Monday, 28 August 2023

तालिब ए इल्मों की ख़ुदकाशिओं से दहला कोटा, अब तक २४।

अज़ीज़ नाज़रीन,

राजस्थान के कोटा में बरोज़ इतवार को NEET की तैयारी कर रहे मज़ीद दो और तालिब ए इल्मों ने ख़ुदकशी कर ली।  तालिब ए इल्मों में बढ़ते हुए ख़ुदक़शी के रूझान को देखते हुए हुकूमत में हड़कंप मचा हुआ है।  क्या नोजवान तब्क़ा मर्कज़ को कोई पैग़ाम देना चाहता है जसको हुकूमत अनदेखा कर रही है।  कियोंके किसी के पास से कोई ख़ुदक़शी नोट नहीं मिला है।  अब कोटा में आला तालीम लेने आने वाले नौजवानों के मुस्तक़बिल पर सवाल उठने लगे हैं।  क्या इसके लिए मरकज़ की ग़फ़लत भरी और ज़ाफ़रानी तंज़ीम की ज़हरीली हिकमत ए अमली ज़िम्मेदार तो नहीं है।  इस साल यह ख़बरनामा लिखे जाने तक कोटा में ख़ुदकशी कर के अकाल मौत मरने वाले तालिब ए इल्मों की तादाद २४ हो गई है।  

नाज़रीन अभी उत्तर प्रदेश के स्कूल में एक मुस्लिम ७ साल के मासूम पर दुर्गा वाहिनी की उस्ताद और ख़ातून की ज़बरदस्त बर्बरता और दहशत देखने को मिली थी।  जिसने वोह वीडियो और मज़ीद बच्चो में पेवस्त होते उस ज़हर को देखा मुस्तक़बिल का सोच कर सिहर उठा।   क्या अक्सरियत अवाम में बढ़ती हुए ख़ुदकशी की वारदात कही इस ज़ुल्म और बर्बरता के खिलाफ मौजूदा मरकज़ी हुकूमत और ज़ाफ़रानी ज़हर को एक पैग़ाम तो नहीं दे रहें हैं।

जो ज़हर ज़ाफ़रानी तंज़ीम और मियां घुमक्कड़ ने तमाम भारत में फैला दिया उस से ख़फ़ा हो कर कहीं अक्सरियत अवाम और अक्सरियत तुलबा हुकूमत को एक पैग़ाम देना चाहतें होगा।  इतवार कोटा में एक तबाह कून खबर ले कर आया जहाँ बा एक वक़्त दो तालिब ए इल्मों एक ही दिन ख़ुदकशी कर ली।  दोनों के पास से कोई ख़ुदकशी नोट नहीं मिला है। 

पुलिस के मुताबिक, आविष्कार शंबाजी कासले (१७) ने जवाहर नगर में अपने कोचिंग सेंटर की बिल्डिंग की छठी मंजिल से दोपहर करीब ३.१५  बजे छलांग लगा ली. उसने यह कदम इंस्टीट्यूट का टेस्ट देने के बाद उठाया. साइंस नगर के सीओ धर्मवीर सिंह ने कहा कि इंस्टिट्यूट के मुलाज़िम कासले को अस्पताल लेकर गए, लेकिन रास्ते में ही वोह हलाक हो गया।    

अभी कोटा इंस्टिट्यूट कासले की मौत से उभर भी नहीं पाया था उसकी मौत के महज़ चार घंटे बाद ही आदर्श राज (18) ने फांसी लगाकर ख़ुदक़शी कर ली।  पुलिस ने बताया कि आदर्श मासबिक़ति इम्तेहानात (प्रतियोगी परीक्षाओं) की तैयारी कर रहा था, उसने शाम करीब ७ बजे कुन्हाड़ी पुलिस थाना क्षेत्र में अपने किराए के फ्लैट में फांसी लगा ली.

