त्ले आम के खिलाफ होगी।  

नाज़रीन एक बात और ग़ौर करने वाली है भलें ही ज़ाफ़रानी तंज़ीम ३७० पर अपनी पीठ थपथपाती रहे लेकिन ना सिर्फ कश्मीर बल्कि भारत के ५ हल्क़ों के अवाम ने भी ३७० मन्सूख़ करने के बाद फ़ौरन हुए इन्तेख़ाब में उसको अपना फैसला सूना दिया है की वोही ग़लत है।   महाराष्ट्र में हुकूमत गई बिहार में दुसरे दर्जे पर काम करने पर मजबूर हुए यह ज़ाफ़रानी।  बिहार में इनकी क़िस्मत में वज़ीरे आला के लिए दरी चादर बिछाने उठाने और कुर्सियां लगाने के अलावा अब कोई काम नहीं है।  हैदराबाद, राजिस्थान और कश्मीर बल्दिया इन्तेख़ाब ने दिखा दिया की तुम्हारे अंदर वोह सलाहियत नहीं है की तुम मुल्क को अमन और फलाह के रस्ते पर चला सको। 

इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों को हर मुद्दे पर खून ख़राबा और क़त्लों ग़ारत करने की आदत हो गई है।  पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करते करते अब अपने ही मुल्क के अवाम पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बातें करने लगे, उससे ज़ाहिर होता है की इन ज़ालिमों के दिलों दिमाग में सिर्फ खून करना ही भरा है।जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने २०१५ के बाद कई एक मज़्मूनों में कर दिया था की अभी यह लोग पाकिस्तान के ऊपर जब्र और खून खराबे की बातें करतें हैं लेकिन जब इनको और कोई नहीं मिलेगा तो अपने खुद के अवाम का क़त्ल और खून करने की बातें करेगें।   अब अवाम ने इनको बराबर जवाब दिया हैं सर्जिकल स्ट्राइक के बदले जम्हूरियत का स्ट्राइक।   

जिस कश्मीर को यह ज़ाफ़रानी अपनी जागीर समझते थे और अवाम के ऊपर ज़ुल्म दहशत जब्र करते थे उस जगह भी धमाका बड़ा ही फैसला कुन हुआ।   जो कहते थे इलाक़ा तुम्हारा और धमाका हमारा यह उनको जवाब है, इलाक़ा तेरा और धमाका हमारा।   क्योंकि कश्मीर को यह ही लोग अपना बोलते थे, हम तो आज़ादी चाहते थे।

कुल मिला कर यह सहाफी इस नतीजे पर पंहुचा है की इन ज़ाफ़रानी शिद्दत, दहशत, खून खराबे, ज़ुल्म सर्जिकल स्ट्राइक फ़िरक़ापरती का वाहिद हल है जम्हुरियाई स्ट्राइक।   हर हल्क़े पर इनके सर्जिकल स्ट्राइक और ज़हरीले ज़ुबान का जवाब जम्हुरियाई स्ट्राइक से दो।

भारत की बुलेट, दहशत, दरअंदाज़ी पर कश्मीर के अवाम की बलोट की जीत हुई।   भारत ने बुलेट का सहारा लिया और कश्मीर के अवाम ने अपने बलोट के रेफरेंडम का सहारा लिया अब अगर भारत को थोड़ी से भी शर्म हया बाक़ी रही हो तो कश्मीर को आज़ाद कर दे और अवाम के जज़्बाए हुर्रियत का पासो लिहाज़ करे, जब अवाम तुम्हारी ग़ुलामी में रहना ही नहीं चाहता तो जब्र और शिद्दत मचा कर मसले को मज़ीद पेचीदा ना करे।   कश्मीर तो आज़ाद होगा और हर हाल में होगाअभी अगर नहीं किया तो जंग से आज़ाद होगा लेकिन होगा ज़रूर।   अब देखना यही होगा की भारत अपनी कितनी बर्बादी कर के आज़ादी देता है।  

दूसरी बात अब बात महज़ कश्मीर तक महदूत नहीं रह गई है बरक्स जो ज़ुल्म शिद्दत जब्र मुस्लिम अवाम के साथ किये हैं वोह भी अब उसी जानिब सोचने लगे हैं।   हुर्रियत।   उनके मज़हबी एतेक़ाद पर चोट, उनकी शकसी आज़ादी पर चोट, उनके इंसानी हुक़ूक़ पर चोट, उनके रोज़गार पर चोट, उनकी तालीम पर चोट जब इतनी चोटें दी तो सोना कुंदन हो जाता है वही हाल अब मुस्लिम अवाम का हुआ।   जो कश्मीर के बाद एक और नासूर की पेशनगोई कर रहा है।    

Monday, 21 December 2020

Pakistan emerging like super power.

