Thursday, 27 October 2022

क्रिकेट का खेल और हक़ीक़ी हालात।

 पाकिस्तान का मतलब क्या

ला इलाहा इल्ललाहा

तोसीह सरहद का मक़सद क्या

क़ानून शरिया नाफ़िज़ कर।

 । सहाफ़ी ज़ुबेर 

अज़ीज़ नाज़रीन,

गुजिश्ता एक हफ्ते जुमा २१ अक्टूबर से काफी मसरूफ रहा, चुनाचे किसी भी मुद्दे पर इज़हारे राये और मज़मून कुशाई नहीं कर सका सिवाए उन मुद्दों के जो उम्मत के लिए एहम थे।  ख़ास पाकिस्तान उसकी सियासत और माज़ी वज़ीरे आज़म मुजाहिद ख़ान साहब से मुताल्लिक़ मुद्दों पर ही मज़मून लिखे थे।बारहाल इस दरमियान पाकिस्तान और भारत के माबेन खेले गए क्रिकेट पर पाकिस्तान की शाकिस्त पर कोई मज़मून ना शाया करने पर अवाम के काफी रूझानात आये और उन्होंने इज़हारे तशवीश मेरी ख़ामोशी पर गुस्से को ज़ाहिर किया। 

नाज़रीन एक बात वाज़े कर देना चाहता हूँ यह सहाफी ना ही डरपोक है और ना ही किसी दहशत से ख़ौफ़ज़दा ख़्वाहा वोह काफिर हो, यहूद हो नसरानी या शैतानी।  बिंदास्त मुंबई और तमाम हिन्द बेरुन मुल्क घूमता अवामी हल्क़े में फिरता हूँ कही कोई ख़तरा नहीं।  अवामी आमदो रफ़्त लेता हूँ ताके कोई संघी यह इलज़ाम ना लगा दे की हम से डर गया या कोई उनका पैरोकार गुलाम मुनाफ़िक़ नो निहाद मुसलमान ऐसा ना बोल दे की बीजेपी का एजेंट है इसलिए इतना बिंदास्त है और इसके ऊपर कोई हिकमत नहीं होती।   

अब असल मुद्दे क्रिकेट मैच पर आतें हैं।  बरोज़ २३ अक्टूबर को खेला गया मैच एक बेईमान मैच बोल कर तारीख़ के सफों में दर्ज हुआ है। और जितना बवाल लंगूरों की टोली ने मचाया था उससे ज़ाहिर हो रहा था सच्चाई वोह नहीं जो दिखाई जा रही है।  वैसे भी ५ का अदद भारत को बोहोत भारी है और जिस रोज़ २३ तारीख को पाकिस्तान से मैच हुआ उस २३ तारीख को ३+२ किया जाए तो अदद ५ आतें हैं फिर उस रोज़ भारत हार गई थी लेकिन बेईमानी साजिश कर के जीत तो गए लेकिन उस जीत के नताइज भारी होने वाले हैं।  कियोंके बईमानी, साजिश, चीट, झूट और फरेब एक हद तक ही चलता है उसके बाद सब कुछ अवाम पर आशकार हो जाता है।  फिर मालिके मुतलक़ तो सब देख रहा है।  इस बईमानी का नेमूल बदल मालिके कायनात पाकिस्तान को बोहोत बेहतर देगा। 

दरअसल हर मोमीन का यह मानना अगर उसके साथ नाइंसाफी हुई उसकी हक़तल्फ़ी हुई और उसमे उसत और ताक़त है तो वोह अपना हक़ छीन ले या नहीं तो अल्लाह तबारक ताला से रूजू करे और उसको बताये की यहाँ हमारे साथ चीटिंग हुई और आप इसका बेहतर सिला देने वाले हैं। कियोंके आप से बेहतर इन्साफ करने वाला और कोई नहीं। फिर ख़ुद काफिरों के माज़ी किस्सों और हालात से ज़ाहिर होता है जिन्होंने चीट कर के जुव्वे में जीत हासिल की उनका क्या हाल हुआ।   कोरवों की अज़ीम फौज थी लेकिन चीटिंग बेईमानी के सबब उनका बेदर्द ख़ात्मा हुआ था।  वही हाल भारत में संघी दहशत का और भारत का होगा।  जिसका ज़िक्र मेने अपने १ अगस्त २०१९ को लिखे मज़मून "गज़वा ऐ हिन्द होगा और ज़रूर होगा" में साफ़ तोर से कर दिया है। 