नाज़रीन जिस अंदाज़ में भारत में हर जानिब मार काट ख़ाना जंगी ज़हर फ़िरक़ापरस्ती नाइंसाफ़ी की हवा चल पड़ी है उससे अक्सरियत अवाम के नौजवान तबक़े के ऊपर उसके बोहोत ही मुज़िर असरात पड़ रहें हैं।   हुकूमत फ़िल वक़्त ग़फ़लत में रहे लेकिन यह बात तिब्बी और नफ़्सियाती महेरीनों से साबित हो चुकी है जो पेशावर मुजरिम नहीं होतें हैं और उनके सामने अगर कोई जुर्म होता है।  किसी अकेली मासूम बच्ची के कपडे फाड़ कर ८-९ मवाली उसकी अस्मत रेज़ी करतें हैं या किसी मासूम को उस हद तक मारा जाता है की वोह जान की भीक मांग कर तड़प तड़प कर मर जाए दंगा फसाद आगज़नी तो ऐसे हादसात जिसके साथ होतें हैं वोह तो मर ही जाता है लेकिन जो आम अवाम है उस हादसे को देख कर नफ़्सियती मरीज़ बन जाता है।  ख़ास कर के जब वोह उस मज़लूम के हक़ में चाहा कर कुछ नहीं कर पाया हो।   कियोंके उसके पास इतनी क़ुव्वत और ताक़त नहीं है।  ऐसे बच्चे और नौजवान ज़्यादातर ऐसे हादसों को भूला नहीं पाते और बोहोत सख्त ज़ेहनी दबाव में रहतें हैं वोह हादसे उसके ज़हन से ना निकल पाने की वजह से वोह ज़ेहनी मरीज़ हो कर अपनी ज़िन्दगी को ख़तम कर देतें हैं। 

ख़ुदकशी के पीछे कुछ ज़ाती वजह भी होती है मुफ़लिसी, मोहब्बत में नाकामी, घरेलू तनाव वग़ैरा।  लेकिन एक बात ज़रूर बताना चाहूंगा की कांग्रेस ने भी हुकूमत की है और जब से इस सहाफ़ी ने होश सम्भाला है मेने कभी इतनी बड़ी तादात में हिदुस्तान में बढ़ती हुए ख़ुदकशी नहीं देखी।  ज़ाफ़रानी तंज़ीम इक़्तेदार के नशे में चूर है हर जानिब उसको सत्ता ही दिख रही है लेकिन इस नशे में वोह अपने कितने बर्बाद कर बैठी है जब इसका इल्म होगा तो कोई पूरसान ए हाल ना होगा। 

कल ही सूबे शुमाल में एक ४० साल का नौजवान भारत की गटर - २ देखने गया और गटर देखने के बाद इतना दबाव महसूस हुआ की हार्ट अटैक से थिएटर के दरवाज़े पर ही गिर पड़ा और मारा गया।  कहाँ एक सिनिमा तफरीह के लिए बनाई थी कहाँ इंसान का हार्ट अटक की वजह बनी। 

अभी जाएफरानी तंज़ीम हिन्दू दहशत को उस ज़हर का पता नहीं पड़ रहा है जो इन्होने बोया है लेकिन जब उसको खा कर इनके अपने ही मारे जाने लगेगें तब इनके पास सिवाए रोने के कुछ नहीं बचेगा। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

Saturday, 26 August 2023

मुस्लिम नाबालिग़ पर थप्पड़ों की बारिश।

अज़ीज़ नाज़रीन 

मेरा ऐसा मानना है स्कूल एक बच्चे का दूसरा घर होता है और उस्ताद दूसरी वालेदा लेकिन जो सबक़ उसको मिलता है वोह पहला होता है।  उसको जो कुछ स्कूल में सिखाया जाता है या जो हादसात अच्छे या बुरे उसके साथ हो गए वोह उसके नाज़ुक दिमाग़ में चस्पा हो जातें हैं। 

तिब्बी उलूम से भी यह बात साबित होती है जो बचपन में बच्चे के साथ ज़ुल्म शिद्दत जबर हो जाता है तो उस हादसे को वोह बच्चा नहीं भूल पाता है और वोह हादसे उसके दिमाग़ की किसी हिस्से में जा कर मेहफ़ूज़ हो जातें हैं।  गाहे बगाहे फिर ऐसे हादसे ज़ुल्म उसको मरे तक याद रहतें हैं।  बचपन में हुए हादसात की वजह से कई नौजवान  अपनी जवानी में उन सब चीज़ों का बदला लेते हैं।     

