Saturday, 30 January 2021

चोर के घर चोर या यहूद दहशत को ख़लास करने हिन्दू दहशत।

अज़ीज़ नाज़रीन,

क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है या ज़ाफ़रानी सोची समझी साजिश के हर उस मसले के बाद कुछ तो ऐसा हो जाता है जिससे की अवाम का ज़हन दूसरी जानिब माइल हो जाए और जिस मुद्दे पर जनखा तंज़ीम या हुकूमत की सख्त फ़ज़ीहत हो रही है उससे वोह बच जाए।    किसान एहतेजाज अपने ऊरूज पर था और जब २६ जनवरी किसान दिन को किसानों ने लाल क़िले की जानिब यलग़ार शुरू की थी के उस यलग़ार में ज़ाफ़रानियों ने अपने कुछ दरन्दाज़ गुसा कर किसानों की हिम्मत को पस्त करने की साजिश रची।  

इस तमाम गहमा गहमी से अवाम उभर पाता और कोई नतीजा अख़ज़ कर पाता की कल बरोज़ जुमे तारीख़ २९ जनवरी २०२१ को भारत के दारुल ख़िलाफ़त दिल्ली में मुक़ीम आलमी दहशतगर्द इसराइल की सिफारातख़ाने के बहार एक कम कशाफत का बम ब्लास्ट हो गया।  उसी रोज़ इसी कैफियत का एक बम बलास्ट जम्मू के एक मंदर के बहार भी हुआ।  मज़े की बात यह रही की दोनों ही बम ब्लास्ट में किसी भी जानी या माली नुकसान की कोई खबर नहीं है। 

यहूद दहशत के अड्डे (सिफारत खाने) के बहार धमाका होना ही था की फ़ौरन यहूद दहशतगर्दों का सरग़ना नितिन याहू अमलपेरा हुआ और उसने धमाके को दहशतगर्दाना हमला क़रार दिया।  वह क्या बात है।   मज़ीद यहूदी दहशतगर्द बोलता है हमें भारत पर पूरा यक़ीन है, की वोह मुजरिमों को उनके अंजाम तक पहुचायेगा।  अब दो बार वह वह क्या बात है।   अब दो बातें में यहूदी दहशतगर्द से पूछना चाहता हूँ।   धमाके के फौरन बाद तूने कैसे यह ते कर लिया की यह दहशतगर्दाना हमला है।  मतलब तेरी और हूकूमते हिन्द की मिली भगत थी, और पहले से सब कुछ ते शुदा वक़्त पर हो रहा था।  दूसरी बात जब कोई भी यहूदी या ज़ाफ़रानी दहशतगर्द नही मारा गया तो यह कैसे दहशतगर्द हमला हो सकता है।  

किसान एहतेजाज से अवाम की तवज्जो हटाने के लिए हुकूमते हिन्द भी बड़ी मुस्तेहदी से इस धमाके के तार दहशतगर्दों से जोड़ने के लिए बेचैन थी।   फिर आनन फ़नन में हुकूमते हिन्द ने बंबई के यहूद दहशत के अड्डे (कांसुलेट) और छाबड हाउस का तहफ़्फ़ुज़ घेरा बड़ा दिया।   अमुरे ख़रजा ने यहूद दहशतगर्दों के सरग़नाओं से बात की।   

यहूद और ज़ाफ़रानी दहशत के दरमियान अज़्म होने लगे कस्मे वादे किये जाने लगे यहूद दहशत का सरग़ना अमुरे खारजा बोलता है हम भारत के साथ मिल कर आतंक से जंग लड़ेगें और उसको ख़तम करेंगें।   अब तीन बार वह वह वह क्या बात है। 

अभी भारत की तहक़ीक़ात टीम किसी हतमी मरहले को पहुंच भी पाती के धमाके के अंदर उसको ईरान का हाथ नज़र आने लगा।  और धमाका ईरानी सेना के सरबराह क़ासिम सुलेमानी  और उनके साइंसदान मोहसिन की शहदात का क़िसास है। भारतीय ज़हीन तहक़ीक़ाती अमले पर हसी आती है।  जो तहक़ीक़ाती इदारे अभी तक उरी, पठानकोटपुलवामा धमाकों की साजिश के चक्रवीहू को नहीं तोड़ पाए उन्होंने इतनी जल्द धमाके के तार ईरान से जोड़ दिए।  अगर ईरान को अपने सिपेहसालार और साइंसदान की शहादत का क़िसास लेना था तो फिर काहे को कोई यहूद दहशतगर्द मौत के घाट नहीं उतारा गया।  क्या मज़ाक़ है।  महज़ कमोज़र डेंसिटी का सुतली बम फोड़ कर किस दर्जे का क़िसास लिया।   ना यहूदी दहशतगर्द खून से सुर्ख हुए और ना ही उसका माशी नुकसान हुआ तो किस तरह का क़िसास लिया गया। 

कुछ नहीं ऐसे छोटे मोठे धमाके हुकूमत की जानिब से होतें रहतें हैं और इसमें ज़्यादा इमकान सिर्फ शरारत करना मक़सद होता है। जब हुकूमत चारों जानिब से घिर जाती है और कोई रास्ता नहीं दिखता तो अवाम की तवज्जो जलते हुए मुद्दों से हटाने के लिए ऐसे काम किये जातें हैं।   इस धमाके में भी किसी का हाथ हो या ना हो साजिश हो या ना हो लेकिन हूकूमते हिन्द की यहूद दहशतगर्दों के साथ मिली भगत कर के अवाम के तवज्जो को हटाने के ज़्यादा इमकान नज़ार आ रहें हैं।  

खैर वजह जो कुछ भी हो अब कुछ दिनों के लिए खबरनामों की सुर्खियां उस लौ इन्टेन्सिटी ब्लास्ट के ऊपर रहेंगीं, जिसमे ना तो कोई मारा गया और ना ही किसी किस्म का माशी नुकसान हुआ, बरक़्स २६ जनवरी किसान दिन के एहतेजाज और ज़ाफ़रानी दरअंदाज़ी में कई किसान शहीद हुए ना जाने कितने ज़ख़्मी लेकिन अब उस बात पर कोई तब्सिरा नहीं करता है।   क्योंकि मक़सद ही उस मसले से अवाम की तवज्जो को हटाना था।     

नाज़रीन ज़ेहन नशीन करें की ईरान के फौजी सरबराह क़ासिम सुलेमानी और साइंसदान मोहसिन को दहशतगर्द इसराईल ने बग़ैर किसी उज्र के शहीद कर दिया था. क्या वोह इसराईल की दहशतगर्दी नहीं थी. अगरचे दिल्ली का बलास्ट ईरान का किया हुआ अमल है, तो उसको अपने फौजी सरबराह और साइंसदान का क़िसास लेने का पूरा हक़ है.  यहूदियों का ख़ून हर मज़लूम मुसलमान पर हलाल है.  लेकिन दिल्ली में कोई भी यहूदी मौत के घाट नहीं उतारा गया तो दिल्ली ब्लास्ट ईरान या किसी भी मुस्लिम का क़िसास लेने की हिकमते अमली नहीं हो सकती।

