Friday, 28 August 2020

राम मंदिर साबित होगा एक और अज़ाब,

अज़ीज़ नज़रीन,


हिन्दू मज़हबी पाकीज़ा शहर अयोध्या में ग़ैर अख़लाक़ी ग़ैर मय्यारी अमल करदा मामला सामने आया है.  जहां दो ख़ातूनों सीता (ख़याली नाम) और  राधा ने राम मंदिर में शादी कर ली.  हाँ भाई जब राम मंदिर ही ग़ैर अख़लाक़ी और डाका डाली हुई ज़मीन पर बनाया जा रहा है तो शादी वग़ैरा भी राम की नगरी में ग़ैर अख़लाक़ी ही होंगें.  भू माफियाओं पर राम मंदिर ऊपर वाले का अज़ाब साबित होगा, लिख कर रख लो यह मेरी बात.  अभी तो राम के मंदिर में देखो कैसे कैसे कारनामे और बरहना रक्स होतें हैं.  राम मंदिर बनाना बड़ी बात नहीं है लेकिन उनके मर्यादा पुरषात को क़ायम रखना या पालना वोह बड़ी बात है.  और यह मंदिर तो बन ही रहा है ग़ैर अख़लाक़ी तरीक़े कार हिकमत इख़्तेयार कर के डाका डाल कर, दुसरे मज़हब की इबादत गाह को तोड़ कर लाशों पर है.  तो हर काम इस मंदिर में ग़ैर अख़लाक़ी ही होगा.

लाशों का हिसाब करो जब से यह तनज़िया हुआ है तब से ले कर अब तक कितने जहांबाक़ हुए, कितनो को मंदिर के नाम पर क़त्ल कर दिया गया.  जिस काम की इब्तिदा ही गलत हो और शुरू में ही बदशकुनी हो जाए वोह चीज़ कभी परवान नहीं चढ़ती और खुशी सुकून फ़राहम नहीं कर सकती.  ठीक उसी तरह जिस तरह से हिन्दू दहशतगर्दों के तरबियती इदारों में शिद्दत पसंद हिन्दुओं के घरेलू माहौल में एक तालिबे इल्म के हाथ में क़लम के बजाए तलवार दे कर ख़ून ख़राबा चोरी डकैती एक मज़हब के खिलाफ नफरत सिखाई जाती है, ज़ेहनों में ज़हर और आलूद भरा जाता है.  फिर ऐसे तरबियती इदारों से ख़ारिज ज़हरीले मवादी शख्स से उम्मीद रखी जाए की वोह अदलिया की कुर्सी पर बैठ कर इन्साफ करेगा तो ऐसी उम्मीद करने वाला जाहिल ही होगा. वोह बच्चा बड़ा हो कर सिर्फ क़त्ल करेगा और दहशतगर्द बन कर दहशत ही मचाएगा. ऐसा तलवार बाज़ इन्साफ की बात कभी नहीं कर सकेगा बल्कि उसको तो मज़हब के नाम पर तलवार से क़त्ल करने में महारत होगी.  ऐसा दहशतगर्द इंसान क़लम से फैसले करने के बजाये अपने फैसले में लाखों लोगों की गर्दन का नज़राना बख़ूबी पसंद होगा.   

 