नाज़रीन उस्ताद की ज़िम्मेदारी होती है की किसी भी मासूम के अंदर इस तरीके के ज़हर को ना पनपने दे और अच्छी तालीम दे।  अच्छे अदब और तहज़ीब सिखाये जिससे मुल्क, क़ौम और इंसानियत का कुछ भला हो सके।  बरक्स उसके कुछ उस्तादों के दिलों दिमाग़ में इस क़दर ज़हर भरा होता है की वोह ख़ास मज़हब के बच्चे को देख कर आग बबूला हो जातें हैं।  

नाज़रीन मुस्लिम बच्चों में ज़हानत और बेहतरीन तख़्लीक़ी ज़ेहन की कोई कमी नहीं है।  यह तो उनकी बदक़िस्मती है की उनको मुफ़लिसी या किसी और वजूहात की वजह से  माक़ूल मौक़े फ़राहम नहीं होतें हैं लेकिन जिनको मौक़े मिलते हैं वोह अपनी ज़हानत का लोहा उस्ताद और अपने साथ पढ़ने वाले दिगर तालिब ए इल्मों से मनवा लेते हैं।  जिसका ज़िक्र ३ अप्रैल को लिखे मेरे मज़मून ज़हानत, फ़ज़ीलत किसी की ग़ुलाम नहीं होती। में किया गया है।

भारत में मुस्लिम बच्चों को लाइल्मी के अँधेरे में ग़र्क़ाब करने में हुकूमतों ने नुमाया किरदार अदा किया है।  मुस्लिम हलकों में आपको शराब की दूकान दिखेगी, जुव्वे के अड्डे दिख जायेगें लेकिन एक भी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम स्कूल नहीं दिखेगा।  फिर अगर तालीम देने की ज़िम्मेदारी कोई दानिशमंद उठाता है और मदरसा खोलता है तो उस पर ज़ालिम हुकूमत की तनक़ीद नज़र होती है और लंगूर लँगूरनियाँ नो निहाद हिन्दू दानिशमंद मदरसों को हाशिये पर रखने लगतें हैं।  आप तो तालिबान बना रहे हो, दहशतगर्दी की तालीम दे रहे हो,  वतन से बग़ावत सीखा रहे हो, कट्टरपंथी सोच भर रहे हो।  

तो आप क्या कर रहे हो।  आप तो ज़लील कर रहे हो और एक मासूम को एहसास ए कमतरी का शिकार बना रहे हो।  उसकी ज़ेहनियत में यह चीज़ चस्पा कर रहे हो की मुसलमानों में शुजात और बहादुरी नहीं बल्कि नपुंसकता होती है।  मुसलमानों में से हज़रत ए उमर की बहादुरी अली करम अल्लाह की शुजात छीन रहे हो।  अपने साथ तालीम हासिल करने वाली लड़कियों से पिटवा रहे हो उसके पीछे की ज़ेहनियत यही है की वोह बच्चा कभी भी उन लड़कियों से बात चीत करने में एहसास ए कमतरी का शिकार रहे।  फ़िर तो अक्सरियत तबक़े के वाल्दैन को यही सोचना होगा और अपनी बच्चिओं को सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ातूनों  के स्कूलों में तालीम दिलवानी होगी।     

दूसरी चीज़ इल्म इंसान के अंदर ताक़त और क़ुव्वत पैदा करती है सही और ग़लत को समझने की सलाहियत देती है।  अगर एक बच्चा पढ़ लिख गया और ज़ालिम के ख़िलाफ़ बोलने की अपने और अपनी क़ौम पर होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलने की क़ुव्वत नहीं है तो उसका इल्म किसी काम का नहीं है।

आप वही एहसास मुस्लिम बच्चों में पैदा कर रहे हो।  जबकी उस्ताद की ज़िम्मेदारी होती है सब तालिब ए इल्मों को एक नज़र से देखे अब जिसकी जैसी ज़ेहनियत उसको वैसे मौक़े और वसाइल। 

लेकिन यह सब हालात देख कर फ़िर मुझे कहना पड़ता है अगर अक्सरियत अवाम के दिल में मुस्लिम और इस्लाम के ख़िलाफ़ इतनी नफ़रत है तो पाकिस्तान की तोहसीह करो हम चले जायेगें पाकिस्तान।

असदुद्दीन उनकी तंज़ीम या जो भी ग़ुलाम सोच है जो भारत पर मर मिटने की बात करतें हैं यहीं रहेगें यहीं दफ़न होंगे वह ऐसे ज़हरीले माहौल में रहें।  जो हमारे साथ आना चाहते हैं उनके लिए तोहसीह करो। 

