आली जनाब उद्धव ठाकरे जी,
वज़ीरे आला
हुकूमत महाराष्ट्र
जनाब उद्धव ठाकरे जी,
दौरे हाजरा में जिस अज़ीयत से ना सिर्फ सूबा महाराष्ट्र बल्कि तमाम मुल्के हिन्द गुज़र रहा है उसकी अज़ीयत और क़ीमत सूबे महाराष्ट्र को भी अदा करना पड़
रही है। लेकिन जो इक़दाम माज़ी में दाढ़ी वाले
बाबा ने उठाये थे वोह ना काफी साबित हुए।
आज १ साल के बाद आप भी उसी तकलीफ कुन और तबाही वाले रस्ते को इख़्तेयार कर
रहें हैं तो आपमें और उन बाबा (फ़क़ीर) में कुछ भी फ़र्क नहीं है।
उद्धव जी, आपने तमाम महाराष्ट्र पर बंद का हुकुम नाफ़िज़ कर दिया और अवाम
को फिर से एक बार क़ैद कर दिया, आपका यह हुकुम इस सहाफी की समझ से परे है और वह यह समझने से
क़ासिर है की जब गुजिश्ता तमाम भारत को क़ैद करने की हिकमते अमली कोविद-१९ वबा पर कोई
असर नहीं दिखा पाई तो आज १ साल बाद आपकी उसी तर्ज़ की हिकमते अमली क्या ख़ैर ख़्वाह असरात
दे सकेगी।
बहैसियत सहाफी और तहक़ीक़ात इस बात का इल्म तो मुझे हो चूका था की महाराष्ट्र
जल्द ही तालाबंदी की अज़ीयत को भोगने वाला है लेकिन पुराने तर्ज़े अमल को नया जामा पहना
कर आप भी उन्ही लोगो के हमराह हो गए जो अवाम का ख़याल रखने के बजाये मुख़ालफ़ीनों के जज़बात
का ज़्यादा ख्याल करतें है।आप भी उन्ही लोगो
के हमराह हो गए जो तन्क़ीदीयों की हक़ गोई को नज़रअंदाज़ कर के चापलूसों की बातों को तवज्जो
देतें हैं। सियासत हो,
इंसान की अज़वाजी या पेशावर ज़िन्दगी हर मुद्दे पर दो रस्ते होतें हैं एक जंग करने का
जज़बा और दूसरा फरारी इख़्तेयार करने की हिकमत।
आप तो मराठा शिवजी के वारिस हो आपने इतनी जल्दी हथियार कैसे
डाल दिए, और दिल्ली सल्तनत के तख़्त पर क़ाबिज़ बादशाह के हमराह हो गए. आपका तालाबंदी का हुकुम ना सिर्फ महाराष्ट्र के आम अवाम के लिए
ज़हर साबित होगा बल्कि माशी एतेबार से अच्छे हज़रात की भी फ़ज़ीहत होगी।
२०२० के तालाबंदी में अवाम पूरी तरह से मुफ़लिस नहीं हुआ था उसके
पास थोड़ा बोहोत सरमायाकारी मेहफ़ूज़ थी जिसकी वजह से उसकी घरेलू गाडी एक साल तक तो चली
अब मज़ीद घरों में बग़ैर रोज़गार और माशी आमदनी के किसी को क़ैद करना उसके ऊपर ख़ुदकशी के
लिए दबाव बनाने जैसा है।
वैसे भी बाबाजी के नोट बंदी, ताला बंदी जैसे ऊल जलूल फैसलों से अवामे हिन्द मुफ़लिस तो हो
ही चूका था रही सही कसर उनकी मुफ़लसी के जनाज़ों पर ठोल ताशे बजवाना,
फिर शमशान में उनकी लाशों पर दिये जलवाना बिल आखिर फूल बरसा
कर उनकी मय्यतों पर तंज़ कसने और हसी मज़ाक़ करने जैसा अमल था। आज मुफलिसी
और ग़ुरबत के चलते गुजरात, हरयाणा, हिमाचल,
उत्तराखंड, राजिस्थान, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश में कई ताजिरों के पूरे पूरे एहले ख़ाना ने खुदकशी
कर के अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ली है। वजह मुफलिसी, ग़ुरबत,
रोज़गार में पस्ती- ज़वाल और क़र्ज़ की बेपनाह इज़ाफ़त।
इस सहाफी ने कभी भी तालाबंदी जैसे मुज़िर असरात देने वाले हुकुम
की पैरवी नहीं की थी, बल्कि हर वक़्त उस मुनाफ़ेक़त और दोहरी ज़ेहनियत की मुख़ालेफ़त की थी जो इन्तेख़ाब में
तो अवाम को घरों से बुला बुला कर अवामी हलकों में हुजूम और गर्दी इकठ्ठा करने की हिमायत
करतें हैं। लेकिन जहाँ इन्तेख़ाब नहीं है वहां
पर सख्त इक़दाम उठाने और लॉक डाऊन की वकालत की पैरवी करतें हैं।
तालाबंदी-१ में जब तमाम हिन्द को बाबा जी ने क़ैद कर दिया था
तभी "आज तक", नवभारत टाइम्स में अपने तास्सुरात में मध्य प्रदेश,
राजिस्थान कर्नाटक, उत्तर प्रदेश में जहाँ कहीं भी इन्तेख़ाबी मरहले में हुजूम जमा
होता था उस पर तनक़ीद की थी। और यही बात कही
थी वबा है तो उसको इंतिख़ाबी मरहले या बीजीपी के नुमाइंदों से काहे को ख़ौफ़ है। इन्तेख़ाब में क्या करोना नहीं पहुंच पाता है। वही बात आज कमो बेश एक साल बात फिर साबित हो रही