भले ही इन इंसानी लाशों और सरों की फेहरिस्त में उसके अपनी क़ौम के लोगों की तादात बे शुमार हो.  ठीक उसी तरह से जिस तरह से मंदिर के बनने से पेश्तर और इस तनज़िया के आग़ाज़ के बाद ही लाखों लोगों की जान चली गई,  इन्साफ का क़त्ल हो गया, क़ुदरती क़ेहर १९९२ से डराने लगा, किल्लारी से ले कर तो करोना तक क़ुदरती क़ेहर आ रहा है; लेकिन मुझको मेरा मक़सद इंसानी सरों का पूरा करना है. मुझे मेरी अना को क़ायम रखना है, उसके लिए मुझे कोई भी क़ीमत चूकानी पड़े चलेगा.  वतन की माशियत भलें ही तबाह हो जाए, क़दीमी असासे फ़रोख़्त हो जाए तब भी चलेगा. फिर उस मंदिर के तामीर होने के बाद खुशहाली आएगी इसका ज़ामिन कौन है.  जो सोचतें हैं की मंदिर की तामीर के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा ऐसी उम्मीद करने वाले जाहिल हैं, अनपढ़ हैं पंचर बाज़ हैं.  खुशहाली मंदिर के बनने या ना बनने से नहीं आती बल्कि इंसान के किरदार, इन्साफ पसंदी हर मज़हब की इज़्ज़त, इंसानी जान की हिफाज़त, मस्तूरातों की इज़्ज़त करने से आती है.  तालिबे इल्मों को दुरुस्त इल्म देने और उनकी सही रहनुमाई करने से आती है.  ना की उनके हाथों में क़लम देने के बजाये बंदूक, तलवार देने से आती है. और ना ही किसी ख़ास मज़हब के मानने वालों के ख़िलाफ़ ज़हर और आलूद भर कर आती है. ना ही बेईमानी डाका डाल कर इन्साफ का क़त्ल कर के, इंसानी लाशों पर किसी और के मज़हबी घर को तोड़ कर अपने पेशवा का मंदिर बनवाने से आती है.

राम कभी भारत में पैदा हुए ही नहीं थे. ज़बरदस्ती आप उनको यहाँ घुसडे जा रहे हो. अब तो ऐसा ख़ुद हिन्दू मज़हबी रहनुमा श्री श्री धुरेन्दर नाथ जी और दीगर हिन्दू दानिशमंदों का भी सोचना है. इस सहाफी का मानना है भारत जैसे दहशतगर्द, कपटी, फ़िरक़ापरस्त, ना इन्साफ, क़ातिल, दरिंदे मुल्क में राम जैसे अज़ीम हिन्दू रहनुमा कैसे पैदा हो सकतें हैं. वोह तो नेपाल जैसे अमन पसंद मुल्क के हो सकतें हैं.  अगर राम भारत में पैदा हुए थे तब भी अक़ीदतमन्दों का यह आलम है.  उनकी फ़िरक़ापरस्ती, ना इंसाफ़ी, दहशतगर्दी से ख़ास लोग उनके आक़ा के बारे में सोचतें होंगे की उनका क्या आलम होगा. दूसरी बात अभी तो सिर्फ मंदिर की बात शुरू हुई और कोविद से ६५००० और जनवरी २०२० से ले कर तो आज अगस्त २८, २०२० तक रोड हादसात, ख़ुदकशी, एक ने दुसरे को गोली मारी और क़ुदरती क़ेहर से कम से कम १५ से २० हज़ार लोग हलाक हुए. जब मंदिर बनी तो बड़ी तबाही तब आएगी, जब डाका डाली हुई ज़मीन पर दुसरे की इबादत गाह को तोड़ कर भू माफ़िया का मंदिर बयाना जा रहा है. तमाम भू माफिया डाकू लूटेरे मारे जायेगे. जिन्होंने मस्जिद को लूट कर मंदिर बनाया या बनवाने में मदद की इम्दात  किया या उसको उस ही जगह मस्जिद की ज़मीन पर बनवाने की हिमायत किया.

अगर मंदिर के बनने से ही सब कुछ होता तो तमाम अरब देशों में कितने मंदिर हैं. सऊदी में तो एक भी नहीं है. लेकिन आज अगर सऊदी शेख या कोई और अरब देश का बादशाह अपनी गलाज़त भी देगा तो मोदी और भक्त उस मल को भी उठा कर अपने मंदिर में सजा कर रख देंगे.  फिर पाकिस्तान में इमरान के आने के बाद २ तेल और बड़ी तादात में नेचरल गैस के सरमाये कैसे मिले और तुर्की में भी वही हुआ.  ठीक है बना लो मंदिर देखते हैं भारत को तेल के सरमाये मिलते हैं या भारत तेल में जल कर राख होता है. 