अभी ३ रोज़ क़ब्ल सूबे शुमाल (उत्तर प्रदेश) में एक ज़ईफ़ वाल्दैन को पीट पीट कर हलाक कर दिया कियोंके उनके फ़रज़न्द वसीम को पड़ोस में रहने वाली हिन्दू लड़की से मोहब्बत हो गई और दोनों ने निकाह कर लिया।  फ़िर राजिस्थान में ५ रोज़ क़ब्ल एक मुस्लिम नौजवान को १२ से १५ लोगों ने घेर कर तलवार उसके जिस्म में घुसा कर हलाक कर दिया।  इन क़ातिलों में महकमा जंगलात भी शामिल था।  मतलब हूकूमती नुमाइंदे भी ज़हरीले हो चुके हैं। 

ऐसा नहीं है की कांग्रेस के दौर हुकूमत में सब कुछ ठीक हो जाएगा जो मुसलमान इस ख़ुशफ़हमी में होंगे की कांग्रेस आएगी सब ठीक हो जाएगा तो उसका सबसे बड़ा सबूत है मौजूदा कोंग्रेसी हुकूमतों में मुस्लिम हलाकत।  राजिस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार में क्या हालात हैं।   जो नफ़रत और ज़हर की ख़लीज हिन्दू मुस्लिम, हिन्दू क्रिस्टी समाज के दरमियान पैदा हुई है अब वोह किसी भी हालात में नहीं भर सकती। 

अब तो हालात ऐसे हो रहें हैं हिन्दू सिखों के दरमियान वहीँ नफ़रत और ज़हर भरा जा रहा है।  जो सिख कभी वतन की आबरू के लिए खुद को क़ुर्बान करने से नहीं चूकते थे उनको गद्दार और खालिस्तानी बोला जा रहा है उनके ख़िलाफ़ नफ़रत भरी जा रही है। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

Friday, 25 August 2023

दुर्गा वाहिनी की ज़ालिम त्यागी के सामने मुस्लिम तालिब की पिटाई।

 मुझे काफ़िरों से नहीं गिला, क़ौम की रहबरी से है सवाल

बता क्या मिला उम्मत को वतन से मोहब्बत के नाम पर

सहाफ़ी ज़ुबेर

अज़ीज़ नाज़रीन,

जो ज़ुल्म और दहशत हिन्दू ज़ालिम, फ़िरक़ापरस्त ज़ेहनियत उस्तादों की इस सहाफ़ी ने भोगी है हू बहू वही हालात आज आज़ादी के ७५ साल बाद भी मुस्लिम तालिब ए इल्म भोग रहें हैं।  उस्ताद के उस ज़ुल्म और दहशत का ज़िक्र इस सहाफ़ी ने अपने मज़मून जुमेरात ३० जुलाई २०१५ को एक और बटवारा ………।  में भाई याक़ूब मेमन की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और बीजेपी संघी ज़ेहनियत प्रणब मुखर्जी की क़ियादत में जुडिशल मर्डर (शहादत) के बाद किया है।  

यूपी के मुजफ्फरनगर से ऐसा ही मामला सामने आया है जो इस सहाफ़ी और आम तोर पर मुस्लिम तालिब ए इल्मों को स्कूलों में भोगना पड़ता है।  एक वीडियो वाइरल हुआ है जिसमे नजर आ रहा है कि स्कूल चलाने वाली दुर्गा वाहिनी की महिला आतंकिनी टीचर क्लास के दूसरे बच्चों से एक मुस्लिम तालिब ए इल्म को पिटवा रही है। 

वह एक-एक कर दुसरे मज़हब के तालिब ए इल्मों को बुला रही है और अपने पास खड़े मुस्लिम लड़के के गाल पर चांटा पड़वा रही है।  मुस्लिम लड़का आंखों में आंसू लिया जोरों ज़ोर से रो रहा है, लेकिन उस ज़ालिम, दरिन्दनी दुर्गा वाहिनी की आतंकिनी ख़ातून का दिल नहीं पसीज रहा है।