Thursday, 28 January 2021

नहीं हुआ लाल क़िला आज़ाद; ट्रेक्टर्स में घूस गए थे दहशतगर्द।

अज़ीज़ नाज़रीन 

२६ जनवरी किसान दिन को लाल क़िले पर जो कुछ भी हुआ उसमे ज़ाफ़रानी दहशत और हुकूमत की मिली भगत सामने आई है।  मक़सद महज़ किसान एहतेजाज को कमोज़र कर के ताजिरों के बाद किसानों को बर्बाद और ख़त्म करने की साजिश है।  कुल मिला कर ग़ुलाम क़िला अभी तक ग़ुलाम ही है।  उसके ऊपर झंडा फहराने वाला कोई किसान नहीं बल्कि बीजेपी का दहशतगर्द दीप सिध्धू है जो सनी देओल का ख़ासम ख़ास माना जाता है।  इस दहशतगर्द दीप सिध्धू ने लोकसभा २०१९ में सनी देओल के लिए जमकर इन्तेख़ाबी मोहीम में हिस्सा लिया था।    

ज़ाफ़रानी ज़हर, साजिशी दीप सिध्धू सनी देओल के एहले ख़ाना में अहम हैसियत रखता है।  लाल क़िले पर किसानों की पीठ में ज़ाफ़रानी छुरा घोपने के बाद  अब हेमा मालिनी, सनी देओल और कई जनखा तंज़ीम के बड़े ओहदेदारों के ऊपर बिजली गिरने के इमकान हैं। नाज़रीन लाल क़िले पर हमला दूसरा पुलवामा कह सकतें हैं।  पुलवामा में हूकूमते तानशाह को अपनी कुर्सी जुंबिश करती हुई दिख रही थी तो उसने फ़ौजिओं को मौत के घाट उतार दिया वहीँ पास किये हुए क़ानून में जुम्बिश दिख रही थी तो क़िले में कुछ किसानों को मौत के घाट उतार दिया।   कुल मिला कर बीजेपी का क्या गया, कुछ नहीं पुलवामा में इलज़ाम पाकिस्तान पर लाद दिया और क़िले में ज़िम्मेदार किसान हो गए.  जबकी दोनों ही हमलों में असली मुजरिम अभी तक क़ानून के शिकंजे से बहार है. अब पुलवामा पर ना कोई सवाल होता है और ना कोई तब्सिरा, क्योंकि अब तो पुलवामा से बड़े बड़े मसले सामने आ गए. फिर अगर किसी ने पुलवामा की हक़ीक़त जानने की कोशिश की तो हो गया वोह ग़द्दार, पाकिस्तान का साथी और तमाम लंगूर लँगूरनियों की टीम के साथ ट्रोल फौज के हाशिये पर आ जाता है.  

जैसा की आम तौर पर इन ज़ाफ़रानी दहशत की रिवायत और मामूल है की गले लग कर पीठ में खंजर उतारते हैं, या कब गले लग कर आपकी गर्दन उतार देंगें आपको पता भी नहीं चलेगा।   जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने कई मज़मूनों में किया है और क़िले में भी वही हुआ जैसे की अलफ़ाज़ इस सहाफी के होतें हैं। गले लग कर भाई बन कर मुहाफिज़ बन कर साथ देने आएं हैं ऐसा बोल कर कब आपके गले को काट डाला पता भी नहीं चला।  बोहोत मोहताद रहने की ज़रुरत है।  किसानों के साथ हुई साजिश में वज़ीरे दाख़ला से ले कर पुलिस इन्तेज़ामियाँ सब की मिली भगत थी.  जान बूझ कर वज़ीरे दाख़ला ने हालात को पेचीदा होने दिए और पुलिस इन्तेज़ामियाँ एक नपुंसक की तरह कमज़ोर कड़ी के जैसे काम करती रही.   फिर जहाँ ग़ैर ज़रूरी था  वहाँ पर गोलियाँ चलाई और शदीद लाठी चार्ज किया। किसानों के मज़बूत कन्धों पर बंदूक रख कर गोली ज़ाफ़रानी दहशत ने चलाई है, अब मिडिया बदनामी का ठीकरा किसानों पर फोड़ रहा है, एक तीर से कई निशाने।   

अब दबे अलफ़ाज़ में ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के खबरनामों में साजिश के पीछे पाकिस्तान का भी नाम लिया जा रहा है।  लेकिन अभी तक हुकूमत की जानिब से उसका कोई सरकारी बयान या सहाफी इजलास में किसी भी हूकूमती नुमाइंदे ने ऐसी बात नहीं कही है।   पाकिस्तान का नाम फील वक़्त  सिर्फ ज़ाफ़रानी ज़हर और उनके ज़हन की ख़बासत तक ही महदूत है। 

अगर मोदी इन्तेज़ामियाँ या हुकूमत की जानिब से ऐसा कोई भी बयान जारी किया जाता है तो उसका इस सहाफी के पास माक़ूल जवाब मौजूद है।  और सही वक़्त पर सही जवाब दिया जाएगा।

कुल मिला कर यह कहना ग़लत ना होगा की भारत में ज़ाफ़रानी साजिश, ज़ाफ़रानी ज़हर, ज़ाफ़रानी वायरस ने फिर से मीठा मीठा बोल कर गले लग कर किसानों का क़तल करवा दिया और कई पुलिस वाले भी ज़ख़्मी हुए।   लेकिन ऐ बी वी पी की आतंकिनी कोमल शर्मा और शाहीन बाग़ में घूस कर एहतेजाज को कमज़ोर करने वाली आतंकिनी की तरह यह मामला भी दब कर रह जाएगा। 

कुल मिला कर पुलीस इस मसले में भी बली की गाये तलाश करेगी जैसा की करोना वबा में मोदी के ऊपर लानत मलामत और नाकामी का ठीकरा तब्लीग़ी नामक जर्सी गाये को हलाल कर के पूरा इलज़ाम उसके ऊपर लगा दिया था।   

लेकिन इस बार हो सकता है गाये बाहर के देशों की यानी जर्सी ना हो बल्कि देसी यानी हिन्दू ईमान की अलामत वाली हो।   यह बात तो ते है ना बीजेपी, ना ज़ाफ़रानी दहशत, ना शिद्दत पसंद हिन्दू बल्कि एक बली की गाये को हलाल किया जाएगा और यह मसला भी ऐसे ही दब जाएगा जैसे की गोधरा, पठानकोट, उरी, पुलवामा, दिल्ली दहशतगर्द हमलों की हक़ीक़त।    

Wednesday, 27 January 2021

जमुहरियत में टकराव दलील है तानाशाही हुकुम।

अज़ीज़ नाज़रीन,

२६ जनवरी किसान दिन को जो कुछ भी हुआ वोह ज़ाफ़रानी ज़ालिम तानाशाह की हठधर्मी साबित करता है।  आज किसान कमो बेश ६ महीनों से एहतेजाज कर रहें हैं, लेकिन ज़ालिम, खून की प्यासी हुकूमत अपना तानाशाही रवैया जो २०१४ से इख़्तेयार किया हुआ है उसको छोड़ने को तैयार ही नहीं है। 

कारवां ऐ ट्रेक्टर पुर अमन तरीक़े से तमाम टोल क्रॉस करता हुआ जैसे ही हुदूदे दिल्ली पंहुचा, खाकी दहशत ने उनपर हमला कर दिया।   यह वही खाकी दहशत है जो मरकज़ी दहशतगर्द अमित शाह के इशारे पर इंसानों का शिकार और उनके सर क़लम करती है।  और रोड पर लिटा कर तलवारों लाठियों से मुस्लिम बच्चो को पीट पीट कर वन्दे ......... और भारत .......... की जय जैसे दहशतगर्दाना नारे लगाने पर मजबूर करती है।  इतना ही नहीं उनको पीट पीट के हलाक भी कर देती है।    यह बात आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ है की किसान अपने हदफ़ पर पुर अमन तरीक़े  से बढ़ रहे थे, इतना ही नहीं अवाम का भरपूर ताऊन उनको मिल रहा था, कही फूल बरसाए जा रहे थे कहीं हौसला अफ़ज़ाई की जा रही थी. लेकिन दहशतगर्द हमलों ने हालात को  पेचीदा कर दिया। असल मुजरिम इन्तेज़ामियाँ और पुलिस है. 