सहाफी जुबेर 

Tuesday, 25 August 2020

कौन हैं मज़हबी और सियासी ग़द्दार

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज समाज और अहले वतन के दो एहम मुद्दों को ले कर आपके रू बरू आया हूँ. एहले हिन्द में अमूमन मुस्लिम अवाम  को  ख़ास तमग़े से मुनसलिक कर दिया जाता है और वोह है "ग़द्दार".  सयासत की बात की जाए तो किसी भी मुस्लिम ख़ास जमात को अक़लियतों की निस्बत से हक़ गोई करने के ऊपर बीजेपी की "बी" टीम बोल कर रूसवा और ज़लील किया जाता रहा है.  उसी हिसाब से अगर कोई सियासी जमात क़ानून, अदलिया या एवान के तोर तरीक़ों पर तनक़ीद करता है या हुकूमत की कारगरदेगी पर ऊँगली उठाता है तो उसको ग़द्दारे वतन बोल कर तोहमत लगाईं जाती है.  

जहाँ तक इस सहाफी की ज़हानत और उसको जो इल्म है उसके हिसाब से इसका फलसफा और ऊपर ज़िक्र  एहले हिन्द के ग़द्दारी के फलसफे से ज़रा अलहदा और मुख़्तलिफ़ है.  उम्मीद है आपमें से काफी कुछ इस सहाफी की राये से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे. 

लफ्ज़ "गद्दारी" को दो हिस्सों में तक़सीम कर सकतें हैं.  

१. सियासी गद्दारी।

२. मज़हबी गद्दारी।    

चलिए आईये अब ज़रा इन तब्सिरों और तोहमतों की ज़राहत करते हैं.    

सियासी गद्दारी: किसी भी सियासी तंज़ीम की हक़ गोई को या किसी ख़ास फ़रीक़ की नुमाइंदगी या उसके हक़ की बात करने को ग़द्दारी तस्सव्वुर करना अहमक़ाना और फ़ितरी सोच है.   आज कल मुल्के हिन्द में तमाम नाम निहाद सेक्युलर तंज़ीमे (कांग्रेस, सपा, बसपा, एन.सी.पी., एल.जे.पी., आप, जनता दल नितीश) जिनका किरदार हमेशा से अक़लियतों के मुद्दों (ख़ास मुस्लिम) पर राये शुमारी की वक़्त हमदर्दी लेने की होती है.  ऐसा महसूस होता है की इनसे बड़ा मुस्लिम हमदर्द और कोई दूसरा है ही नहीं.  लेकिन जब असल मुस्लिम मुद्दों पर काम करने का वक़्त आता था या अमल करने का वक़्त आता है तो यही सेक्युलर तस्लीम की जाने वाली तमाम तंज़ीमे ग़द्दारी कर के मुस्लिम और अक़लियतों की पीठ में खंजर घोप देती हैं. फिर जब उन मुद्दों पर बेहेस और मुबाहिसे में ऐ.आई.एम.आई.एम. के नुमाइंदे या तंज़ीम के सरबराह असदुद्दीन इन सेक्युलर समझे जाने वालों की हजामत करतें हैं तो उनको बीजेपी की "बी" टीम बोला जाता है.  संघ का एजेंट तस्लीम किया जाता है.  पैसे खा कर ऐसे बयानात दे रहे हो.  उसके ऊपर ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ आतिश में पेट्रोल डालने का काम करतें हैं.  जो इन सेक्युलर तंज़ीमों के इलज़ाम वोट कटुआ को सही और दुरुस्त ठहराते हैं.  सही देखा जाए तो यही नाम निहाद सेक्युलर तंज़ीमें जो अपने आपको मुस्लिम मुहाफ़िज़ बोलती हैं वही असली ग़द्दार हैं.  क्योंकि इन्होने मुस्लिम मफ़ात की ज़िम्मेदारी पर राये शुमारी में हिस्सा लिया और ज़ेरे दस्तूर हलफबरदार हुए,  फिर इंतेखाब ख़त्म होने के बाद यह तमाम सेक्युलर तंज़ीमे कैसे घिरघिट के जैसे अपना रंग बदलती हैं.  

