Wednesday, 14 July 2021

जंगी महाज़ पर फ़तह इस्लाम होगा।

अज़ीज़ नाज़रीन

हक़ और बातिल के दरमियान जो जंग का आग़ाज़ हुआ है, उसमे इस्लाम और मुजाहेदीन हर महाज़ पर सुरखुरू हो रहें हैं. इस जंग की इब्तेदाह भारत  से हुई थी और इसका ख़ात्मा भी भारत पर आ कर ही होगा।  अफ़ग़ानिस्तान के तक़रीबन ८५ फीसद हिस्से पर अब मुजाहिदों का क़ब्ज़ा है और भारत के संघी दहशतगर्दों की सख़्त तरीन फ़ज़ीहत हो रही है.  अमेरिका के ट्रम्प इन्तेज़ामियाँ के कन्धों  पर बंदूक़ रख कर और अफ़ग़ानी ग़ुलाम हुकूमत से सांठ गाँठ  कर के संघी दहशतगर्द इस्लामिक ज़मीन पर अपना क़ब्ज़ा ज़माना चाहता था.  वोह महज़ आलमगीर औरग़ज़ेब रेहमतुल्लाह अलहे की फारस से बर्मा और कश्मीर से कन्याकुमारी तक हुकूमत करने के रूहानी जज़्बे और तारीख़ी रिकॉर्ड को तोडना चाहता था.   साजिश, मंसूबा बना कर  भारत की ज़ाफ़रानी हुकूमत ने संघी दहशतगर्दों को अफ़ग़ानिस्तान में घुसाया था.  लेकिन अब फ़ज़ीहत हो रही है और जान के लाले पड़े हुए हैं.  

भारत ने अपना मिशन अफ़ग़ानिस्तान में बंद कर दिया है और तमाम सिफारती इन्तेज़ामियाँ को वापिस आने की हिदायत दी है.  लेकिन बड़ी बात वही है दुश्मनों को क्या अब तालिबान आसानी से जाने देंगें।  पूरी तफ्तीश होगी क्या उनका मंशा था क्या साजिश थी.  अफ़ग़ानिस्तान के किस किस हल्क़े में बम ब्लास्ट में भारत की हुकूमत का हाथ था.  सब चीज़ें बहार निकल कर आयेगीं.  जब अमेरिका के साथ मिल कर अफ़ग़ानी फौजियों ने इस्लाम और मुसलमानों के साथ ग़द्दारी की मुनाफ़िक़ाना किरदार पेश किया तो  उनको नहीं बक्शा जा रहा है.  फिर दुश्मन वोह भी ज़ाफ़रानी शिद्दत और संघी दहशत उसको किसी सूरत से तालिबान माफ़ नहीं करेगें। 

नाज़रीन भारत की जंग के हर महाज़ पर सख़्त फ़ज़ीहत और रूस्वाई हुई है.  हाल ही में क्रोएशिया और अज़रबाइजान के दरमियान जंग में क्रोएशिया को बेदर्द हार का सामना करना पड़ा था.  जिस फतह के ऊपर और दौरान जंग इस सहाफी ने अज़रबाइजान की हौसला अफ़ज़ाई में मज़मून शाया किये थे.  उस जंग में वालिद (इजराइल) और फ़रज़न्द (भारत) को मुँह की खानी पड़ी थी.  ज़िल्लत और रूस्वाई  की दहशत की पनाह गाह इजराइल के बग़दादी को अपनी  कुर्सी से हाथ धोने पड़े थे.  क्योंकि क्रोएशिया को भारत और इजराइल जंगी महाज़ पर जंगी आशियात, असासे और जंगी साज सामान से मदद रहे थे.  जबकि अज़रबाइजान को तुर्की, पाकिस्तान और ईरान की मदद शामिल थी. 

उस जंग में क्रोएशिया की हार को  इस्लामिक बरदारी अमेरिका और बातिल ताक़तों की शाकिस्त तस्लीम कर के चल रहे थे.  और हुआ वही अज़रबाइजान के फतह के परचम के साथ इजराइल, अमेरिका और भारत के तख्ते पलटने शुरू हो गए.  उनकी ताक़त  हौसले पस्त पढ़ गए. नतीजा इजराइल बग़दादी की दहशत का खात्मा हुआ और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का तख्ता पलट हुआ.   अमेरिकी इतने ख़ौफ़ज़दा हो गए थे की काबुल एयर पोर्ट को रातों रात खामोशी से खाली कर के भाग खड़े हुए.  