 

AUTONOMOUS JOURNALIST

Pakistan emerging like super power.

https://autojourna.wordpress.com/2020/12/21/pakistan-emerging-like-super-power/ 

५ साल मुफलिसी, ग़ुरबत और बेइज़्ज़ाती के, बाक़िया एहतेजाज के…….

मज़मून नवाज़ सहाफी जुबेर

तारीख़ २१ डिसेम्बर २०२० मुक़ाम मुंबई शाम ४:५१  


अज़ीज़ नाज़रीन,

मोदी इन्तेज़ामियाँ के पिछले ५ साल मुफलिसी, ग़ुरबत की नज़र हो गए और अगले ५ साल एहतेजाज की नज़र हो रहें हैं। 

भारतीय जनखा पार्टी (बीजेपी) में दौरे हाजरा में कुछ भी दुरुस्त नहीं चल रहा है।  अब यह बात अलहदा है की बीजेपी वाले अपनी नामर्दानगी को पोशीदा करने के लिए कभी पाकिस्तान का हाथ कभी आई.अस. आई. का हाथ कभी इस्लामिक स्टेट का हाथ कभी मुसलमानो का हाथ बोल कर अपनी फजीती और मुख़ालेफ़त को दबाते रहें।   अब मज़ीद आगे की जानिब जाते हुई हाल ही के किसान मुखालिफ बिल पर एहतेजाज करते हुए किसानों को खालिस्तानी बोल कर बीजेपी ने अलग ही मुद्दे को पैदा कर दिया है।   २०१४ के बाद जब कभी भी कोई भी एहतेजाज होता था तो उसमे बीजेपी और लंगूरों को बड़ी तादात में आज़ादी के परवाने मिल जाते थे।  यहाँ भी आज़ादी के नारे लगे वहां भी आज़ादी के नारे लगे।   लेकिन यह पहली बार हो रहा है जब किसी मुख़ालेफ़त को ख़ालिस्तानी नाम दिया जा रहा है। 

नाज़रीन क्या यह जनखा पार्टी के साथ बदबख़्ती है या उनके बदकिरदार, गुनाहों और नाइंसाफी की आज़माइश के गुजिश्ता ५ साल मतलब २०१४ से २०१९ तक सख़्त मुफलिसी, ग़ुरबत और बेइज़्ज़ती के नज़र हो गए।   पिछले ५ सालों में कोई इस्म विकास के नाम से बच्चा तो पैदा नहीं हुआ, बरक़्स नोट बंदी, जी अस टी, पुलवामा जैसी बड़ी बड़ी कई ग़फ़लत और गुस्ताखियां  मोदी इन्तेज़ामियाँ की जानिब से होती रही।     

मज़े की बात तो यह रही हर ग़फ़लत और ग़लती पर जब मुख़ालेफ़ीन मोदी इन्तेज़ामियाँ से सवाल जवाब तलब करते उसको कभी राम मंदिर का  मज़हबी रूख़ दे कर कभी अपने भाड़े के गुंडों से वतन परस्ती के नाम पर कभी फ़िरक़ापरस्ती का ज़हर दे कर मुद्दे को पूरा तब्दील कर दिया जाता था।  

२०१४ से ले कर २०१९ तक भारत तमाम अंदरूनी मसलों में उलझा रहा जिसके चलते फलाही कामों की जानिब तवज्जो देने का मौक़ा ही नहीं मिला।   उसका असर यह हुआ की मेह्गाई आस्मां को छूने लगी।   उसके ऊपर साहब का हर दूसरे रोज़ बेरुन मुल्क दौरा।   साहब बहादुर भारत में तो कम और बेरुन मुल्क में ही ज़्यादा रहने लगे।  सहाफी जुबेर इस मुद्दे पर एक मज़ाक़ करता है।

एक बार राहुल गांधी को मोदी जी से कुछ सवाल करने थे, ऐवान की कारवाही चालू होते हुए मोदी जी कमो बेश ७ दिन तक भारत के पार्लियामेंट से नदारद दिखे।   जब उनके ग़ायब रेहने की वजह मुख़ालफ़ीनों ने मांगी तो पता पड़ा पिछले १ हफ्ते से हुकूमते आज़म बेरुन मुल्क रकने ऐवान में हिस्सा ले रहें हैं।   