उस मज़मून में भी क्रिकेट मैच और मुस्लिम हक़तल्फ़ी से मुत्तलीक़ बात को कहा गया है।  दूसरी बात अब मुद्दा क्रिकेट रह ही नहीं गया है अब तो वोह सरहदों की तोहसीह पर आ गया है।  तमाम शुमाल, शुमाली मध्य प्रदेश तक, आसाम, मग़रिबी बंगाल, शुमाली बिहार,  राजिस्थान का हल्क़ा, गुजरात, मग़रिबी साहिली महाराष्ट्र, केरला पाकिस्तान के सरहद तोहसीह का हिस्सा बना दो।  तभी उस बेईमानी का कफ़्फ़ारा पूरा होगा।  

उस चीटिंग और बेईमानी से जीते मैच पर बजाए तनक़ीद करने के और हकबयानी से बात को रखने के हू बहू महाभारत के किरदारों की तरह हर संघी का चेहरा नुमाया हो गया जिसने खेल और क्रिकेट को ज़लील कर दिया।  सुनील गावस्कर एक अज़ीम खिलाड़ी तक अपनी खेल जज़बात के बरक़्स बईमानी से जीते मैच में बजाये हक़ बयान करने के बच्चों की तरह रक़्स करने लगा था।  तो अब भारत के बच्चे भी ख़ूब हलाक हो रहें हैं।  नाचो पीटो सर को नोचों अपने बालों को।  गुनाह तो तुम कर बैठे अब कफ़्फ़ारे की बारी है।

लंगूर और लंगूरनिओं की टोली संघी हुड़दंगाईयों ने उधम मचा कर रख दिया था।  वैसे भी यह क़ाफ़िर गुंडे दिवाली, होली, गणपति, लव रात्रि में हुड़दंग मचाते हैं और दूसरों की नींद ख़राब करतें हैं।  हर रोज़ रात को १२ - १ बजे तक पटाखे फोड़ना चिल्लाना शोर मचाना अवाम को तकलीफ देना यह तो इनकी आदत है।  लखनऊ, पूना में इन हुड़दंगिओं ने पुलिस वाले पर हलमा बोल दिया उनको धो डाला।  इतने पर भी इन्तेज़ामियाँ बेदार नहीं हुई फिर जब लंगूर लँगूरनियों के गिरोह और अड्डे के गुंडे हुड़दंग मचाएं आतंक मचाएं पुलिस को मारे पीटें तो उनको सिर्फ हुड़दंगी बोला जाएगा यही कही अब्दुल का फ़रज़न्द सपड़ाई में आ जाता तो उसको आतंकी बना देते मीडिआ के गुलाम।  

नाज़रीन अल्लाह से रूजू करने का मतलब यह हर्गिज़ नहीं है की जद्दो जेहद नहीं करना चाहिए हर मुद्दे पर अपने हक़ के लिए लड़ना चाहिए ख़्वाह वोह जंग का मैदान हो या खेल का, बेहेस मुबाहिसा हो या कोई और मुक़ाबला अपना दिफ़ा पूरी क़ुव्वत और ताक़त से करना चाहिए बिल फ़र्ज़ अगर मोमीन जीत जाता या जीत के क़रीब था और उसको साजिश कर के चीट कर के बेईमानी से शाकिस्त दी तो अब अल्लाह से रूजू किया जाए और उसको बोला जाए ऐ हाकिमों के हाकिम ऐ तमाम कायनात के मालिके मुख्तार हमने ईमानदारी से अपने फ़र्ज़ को अंजाम दिया लेकिन दुश्मन ने बेईमानी की नाइंसाफी की चीट कर के हमको शाकिस्त दी और आप दुशमन की हर हिकमत का हर नाइंसाफी का हर बेईमानी का माक़ूल नेमुल बदल दीजिये तो बस हो गया सामने वाले दुश्मन का वाटोला।  कियोंके अल्लाह कभी भी बेईमानी, नाइंसाफी, धोखेबाज़ी, फ़रेब और झूट को पसंद नहीं करता।  फिर जो चीज़ अल्लाह पसंद नहीं करता और एक मोमीन के साथ वही हुआ तो दुश्मन का क़िला तबाह और बर्बाद हो जाएगा।   