अब हदफ़ भारत ही होगा।  जिस अहमद शाह अब्दाली, मेहमूद ग़ज़नवी जैसे जलील क़द्र बादशाहों को आक्रांता ज़ालिम लूटेरा बोल कर शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानी अवाम के ज़ेहनों में आलूद भरते थे अब उन्ही बादशाहों की नस्लें भारत की जानिब यलग़ार करेगी.  

Monday, 5 July 2021

ख़बरदार मोमिनो शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है.

अज़ीज़ नाज़रीन

आज उम्मते मुस्लेमा सख़्त गुमराही का शिकार है और वोह शैतानी जाल में बुरी तरह फस चुकी है. सियासत, तिजारत से ले कर मुलाज़मत हर खित्ते हर शोबे में मुस्लिम अनदेखी और उनका इसतेसाल हो रहा है.  वजह महज़ एक है और वोह है शैतानी हर्बे में हम फसते चले जा रहे हैं. 

नाज़रीन जब शैतानी जाल  में फस गए तो अब हर काम ख़िलाफ़े शरीयत होगा।  जैसा की किसी भी मुस्लिम से ३ दिन से ज़ाइद बात चीत तर्क करना बग़ैर किसी शराई उज्र के गुनाह है.  उसी हिसाब से रिश्तेदारों से क़ता ताल्लुक़ करना बग़ैर शराई उज्र के गुनाहे कबीरा है. लेकिन मुसलमान उस गुनाह में मुलव्विस हैं.  नाज़रीन ख़ाकसार के वैसे तो कोई ज़्यादा एहबाब वग़ैरा नहीं है महदूद सर्किल है.  लेकिन जितने भी हैं वोह मुस्लिम ही हैं.  फिर बिल फ़र्ज़ किसी मुस्लिम से नाइत्तेफ़ाक़ी हो जाती है तो २ दिन ज़्यादा से ज़्यादा ३ दिनों के अंदर उससे रूजू कर लेता हूँ.  इंस्टाग्राम, व्हाट्सअप या दीगर सोशल मीडिया से उसको खुद हो कर मेसेज भेज देता हूँ.  अगरचे गलती मेरी जानिब से नहीं उसकी जानिब से ही हैफिर भी पहल मेरी जानिब से होती है.  

किसी भी गलती पर माफ़ी मांग लेने से कोई छोटे थोड़ी हो जातें हैं.  माफ़ी मांगों और मसले को हल करो. फिर भी अगर कोई अनदेखी करता है या डिलीट कर देता है तो ३ बार ख़ुद हो कर उसकी जानिब हाथ बढ़ाता हूँ, फिर उसको अल्लाह के हवाले छोड़ देता हूँ.  अब मज़ीद मिन्नत करने की कोई सूरत समझ में नहीं आती. उसके ऊपर शैतान हावी हो चूका है अब उसको अल्लाह ही हिदायत दे सकता है.      

वैसे तो इस ख़ाकसार की हक़गोई से ज़्यादातर अवाम ख़फ़ा ही दिखता है.  कुछ अर्से क़ब्ल एक मुस्लिम से नाइत्तेफ़ाक़ी हो गई थी.  उस नाइत्तेफ़ाक़ी ने इस ख़ाक़सार को पूरी तरह तोड़ डाला.  जो ज़हरीली ज़ुबान इस्तेमाल की है उसने उससे बोहोत रंजीदा हुआ.  हमें उम्मीद नहीं थी की उसके दिल में हमारे लिए इतनी रंजिशे और नफरत पल रही है।    