२०१४ के बाद से उन तमाम पेचीदा मसलों पर चाहे वोह बाबरी मस्जिद हो, ट्रिपल तलाक़, कश्मीर ३७०, स्याह क़ानून "का" जिनसे मुस्लिम मज़हबी और जज़्बाती ताल्लुक़ था उन सभी मुद्दों पर इन तमाम नो निहाद सेक्युलर तंज़ीमों ने ऐवान में ग़द्दारी की, बीजेपी का साथ दिया और  दस्तूर की रूह का क़त्ल कर के वाक आउट किया.  फिर  किस बुनयाद पर यह  सेक्युलर तंज़ीमें असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम पर बीजेपी की "बी" टीम होने का इलज़ाम तराशी करतीं हैं.  अमल तो इनका "बी" टीम जैसा है.  

अब कांग्रेस  की जानिब आतें हैं जो की मुल्क की सबसे बड़ी मुख़ालिफ़ तंज़ीम है.  जो टीवी मुबाहिसों और बेहेस में पुर ज़ोर अंदाज़ में असद पर बीजेपी  की बोली बोल रहे हो आप तो बीजेपी की "बी" टीम हो ऐसे इल्ज़ामात लगाने में सरे फेहरिस्त होती थी.   कांग्रेस की भी मुस्लिम नस्ल कुशी की एक स्याह तारिख रही है.  बरहाल अभी तमाम बातों का तब्सिरा करने के बजाये २०१४ से आगे की बात करतें हैं.   २०१४ के बाद कितने ऐवाने पार्लिअमान और रकूने असेम्ली कांग्रेस के सेक्युलर उसूलों पर मुंतखिब हो कर आये फिर बीजेपी की गोंद में जा कर बैठ गए.  जो सिलसिला गोवा से शुरू हुआ था वोह राजिस्थान तक क़याम रहा.  अब तो कांग्रेस मज़ीद बड़ी परेशानी में मुब्तेला है. अवामी सतह पर तबसिरे होने लगे हैं मरकज़ी नुमाइंदगी के ऊपर बीजेपी से सांठ गाँठ होने के सबूत मिल रहे हैं.  तो यह है असली गद्दारी. 

इन सेक्युलर तंज़ीमों को हक़ गोई की कही हुई बात, तनक़ीद पसंद नहीं है.  यही लोग अभी तक अपने हलके के पसतमंदा अवाम के महज़ वोट के ऊपर सियासत करते थे, और उनके मसाइल और मुद्दे  हल करने पे एक दम पीछे रहते थे.   अब किसी तंज़ीम ने जब हक़ की बात कही, गुजिश्ता ७० सालों का हिसाब किताब माँगा तो लगा दिया इलज़ाम की आप तो संघ की बोली बोल रहे हो. आप तो बीजेपी की "बी" टीम हो आप तो मुस्लिम वोट पर सेंध लगा रहे हो.  क्योंके इन सेक्युलर तंज़ीमों को अब या तो मुस्लिम मफ़ात के काम करना होंगे या जाना होगा.  फिर अब यह तंज़ीमे मुसलमानों को महज़ वोट बैंक के जैसे इस्तेमाल नहीं कर सकते.  और ऐसे ही सियसतदाँ जो अपने फ़र्ज़ से गद्दारी करतें हैं.  हलफ तो दस्तूर पर लेते हैं लेकिन ऐवान में दस्तूर के बुनयादी ढाँचे को तोड़ने वालों के साथ हम क़दम दिखतें हैं.  और हर उस मुद्दे पर ज़ाफ़रानी तंज़ीम के हमक़दम राये रखतें हैं, जो दस्तूर की या  अक़लियतों के हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी करता है.  भले ही दस्तूर की ख़िलाफ़वर्ज़ी हो जाए. और ऐसे ही सियासतदां गद्दार हैं.  सियासी गद्दार।   