नाज़रीन अगर मुक़ाबिल शैतानी ताक़त है तो अल्लाह के बारगुज़ीदा बन्दों और वालिओं से रूजू कीजिये उमरे फ़ारूक़, ग़ौसुल आज़म, गरीब नवाज़ या अपने कामिल मुर्शिद से।  कियोंके अल्लाह वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता और शैतान को सुबह क़यामत या जब तक वोह क़तल नहीं कर दिया जाता तमाम क़ुव्वत और ताक़त दे रखी है और जहाँ अल्लाह ने शैतान को ताक़त दी है वहीँ अल्लाह के वालिओं को उसको अपने क़ाबू में करने की क़ुव्वत दे रखी है। 

ग़रीब नवाज़ के बोहोत से शैतानी अमलियात को क़ाबू में करने के और उस दौरे कुफ्रिया जादू के मरकज़ जगत पाल जोगी को शिकस्त देने मुसलमान बना कर अपने ग़ुलामों और मुरीदों में शामिल करने के एक नहीं बल्कि बोहोत से क़िस्से मौजूद हैं।  जिसकी शिनाख़्त अजमेर में आज भी हजर शजर सब करतें हैं।  आप ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की मौजूदा दौर में भी कई करामात ज़ाहिर हुई जिसके ऊपर कई मज़मून शाया किये जा चुके हैं। 

Zuber

Wednesday, 19 October 2022

मुसलमान और उनकी एहमियत।

अज़ीज़ नाज़रीन,

दौरे मुनाफ़ेक़त, कुफ्र और साजिश में मुस्लिम अवाम को बोहोत ही मोहताद रह कर काम करने की ज़रुरत है।  जो दीनी इदारे हैं वोह किसी भी सूरत से हुकूमत के ग़ुलाम ना बनें, ख़्वाहा वोह किसी भी मसलक और फ़िरक़े से हो।  अगरचे बात इस्लाम, मुसलमानों की फलाह और हक़ की आ जाए तो सभी मुस्लिम एक परचम के नीचे आ जाए हक़ का परचम।  ना तिरंगा ना इरंगा मेरा परचम हक़ का। 

इस ज़िम्न में मुस्लिम हक़तल्फ़ी से मुत्तलीक़ कुछ बातें आप हज़रात के रू बरू रखना चाहता हूँ।  जब हिन्द में कोई भी ऐसा काम जो हुकूमत, फौज, जंग या खेल के मैदान में अक्सरियत अवाम के बूते की बात ना रहे तो मुस्लिम अवाम याद आतें हैं। 

मुझे गुजिश्ता वर्ल्ड कप का फाइनल याद आ गया जिसमे कीवी के साथ खेलते हुए मोहम्मद समी को बहार रखा गया था।  वहीँ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खिलाया गया था।  नतीजा सामने आया पाक के ख़िलाफ़ भारत जीता था और कीवी के ख़िलाफ़ २४० तक नहीं बना पाया।  मतलब मुस्लिम अवाम भारत के अक्सरियत अवाम के ग़ुलाम हैं।  जब उनकी ज़रुरत पड़ेगी तभी बुलाया जाएगा उनका कोई ओहदा या एक मुक़ाम नहीं है।  क्या मुस्लिम अवाम भारत में रोलिंग बॉल हैं।  जिस किसी के समझ में आया उनको लात मार दी और जब खुद के ऊपर बात आई तो पुचकार लिया। 

यही हाल मोहम्मद समी का इस वर्ल्ड कप में हैं।  आया राम गया राम हैं।  जिस तरह से जिस्म की गंदगी सिर्फ उसी वक़्त ख़ारिज की जाती है जब जवानी चढ़ जाती है या कभी बाथरूम में बहा दी जाती है वैसा ही हाल समी का है।  अगर थोड़ी सी भी अपने वेक़ार और इज़्ज़त के लिए जीता है समी तो हरगिज़ ऐसे वक़्त में भारत की टीम लिए नहीं खेलेगा जब वोह मुसीबत में होगी।  ऑस्ट्रेलिया से खेलते वक़्त जब भारत की टीम तक़रीबन हार गई थी तब समी याद आया।  और समी ने ना सिर्फ हेट ट्रिक ली बल्कि कप्तान को भी मायूस नहीं किया और भारत को जीत दिलवा दी।  लेकिन अब समी को अपनी एहमियत दिखानी होगी।  अगर प्लेइंग ११ में नहीं तो जब ज़रुरत पड़ेगी तब भी नहीं।