दुर्गा वाहिनी की आतंकिनी टीचर का मुस्लिम बच्चे पर दहशतगर्द हमला मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर थाना क्षेत्र खुब्बापुर गांव का है।  यहां पर तृप्ता त्यागी नाम की दहशतगर्द महिला टीचर स्कूल चलाती है।  तृप्ता कुर्सी पर बैठी हुई है. उसके पास एक तालिब ए इल्म खड़ा हुआ है. पास ही जमीन पर दर्जनों छात्र-छात्राएं बैठे हुए हैं और पढ़ाई कर रहे हैं।  तृप्ता एक-एक कर जमीन पर बैठे छात्रों को बुलाती है और अपने पास खड़े छात्र के गाल पर उन लोगों से चांटा मारने को कहती है. दूसरे छात्र लाइन से आ रहे हैं और ज़ोर से पूरी ताक़त से एक थप्पड़ जड़ देतें हैं।  थप्पड़ खाने के बाद मुस्लिम बच्चा दर्द से तिलमिला जाता है।  लेकिन उस ज़ालिम के दिल पर उसकी चीख उसके दर्द का कोई असर नहीं होता है। 

दुर्गा वाहिनी की आतंकिनी तृप्ता त्यागी के पास ही कुर्सी पर एक मर्द बैठा है जो मुस्लिम लोगों के बारे में बात कर रहा है हो सकता है की वोह तृप्ता का कोई यार दोस्त होगा।  जैसा की इस सहाफ़ी ने दुर्गा वाहिनी की जवान लड़कियों और ज़ईफ़ होने के बाद उनके काम काज के बारे में पूरी तहक़ीक़ के साथ कई लेख लिखे हैं।  

मजलिस के सरबराह असदुद्दीन ने भी वीडियो को सांझा किया है।  मेरा सवाल उन्ही से है कब तक ऐसी ज़लालत और ज़ुल्म मुस्लिम तालिब ए इल्म भोगते रहेगें।  क्लास में लड़कियों के सामने ऐसा ज़लील करना स्कूल में कहाँ तक जाइज़ है।  इस मुद्दे पर मेने तहक़ीक़ात कर एक किताब लिखी है और उसमे एक वजह ज़लालत को भी मुस्लिम ड्राप आउट रेट में बड़ी वजह बताया है। 

फिर असद साहब से में पूछना चाहता हूँ क्या और कुछ देखना बाक़ी है या अब तक़सीम के बारे में बात की जाएगी।  आप की मर कर इस अज़ीम वतन की ज़मीन में दफ़न होने की ज़िद्द और दोग़ले वतन की मोहब्बत उम्मत को बोहोत भारी पड़ रही है।   आपका क्या आप उस मुक़ाम पर हैं की आपकी नस्लों, भाई, बेटियों और सात पुश्तों को कोई तकलीफ और ज़लालत नहीं होगी।  तकलीफ, ज़लालत, हलाकत तो आम मुसलमानों की क़िस्मत में आ रही है।   

नाज़रीन चंद्रयान की चाँद पर फ़रेबी लेंडिंग के बाद सोशल मीडिया पर मुल्ले मुबारकबाद देतें नहीं थक रहे थे।  फिर सिलसिला जुमे के नाम पर हमदर्दी लेने का शुरू हुआ उस पर भी दिल नहीं भरा तो ना जाने किन किन मुसलमानों को पकड़ लाये की उनकी कारगरदेगी की वजह से इसरों ने इस काम को सरंजाम दिया। 

सहाफ़ी जुबेर का मुल्लों को जवाब

लंगूरों की जमात से हो, जो काफ़िरों की कारगरदेगी को एक मुस्लिम पर लाद रहे हो, लोहार की ख़ानदान से हो जो ज़हीन को हथियार और औज़ार बोल रहे हो।  क्या बकवास है झूठी खबर कब तक फैलाओगे साइंसदानों में कहीं भी किसी मुल्ले का नाम नहीं है।  मेरे पास पूरी लिस्ट है सब काफ़िर हैं। 

१.   रॉकेट वुमन नाम से चर्चित अंतरिक्ष वैज्ञानिक ऋतु करिधाल श्रीवास्तव का अहम रोल है

२.   काफिर धर्मेंद्र प्रताप यादव चंद्रयान-3 की लांचिंग टीम का सदस्य है.