नाज़रीन हर इन्तेख़ाब में मुस्लिम अवाम के क़ातिल और नस्ल कूशी करने वाले भेड़िये मीठी मीठी बातें कर के मुस्लिम अवाम को अपनी जानिब माइल करने की कोशिश करतें हैं.  यूं तो ज़ाफ़रानी भेड़ियों को हर वक़्त की हूजूमी दहशत सुकून करती थी लेकिन इंतेखाब से क़ब्ल ज़ाफ़रानी डाकू मुस्लिम अवाम के वोटों पर बग़ैर किसी स्कीम के डाका डालने आ गया.  हूजूमी दहशत करने वाले हिन्दू नहीं, मुस्लिम अवाम के बग़ैर भारत का विकास संभव नहीं।  अगर संभव नहीं तो उसका क्या उपाय है.  क्या मुस्लिम अवाम को सरकारी, ग़ैर सरकारी (Semi Govt.) इदारों की मुलाज़मत में, तालीम में १० फीसद  मुसलमानों को मेहफ़ूज़ किया जाएगा।  मुस्लिम माशी हालात दुरुस्त करने के लिए उनको बग़ैर ब्याज लोन दिया जाएगा।  फिर जिन हिन्दू दहशतगर्दों ने हूजूमी दहशत की उनको उनके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा।  हूजूमी दहशत के लिए अलहदा बिल पास करवाइये, जिसकी सज़ा जो एक दहशतगर्द की वही होना चाहिए फ़ासी से ले कर उम्र क़ैद तक.  जो संघी कभी मुस्लिम हमदर्द नही हुए वोह मुस्लिम सेवा संघ में मुस्लिम नुमाइंदगी करवाने के लिए जी जान लगा रहें हैं.  और उसमे सब ज़र ख़रीद मुस्लिम या मुनाफ़िक़ भरे पड़ें हैं.  

नोनिहाद सेक्युलर जमातें असदुद्दीन के फ़ौजिओं की बढ़ती हुई ताक़त को देख कर फ़ौरन अमल पेरा हो जाती हैं.  जो सपा अपने खुद के मुहाफ़िज़ आज़म खान की रिहाई उनकी एहलिया की रिहाई उनके फ़रज़न्द के ऊपर हूकूमती दहशत के खिलाफ मुँह नहीं खोल सकी और ना ही कुछ इक़दाम किये वोह अब मुस्लिम इजलास करने लगे.  जिसमे सिर्फ मुस्लिम शामिल हो सकतें हैं.  जो बासापा असदुद्दीन से हाथ मिलाने में गुरेज़ कर रही है उसके कितने मुस्लिम सियसतदाँ जेलों में सड़ रहें हैं लेकिन उनकी रिहाई के लिए आवाज़ बुलंद नहीं की.  उसके ऊपर ज़ुल्म देखिये इनके ख़रीदे हुए जुम्मन लगे असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम के ख़िलाफ़ बदगुमानी फैलाने।  शर्म करो.   

आपसे हमदर्दीमोहब्बत और उनसियत का पैमाना वही था मुस्लिम कशिश और तड़पजिसमे आपका हमारा ज़ेहन मुस्लिम मफ़ात पर एक प्लेटफॉर्म पर था।  आपके अंदर भी वही अंगार और बदला लेने का जज़्बा था जो हमारे अंदर हैं।  लेकिन आपका जज़्बा फरेब और झूट पर मब्नी था। अब जब सच्चाई आश्कार हो चुकी है सब बातें शफ़्फ़ाफ़ और आईने की तरह चमकने लगी हैं के आप लोगों ने अपना असली रंग दिखा दिया है तो अब वोह हमदर्दी भी महदूत रह गई है।

मुझे रूपये पैसे शोहरत इज़्ज़त की कोई तवक़्क़ो ना थी और ना रहेगी।  इज़्ज़त दौलत, रूपये पैसे सब चीज़े अल्लाह ही अता करने वाला है.  तो में कियों किसी चीज़ के पीछे भागूं।  दूसरी बात मेरी ज़रूरतें महदूत हैं तो मेरे इख़राजात भी महदूत हैं. 

Zuber

इश्क़े मजाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी तक का सफर.