मुसलमानों को अपनी एहमियत दिखाना चाहिए सिर्फ वतन वतन के नाम पर नहीं बल्कि तुम्हारी क़ाबिलियत के हिसाब से तुमको हर ओहदे पर फ़ाइज़ होने की ज़िद्द होना चाहिए।  नहीं तो तुम नीचे लटकने वाले सिर्फ गोश्त का लोथड़ा बन कर रह जाओगे।  जब ज़रुरत होगी तुमको हाथ लगाया जाएगा पुचकारा जाएगा जब ज़रुरत नहीं कपडे में लैपट कर रख दिया जाएगा। 

नाज़रीन आपको ब्रिगेडियर उस्मान याद हैं।   जब पाकिस्तानी फौज भारत में तबाही मचा रही थी।  भारत के १२ फ़िज़ाई अड्डे तबाह कर पाकिस्तानी टैंक तेज़ी से भारत के अंदर दाख़िल हो रहे थे, तब ब्रिगेडियर उस्मान ने पाकिस्तान की धज्जिया उड़ा दी थी और तमाम टैंक अपनी कारगरदेगी और फौजी सलाहियत से तबाह कर दिए थे। 

लेकिन आज उस क़ुर्बानी का किया सिला मिला जिस मुस्लिम ब्रिगेडियर उस्मान का हिंदुस्तान की फतह में अहम किरदार था उनकी नस्लों को ज़लील किया जाता हैं क़ुरान जलाये जातें हैं।  मस्जिदों पर डाका डाला जाता है, ख़ानख़ाह मदरसों को तोड़ा जाता है।  और इन सब में सिर्फ हिन्दू दहशत ही शामिल नहीं है बल्कि हुकूमत की जानिब से ऐसे कामों को अंजाम दिया जा रहा है।  

जितने भी मुस्लिम हैं ख़ेल के मैदान में या फौज में अगर उनको इस्तेमाल किया जा रहा है और सिर्फ ज़रुरत के वक़्त ही याद किया जाता है बाक़ी वक़्त एक अछूत के जैसे दूर रखा जाता है बे यारो मददगार तो अपनी एहमियत दिखाए और ऐसी हिकमत का हरगिज़ हिस्सा ना  बने जब भारत को या किसी भी भारतीय टीम को तुम्हारी ज़रुरत हो तभी तुमको याद किया जाए।

अगर एक मुसलमान फुल टाइम काम पर है तो उसकी मुलाज़मत को भी लो लेकिन सिर्फ जब भारत, कुफ्र मुसीबत में पड़ जाए तभी मुस्लिम अवाम को याद करोगे तो फिर हमको हिस्सा बराबर का चाहिए।  अगर जंग है तो हमको ज़मीन का हाकिम बनाओ और ख़ेल है तो प्लेइंग ११ में रखो।

आज हिंदुस्तान में हुकूमत की सरपरस्ती में बेटिओं के सरों से हिजाब उतारा जा रहा है बेटों को पढ़ाई से रोका जा रहा है।  मुस्लिम रोज़गार, घरों को बर्बाद किया जा रहा है।  नौजवानों को गोली मारी जाती है या जेल में डाल कर उनकी ज़िन्दगी बर्बाद की जा रही है।  बेटियों के साथ ज़िना और गिरोह गर्दाना ज़िना करने वालों को ना सिर्फ बाइज़्ज़त बरी किया जा रहा है बल्कि उनकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई की जा रही है।  वोह तो मोअज़्ज़ीब खानदान से हैं इसलिए छूट गए ऐसे बयानात किया जलते हुए ज़ख़्म पर नमक रगड़ने जैसा नहीं है।  सोचो   