नाज़रीन ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर ख़ास लँगूरनियाँ बरहना हो कर अपने ज़ाती आज़ा दिखा कर ख़ुद अपनी इज़्ज़त आबरू नीलाम कर रही हैं और पोशीदा ख़ाकी पैरहन को दिखा कर उसकी नुमाइश करवा कर अपनी बदनामी।   इन ज़हन फरोश लँगूरनियों को ३०० पुलिस वालों के ज़ख्म तो दिख गए लेकिन कितने किसान ज़ख़्मी हुए उसका कोई हिसाब किताब नहीं है।  पुलिस की गोली में कुछ किसानों के जहांबाक होने की भी ख़बरें हैं।   फिर ऐसे हालात पुलिस ने पैदा किये थे काहे को शदीद लाठी चार्ज किया  गया, काहे को गोलियां चलाई।  फिर इन पुलिस वालों की गोलियां सिर्फ मज़लूम अपने हक़ के लिए जद्दो जेहद करने वाले अफ़राद के ऊपर ही क्यों बरसती हैं। यही पुलिस दिल्ली में २०२० में हुए हिन्दू दहशतगर्द हमले में काहे को एक कमज़ोर ज़नख़ों की मानिंद बर्ताव करती हुई दिख रही थी।  अगर वक़्त पर दिल्ली पुलिस ने हिन्दू दहशतगर्दों को गोलिओं से भून डाला होता तो उस वक़्त १५० मज़लूम लाशें नहीं गिरती, और ना ही मस्जिदें, मज़ारात की बेहुरमती होती और ना ही क़ुरआन जलाये जाते।  

यही पुलिस अगर बग़ैर किसी तास्सुब के काम करती तो मनसौर में मस्जिद के ऊपर भगवा फहराने वाले और बवाल करने वाले हिन्दू दहशतगर्दों में से १०-१२ को गोली मार के हलाक कर देना था।  क्योंकि वोह बग़ैर किसी उज्र और जाइज़ मांग के बेजा बवाल कर रहे थे। 

किसानों के एहतेजाज पर तमाम लँगूरनियाँ अपने ज़ईफ़ आशिक़ की बेइज़्ज़त्ती पर आग बबूला हो रहीं हैं, जैसे की इनको कामख्या मंदिर में जा कर अपने ज़ाती आज़ा की नुमाइश करने की इजाजात नहीं मिली है। लेकिन में उन तमाम लँगूरनिओं से पूछना चाहता हूँ जो अपने ज़ईफ़ कमज़ोर, जनखे आशिक़ की जी हूज़ूरी कर रहीं हैं क्या कभी उन्होंने किसानों की बात को इतनी ही शिद्दत और साफ़ दिल से अपने आशिक़ के रू बरू रखने की हिम्मत की थी।   अगर तानाशाह ज़ुल्म नहीं करता तो हालात इतने पेचीदा होते ही ना।   

एहतेजाज इसीलिए तो किया गया था की ज़ुल्म हो ही ना।  जब तुम ज़ुल्म करोगे तो एहतेजाज के लिए भी तैयार रहो।  

बरहाल जो कुछ भी हुआ उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हुकूमत का तानाशाही और अड़ियल रुख़ ज़िम्मेदार है जो जमुहुरित के लिए ज़हर है।    और यह जंग लम्बी चलने वाली है, और यह जंग अपने हक़ और इन्साफ की मांग को ले कर है ना की इक़्तेदार के लिए की जा रही जंग है।   जबकी इक़्तेदार के लिए इस जंग की शुरूवात तो लँगूरनियों ने २०१९ के इंतेखाब ख़त्म होने बाद तास्सुरात में और नताइज के वक़्त ही कर दी थी।   इंतेखाब ख़त्म होने के बाद किस तंज़ीम को कितनी सीटें मिलेगी हर उस प्रोग्राम को जंग का नाम देना फिर राहुल को घोड़े पर सवार तलवार भाला हाथ में लिए दुसरे घोड़े पर तानाशाह ज़न्खा कमज़ोर आदमी लँगूरनियों का आशिक़ उसके भी हाथ में तलवार भाला और वोह गधे पर सवार।  नताइज के वक़्त जब बीजेपी का कोई भी नुमाइंदा जीतता और मुख़ालफ़ीनों का हारता तो क्या बोला जाता था दुश्मन का एक और फौजी ख़तम।  फिर जो मरहला पहले कांग्रेस, सपा, बसपा या और किसी सियासी तंज़ीम के हाथ में था उसको बीजेपी ने जीता तो क्या बोला जाता था दुशमन का एक और क़िला फतह किया।  तो वतन के मुख़ालफ़ीनों के खिलाफ ज़हर तो लँगूरनिओं ने भरा था।      

आज किसानों के हाथ में भाले और तलवार देख कर लँगूरनियाँ बवाल मचा रहीं हैं उन्होंने तो २०१९ में ही तलवार भाले से जंग की शुरूवात कर दी थी।   बाक़ायदा जंगी टोपी पहने हुए दोनों सिपहसालार फिर अब इतना बवाल मचाना इस बात की दलील दे रहा है की इन लँगूरनियों को कमज़ोर आदमी ज़न्खे से जो खुशी चाहिए थी वोह नहीं मिली और वोह अपनी जिस्मानी और जिन्सी ख़्वाहिशों को मुत्मइन नहीं कर पाई।   तो जब किसानों का जूनून और जोश देखा तो जिस्म की दर्जे हरारत गर्मजोश हो गई अब चाहती हैं की किसानों को ब्लैकमेल कर के उनके साथ थोड़े से बदकारी कर ली जाए।   

पिछले ५ सालों से कोविद -१९ वबा के आने तक तमाम दुनियाँ में मारा मारा फिरा जुनूनी आदमी लेकिन जब किसी भी मुल्क ने कुछ भी ख़याल ना किया ना तिजारत में और ना ही हथियारों की फ़राहम करने में तो आ गया अपनी औक़ात पर अब बात करता है आत्मनिर्भर भारत बनायेगें।  लेकिन कैसे, ऐसे बनाओगे आत्मनिर्भर भारत, जो किसानों का हक़ मार कर ताजिरों को दे, जो लँगूरनियों को अपने पती से अलग कर के बरहना हो कर ज़हन फरोशी के दलदल में धकेल दे।   ऐसा आत्मनिर्भर भारत आपको ही मुबारक हमें हमारा दूसरों पर निर्भर भारत दे दो जहँ ६५ रूपये पेट्रोल था और ५०  रूपये डीज़ल।  जहाँ बकरे का गोश्त ३५० रूपये और गाये बैल का ८० रूपये, जहाँ मुर्गी का गोश्त १२० रूपये और साग भाजी २० रूपये।  जहां दाल दलीय ८० रूपये चावल गेहूं २५ रूपये।     

भारत के हर उस अवाम से गुज़ारिश है, जो हक़ और इन्साफ की इस जंग में हक़ के साथ है इन्साफ का साथ देना चाहता है जिसके साथ हक़तल्फ़ी हुई जिसका हुकूमत की गफलत और गैर ज़रूरी फैसलों से कुछ भी बूरा हुआ वोह किसानों का साथ दें।  

में तो किसानों के साथ हूँ क्या आप हैं।  

Tuesday, 26 January 2021

लाल क़िला हुआ आज़ाद आगे भारत की बारी है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