अज़ीज़ नाज़रीन

आज ख़ाकसार इश्क़े हक़ीक़ी और इश्क़े मजाज़ी के फलसफे को ले कर अलग ही कैफियत में मज़मून शाया कर रहा है.   नाज़रीन तस्सवुफ़ में माशूक़ से मुराद पीरो तरीक़त, रसूले अरबी बिल आख़िर बारी इलाहा से होता है.  यह मोहब्बत के दर्जे होतें हैं.  इश्क़े हक़ीक़ी की पहली सीढ़ी इश्क़े मजाज़ी होता है. या इश्क़े हक़ीक़ी की इब्तेदाह ही इश्क़े मजाज़ी से होती है. एक नमाज़ी परेहज़गार बा शरा, बा किरदार इंसान अगर मोहब्बत और इश्क़ में पड़ गया तो अब आगाज़ होता है उसके इम्तेहान का.  यहाँ पर शदीद जंग होती है, शैतान और उस इंसान के किरदार के दरमियान।  यहाँ पर वोह शख़्स तीन जानिब से जंग लड़ रहा होता है.  पहली अपने नफ़्स के साथ, दूजी शैतान के साथ और तीजी माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, दुनियाँ) के साथ. पहली सीढ़ी जो आसान नहीं होती और हर बार आशिक़ को शैतानी हर्बे, शैतानी वस्वसे, शैतानी शर से दो चार होना पड़ता है.  फिर भी अगर किसी सूरत वोह आशिक़ पहली सीढ़ी चढ़ गया, और अपने मश्क़ को बरक़रार रखा तो वोह इश्क़े हक़ीक़ी और मार्फ़त की नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ होता है।  होता, यही है इश्क़े हक़ीक़ी को पाने की चाहत रखने वाले अक्सर और बेश्तर इंसान इश्क़े मजाज़ी के सफर में शैतान के शिकार हो कर दम तोड़ देतें हैं.  मोहब्बत में धोका होने के सबब शराब ख़ोरी और तारीकी के अंधेरों में ग़र्क़ाब हो जातें हैं.   और अल्लाह की मार्फ़त हासिल नहीं कर पाते, अल्लाह की मोहब्बत से दूर हो जातें हैं. कभी आशिक़ शिकवा कर बैठता है. मेने तेरी इतनी इबादत की मुझे मेरी माशूक़ नहीं मिली।  या जिसे चाहा उससे शादी नहीं हुई वग़ैरा। इबादत और मोहब्बत बेलौस होना चाहिए। अगर उसका बदला माँगा तो वोह तिजारत हो गई.   

जब शख़्स इश्क़ मज़ाज़ी के इस मरहले (आग के दरिया) को पार कर जाता है और दुनयावी लज़्ज़त्तों से ग़ाफ़िल नहीं होता तो उसको हासिल होती है अल्लाह की मार्फ़त और रूहानियत।  उस शख़्स को शैतान, नफ़्स और दुनिया से जंग जीतने पर बारी इलाहा की बारगाहे खुदावंदी से हासिल होते हैं इनामात, दरजात बुलंद होतें हैं फिर ऐसे शख़्स को मुजाहिद और ग़ाज़ी कहने में कोई हर्ज नहीं। 

नाज़रीन अब ऐसा शख़्स जो दुनयावी लज़्ज़तों और माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, दुनियाँ) की चाहत से बालातर हो, फिर उसको हर जानिब अपना मेहबूब ही नज़र आता है.  लेकिन अब मेहबूब और  माशूक़ की सिफ़त तब्दील हो चुकी है. अब वोह माशूक़ या मेहबूब की बात करता है तो उसका मतलब अपने मुर्शिद, रसूले अरबी या बारी इलाहा से होता है.  हो सकता है वोह कैफ़ियत दीवानगी के आलम में जो कह दे वही बातें अब सच्ची और दुरुस्त साबित हों.  फिर ऐसा शख़्स आगे के हालात बयान करना शुरू कर देता है.  दुनियां उसको पागल दीवाना समझती है. उसकी चाहत (मोहतरमा ख़ातून) अब उसको फरामोश और नज़र अंदाज़ करना शुरू कर देती है.  लेकिन अगर उस शख़्स ने तमाम अज़ीयतों और बावजूद तकलीफों के अपने हक़ीक़ी प्रियतम माशूक़ (मुर्शिद, रसूले अरबी, बारी इलाहा) का दामन नहीं छोड़ा तो ऐसा मजनूँ पागल  दीवाना अल्लाह के बोहोत नज़दीक होता है.  और ऐसे मजनूँ दीवाने की अगर कोई दिल शिकनी करता है तो उसका कफ़्फ़ारा और हिसाब अल्लाह उस ज़ालिम और सितमगर से लेता है.  