Zuber

अल्लाह के वली बनाम सामरी की गोशाला।

अज़ीज़ नाज़रीन,

अल्लाह के वालिओं पर तनक़ीद करने वालों उनके आस्ताने की जालिओं को बोसा देने पर शिर्क, बिदअत, कुफ्र बताने वालों।  वालिओं के दर पर अर्ज़ी लगाने को गुनाह बताने वालों यह सांबरी की औलाद तो एक मुजस्समें से अर्ज़ लगवा रही है और कुफ्रिया अक़ीदा की नंदी बैल के कान में अपनी हाजत रखने से पूरी होती है।  सांबरी ने भी यही किया था गाये की कटी गर्दन रख कर बछड़ा बना दिया था फिर वोह बोलता था और लोगों की हाजत पूरी करता था।  लेकिन वोह कुफ्र था जादू था कियोंके सांबरी एक जादूगर था और उम्मते मुस्लिमा में निफ़ाक़ डालने आया था।  जब हज़रते मूसा तूर से ४० दिन बाद अल्लाह की किताब ले कर लौटे तो आपने जलाल में अपने भाई हारुन अलैहे सलाम की दाढ़ी मुबारक नोच ली और बोले में उम्मत को तुम्हारे हवाले कर के गया था यह क्या हाल बना दिया।  तब आपने बोला उम्मत बाग़ी हो गई थी वोह मेरा क़तल कर डालती और उम्मत में निफ़ाक़ बे हद बढ़ जाता क़त्ले आम शुरू हो जाता इसलिए में ख़ामोश रहा। 

आज वही सामरी जादूगर हिन्द से आया और उम्मते मुस्लिमा में निफ़ाक़ डालने की नियत से इस्लामिक रियासत दुबाई में गोशाला क़ायम कर गया। अब वोह इल्मी चैनल वाले ऐसी बातों पर कुफ्र का फतवा नहीं देंगें अगर दिया तो मौजूदा नाइंसाफ, सामरी का ग़ुलाम हाकिम रियासत के ख़िलाफ़ बग़ावत के इलज़ाम में इनका सर धड़ से जुदा कर देगा। 

यह वही इल्मी चेंनल के ख़ास मौलाना हैं जो वालिओं के ऊपर तो तनक़ीद करतें हैं लेकिन इस्लामिक रियासतों में होने वाले हक़ीक़ी कुफ्र, शराब नोशी, फाहशी, जिस्म फरोशी, रक़स, हिंदी सिनिमा, जूआ ख़ाना, ख़िन्ज़ीर का गोश्त पर ख़ामोशी इख़्तेयार करतें हैं।  शायद हाकिमे वक़्त से ख़ौफ़ ज़ादा होंगे।  लेकिन हम तो बोलेगें, हिन्द में रह कर भी बोलेगें और अगर मौक़ा मिला ऐसी इस्लामिक रियासतों में जाने का तो वहां पर भी ग़लत को ग़लत बोलेगें।  किसी हाकिम से नहीं डरेगें सिवाए अल्लाह उसके रसूल और बुज़ुर्गाने दीन (वली)।  

जैसा की आप हज़रात को इल्म होगा इससे क़ब्ल ख़ाकसार के मज़मून "अल्लाह के बरगुज़ीदा बन्देनाम से शाया किये जा चुके हैं। गर आप हज़रात ने उन मज़ामीनों का मुताला किया होगा तो आपको अल्लाह वालों की कश्फ़ और करामात का इल्म भी हुआ होगा।  अल्लहा के सच्चे वली महज़ नज़रों से इंसान की तक़दीर पलट सकतें हैं। जिसका ज़िक्र अल्लामा इक़बाल ने अपने अशआर में किया है

 "निगाहें मर्दे मोमीन से बदल जाती हैं तक़दीरें…….,

…….. जो हो ज़ौक़े यक़ीन पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

हज़रात कुछ मुनाफ़िक़े इस्लाम हिन्द में संघी और ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी के नुमाइंदे, तमाम आलम में यहूद और नसारा के एजेंट कुछ ऐसे कामों में मुलव्विस रहतें हैं जिसकी वजह से इस्लाम और मुसलमानों में तफ़रीक़ क़ायम रहे।  लेकिन बारी इलाह वक़्त वक़्त पर ऐसे ग़लीज़ और मुँह से गंदगी निकालने वालों को माक़ूल जवाब देता रहता है। 

यह कोई शैख़ तौसीफ उर रेहमान है दज्जाल का फितना नज़र आता है इसको ग़ौसुल आज़म, ग़रीब नवाज़ महबूबे इलाही जैसे बुज़ुर्गाने दीन और वालिओं से लिल्लाहि बुग्ज़ और कीना है।  यह शख़्स अपने आपको नबी का उम्मत्ती बोलता है और इस्लाम का ठेकेदार समझता है लेकिन इसको इसके मकतब में इतना नहीं सिखाया गया की ज़ईफ़ लोगों और वफ़ात कर गए मोमीन की शान में बदकलामी नहीं करना चाहिए हत्ता के वोह बदकार ही कियों ना हो।  फिर यह शख़्स इल्मी चेंनल पर कर ग़ौसुल आज़म और ग़रीब नवाज़ की शान में अदना दर्जे की बदकलामी करता है।  सतगफ़िरूल्लाहा  बोलता है "अरे जो मर गया, इस्तंजा नहीं कर सकता, अपने कपडे नहीं बदल सकता और तुम उसको गोसूल आज़म बोल रहे हो।    