मज़हबी ग़द्दारी:  मज़हबी ग़द्दारों की फेहरिस्त और दर्जे में वोह लोग आतें हैं जो अपने मज़हब के उसूलों और क़ानूनों को नहीं मानते उसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी करतें हैं. फिर भी दावा की गर्व से कहो हम हिन्दू हैं.  शान से कहो में मुसलमान हूँ.  मुसलमान होने पर नाज़ है. इस तरह के ग़द्दारों में तमाम सियासतदां तो होतें ही हैं बरक्स इसमें अवाम का एक बड़ा तब्क़ा भी होता है.  इस्लाम में हर वोह जुर्म जो शरीयत की रूह से गुनाहे कबीरा है फिर भी एक मुस्लिम अल्लाह के क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी  करता हैं और अपने आपको इस्लामिक या मुसलमान होने का दावा करता है तो वोह ग़द्दारे मज़हब है.  

आज मुस्लिम माशरे में बड़ी तादात में शराबख़ोरी, चोरी दग़ाबाज़ी, जालसाज़ी, फरेब, धोका, झूट, ग़ैर मज़हबी शादी (ज़िना) जैसे अमल मौजूद हैं.  फिर भी शान से गोश्त खा कर कहो हम मुस्लिम हैं.  सियासी तंज़ीमों के रहनुमा इल्ला माशाल्लाह सभी ग़द्दार हैं. ख़ास जुम्मनों के किरदार को फरामोश नहीं कर सकता के वोह कितने बड़े ग़द्दार हैं.   बीजेपी से मुनसलिक हर मुस्लिम, मज़हबी ग़द्दार है.  क्योंकि बीजेपी का हर अमल बाबरी मस्जिद से ले कर तो ईदे क़ुर्बान तक मुस्लिम अवाम के मज़हबी और जज़्बाती मुद्दों पर इज़ा पहुंचाने वाला होता है.  और जितने भी जुम्मन हैं वोह सभी ऐसी भेड़ें हैं जो सिर्फ सर को नीचे रख कर इन पेचीदा मुद्दों पर हक़ बयानी करने के बजाये बीजेपी की बोली बोलते हैं.  हाल ही में मरकज़ निजामुद्दीन तब्लीग़ी जमात पर ज़ाफ़रानी लंगूरों ने जो उधम मचाया था  उसके बाद वज़ीरे अक़लियत मुख्तार अब्बास नक़वी के जमात पर जो तास्सुरात थे वोह बेहद तशवीशनाक हैं.  मौलाना साद साहब पर बेहूदा बयानबाज़ी और उनकी गिरफ्तारी करने की मांग के बाद उनकी शान में नाज़ेबा अलफ़ाज़ बोलना, वोह क्या है.  वही है मज़हबी गद्दारी और ऐसे मुनाफिक़ ही कहलाते हैं, "मज़हबी गद्दार".  

ऐसा नहीं है की मज़हबी गद्दार सिर्फ इस्लाम में मौजूद होतें हैं. नहीं, वोह तो हर मज़हब में हैं.  हिन्दू मज़हब में भी ऐसे अनासिर देखे जा सकतें हैं.  जो राम के नाम पर क़त्ले आम करतें हैं.  एक मुसलमान, क्रिस्टी, दलित को पकड़ कर लाठी, डंडों से पीटना और तलवार की दहशत से उसको उनके मज़हब के ख़िलाफ़ नारा लगाने पर ज़ोर डालना.  "जय जय ........"  यह क्या है, यही है मज़हबी ग़द्दारी.  ऐसा हिन्दू मज़हब में कहाँ कहा गया है, की राम के नाम पर अवाम के साथ दहशतगर्दी करो.  तलवार के ज़ोर पर राम के नाम पर हिन्दू मज़हब फैलातें हैं. 