वैसे तो मोहब्बत का नाम ही क़ुर्बानी और इम्तेहान देना है, हर मोहब्बत क़ुर्बानी भी मांगती है और इम्तेहान भी लेती है.  ख़्वाह वोह इश्क़े मजाज़ी हो या हक़ीक़ी इश्क़ क़ुर्बानी तलब करता है, इम्तेहान लेता है. माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, मुर्शिद, नबी सल्लम और अल्लाह) की राह में आशिक़ क्या क्या क़ुर्बान कर सकता है. अगर आशिक़ अपने इम्तेहान में कामयाब हुआ तो उसके ऊपर इश्क़े हक़ीक़ी में दरजात बुलंद होतें हैं मार्फ़त मिलती है इनाम मिलते हैं और मजाज़ी में माशूक़.  बोहोत से कम इल्म और नो उम्र किसी भी दीवाने को झिड़क देतें हैं उसकी दिल शिकनी करते हैं.  मुझसे किसी क़िस्म की उम्मीद मत रखना।  यह ग़लत सोच है, सच्चा आशिक़ बे लोस मोहब्बत करता है जो सिर्फ क़ुर्बानी देता है ना की लेता है.  वोह ख़ुद तपिश बर्दाश्त करता है जलता है लेकिन माशूक़ को ख़ुशी फ़राहम करने की तदबीर करता है. उसको अपने माशूक़ से कोई उम्मीद ना होती है वोह तो दीदार का दीवाना होता है.  उसको दीदारे यार की तड़प होती है.   जिस महफ़िल में उसका माशूक़ नहीं वोह महफ़िल उसको सूनी लगती है.  

दौरे हाजरा में जब इंसान ताजिर और दुनयावी लज़्ज़त के पीछे भाग रहा है हर क़िस्म के अमल में उसको नफ़ा और नुक़सान देखने की आदत हो गयी है.  इस काम से मेरे मुस्तक़बिल पर क्या असर होगा, मेरे को ऐसा करने से क्या क्या फायदा मिलेगा।  अगर कोई इबादत भी करेगें तो बारी इलाह से उम्मीद के इसके बदले में हमको जन्नत मिलेगी।  या दुआ में  अपनी चाहत को पाने ले लिए नए नए ऑफर.  मेरी चाहत फलां बिन फलां है तू उससे मेरा रिश्ता करवा दे तो में यह गुनाह करना छोड़ दूंगा। यह तो खुली तिजारत है.  

बेलौस मोहब्बत करने वाले नमाज़ क़ायम करतें हैं या कोई भी नेकी का अमल करते वक़्त कभी भी एक्सचेंज ऑफर नहीं रखते।  बस माशूक़ ने जो कह दिया वोह करना है. और रब से मांगते वक़्त जो तेरी मर्ज़ी हो वोह हम को दे दे.  ऐसे बन्दे अल्लाह की जानिब से दी जाने वाली अज़ीयत पर भी सरे तस्लीम ख़म होतें हैं.  बिल फ़र्ज़ अगर उनके तमाम नेक आमाल पर अल्लाह रोज़ाये जज़ा पर उनको सज़ा देगा तो क्या वोह शिकवा करेंगें। नहीं। क्योंकि वही सच्चे आशिक़ हैं.   और अल्लाह की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी ज़म कर देंगें जो आपकी मर्ज़ी।  हमें मंज़ूर है. जहन्नुम भी तो आप ही की मर्ज़ी से दी जा रही है.   

नाज़रीन ख़ाकसार ने एकम जुलाई २०२१ को अपने whats aap पर एक पैग़ाम आम किया था जिसका मफ़ूम था की अगर आप मेरी जंगे इन्साफ से मुतमईन नहीं हैं तो आप बेशक मुझको डिलीट और ब्लॉक कर दें.  इस पैग़ामें आम के बाद ज़्यादातर अफ़राद जिसमे खातूनों की जमात का कमो बेश ५० फीसद हिस्सा है सभी ने यही कहा.  नहीं ना हम आपको ब्लॉक करेंगे और ना ही डिलीट करेंगें।  आप एक नेक सिफ़त हक़ गोई की बात करने वाले शफ़्फ़ाफ़ किरदार के इंसान हैं.  एक ने कहा में आपकी हर नज़म, मेसेज और लेख पड़ती हूँ, में आपको डिलीट नहीं करूंगी.  एक ने कहा जुबेर साहब इतना ख़फ़ा क्यों हो मेने आपको कुछ कहा, अगर करना ही होता तो कब का कर दिया होता।  