साल २०२१ वैसे तो मोदी, भारतीय जनखा पार्टी और शिद्दत पसंद हिन्दू समाज के लिए सख़्त दिन ले कर आया था, जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने एकम जनवरी को ही कर दिया था।   उसके ऊपर मोदी महाराज की हठधर्मी और हिटलर शाही मज़ीद हालात को पेचीदा करती चली गई।   लेकिन इस बार मुक़ाबला कमज़ोर मुस्लिम सामाज से नहीं था बल्कि बहादुर किसानों से था जो ज़मीन का सीना चीर कर अपनी मर्ज़ी का बीज बोना जानते हैं तो हुकूमत के फैसले को कैसे तब्दील नहीं कर सकते।  जो किसान रिज़्क़ रोटी उगाना जानते हैं वोह वक़्त पड़ने पर उनके हाथ से रोटी छीनने वाले के हाथ काटना भी जानतें हैं।  और यही भारत का इतिहास भी है, जब जब किसी ज़ालिम दुष्ट दरिंदे ने किसानों के हाथों से रोटी या उनकी ज़मीन छीनने की कोशिश की है उन्होंने अपने हालों को पिघला कर तलवार बनाई और ज़ालिम का मुक़ाबला किया है।    

नाज़रीन जब किसान एहतेजाज अपने ऊरूज पर पहुंचा भी नहीं था और मोदी इन्तेज़ामियाँ गफलत में थी और किसानों ने तमाम टोल प्लाज़ा फ्री कर दिए थे तभी इस सहाफी ने बोला था की हुकूमत चलाने की ज़िम्मेदारी किसानों को देना चाहिए।   अभी तो एहतेजाज है और तमाम टोल फ्री कर दिए गए।   अब लाल क़िला गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद हुआ।   जल्द ही किसानों को उस ताजिर से क़िले को अपने क़ब्ज़े में ले लेना चाहिए जिसको मोदी इन्तेज़ामियाँ ने दो साल पहले फ़रोख़्त कर दिया था।  

किसानों को एक एक ज़ुल्म का बदला लेना होगा जो इन लोगों ने अवाम पर किये हैं। हर ना इंसाफ़ी, बेजा क़त्ल, मस्तूरातों के साथ ज़िना बिल जब्र और गिरोह गरदाना ज़िना तमाम ज़ुल्म का बदला लेना होगा हर ज़ालिम को अपना हिसाब देना होगा।   

इतना तो ते है अब बात महज़ बिल के वापिस लेने या ख़तम करने तक महदूत नहीं रह गई।   अब तो बात हुकूमत से मोदी को दस्तबरदार करने की आ गई है।   और जल्द कुछ बड़ी बड़ी बातें होने जा रहीं हैं।  

में सहाफी जुबेर तमाम जर्राह, तबीबों, शिफा खाने में काम करने वाली नर्सों, इंजीनयरों से गुज़ारिश करूँगा की दिल्ली की जानिब अपना रुख़ करें।  ख़ास जर्राह और नर्सों की सख़्त ज़रुरत पड़ने वाली है।   अपने ज़ख़्मी भाइयों का शिफा खाने में इलाज करना होगा।   ये जंग किसी ख़ास मज़हब या सियासी नुमाइंदे की नहीं है।  बल्कि यह जंग हर उस हिन्दुस्तानी की है जो अपने हक़ के लिए इन ज़ालिमों से लड़ रहा है।  हर उस भाई की है जिसकी बेहेन की आबरू इन ज़ाफ़रानी संघी और बीजेपी वालों ने लूट ली।   हर उस इंसान की है जिसके साथ हक़तल्फ़ी हुई।   हर उस ताजिर की है जिसकी तिजारत हुकूमत के बेतुके और बेहूदा फैसलों की वजह से बर्बाद हो गई।   हर उस इंसान की है जिसकी माश को अडानी और अम्बानी जैसे अजगरों ने निगल लिया।   

हर उस सरकारी ओहदेदार की है जिसकी कंपनी सरकार ने निजी हाथों में दे कर उसको बेरोज़गार कर दिया।   आज हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम तमाम असासे और सरमाये निजी हाथों (अडानी, अम्बानी) की कठपुतलियां हैं।  

अगर इस वक़्त आप खामोश रहे और किसानों का साथ नहीं दिया तो आपको मौत की आगोश में जाने से कोई नहीं रोक सकता।  मोदी इन्तेज़ामियाँ तो खुद अपने वतन के अवाम को गोली मारती है, फौजियों की लाशों पर सियासत करती है।   उसके कारिंदे और बीजेपी वाले भारत के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बात करतें हैं, बम धमाका करने की बात करतें हैं।  

सोचो, बोहोत देर हो जाए और आपके हाथ सिर्फ पछताने के सिवा कुछ ना रहे तो अच्छा है किसानों का साथ दो।  यह सुनहरा मौक़ा है, इसे हाथ से ना जाने दो।  

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26 January Happy Republic Farmer’s Day 

दीफाई फौजों ने मार गिराया दुश्मन का एक और हेलीकाप्टर। इस महीने का ३सरा

अज़ीज़ नाज़रीन,

ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के खिलाफ जंग में दीफाई फौजों को हर दुसरे रोज़ बड़ी बड़ी कामयाबी मिल रही है।   इस ज़िम्न में एक और कामयाबी हाथ लगी है।  जब ज़ाफ़रानी दहशत जश्न में डूब कर गालिफ़ हो गई तभी २५ जनवरी देर शाम दीफाई फौजों ने दहशतगर्दों का एक हेलीकाप्टर मार गिराया है।   इस हमले में दहशतगर्दों का एक पाइलट मौत की आगोश में चला गया और दूसरा शदीद ज़ख़्मी हालत में शिफा खाने में मौत और ज़िन्दगी के बीच झूल रहा है।  ज़ख़्मी दहशतगर्द बेहोश है और वोह वेंटिलेटर पर है।   जर्राह और तबीबों को खदशा है की कही दहशतगर्द सालों के लिए कोमा में नहीं चला जाए।  अगर ऐसा होता है तो वह महज़ एक ज़िंदा लाश से कुछ कम ना होगा। 

ज़ाराये से मालूम हुआ है की ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों का हेलिकॉप्टर ध्रुव पाकिस्तान के इलाक़े जम्मू में कठुआ जिले के लखनपुर में जम्मू-कश्मीर जो अब पाकिस्तानी हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम है से लगी पंजाब की सरहद से दरअंदाज़ी कर रहा था।  पाकिस्तानी राडार सिस्टम ने जम्मू कश्मीर की हवा को क़ैद कर रखा है फ़ौरन इत्तेला दी और उस दरअंदाज़ दहशत को मार गिराया गया। 

नाज़रीन इस महीने का यह तीसरा फौजी तय्यारा दीफाई फौजों ने मार गिराया है।  इससे क़ब्ल ६ जनवरी के आस पास MIG 21 Bison Aircraft राजस्थान के सूरतगढ़ की जानिब से दहशतगर्दों ने पाकिस्तानी सरहद में दरअंदाज़ी करने की हिमाक़त और जुर्रत की थी।  दुश्मन के दरअंदाज़ी की इत्तेला राडार ने दी और हवा जो क़ैद थी फ़ौरन दुशमना  का तय्यारा मार गिराया गया।   इस हमले में दुशमन का पायलट पहले ही जान बचा कर भाग गया था और कोक पिट से खुद को मेहफ़ूज़ निकाल लिया था।   नाज़रीन MIG 21 Bison Aircraft रूस में बना जदीद तरीन और सबसे ज़्यादा मेहफ़ूज़ फौजी तय्यारा तस्सवुर किया जाता है।  उसके एक रोज़ बाद दौरान मश्क़ एक दहशतगर्दों के एक पायलट को जोधपुर के नज़दीक खलीज में दबोच डाला था।  