जो लोग राम मंदिर पर डाका डाल कर मंदिर बना रहे हैं, वोह तमाम मज़हबी ग़द्दार हैं.  क्योंकि यह बात किसी से पोशीदा नहीं और सुप्रीम कोर्ट में साबित हुई है की रात की तारीकी में मस्जिद में मूर्तियां रखी गई.  मस्जिद को गिरा कर मंदिर बनाना किस राम को पसंद होगा.  किसी दुसरे की इबादत गाहा पर डाका डाल कर अपने मज़हबी पेशवा का घर बनाना मज़हबी ग़द्दारी है.  

गौ मॉस और गौ हत्या पर जो हिन्दू और गौ रक्षक, भक्षक बन कर दहशत मचाते हैं वोह सभी मज़हबी ग़द्दार हैं.  इनको जो गायें हर रोज़ हिन्दू क़तल ख़ानों में क़तल कर के बेरुन मुल्क भेजी जातीं हैं, तब गौ प्रेम नहीं दीखता, तब लोग यह कैसे खामोशी इख़्तेयार कर लेते हैं.  जो गाये गोशाला में मौत की आगोश में चली जा रहीं हैं उस पर काहे को ज़रूरी इक़दाम नहीं करते यह गौ रक्षक. एक पर वार दुसरे पर इक़रार।  यह सभी मज़हबी ग़द्दार हैं.  

इनका मज़हब से कहीं  से कहीं तक कोई ताल्लुक़ नहीं होता है.  इन लोगों को  इब्तेदा तक नहीं मालूम होती हैं.  चाहे वोह जुम्मन हो जो तब्सिरों और मुबाहिसों में बड़े बड़े इस्लामिक फलसफे देतें हैं या वोह हिन्दू हों जो गौ माता, राम मंदिर, राम राज पर बड़े बड़े फलसफे और नज़रिया देतें हों.  ऐसे अनासिरों का मज़हब से कोई ताल्लुक़ नहीं होता है.  यह लोग पैसे के पुजारी और इबादत  गुज़ार हैं.  आज जुम्मानों को संघ और बीजेपी से मुस्लिम और इस्लाम मुख़लिफ़ बयानात और अमल के लिए पैसे मिल रहें हैं तो वोह मुस्लिम मुख़ालेफ़त में आमादा हैं.  वही कल से अगर पुजारी और राम, गौ भक्तों  और फरेबी वतन परस्तों को कोई बड़ी तंज़ीम लाखो करोड़ों दे देगी तो यह लोग अपने ही मज़हब और वतन की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने लगेगें.  

क्योंकि जो जुम्मन बाबरी की मुख़ालेफ़त में राम मंदिर की मुवाफ़ेक़त करता हैं, जो गौ हत्या पर अलग ही नज़रिया रखता है की हिंदुस्तान में नहीं मिलेगा पाकिस्तान या अरेबिया जाओ तो वोह ज़्यादा पैसे मिले तो कुछ और बयान दे देगा.  वहीँ जो हिन्दू राम के नाम पर फरेब मचाते हैं झूट को सच और सच को झूट साबित करने में लगे होतें हैं ऐसे फरेबी और जालसाज़ों को ज़्यादा रक़म मिली तो वोह राम को ही बेच देंगे.  

इस  सहाफी के फलसफे के हिसाब से सियासी ग़द्दार से ज़्यादा खतरनाक और ज़हरीला मज़हबी ग़द्दार होता है.  क्योंकि सियासत में सब कुछ चलता है.  लेकिन मज़हब के बुनयादी क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने वाले की दीन और दुनियां दोनों ग़ारत हो जाती हैं और वोह ना ही दीन के काम का रह जाता हैंऔर ना ही दुनिया के काम का.    