३.   इटावा का काफिर अंकुर गुप्ता

४.  फतेहपुर का काफिर सुमित कुमार 

५.  उन्नाव का काफ़िर आशीष मिश्रा

६.  मिर्जापुर का काफ़िर आलोक पांडेय

७.  अल्लाहाबाद का काफिर हरिशंकर गुप्ता 

अगर किसी मुस्लिम का नाम होगा भी तो इसको बाईपास कर दिया अब खड़े रहो आख़िर सफ़ में दरी बिछाने के लिए और कुर्सियां लगाने के लिए।  जो हक़ मुस्लिम का था उस पर तो काफ़िर आ बैठे।  और तुम वतन वतन खेल रहे हो। बेशर्मों शर्म करो।    

दूसरी बात चंद्रयान के चाँद पर पहुंचने से मिल्लत का क्या फायदा हुआ।  जिसका ज़िक्र में मेरी २४ अगस्त २०२३ को लिखी नज़म में कर चूका हूँ।  

वैसे भी त्यागी नंबर एक के ज़ालिम और मुस्लिम अवाम से हद दर्जे का बुग्ज़ और कीना रखने वाली क़ौम है।  त्यागी आम तोर पर दहशतगर्द ज़ेहनियत और मुसलमानों का खून बहाने पर यक़ीन रखते हैं।  बॉम्बे का पुलिस कमिशर के.सी.त्यागी जिसने सलमान रश्दी की किताब पर एहतेजाज करते हुए मसुलिम नौजवानों पर गोलियों की बौछार कर दी थी जिसमे १२ मुस्लिम शहीद हो गए थे।  १९९३ में सुलेमान बेकरी में बंद कर के दर्जनों मुस्लिम अवाम को ज़िंदा जला दिया था।  

छी न्यूज़ की लँगूरनी अदिती त्यागी अपने आप को सहाफ़ी कहती है लेकिन ज़हनियत एक ज़हरीली नागिन के कम नहीं है।  मुसलमानों के हक़ की बात करते ही अंगारे सी दहकने लगती है।  ज़हर ऐसा की अगर ७ फुट दूर से भी फुफकार दे तो सामने वाला डर जाए।   

सहाफ़ी ज़ुबेर

Wednesday, 23 August 2023

हलाक शुदा मुर्दे (चारद्रयान-३) को लंगूरों की टीम ने ज़िंदा रखा है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

जिस तरह नाटक में गटर- फेम को पाकिस्तान तबाह करते हुए दिखाया गया है वैसा ही  हाल  चंद्रयान- सय्यारे का है।  चंद्रयान- की तर्ज़ पर भारत का चंद्रयान- मिशन क़मर भी तबाह हो चूका है।   जितने जारिहाना अंदाज़ में इश्तेहार किया जा रहा है वोह उस बात का ही सबूत है की दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली हो चुकी है।  

अगर भारत ने चाँद पर फ़तह हासिल की है तो वाक़ई यह बात क़ाबिल तारीफ़ है और हर भारतीय के लिए फ़ख़र का मक़ाम है।  जिस ख़ुशी में सिर्फ कुछ खरीदे हुए मुल्लों को दुआ मांगते कुछ मदरसे के बच्चों को और कुछ पंडितों को हवन करते हुए देखा जा सकता है।  मियां घुम्मक्कड़ कहाँ गए।  उनके क्या तास्सुरात हैं, बीजीपी या किसी भी सियासतदां के क्या तास्सुरात हैं।  अब एक एक कर के आना शुरू हो जाएँ तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।  पहले कियों नहीं आये।

जिस रूस के सय्यारे को तबाह हुआ बताया गया दरअसल वोह भारत का ही था और मीडिया में एक डम्मी सय्यारा रूस के नाम से तैयार किया जिसकी ना तो आलमी ख़ला तस्दीक़ करता है और ना ही रूस के सफारातख़ाने ने इस बात की तस्दीक़ की है की उसके देश ने कोई सय्यारा ख़ला में छोड़ा था जो तबाह हो चूका है। 

तीसरी बात भारत के मीडिया के हिसाब से भारत आलमी ख़ला को फ़तह करने जा रहा है तमाम आलम के तालीमी आफ़ता मुल्कों की नज़र भारत पर टिकी है और मियां घुम्मक्कड़ जुनूबी अफ्रीका जा पहुंचे।  क्या ऐसे मौक़े पर जब तमाम आलम की निगाहें भारत पर टिकी हैं और वोह क़मर को फ़तह करने पहुंच गया तो मियां घुमक्कड़ को भारत में मौजूद नहीं होना चाहिए था।  क्या वतन के तमाम अवाम के साथ उस खुशी के पल को सांझा नहीं करना चाहिए था।