सहाफी जुबेर का नुक़्ता ऐ नज़र

नाज़रीन ज़ाफ़रानी हुकूमत के मौजूदा हालात सबक़ हैं उन तमाम सरकश, मग़रूर हठधर्मियों के लिए जो अपनी फौज पर पुर एतेमाद थे और बड़ी बड़ी बातें करते नहीं थकते थे।  जो अपने क़वी रक़बे के ऊपर ग़ुरूर और तकब्बुर कर बैठे थे, जो अपनी आबादी की हैसियत दिखा कर बोलते थे की अगर तमाम १३० करोड़ हिन्द की आबादी सरहद पर जा कर पेशाब कर दे तो पाकिस्तानी बह जायेगें और पाकिस्तान का नाम आलमी नक़्शे से साफ़ हो जाएगा।   जो अपनी ज़हानत और ग़ुरूर करते थे और सदा पाकिस्तान को एक हक़ीर जानकार उसका मनफ़ी अक्स अपने अवाम के सामने पेश करते थे।  लेकिन वोह तमाम ज़ाफ़रानी यह भूल गए थे की ज़हानत किसी के घर की भबूती नहीं है।  जो ज़हन ऊपर वाला किसी को देता है वोह उस ज़हानत पर तकब्बुर करने और उसका बेजा इस्तेमाल करने पर छीन भी सकता है।   दूसरी बात भारत का अवाम कितना ज़हीन है वोह तो उसने ज़ाफ़रानी हुकूमत के अब तक के सबसे ज़्यादा ज़ालिम, गद्दार, मुखलीफ़े वतन, मुखलीफ़े अमन, मुखलीफ़े काश्तकार, मुखलीफ़े गरीब, मुख़ालिफे मस्तूरात, मुखलीफ़े अक़लियत को २०१९ में फिर से मुंतखिब कर के सबूत दे दिया।   वहीँ पाकिस्तान के अवाम ने हाफिज सईद और इमरान खान में से ज़हीन तालीमी आफ़ता अपने वतन की अवाम के लिए फलाही कामों को करने वाले को मुंतखिब किया। नतीजा सामने है।  आज जो इज़्ज़त आलमी सतह पर किसी वक़्त भारत की थी वोह पाकिस्तान पा रहा है और जो ज़िल्लत, रूस्वाई कभी पाकिस्तान की थी वोह भारत पा रहा है।

नाज़रीन एक बात वाज़े है जिस मुस्लिम अवाम को तमाम ज़ाफ़रानी पानी पी पी कर कोसते रहतें हैं, वही हर दम भारत की बक़ा के लिए आगे आतें हैं।

१९६५ में जंग के बाद जब भारत माशी हालात से बेहद कमज़ोर हो गया था तब निज़ाम हैदराबाद ने ५००० किलो सोना से भारत को इमदाद की थी।   वहीँ इस जंग में और करोना में भारत के बड़े बड़े गुज्जु ताजिर अपनी तिजोरियां भरने में लगे रहे, अगर कोई आगे आया तो मुस्लिम जिन्होंने बढ़ चढ़ कर भारत को माशी इमदाद की थी।  जिसमे ख़ास नाम हैं सिप्ला, विप्रो, फ़ाइज़र वहीँ अडानी अम्बानी जालसाज़ी कर के भारत के किसानों की ज़मीन हड़पने में लगे हुए थे।  और भारत के असासे ट्रैन, एयरपोर्ट खरीद लिए।   

इतना सब रुस्वा और ज़लील होने के बाद भी ज़ाफ़रानी ज़हर अपने हथकंडे और अवाम के दिलों दिमाग़ में मुस्लिम अवाम के लिए आलूद और ग़ुबार भरे बग़ैर बाज़ नहीं आता है। हर इन्तेख़ाब में बग़ैर मुस्लिम, मुग़ल, ओवेसी, पाकिस्तान का नाम लिए इनकी जीत मुमकिन ही नहीं है।  उससे साबित हो रहा है की यह ज़ाफ़रानी महज़ हाकिम बने रहना चाहतें हैं इनको वतन से ना मोहब्बत थी और ना ही कभी इन्होने अवाम के लिए फलाही कामों को तर्जी दी।  

२०१८ के हैदराबाद के इन्तेख़ाब में एक ज़ाफ़रानी शैतान वेलु बिल्जी हैदराबाद में ज़हर अंगेशी करता है "मित्रों में आपको यक़ीन दिलाता हूँ, अगर ज़ाफ़रानी पार्टी इक़्तेदार में आई, तो ओवेसे बंधुओं को ऐसे ही ह्यदेरबाद से भागना पड़ेगा जैसे की निज़ाम भागे थे" झूट की कोई हद होती है।  उसके बाद बल्दिया में दूसरा बोलता है सर्जिकल स्ट्राइक करेगें।  मतलब अपने ही वतन के अवाम को गोली मरोगे, तुम हमें गोली मारोगे, हमारी नस्ले बर्बाद करोगे, फिर तवक़्क़ो करते हो की तुमसे और तुम्हारी तंज़ीम से तुम्हारे वतन से हम मोहब्बत करेगें।   तीसरा बोलता है ३०% पाकिस्तानी और रोहंगिया हैं।  

Monday, 25 January 2021

जनखा डर गया, भोग (खो, गुफा) में घुस गया, भारत ख़ौफ़ज़दा है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज दो मुद्दों को ले कर आप हज़रात के सामने हाज़िर हुआ हूँ।  दोनों ही मुद्दे हर हक़ पसंद इन्साफ की बात करने वालों को सुकून फ़राहम करेगें।  और दोनों ही मुद्दों में हर ईमान वाले की जीत नज़र आ रही है।

पहला मुद्दा

यह मुद्दा बड़े बड़े बोल से मुनसलिक है, जिसको बोलने के लिए और ग़ुरूर-तकब्बुर करने के लिए मालिके कायनात ने सख़्त मनाही की है।  ऐसा कहतें हैं जो जितना बड़ा बड़ा बोल बोलता है बारी इलाहा उसको उतना ही पस्ती में ग़र्क़ाब करता है।  काफिर शिद्दत पसंदों, संघी दहशतगर्दों, मीडिया के लंगूर-लँगूरनियों  और भातरीय जनखा पार्टी के वज़ीरों, नुमाइंदों और कारकूनों के पाकिस्तान, इस्लाम और मुसलमानों की निस्बत से बड़े बड़े बोल हर बार उनके सामने ही आतें हैं।  हर वक़्त यह काफिर शिद्दत पसंद, लंगूर-लँगूरनियाँ रूसवा ज़लील और बेइज़्ज़त होतें हैं।  हर बार इनको ज़बरदस्त तरीक़े से धो डाला जाता है फिर भी अपनी हरामकारी से बाज़ नहीं आते हैं।  कुत्ते की दुम की तरह, टेड़ी ही रहती है।  

२०१४ से पेश्तर और उसके बाद अभी तक इन काफिर शिद्दत पसंदों, बीजेपी वालों, लंगूर-लँगूरनियों की हर उस मुद्दे पर रूस्वाई हुई है जिसमे की वोह पाकिस्तान, इस्लाम या मुस्लिम क़ौम को जोड़ देतें थे।  चाहे वोह बाबरी मुद्दा हो, चाहे वोह गौ हत्या हो, चाहे वोह गौ तस्करी हो, चाहे वोह पाकिस्तान के मुजाहिद की सादगी पर मज़ाक़ करने, चाहे वोह पाकिस्तान को भिकारी, मुफ़लिस, और इमरान को कटोरा बाज़ बोल कर मखौल उड़ाने की बात हो, चाहे वोह लव जिहाद हो, चाहे वह तब्लीग़ी जमात हो, चाहे वह उस हर्राफ़ नर्स का झूठा बयान हो, की पेंट उतार दी, मेरे सामने थूक लगाया, गंदे गंदे इशारे (मस्टरबेशन) किया, मास मदिरा मांगी।  अब इन काफिर शिद्दत पसंदों का तमाम झूट फरेब साजिश बेनाकाब हो चुकी है। 