और ऐसे ही मज़हबी क़ानून (इस्लाम और हिन्दू) की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने वाले दोनों ही जुम्मन और हिन्दू "गद्दार" हैं.  जो बात राम को पसंद नहीं वोह राम के ऊपर लाद  कर करना, दीप से दीप जलायेगे मंदिर वही बनायेगे, सौगंध राम की खातें हैं मंदिर वही बनायेगे.  तो क्या राम ने आ कर कहा था, की डाका डाली हुई ज़मीन पर मेरा मंदिर बाना लो.  क्या राम ने कहा था दुसरे की इबादत गाहा को तोड़ कर मेरा मंदिर बना लो.  "मज़हबी गद्दार".     

शहादते हुसैन असल में मग्रे यज़ीद था, और इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद. एहले कर्बला और शहादते हुसैन को सरशार।   

Monday, 24 August 2020

No Muslims are scapegoat in Dynasty Rule of Maratha.

 No Muslims are scapegoat in Dynasty Rule of Maratha.

https://autojourna.wordpress.com/2020/08/24/no-muslims-are-scapegoat-in-dynasty-rule-of-maratha/



Saturday, 15 August 2020

किस के साथ बनाऊं जश्ने आज़ादी, कैसे कहूँ में हूँ आज़ाद.

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज कल जो मुल्के हिन्द के हालात हैं बोहोत ही पेचीदा हैं.  २०१४ से २०१९ तक अवाम जो हुकूमत के मुख़ालिफ़ बोलता था उसको मौत के घाट उतार दिया जाता था.   लेकिन ज़ाफ़रानी महाज़-२ में, अब तो सियसतदाँ अगर मुख़ालेफ़त में बोलेगे तो उनको सीधा गोली नहीं मारी जाएगी.  बल्कि साजिश के तहत ऐसे हालात पैदा कर दिए जायेगे की उनकी मौत हो जाए.  राजिव त्यागी के साथ जो कुछ भी हुआ वोह महज़ एक हादसा नहीं था.  बल्कि सोची समझी साजिश के तहत उनका क़त्ल किया गया है.   जहाँ तक इस सहाफी और उसकी टीम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट ने जानकारी निकाली है उससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है की त्यागी के सामने ज़ाफ़रानी महाज़ का स्पोक पर्सन और ज़ाफ़रानी सहाफी की सख़्त ज़ुबानी और तल्ख़ लहजे ने उनका क़त्ल किया.  दोनों, तीनो, चारों ने मिल कर उनका मोब लीच किया है.  दूसरी एक और बोहोत ही एहम खुलासा करता हूँ.  बेंगलोर का वाक़िया भी इस मुद्दे से जुड़ा हुआ है.  और उनके क़त्ल पर ज़ाफ़रानी पार्टी और उसका स्पोक पर्सन, साहाफी चारो जानिब घिरे तो उस तपिश को ठंडा करने के लिए पैगम्बर की शान में ग़ुस्ताख़ी की गई.  अब उसका पूरा फायदा बोलने की आज़ादी को ले कर ज़ाफ़रानी पार्टी उठा रही है.  ताके त्यागी के खून को महज़ एक हादसा क़रार दिया जा सके.   और बैंगलोर की आतिश में सब कुछ जल कर राख हो जाए.  जब मुस्लिम अपने पैगम्बर की शान में पूरा बंगलोर आतिशे नार कर सकतें हैं तो मुल्क की दिफ़ा के लिए क्या हमारे स्पोक पर्सन सख़्त अलफ़ाज़ का इस्तेमाल नहीं कर सकते.  लेकिन फ़र्क़ है.  मज़हबी और सियासी शख़्सियत में ज़मीन आस्मां का फ़र्क़ होता है. दूसरी बात राजिव त्यागी की हत्या एक सोची समझी साजिश थी. उस साजिश और क़त्ल के ऊपर कफ़न  पैगम्बर की शान में गुस्ताखी कर के की गई.  लेकिन उसके बाद के जो बंगलोर में हालात हुए वोह अवाम के जज़्बात और उनका गुस्सा था.  हर बद अमली, खून, दहशत में ज़ाफ़रानी तंज़ीम उसके कारिंदे और  खरीदे हुए सहाफी, पुलिस, फौज शामिल हैं अवाम नहीं.  अवाम ने वही किया जो उसको करना था. 