२०१९ में भला हुआ कोविद - १९ वबा का जिसने मोदी जी के दौरों पर पूरा बेन लगा दिया, अब गुलछर्रे और मौज मस्ती के लिए विदेशी नहीं बल्कि देसी खालिस भारतीय सक़ाफ़त इख़्तेयार करना पड़ रही है।  उससे वतन की माश पर जो गुलछर्रे और बेरुन मुल्क जाने में इख़राजात होते थे वोह भी बंद हुए।  

लेकिन २०२० लाया सख़्त मुख़ालेफ़त का दौर जिसकी पेशबंदी शुरूवात से ही हो गई थी। जब मोदी इन्तेज़ामियाँ की दूसरी हुकूमत ने अगस्त ०५ को कश्मीर की मुस्तक़िल दफा ३७० और ३५ A मंसूख कर के दरनंदाजी की, अपने दरअंदाज़ (घुसपैठिये) और दशशतगर्द भेज कर कश्मीर पर काबू पाना चाहा।  

उसके बाद शुरू हुआ एहतेजाजों का तवील मरहला जो अभी तक तमने का नाम नहीं ले रहा है।   कश्मीर के बाद "का" एन.आर.सी. जैसे सियाह क़ानूनों के खिलाफ एहतेजाज जो मार्च २०२० तक चला उसके बाद ताला बंदी।  अभी भारत को खुले हुए कुछ ही अरसा हुआ था की तक़रीबन वही महीना अगस्त के बाद किसान एहतेजाज शुरू हुआ।    जो दिसम्बर को पार करते हुए नए साल यानी २०२१ में दाखिल होने को बेक़रार है जैसा की शाहीन एहतेजाज हुआ था।  

यह एहतेजाज ख़त्म हुआ की नया एहतेजाज हिन्दू अवाम की जानिब से आने वाला है, जो पूरा २०२१ निगल जाएगा और २०२२ में दाखिल होगा।   अल ग़रज़ २०१९ से ले कर २०२२ तक तवील मरहला एहतेजाज का रहेगा फिर २०२२ से ले कर मोदी इन्तेज़ामियाँ के खिलाफ बगावत, जंग और २०२३ में जंग का नतीजा।  हो सकता है बीच में मोदी इन्तेज़ामियाँ पस्त हो कर घुटने टेंक दे और हार तस्लीम कर ले।   लेकिन फील वक़्त २०२१, २२, २३ सख़्त हैं।   

कुल मिला कर इस सहाफी को इस बात को मन्ज़रे आम पर लाने में कोई गुरेज़ और परेशानी नहीं की पिछले ५ साल यानी २०१४ - २०१९ मोदी इन्तेज़ामियाँ को सख़्त बेइज़्ज़त्ती, बदनामी का ज़हर पीना पड़ा और अगले ५ साल यानी २०१९ से २०२३ एहतेजाजों से जूझती रही मोदी हुकूमत। 

 कुल मिला कर विकास पैदा करने का मौक़ा ही नहीं मिला।

कुल मिला कर यह कहना ग़लत नहीं होगा की विकास पैदा करने का मौक़ा ही नहीं मिला।  इधर उधर के मसलों में ही वक़्त निकल जाता था फिर अपनी लुगाई (विकास के कामों) के लिए वक़्त और क़ुव्वत ही नहीं बचती थी सो विकास की ज़िम्मेदारी कभी पाकिस्तान कभी मुस्लिम कभी जिन्ना, कभी रोहंगिया, कभी गुस्पेठियों के कन्धों पर ही रहती थी।   फिर सवाल यह उठता है की इन लोगों की इतनी हिम्मत कैसे हुई के तुम्हारी लुगाई (विकास) के कामों में मदाखलत करें या तो तुमने बुलाया होगा या फिर तुम्हारी लुगाई ने बुलाया होगा। 

अब जा कर इन ५ नामों से छुटकारा मिला है और अब विकास पैदा करने की ज़िम्मेदारी भारतीय जनखा पार्टी ने खलिस्तानी मुहाफिजों को दी है।   मतलब, किसान एहतेजाज में इन को ख़ालिस्तानी दिख रहें हैं।२०२१-२२ में हिन्दू अवाम के ऊपर यह ज़िम्मेदारी होगी की वह विकास ख़ुद पैदा करें।   मतलब किसी मसले पर जब हुकूमत और हिन्दू अवाम में रस्सा कशी होगी तब इनको भी ऐसा ही कुछ नाम दिया जाएगा।  

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...