२००२ में गोधरा ट्रैन आतिश से ले कर पठानकोट, और उरी से कर पुलवामा तमाम जगह बस ज़ाफ़रानी शिद्दत ही नज़र आ रही है।  इस ज़िम्न में एक और रूस्वाई इन ज़ालिमों के सर चढ़ कर बोलने लगी है।

नाज़रीन जिस पाकिस्तान को सदा भिकारी बोलते थे आज उससे भी बत्तरीन हालात भारत के हैं, और वही पाकिस्तान आज तमाम आलम में भारत से आगे निकल रहा है।  और जिस इमरान की सादगी का मज़ाक़ बनाते थे फिर वही चीज़ मोदी पर भी लागू हुई।   और मोदी को तो कोई भी मुल्क अपने होटल में रुकने ही नहीं देते थे, वोह एयरपोर्ट पर ही हग लेता था और नहा धो कर वही से सेर सपाटे को निकल जाता था।  इस मुद्दे पर अंग्रेज़ी में एक मज़मून लिखा है। 

अब असल मुद्दे पर आतें हैं।  भारत ने अपने ही मुल्क पर पुलवामा का हमला किया और इलज़ाम पाकिस्तान के ऊपर लगा दिया।   फिर नाकाम सर्जिकल स्ट्राइक की, जिसमे भारत के दो फौजी तय्यारे पाकिस्तान ने तबाह कर दिए और एक पाइलेट अभिनन्दन को गिरफ्तार कर लिया।

अब यहाँ पर भारत के शिद्दत पसंद काफिरों, बीजेपी वालों और लंगूर-लँगूरनियों से पूछना चाहता हूँ।  १.  अगर जैसा अभिनन्दन के साथ हुआ वैसा ही हाल अगर भारत में होता तो क्या तमाम हमदर्दी लंगूर-लँगूरनियों की शिद्दत पसंद काफिरों और बीजेपी वालों की उस पाकिस्तानी फौजी के साथ होती, क्या उसको भारतीय दरिंदा, ज़ालिम, क़साई, दहशतगर्द आदमख़ोर (इंसान का मास ख़ाने और खून पीने वाले) समाज मौत के घाट नहीं उतार देता।  जब भारत के खुद के अवाम को सिर्फ मज़हब और ज़ात की वजह से मौत नसीब होती है तो क्या उस पाकिस्तानी के साथ भी वही नहीं होता जो मुस्लिम, दलित और सिख अवाम के साथ हो रहा है। २. फिर जब पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म इमरान खान ने दरियादिली दिखाई और भारत के ज़ाफ़रानी हाकिमों की तमाम हरामख़ोरी, बदबख़्ती, नपुंसकता को नज़रअंदाज़ करते हुए जंग के ख़तरात को फ़ौत किया और अभिनन्दन को वापिस भारत को सौंप दिया, तब लंगूर-लँगूरनियों और शिद्दत पसंद काफिरों संघी दहशतगर्दों बीजेपी वालों के क्या तास्सुरात थे।  डर गया पाकिस्तान, ख़ौफ़ज़दा हैं इमरान, मोदी का ख़ौफ़ पाकिस्तान की फौज पर हावी रहा।

अब तक़रीबन वही हालात भारत के साथ बने हैं, जब ९ जनवरी को भारत ने चीन के इलाक़े लद्दाख़ में दरअंदाज़ी (घुसपैठ) करते हुए चुशुल सेक्टर में गुरूंग हिल के पास से एक चीनी फौजी को अगवाह कर लिया था।  चीन ने लगाईं सख़्त लताड़, और अपनी फौजें चीन के इलाक़े अरुणाचल से भारत की सरहद पर लगा दी, फिर क्या था ख़ौफ़ इतना बढ़ गया, बग़ैर किसी शर्त के वापिस करना पड़ा चीनी ब्रेव हार्ट फौजी को, अब इस क़िस्म की बेइज़्ज़ती को कोई भी मीडिया मोदी की बेइज़्ज़ती नहीं बताएगा या भारत ख़ौफ़ज़दा  है नहीं बोलेगा, बल्कि इसको बोला जा रहा है भारत ने दिखाई दरिया दिली, बड़ा दिल कर के वापिस किया चीनी फौजी।  अरे क्या बकवास है, और इसी को कहतें हैं मुँह से हगना और पीछे से खाना या थूक कर चाट जाना।  मोदी भक्त लंगूर और लँगूरनियाँ हर मुद्दे पर ऐसा ही कर रहें हैं।  जब भारतीय फौज दुनियां की सबसे ताक़तवर फौजों में चौथे नंबर पर है, भारत के पास जदीद हथियारों की भरमार है, जो भारत के सियसतदाँ बीजेपी वाले, संघी, शिद्दत पसंद काफिर, मीडिया के लंगूर-लँगूरनियाँ चीन को धमकी देते नहीं थकते अब भारत १९६१-६२ वाला नहीं है तो फिर इस क़िस्म की दरियादिली को ख़ौफ़ नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा।  फिर इस क़िस्म की दरिया दिली की कोई माक़ूल वजह होना चाहिए।  चीन ने आज लद्दाख़, अरुणाचल, नागालैंड, सिक्किम पर क़ब्ज़ा कर रखा है और साहब हैं की दरियादिली दिखा रहें हैं।   सीन क्या है बोस, कही ख़ौफ़ तो तारी नहीं है तुम पर जो तुम पाकिस्तान के लिए झूट फरेब फैलाते थे।  फिर अभिनन्दन पकिस्तान के मुजाहिदे अज़ाम ने छोड़ा तो वोह दरियादिली नहीं थी, बुज़दिली थी, मोदी से डर गए इमरान, पाकिस्तान घबरा रहा है अब वही बात चीन के साथ है तो दरियादिली है।   मोदी पिछवाड़े से छोड़ेगा तो भी लंगूर लँगूरनियाँ, भक्त बोलेगें हूँ......... क्या खुसबू है।  

दूसरा मुद्दा

पाकिस्तानी रण बांकुरों जांबाज़ फौजों ने एक भारतीय दहशतगर्द और दरअंदाज़ को मौत के घाट उतार दिया है।  यह संघी दरअंदाज़ निशांत शर्मा ४ रोज़ क़ब्ल सरहद से पाकिस्तान के अख़नूर सेक्टर में ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से दाख़िल होने की कोशिश में था।   फ़ौरन पाकिस्तानी जांबाज़ हरकत में आये और उसको उसके ही खून से निलहा दिया।  उस दहशतगर्द को भारतीय साथी ज़ख़्मी हालत में तिब्बी इमदाद फ़राहम करने के लिए उधमपुर के कमाल शिफ़ा ख़ाने ले गए, जहाँ दौरान इलाज वोह पाकिस्तानी ज़ख्मों की ताप नहीं सेह सका और ज़न्खा बरोज़ इतवार मौत की आग़ोश में चला गया।  संघी दहशतगर्द निशांत शर्मा भारत के ज़ेरे इंतज़ाम सूबे उत्तर प्रदेश के सहारंगपुर का रहने वाला बताया जाता है। जैसे ही उसको पाकिस्तान ने मौत के घाट उतार दिया है यह खबर सहारंगपुर पहुंची उसके एहले ख़ाना में मातम मच गया।   रोना पीटना और छाती कूटना शुरू हो गया।  