भारत का सय्यारा चंद्रयान- तो पहले ही फ़ौत हो चूका है लेकिन जर्राहों की टीम ने उसको बिस्तर मर्ग पर फ़रेबी कहानियों के साथ ज़िंदा रखा हुआ है। 

जैसे एक नाटक आया था कनाडा से भगोड़े जोकर का "गब्बर" जिसमे मरे हुए अवाम का इलाज़ चालू रहता है जब तक वोह लाश सड़ने नहीं लगती है उसको ज़िंदा रखा जाता है।  चंद्रयान- का भी वही हाल है।  मियां घुम्मक्कड़ को खबर लग गई थी की भारत का सय्यारा तबाह हो चूका है सो वोह घूमने फिरने जुनूबी अफ्रिका निकल गए। 

अब शाम को जब मीडिया फ़रेबी कवरेज दिखायेगा तब वहां से ताली बजाएगें और उठ कर मोहतरमा सोनियां गांधी को मुबारकबाद देंगें। 

अब इस मज़मून के बाद हो सकता है मीडिया और जारिहाना अंदाज़ में कवरेज पेश करे।  इस बात को साबित करने की कोशिश करे की हमने क़मर पर फ़तह हासिल कर ली।  लेकिन यह वैसा ही होगा जैसा सेहरा की ताप्ती गर्मी में रेत के ऊपर पानी का अक्स। 

जब भी कोई सय्यारा ख़ला में दाखिल किया जाता है तो उसकी जानकारी आलमी ख़ला को फ़ौरन हो जाती है और उस मुल्क को भी जानकारी देनी होती है लेकिन ऐसी कोई भी जानकारी रूस ने नहीं दी बल्कि जहाँ तक रूस के सिफ़ारत ख़ाने से तहक़ीक़ की गई है उससे यह पता चला की गुजिश्ता १० सालों में उसने कोई सय्यारा ख़ला में नहीं भेजा है। 

अमेरिका ने गुजिश्ता सालों में कोई सय्यारा नहीं भेजा फिर तबाहकुन सैय्यरा किस मुल्क का था। 

अगर भारत ने चाँद पर फ़तह हासिल की है तो वाक़ई यह बात क़ाबिल तारीफ़ है और हर भारतीय के लिए फ़ख़र का मक़ाम है।  जिस ख़ुशी में सिर्फ कुछ खरीदे हुए मुल्लों को दुआ मांगते कुछ मदरसे के बच्चों को और कुछ पंडितों को हवन करते हुए देखा जा सकता है।  मियां घुम्मक्कड़ कहाँ गए।  उनके क्या तास्सुरात हैं, बीजीपी या किसी भी सियासतदां के क्या तास्सुरात हैं।  अब एक एक कर के आना शुरू हो जाएँ तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।  पहले कियों नहीं आये।  लेकिन इस तरक़्क़ी पर सियासत नहीं होना चाहिए।  अब यह मरा हुआ सय्यारा चंद्रयान ३ इन्तेख़ाब तक ज़िंदा रहेगा।  २०२४ में मीडिया जिस मरे हुए सय्यारे पर बीजपी को नफ़ा पहुंचाने का काम करेगा।  

फिर इसरों के साइंसदाओं ने कैसे यकायक सय्यारे को चाँद पर उतरने का वक़्त और दिन बदल दिया।  क्या ऐसा हो सकता है।  जब कोई सय्यारा ख़ला में पहुंच जाता है तो अब उसके इख़्तेयार में कुछ नहीं होता कियोंके अब वोह दुनियां के ग्रेविटी से बहार हो चूका है।  अब वोह ख़ला में अपने आप खींचा जाता है।  दूसरी बात ख़ला में कोई ग्रेविटी फाॅर्स नहीं होता है ज़ीरो ग्रेविटी में काम होता है तो कोई भी साइंसदान दावा नहीं कर सकता की १८ बज कर मिनिट पर इस तारिख को इस दिन हम चाँद पर उतरेगें। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...