है। असम, वेस्ट बंगाल, केरला में इन्तेख़ाब में करोना वबा का क्या फीड बैक है और दीगर
सूबों में जहाँ इन्तेख़ाब नहीं है वहां क्या हालत है।
पिछले साल तमाम संघी ज़ेहनियत और ज़ाफ़रानी मीडिया ने करोना वबा
के लिए ज़िम्मेदार एक बली की गाये तब्लीग़ी जमात को तलाश लिया था,
हर मीडिया के कारकून के ज़हर अंगेशी,
मुत्तसिब ज़ेहनियत और झूट फरेब के चलते मुस्लिम अवाम पर संघी
दहशत की आंधी आ गई थी। मुस्लिम पेडलरों को
रोड पर दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया उनका नाम पूछ पूछ कर तिजारत करने से उनको रोका गया लेकिन
अब उससे ज़्यादा भयानक और हुजूम वाली सूरते हाल कुंभ के मेले में है। तो अब करोना बम, करोना धर्म युध, साजिश, देश के ग़द्दार जैसे अलफ़ाज़ का इस्तेमाल उस हुजूम पर काहे को नहीं
किया जा रहा है; जो सरे आम इन्तेज़ामियाँ के हुकुम की धज्जियाँ उड़ा रहा है और लड़के लड़किया
आपस में बगलगीर हो कर नंगे नहा रहें हैं।
ऐसे मेले ठेलों में मज़हब का कोई अमल दख़ल नहीं होता है बल्कि
यहाँ तो मस्तूरातों, लड़कियों के खुले जिस्म को देखना और उनके साथ फाहाशाई,
अय्याशी करने की निस्बत से ठोले कावड़ियाँ ले कर जातें हैं। लेकिन ऐसे सभी फोटों देख कर भी ज़ाफ़रानी मीडिया
इसको जिस्म धर्म युद्ध नहीं बोलेगा क्योंकि बात अक्सरियत तबक़े के जज़बात और आस्ता से
जुडी हुई है।
ख़ैर बात यहाँ पर हिन्दू मज़हब की कुरीतियों,
नियोग और देवदासी मय्यारे ज़िन्दगी (प्रथा) बताना नहीं है बल्कि उस ज़ेहरीली ज़ेहनियत का पर्दा
फाश करना है जो मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों ने अपने ज़हन में भर रखी है। और इनके खबरनामों को देख कर अवाम ज़हरीला होता चला
जा रहा है। हर उस मुद्दे पर जिसमे भारत का
कुछ भी बूरा होता है तो ज़ाफ़रानी सहाफत को मुस्लिम नज़र आ जातें हैं पाकिस्तानी ज़ाविया
(एंगल) दिखने लगता है। लेकिन यह ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत
अपने खुद के किरदार और अमल पर कभी नज़र नहीं डालते की कही हमसे तो कुछ ख़ता नहीं हो गई
जिसकी सज़ा के तोर पर हम पर यह मुसीबत मालिके मुतलक़ ने लादी है।
आपसे गुज़ारिश है महाराष्ट्र को किसी भी तानाशाह और दहशत के ज़ेरे
हुकुम ग़ुलाम ना बनाये। महाराष्ट्र को उत्तर
प्रदेश,
बिहार ना बनाये बल्कि उसको माशी मज़बूत बनाएं। ज़हीन हुकुम नाफ़िज़ कीजिये अपने खुद के लॉ बनाइये,
हारे हुए घोड़े के नक़्शे क़दम मत चलिए। करोना वबा का लॉक डाऊन से कोई ताल्लुक़ नहीं है
अगर होता तो बाबा जी ने ९ माह का लॉक डाऊन किया था अभी तक तो विकास पैदा हो चूका होता
लेकिन हुआ किया जो अवाम पहले माशी मज़बूत थे उनका भी खून निचोड़ लिया।
आपसे गुज़ारिश है लॉक डाऊन के हुकुम पर नज़रे सानी कीजिये और अवाम
को अपने रोज़गार के मौके फ़राहम कीजिये नहीं तो उत्तर प्रदेश बिहार की तर्ज़ पर जुर्म
महाराष्ट्र में भी बे पनाह बढ़ जाएगा। अवाम
खुद को ज़िंदा रखने के लिए दूसरों का ख़ून करने से गुरेज़ नहीं करेगा। जहाँ तक वबा को काबू करने का सवाल है तो सख़्त इक़दाम
कीजिये क़ानून को तोड़ने वालों पर ३ गुना जुर्माना लगाइये लेकिन लॉक डाऊन नहीं। लॉक डाऊन की हिकमते अमली एक बार नाकाम साबित हो
चुकी है वोह फिर से कैसे कामयाब होगी।
लॉक डाऊन कीजिये लेकिन फिर महाराष्ट्र के १२ करोड़ हर अवाम के खाते में बिला तफ़रीक़ उसके माशी हैसियत के १५ हज़ार रूपये जमा कीजिये। अगर एक घर में ४ अफ़राद बालिग़ हैं तो फि मेंबर १५ हज़ार मतलब ६० हज़ार रूपये उस घर को माशी इमदाद फ़राहम कीजिये तो आपका ताला बंदी का हुकुम मुनासिब लगेगा नहीं तो अवाम से बदला लेने की हिकमत जैसा लग रहा है।
सहाफी जुबेर