संघी दहशत को फ़रोग़ देने वाले निशांत शर्मा के बाप का नाम जोगेंद्र शर्मा है जिसके तीन बेटों में से दो निशांत शर्मा (पाकिस्तान ने मौत के घाट उतारा गया) और शुभम शर्मा संघी दहशत को फ़रोग़ देतें हैं।  निशांत शर्मा की जम्मू में तैनाती थी और उस ने पाकिस्तान को हक़ीर जान कर उसकी जानिब लाल आँख दिखाने, गन्दी नियत से उसकी सरज़मीं अख़नूर सेक्टर में दरअंदाज़ी करने की गलती और जुर्रत कर बैठा सो नतीजा भोगा और हो गया जहन्नुम रसीद।  संघी बाप का अब बचा है दूसरा बेटा शुभम शर्मा जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले सूबे उत्तर प्रदेश की सरहद से लगे मेरठ में तैनात है। 

शुरू हुई भिखारियों को भीक देने की क़ावायत

संघी दहशतगर्द को पाकिस्तान ने खून से लाल कर के मौत के घाट उतार देने के बाद शुरू हुई भीक बांटने की क़वायत।   जिस हिकमते अमली के लिए यह संघी फौज में जातें हैं, ताके हर चीज़ इनको भीक में मिल जाए और ज़िन्दगी भर एक परभक्षी के जैसे सस्ती चीज़ों पर ज़िंदा रहें।   भारत के ज़ेरे इंतज़ाम सूबे उत्तर प्रदेश के वज़ीरे दहशत ने मौत के घाट उतारे गए दहशतगर्द के एहले ख़ाना में से एक फर्द को ज़ाफ़रानी दहशत में शामिल करने का एलान करने के साथ साथ ५० लाख की भीख उसकी अगर बीवी है तो उसको नहीं तो उसके किसी क़रीबी रिश्तेदार को देने का एलान किया है।  

वज़ीरे दहशत ने ज़िल्हे के किसी गली या नुक्कड़ को उसका नाम दिया जाएगा ऐसा भी एलान किया है।  अब देखने वाली बात यही दिलचस्प होगी की मारे गए दहशतगर्द की लुगाई या एहले ख़ाना की औरतें कही उसी गली या नुक्कड़ में बैठ कर धंधा शुरू नहीं कर दें।  क्योंकी उसका ख़सम या सगे वाला तो रज़ाई में सोने के क़ाबिल भी नहीं बचा बल्कि मौत की आग़ोश में चला गया है।

Saturday, 23 January 2021

एक और क़िसास (बदला) हुआ पूरा।

अज़ीज़ नाज़रीन

एक और मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये, एक के बाद एक क़िसास लिए जा रहें हैं।   इस बार २०१६ में झारखंड के रांची में ३५ साला मोहम्मद मज़लूम और उनके नाबालिग़ भतीजे १५ साला आज़ाद ख़ान उर्फ़ इब्राहीम को बेदर्दी से पीट पीट कर फ़ासी पर लटका दिया था।  दहशतगर्दों ने इतनी बेदर्दी से उनको शहीद किया था की जांच पर आये पुलिस वालों की भी रूह कांप गई थी।   और तहक़ीक़ात करने वाले अफसर ने बोला था लगता है मक़तूलों को बेहद बेरहमी से मुँह के अंदर कपड़ा ठूस कर तमाम दांत तोड़ कर मारा है और क़ातिल के अंदाज़े क़त्ल से लग रहा है की वोह बेहद वेहशाना और दरिंदा सिफ़त और मक़तूलों से बेहद नफरत करने वाला होगा। 

झारखंड तब भारतीय जनखा पार्टी के ज़ेरे मत्तेहत था, सो क़िसास भी ऐसे सूबे से लेना था जो बेहद वेहशाना, दरिंदा सिफ़त, क़साई, जल्लाद और दहशतगर्द की ज़ेरे सरपरस्ती में काम करता होगा उस क़िसास के लिए उत्तर प्रदेश बिलकुल माक़ूल लगा। जहाँ आज सुब बरोज़ सनीचर को फरुखाबाद के अमृतपुर ज़ेरे निगरानी थाना में दो चचेरे भाइयों की लाशें पेड़ पर मशकूक हालात में फ़ासी के फंदे से लटकी हुई पाई गई।   इब्तेदाई मरहले की तहक़ीक़ात में पुलिस इस को खुदकशी मान कर ही चल रही है लेकिन मक़तूलों के अहले ख़ाना का कहना है की यह क़त्ल की वारदात है। 

फ़ासी देने की पहली खबर मिलते ही पुलिस मौक़ा ऐ फ़ासी पर पहुंची और लाशों को फ़ासी के फंदे से उतार कर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया।   जहाँ जर्राह ने लाशों का मोयना किया और दोनों के मूर्दा होने की तस्दीक़ के साथ दोनों की मौत का एलान किया। 

दरअसल ये मामला अमृतपुर थाना के ज़ेरे निगरानी पिथनापुर गांव का है. यहां १८ साला विनय प्रताप अपने चचाज़ाद भाई १७ साला मंगली के साथ कटरी इलाक़े में वाक़े अपने खेतों में फसलों की निगरानी करने गया था।  खेतों में ही उन दोनों को किसी ने दबोच कर फ़ासी से लटका दिया।  दोनों की लाशें पेड़ पर धोती से लटकती हुई मिली।   

गनीमत यह रहा की दोनों की लाशें सही सलामत थी और किसी क़िस्म की टूट फुट नहीं हुई थी।   उससे ज़ाहिर हो रहा है की दोनों के साथ फ़ासी से पहले किसी क़िस्म की कोई हाथापाई नहीं हुई थी और ना ही किसी ने बेदर्दी से वेहशाना तरीके से फ़ासी दी है।  जिस तरह से हिन्दू दहशतगर्दों ने रांची के मज़लूम और उनके भतीजे इब्राहिम को बेदर्दी से ज़ालिमाना तरीक़े से हाथ पैर तोड़ कर मुँह में कपडा ठूस कर तामाम दांत तोड़ कर फ़ासी पर लटकाया था।  

ख़ैर वजह जो कुछ भी हो अगरचे इनको फ़ासी दी गई है तो भी मौजूदा हुकूमत की तारीफ करना होगी की उसने फ़ासी से पहले झारखंड की कहानी नहीं दुहराई और बेदर्दी से फ़ासी पर नहीं लटकाया और अगर दोनों ने खुदकशी की है तो किस्सा ही खलास होता है।   बरहाल अगर यह मौजूदा हुकूमत की कारगरदेगी है या खुदकशी, दोनों ही सूरतों में क़िसास तो पूरा ही हुआ है।   जिस तरह मासूम नाबालिग़ १५ साला इब्राहीम को फ़ासी दी थी उसका क़िसास १७ साला से पूरा हुआ।  

मुस्लिम मजलिस पाक है: असद, अकबर, आज़म क़ौम के सच्चे रहबर।

अज़ीज़ नाज़रीन,

इन संघी दहशतगर्दों, शिद्दत पसंद काफिरों, बीजेपी वालों, मुनाफ़िक़ों, नो निहाद सेकुलरों और मीडिया के ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों को असदउद्दीन (शेर) और उनकी तंज़ीम मुस्लिम मजलिस इत्तेहाद का इस क़दर ख़ौफ़ तारी हो चूका है की कही भी किसी भी मुद्दे पर मुनाफ़ेक़त की बात आई या किसी सहाफी ने मस्लेहतन इशारों किनायों में अपना मज़मून लिखा के लग गए सभी उसका रूख़ असदउद्दीन और उनकी तंज़ीम मुस्लिम इत्तेहाद की जानिब मोड़ कर अवाम के ज़हन में शक, शुकूक और वस्वसे डालने।  