दूसरा है शैख़ मेराज रब्बानी हफ़ीज़उल्लाह वोह ज़ैनुल आबेदीन और इमाम जाफर सादिक़ रज़ियल्लाह के शान में बदकलामी करता है।  यह लोग तो अपने आपको आलिम बोलतें हैं फिर इनको इतना इल्म कियों नहीं आया की एक वफ़ात पाए हुए मोमीन की शान में बदकलामी नहीं करना चाहिए।  तुम इनको बुज़ुर्ग तस्लीम करो या ना करो लेकिन उमर रसीदा तो थे हज़रत ग़रीब नवाज़ ९२ साल में पर्दा किये वैसे ही गोसूल आज़म और तमाम वली ६० साल के बाद पर्दा किये होंगे तो तुम्हारी तालीम का दायरा इतना महदूत है की एक बूढ़े शख़्स को सिर्फ इसलिए अदना दर्जे से मुखातिब कर रहे हो कियोंके उनकी करामात पर तुमको यक़ीन नहीं है।  

तीसरी बात यह तमाम इल्मी चेंनल वाले नबी मुकर्रम की सिफ़त बयान करतें हैं अपने दुश्मनों को माफ़ करने की हदीस बतातें हैं नबी की सभी से हुस्ने सुलूक यहाँ तक यहूद और कुफ्फारे मक्का से भी नरमी और खुश असलूबी से बात करने की सिफ़त बतातें हैं लेकिन खुद उस पर अमल नहीं करतें।  अदना दर्जे की जुबां से एक बुज़ुर्ग को मुखातिब करते हो। 

इससे ज़ाहिर हो रहा है की तुम सभी क़ादियानी दज्जाल के फ़िरक़े से हो।  मिर्ज़ा गुलाम एहमद क़ादियानी भी अपने को आलिम कहता था, मसनद पर बैठ कर तक़रीरें करता था।  लेकिन जब शैतान हावी हुआ और अल्लाह ने लानत का तोग गले में टांगा तो गुमराही उसका मुक़्क़दर बन गई। पैसों के लिए अंग्रेज़ों की ग़ुलामी ले ली और कर दिया नबूवत का दावा।  उस दौर में हम तो नहीं थे लेकिन जहाँ तक इल्म हुआ है उसने भी वालिओं से बग़ावत शुरू की थी, जो नबूवत के दावे पर जा कर रुकी।  और अल्लाह ने उसको ही जहन्नम का ईंधन बना दिया।  जब मरा था उसके मुँह से पख़ाना निकल रहा था। 

फिर जो लोग ज़ैनुल आबेदीन, इमाम जाफर सादिक़, ग़ौसुल आज़म, ग़रीब नवाज़, महबूबे इलाही पर तनक़ीद करतें हैं मतलब आले नबी नस्ले नबी और सय्यद सादगान पर तनक़ीद करतें हैं और दावा नबी की मोहब्बत का भारतें हैं।  या फिर उनको हदीसे क़ुदसी पर यक़ीन नहीं और उसको झुटला रहें हैं।  जिसका मफूम हैं

अल्लाह ने फ़रमाया जिस बन्दे ने अल्लाह के वली से बुग्ज़ रखा उसकी शान में बदकलामी की और जिस मोमीन बन्दे ने सूद खाया अल्लाह का उसके खिलाफ एलान जंग है। 

जॉर्जिस के जैसे यह मौलाना शैख़ तौसीफ उर रेहमान भी जेल जा चूका है।  इसके ऊपर इस्लामिक स्टेट जो की यहूद की पैदा करदा दहशतगर्द तंज़ीम थी उसके लिए फण्ड कलेक्ट करने का इलज़ाम था।  इस्लामिक स्टेट सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अवाम में निफ़ाक़ डालने के लिए तैयार की गई थी। 

अगली नशिस्त में ग़ौसुल आज़म की करामात के बारे में ज़िक्र करूंगा जिसको यह जॉर्जिस और मौलाना शैख़ तौसीफ उर रेहमान जैसे लोग मज़ाक़ बनातें हैं। 

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...