अज़ीज़ नाज़रीन,
क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है या ज़ाफ़रानी सोची समझी साजिश के हर उस मसले के बाद कुछ तो ऐसा हो जाता है जिससे की अवाम का ज़हन दूसरी जानिब माइल हो जाए और जिस मुद्दे पर जनखा तंज़ीम या हुकूमत की सख्त फ़ज़ीहत हो रही है उससे वोह बच जाए। किसान एहतेजाज अपने ऊरूज पर था और जब २६ जनवरी किसान दिन को किसानों ने लाल क़िले की जानिब यलग़ार शुरू की थी के उस यलग़ार में ज़ाफ़रानियों ने अपने कुछ दरन्दाज़ गुसा कर किसानों की हिम्मत को पस्त करने की साजिश रची।
इस तमाम गहमा गहमी से अवाम उभर पाता और कोई नतीजा अख़ज़ कर पाता की कल बरोज़ जुमे तारीख़ २९ जनवरी २०२१ को भारत के दारुल ख़िलाफ़त दिल्ली में मुक़ीम आलमी दहशतगर्द इसराइल की सिफारातख़ाने के बहार एक कम कशाफत का बम ब्लास्ट हो गया। उसी रोज़ इसी कैफियत का एक बम बलास्ट जम्मू के एक मंदर के बहार भी हुआ। मज़े की बात यह रही की दोनों ही बम ब्लास्ट में किसी भी जानी या माली नुकसान की कोई खबर नहीं है।
यहूद दहशत के अड्डे (सिफारत खाने) के बहार धमाका होना ही था की फ़ौरन यहूद दहशतगर्दों का सरग़ना नितिन याहू अमलपेरा हुआ और उसने धमाके को दहशतगर्दाना हमला क़रार दिया। वह क्या बात है। मज़ीद यहूदी दहशतगर्द बोलता है हमें भारत पर पूरा यक़ीन है, की वोह मुजरिमों को उनके अंजाम तक पहुचायेगा। अब दो बार वह वह क्या बात है। अब दो बातें में यहूदी दहशतगर्द से पूछना चाहता हूँ। धमाके के फौरन बाद तूने कैसे यह ते कर लिया की यह दहशतगर्दाना हमला है। मतलब तेरी और हूकूमते हिन्द की मिली भगत थी, और पहले से सब कुछ ते शुदा वक़्त पर हो रहा था। दूसरी बात जब कोई भी यहूदी या ज़ाफ़रानी दहशतगर्द नही मारा गया तो यह कैसे दहशतगर्द हमला हो सकता है।
किसान एहतेजाज से अवाम की तवज्जो हटाने के लिए हुकूमते हिन्द भी बड़ी मुस्तेहदी से इस धमाके के तार दहशतगर्दों से जोड़ने के लिए बेचैन थी। फिर आनन फ़नन में हुकूमते हिन्द ने बंबई के यहूद दहशत के अड्डे (कांसुलेट) और छाबड हाउस का तहफ़्फ़ुज़ घेरा बड़ा दिया। अमुरे ख़रजा ने यहूद दहशतगर्दों के सरग़नाओं से बात की।
यहूद और ज़ाफ़रानी दहशत के दरमियान अज़्म होने लगे कस्मे वादे किये जाने लगे यहूद दहशत का सरग़ना अमुरे खारजा बोलता है हम भारत के साथ मिल कर आतंक से जंग लड़ेगें और उसको ख़तम करेंगें। अब तीन बार वह वह वह क्या बात है।
अभी भारत की तहक़ीक़ात टीम किसी हतमी मरहले को पहुंच भी पाती के धमाके के अंदर उसको ईरान का हाथ नज़र आने लगा। और धमाका ईरानी सेना के सरबराह क़ासिम सुलेमानी और उनके साइंसदान मोहसिन की शहदात का क़िसास है। भारतीय ज़हीन तहक़ीक़ाती अमले पर हसी आती है। जो तहक़ीक़ाती इदारे अभी तक उरी, पठानकोट, पुलवामा धमाकों की साजिश के चक्रवीहू को नहीं तोड़ पाए उन्होंने इतनी जल्द धमाके के तार ईरान से जोड़ दिए। अगर ईरान को अपने सिपेहसालार और साइंसदान की शहादत का क़िसास लेना था तो फिर काहे को कोई यहूद दहशतगर्द मौत के घाट नहीं उतारा गया। क्या मज़ाक़ है। महज़ कमोज़र डेंसिटी का सुतली बम फोड़ कर किस दर्जे का क़िसास लिया। ना यहूदी दहशतगर्द खून से सुर्ख हुए और ना ही उसका माशी नुकसान हुआ तो किस तरह का क़िसास लिया गया।
कुछ नहीं ऐसे छोटे मोठे धमाके हुकूमत की जानिब से होतें रहतें हैं और इसमें ज़्यादा इमकान सिर्फ शरारत करना मक़सद होता है। जब हुकूमत चारों जानिब से घिर जाती है और कोई रास्ता नहीं दिखता तो अवाम की तवज्जो जलते हुए मुद्दों से हटाने के लिए ऐसे काम किये जातें हैं। इस धमाके में भी किसी का हाथ हो या ना हो साजिश हो या ना हो लेकिन हूकूमते हिन्द की यहूद दहशतगर्दों के साथ मिली भगत कर के अवाम के तवज्जो को हटाने के ज़्यादा इमकान नज़ार आ रहें हैं।
खैर वजह जो कुछ भी हो अब कुछ दिनों के लिए खबरनामों की सुर्खियां उस लौ इन्टेन्सिटी ब्लास्ट के ऊपर रहेंगीं, जिसमे ना तो कोई मारा गया और ना ही किसी किस्म का माशी नुकसान हुआ, बरक़्स २६ जनवरी किसान दिन के एहतेजाज और ज़ाफ़रानी दरअंदाज़ी में कई किसान शहीद हुए ना जाने कितने ज़ख़्मी लेकिन अब उस बात पर कोई तब्सिरा नहीं करता है। क्योंकि मक़सद ही उस मसले से अवाम की तवज्जो को हटाना था।
नाज़रीन ज़ेहन नशीन करें की ईरान के फौजी सरबराह क़ासिम सुलेमानी और साइंसदान मोहसिन को दहशतगर्द इसराईल ने बग़ैर किसी उज्र के शहीद कर दिया था. क्या वोह इसराईल की दहशतगर्दी नहीं थी. अगरचे दिल्ली का बलास्ट ईरान का किया हुआ अमल है, तो उसको अपने फौजी सरबराह और साइंसदान का क़िसास लेने का पूरा हक़ है. यहूदियों का ख़ून हर मज़लूम मुसलमान पर हलाल है. लेकिन दिल्ली में कोई भी यहूदी मौत के घाट नहीं उतारा गया तो दिल्ली ब्लास्ट ईरान या किसी भी मुस्लिम का क़िसास लेने की हिकमते अमली नहीं हो सकती।