नाज़रीन बताने का मक़सद वही है, जो बे लोस इश्क़ करते हैं उनको किसी क़िस्म की कोई हाजत या उम्मीद किसी भी शख्स से नहीं होती है. वोह एहले नास के लिए काम करतें हैं.  जो लोग दीवानगी की हद को पार कर जातें हैं फिर उनको दुनयावी जमात से कोई हाजत ही नहीं रह जाती है.  उनको तो सब कुछ पहले ही उनके हक़ीक़ी माशूक़ (रब) से मिल गया होता है.  

ऐसे लोग जिनको पहले ही सब कुछ अता कर दिया होता है वोह एहले नास की फलाह के लिए काम करतें हैं. अपने अतराफ़ में पहचान वालों में परेशान कून अफ़राद की परेशानी को दूर करतें हैं.  उनके बेहतर मुस्तक़बिल के लिए दुआ गो रहतें हैं.  ऐसे लोग वोह चिराग़ होतें हैं जो खुद जल कर दूसरों को रोशन करतें हैं.  और किसी को कानों कान खबर नहीं होती की इस रौशनी की इब्तेदाह या मरकज़ कौन हैं.  जब तलाश शुरू होती है तो इस बात का इल्म होता है इसकी रौशनी का मरकज़ यहाँ है.  एक तारीख़ी हक़ीक़ी क़िस्से से अपने मज़मून का खात्मा करूंगा। 

हज़रत अबू हनीफा रेहमतुल्लाह वली कामिल और इस्लाम के ४ सतूनों में से एक थे. आपकी ख़ानक़ाह में अक्सर अवाम अपने मसले और मसाइल के लिए आते रहते थे.  एक बार उनके दरमियान कुछ मुरीदीन बैठे थे और कुछ साईल जो अपने मसले ले कर आये थे. सब को काहवा पेश करने का हुकुम दिया गया.  क़हवा ले कर दूकान से एक कम उम्र बच्चा आया जिसने सबसे पहले एक दस्तरख़ान लगाया और बड़ी ही नफासत तमीज़ से तमाम अफ़राद को क़हवा पेश किया।  हज़रत को उसका अंदाज़े अमल काफ़ी पसंद आया और बड़े मुत्तासिर हुए.  उन्होंने उसको दुगुनी तन्खा देने के वादे पर अपने यहाँ रख लिया, और कहा जब कुछ काम ना हो तुम पड़ा करो और जब भी कोई मेहमान आये तो इसी अंदाज़ में कहवा पेश किया करो।  उसकी वालेदा को पता पड़ा तो हज़रत से ख़फ़ा हो कर अपने बेटे को फिर उस ही क़हवा वाले के यहाँ लगा दिया।  फिर कुछ अर्से बाद वही मामला हुआ और हज़रत ने उसको फिर दो गुनी तन्खा पर अपने यहाँ रख लिया।  लेकिन इस बार उसकी वालेदा ना सिर्फ ख़फ़ा हुई बल्कि हज़रत को नाज़ेबा कलेमात भी बोले।  आप मेरे बच्चे की ज़िन्दगी बर्बाद कर दोगे।  आप जैसे मौलाना की सोहबत में रह कर क्या करेगा, इसका क्या मुस्तक़बिल होगा यह तो बर्बाद हो जाएगा।  कम से कम क़हवा वाले के यहाँ रहेगा तो कुछ सीखेगा और आगे उसकी तिजारत में हिस्सेदार भो हो सकता है. उस पर हज़रत ने बोला, हमारे यहाँ रहेगा तो इसको हर रोज़ वोह ख़ाना मिला करेगा जो हाकिमे वक़त (बादशाह) को हफ्ते में एक रोज़ मिलता है.  बात आई गई हुई.  हज़रत की सोहबत में रह कर उनकी दानिशमंदी और रूहानी फेज़ से उसने बोहोत कुछ सीखा।  कुछ अर्से बाद हज़रत का विसाल हो गया और वोह मुफ़्ती का इम्तेहान पास करने में कामयाब हुआ.  फिर वक़्त के ख़लीफ़ा या हाकिम के यहाँ मुफ्ती की मुलाज़मत मिली।  उसको मुलाज़मत की सनद और दिगार मराआत से नवाज़ने के लिए ख़ुद हाकिमे वक़्त आये और उन्होंने उनको उनकी तन्खा के साथ साथ कहा आपको हर रोज़ ख़ाने में चिलगोज़े, बादाम, पिस्ते और तमाम सूखे मेवे दिए जायेगें। जो हमको हफ्ते में एक बार यानी जुमे को मिलते हैं. बादशाह की बात सून कर मुफ्ती साहब रोने लगे.  बादशाह ने पुछा हमारे इनाम और तन्खा क्या आपको कम लगी. उस पर उन्होंने बोला नहीं आज मुझे मेरे मुर्शिद याद आ गए.  उन्होंने बरसों पहले बोला था की इसको वोह ख़ाना हर रोज़ मिलेगा जो बादशाहे वक़्त को हफ्ते में मिलता है.  उनकी बात सच्ची साबित हुई इसलिए खुशी से अश्क़ निकल पड़े.  