 

असद के बढ़ते हुए क़द और दबदबे से सभी बे पनाह ख़ौफ़ ज़दा हैं, क्या इक़्तेदार वाली हुकुमरान जमात और क्या मुख़ालिफ़ तंज़ीमें।   अभी हाल ही में ०६ जनवरी २०२१ को इस सहाफी ने एक मज़मून काफ़िरों को मौत देने के बाद क़ौम के गद्दारों की बारी है. लिखा था।   अब मसले को समझे बिना मज़मून किस की जानिब इशारा कर रहा है उसको जाने बिना जाहिल, कम अक़ल, गधे, साधू, दहशतगर्द सभी लग गए एक सूर से सूर मिलाने।  कुछ अहमक़, जाहिलों ने तो यहाँ तक कह दिया की असदउद्दीन की पार्टी की वजह से ही हम इक़्तेदार में मौजूद हैं, उनकी ताक़त और मदद की वजह से ही हम जीतते हैं,  आगे भी वोह हमारी जीत में मदद करेगें।   उस जाहिल की बात से यह ज़ाहिर हो गया की उसकी तंज़ीम में कोई भी ऐसा मर्द नहीं और ना ही किसी में इतनी क़ुव्वत और ताक़त है की वोह अपने बल बूते पर अपनी तंज़ीम को जीत दिलवा सके।  इससे क़ब्ल एक और जाहिल दहशतगर्द बोला था, इलाक़ा तेरा धमाका मेरा, दूसरा बोला था हैदराबाद में सर्जिकल स्ट्राइक करेगें।   

अब जिस तंज़ीम में इतनी ताक़त नहीं और जिसमे एक भी ऐसा मर्द नहीं जो अपनी तंज़ीम को अपने बल पर जीतवा सके बरक्स अपनी तंज़ीम को दुसरे ताक़तवर और क़ुव्वत वाले मर्द के पास भेज कर उसके बल बूते पर विकास पैदा करने की आरज़ू रखतें हों तो ऐसी तंज़ीम आपको क्या दे सकेगी जो अपने खुद के विकास के लिए कभी पाकिस्तान, कभी मुस्लिम, कभी असदुद्दीन, कभी लव जिहाद, कभी बाबरी कभी मुग़ल कभी अकबर कभी हिन्दू अक़लियत हो जायेगें ऐसी बातों पर डिपेंड हो।  नामर्द।  इतना ही नहीं इक़्तेदार और जीत के लिए यह लोग अवाम, फौज, जमहूरियत सबका क़त्ले आम कर डालतें हैं जिसका ज़िक्र कई एक मज़मूनों में किया जा चूका है।  दहशतगर्दाना बम धमाकों से ले कर तो दंगों तक तमाम हदों तक गिर जातें हैं।     

इन लोगों के इस तरह के बायानात और दूसरों पर तोहमत लगा कर अपनी जीत का तस्सव्वुर करना ही यह साबित करता है जिस तरह मरी हुई गाये बैल के गोश्त पर चील कव्वों, गिद्धों और गीदडों की तरह नज़रे होती हैं वही किरदार इनका होता है।   शेर वोह जो अपना शिकार खुद करे ना ही किसी और के भरोसे पर ज़िंदा रहे, और ना ही मुर्दार मरी हुई गाये बैल को खाये।     

नाज़रीन असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मुस्लिम इत्तेहाद की मजलिस से वोह तमाम अफ़राद ख़ौफ़ ज़दा हैं जिनका कुछ ना कुछ खराब होते दिख रहा है।   और वही इलज़ाम तराशी कर रहे हैं असदुद्दीन संघी हैं, मुनाफ़िक़ हैं, मुस्लिम क़ौम के ग़द्दार हैं, मुस्लिम क़ौम की हक़तल्फ़ी करने वाले, मजलिस बी टीम सी टीम वोट कटुआ। 

दर हक़ीक़त यह उनका हद दर्जे का ख़ौफ़ है जो ज़बान पर चढ़ कर बोल रहा है।  यह लोग सोचते होंगे अगर इस शख्स के ख़िलाफ़ बदगुमानी नहीं फैलाई गई तो हमारा वोट बैंक खिसक जाएगा, हमारा यह मफ़ात फेल हो जाएगा, हमें इस जगह नुकसान उठाना पड़ सकता है वग़ैरा।  

आज एक साल से ज़ाइद आज़म ख़ान सियासी नफरत, बदला और हसद के चलते बग़ैर किसी जुर्म के जेल में क़ैद हैं लेकिन ना ही सपा पार्टी के किसी भी ओहदेदार को और ना है सपा के रहबर अखिलेश यादव को उनकी याद आई जबकी आज़म ख़ान ने मुलायम सिंह यादव और सापा के लिए बैलगाड़ी में इन्तेख़ाबी मरहले को मुकम्मल किया था लेकिन आज उनको तनहे तनहा छोड़ दिया और यही बात मेने अपने मज़मूनों में की है।  जब भी बात कुफ्र मुक़ाबिल मुस्लिम आ जाएगी आपको अपना सबसे बड़ा हमदर्द कहलाने वाले भी आपका साथ छोड़ देंगें।   

अब जब असद उद्दीन ओवेसी ने आज़म ख़ान से मिलने के लिए उनका वक़्त माँगा तो तमाम सियासी तंज़ीमें दौड़ने लगी और उनके क़ल्ब की दर्जे हरारत तेज़ हो गई।   अब सपा भी मिलने पहुंची, कांग्रेस भी अपने नुमाइंदों इमरान को ले कर खीर पकाने पहुंची अब सपा धरना देने की बात कर रही है चक्का जाम करने की बात करती है।  मौलाना जोहर अली यूनिवर्सिटी की ज़मीन एक ज़ाफ़रानी दहशतगर्द (साधू) को सोप दी गई लेकिन इन सपाइयों की नींद नहीं खुली और असद ने मिलने का वक़्त माँगा फ़ौरन नींद से बेदार हो गए।  फिर आगे अब दूध और चाशनी टपकायेगे यह नो निहाद सेक्युलर, तो अभी तक कहाँ थे, आज़ाम साहब को एक साल से ज़ाइद सियासी बुग्ज़, और हसद की वजह से जेल कर रखी है और आप असद के पहुंचते ही नींद से बेदार हो गए।  क्या यह दोग़ला रवैया नहीं है। 

यह बात महज़ सियसत तक महदूत नहीं है जिसका ज़िक्र मेने अपने कई मज़मूनों में किया है, बल्कि हाउसिंग सोसाइटी से ले कर ऑफिस में काम करने तक हर अफ़राद ने इस ज़हर को पीया होगा।  ऑफिस में जो आपके अहबाब और सबसे क़रीबी दोस्त होंगे हर मुद्दे पर आपके शाना बा शाना खड़े होतें होंगे अगर आपके और एम्प्लायर के दरमियान कुछ कशीदगी हो गई भले ही आप हक़ पर होंगे लेकिन आपके तमाम अहबाब आपको तनहे तनहा छोड़ कर एम्प्लायर की ना इंसाफ़ी, हक़तल्फ़ी को ही दुरुस्त बतायेगें।   जबकि अक्सरियत तबक़े के साथ ऐसा कुछ होगा तो तमाम एक सूर से सूर मिला कर उसको हक़ दिलवाने की बात करेंगें।    

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...