सख़्त घडी है आई,

यह कैसी भगवा आंधी आई,

अपने साथ तबाही लाई.

एक ही मज़हब एक ही खून

फिर कियूं करते हो लड़ाई

 

मौतों के सौदागर बन गए हो तुम आज

जो कभी करते थे अमन की बात

ख़रीद लाये कफ़न भी साथ

कर दिया खूने जिगर

त्यागी मर्यादा

 

सहाफत हो या सयासत

सब ने कर दिया बर्बाद भारत

कहने ना देते हो, वोह बात, जो है हुकूमत के ख़िलाफ़

फिर करते हो दावा की हम है आज आज़ाद.

 

हर उस आवाज़ को दबा डाला,

हर उस आवाज़ को कर दिया क़ैद

जो करते थे हक़ की बात

 

तालिबे जामिया, मशरिक़ या शुमाल

अलीगढ़ हो या जवाहरलाल

सहाफत या हो सियासत

जो करे तुम पर तनक़ीद या हक़ की बात

कर दिया उसको क़त्ल या पस्त

लगा कर मज़हबी इलज़ाम, तिलक या गद्दार

 

जिस आज़ादी में अवाम कर ना सके हुकूमत के ख़िलाफ़ दिल की बात

ऐसी आज़ादी से तो कई गुना अच्छी थे गुलामो वाली बिसात

उस दौर में एक आस थी एक उम्मीद थी के होंगे हम कामयाब

होंगे हम एक दिन आज़ाद.

 

आज बोहोत तनहा हूँ.

ना ही कर सकता हूँ अपने दिल की बात

ना ही कर सकता हूँ हुकूमत के ख़िलाफ़ एहतेजाज

किस के साथ बनाऊं जश्ने आज़ादी

कैसे कहूँ में हूँ आज़ाद.

 

अब तो ना कोई उम्मीद रही बाक़ी

ना है कोई राह गुज़ार

चारो तरफ अमवात हैं, तारीकी है

मायूसी, ना उम्मीदी, और है ख़ामोशी

फिर भी शान से कहो

तुम्हे मुबारक हो आज़ादी.

 

सहाफी जुबेर 

Friday, 14 August 2020

Happy Independence day, where we are such a fortunate.

 

Happy Independence day, where we are such a fortunate.



یوم آزادی مبارک, ہماری ایسی قسمت کہاں

میں پاکستان کی حکومت اور پاکستان کے 

عوام کو یوم آزادی کی دل کی گہرائیوں سے مبارک بعد  

پیش کرتا ہوں. پاک عوام خوش قسمت ہے، جو ظلم ,تشدد، تاسب,

جاتیواد، نفرت، نا انصافی اور تسوب کی  بگ سے آزاد 

ہو گئے ، اور ہم سب مسلمان آج بھی ہندوستان  میں اسی

طرح برداشت کر رہے ہیں

مزید میں خوش خرم, سبز, مضبوط اور پاکستان کی فلاہ کی دعا

کرتا ہوں. دشمنوں نے ہمیشہ پاکستان کی طاقت ہمت اور 

اخوان المسلمین کو توڑنا چاہ لیکن ان کی گندی, گلیز 

ہیکمتے املی کو اب فتح نہیں ملیں گے . دشمنوں کو 

ہمیشہ سخت جھٹکا اور جللا لت ملیں گےانشا اللہ. میں مالک 

حقیقی سے دعاگو  ہون کہ پاکستان, اسلام اور مسلمانوں ک 

دشمن ہمیشہ الٹے منہ گرے, روسووا ہو, ذلیل ہو

 

زبیر احمد خان

صحافی


Sunday, 2 August 2020

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...