नाज़रीन बताने का मक़सद वही है हज़रत अबू हनीफा की मोहब्बत उस बच्चे के लिए बेलौस थी, ना ही उनको उस से कोई उम्मीद थी.  लेकिन वोह काफ़ी आगे का देख रहे थे उसका मुस्तक़बिल उस क़हवा वाले के यहाँ बर्बाद होगा लेकिन मेरे यहाँ रहने से आबाद है.  जबकी उसकी वालेदा नज़दीकी रूपये पैसे को देख रही थी.  और हुआ वही जो रब ने उस बच्चे की तक़दीर में लिख दिया था.  शैतान ने लाख़ कोशिश की हर्बे खेले लेकिन वोह उन्ही के यहाँ रहा क्योंकि उसके दरजात बुलंद होना थे. 

दुआ करो नबी के सदक़े जिस तरह उस क़हवा वाले की दूकान पर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद करने वाले बच्चे को अबू हनीफा जैसे दानिशमंद, दूरंदेश, आलिम की सोहबत मिली उसी तरह हर मोमिन हर मोमिना हर मुस्लिम हर मुसलमा,  हर हक़ की तलाश से ग़ाफ़िल और भटके हुए इंसान को हक़ का रेहबर मिले।  

Zuber

Thursday, 1 July 2021

सूबे शुमाल में ज़ाफ़रानी दहशत एक और झटका।

अज़ीज़ नाज़रीन,

दीफ़ाई फौजों को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है जब उन्होंने शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानी दहशत के नौ उम्र एरिया कमोनडेंट शरद त्रिपाठी को ढेर कर दिया।   शरद संत कबीर नगर की लोक सभा सीट से २०१४ से २०१९ तक दहशतगर्दी के फ़राइज़ को अंजाम देता रहा था।  उसको कुछ अर्से क़ब्ल दीफ़ाई  फौजों ने घेर लिया था, और ज़ख़्मी हालात में उसको गुरूग्राम के मेदांता शिफा खाने में दाखिल किया गया था।  दीफ़ाई फौजों ने उसके ५६ इंची सीने को चीर कर जिगर पंचर कर दिया था। जिससे उसके जिगर (लिवर) में दिक़्क़त के चलते उसने दम तोड़ दिया।   उसको ढेर करने की खबर सियसत के गलियारों में सख़त तशवीशकुन साबित हुई और ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों में ग़म देखा जा सकता है।  ज़ाफ़रानी तंज़ीम के कई आला सियसतदांओं ने वज़ीरे आज़ाम को मिला कर ताज़ियाती पैगाम पेश किये है।

मरकज़ी बुलंद दरवाज़ा स्मृति ने ट्वीट कर लिखा है में निशब्द हूँ।   ऐसा लगता है अभी बोल उठेगा शरद चल दीदी छेत्र में कार्यक्रम करना है।  चला गया, प्रभु की यही इच्छा थी।  ईश्वर शरद त्रिपाठी जी की आत्मा को शांति दे, अपने श्री चरणों में स्थान दें। 

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...