अज़ीज़, मोहसिन, फरिश्ता।
खारघर नई बम्बई का एक आला और जदीद क़स्बों में से एक है। जहाँ आला माशी मआशरा रहता है। ख़ुशक़िस्मती से सहाफ़ी भी इस शहर खारघर में रहता है। अब सहाफ़ी के मज़मूनों और ख़बरनामों में दिए गए तब्सिरों का असर हूकूमती निज़ाम पर भी पड़ने लगा है। खारघर में सायन पनवेल हाईवे पर तमाम महाराष्ट्र और महाराष्ट्र के बहार जाने के लिए बस टैक्सी मिलती है। उस पॉइंट को आधिकारिक तोर पर हिंदी में लंगूर बिन्दु और अंग्रेज़ी में मंकी पॉइंट के नाम से जाना जाता है। यह चौराहा ३ लंगूर बिन्दु अब आहिस्ता आहिस्ता काफी मशहूर होने लगा है। ज़ोमेटो में ३ मंकी रेस्टोरेंट में खाने की सहूलियत दी है। वहीं बिल्डर लॉबी भी अपने फ्लैट की अच्छी क़ीमत मिलने के इश्तेहार दे रहें हैं प्रॉपर्टी नियर ३ मंकी पॉइंट।
इस मसरूफ चौराहे को लंगूर बिन्दु नाम देने
की भी बोहोत अहम वजह है। चौराहे के बीच में
३ लंगूरों के बड़े मुजस्समे नसब किये गए हैं।
जिसकी वजह से इस चौराहे का नाम ३ लंगूर बिन्दु या ३ मंकी पॉइंट पड़ गया।
भारतिय मिडिया के ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों ने वतन के लिए कुछ कमाया हो या नहीं लेकिन सहाफत की साख कम करने में अपना मखौल उड़वाने में अपने जिस्म की नुमाइश करवाने में खूब नाम कमाया है।
जैसे एक तवायफ अपने आक़ा को पूरा मुत्मइन करती है लेकिन उसको जिस्म फ़रोश बोला जाता है वैसे ही लँगूरनियों को जो अपने सियासी आक़ा को पूरा सियासी नफ़ा देने के लिए अपनी जिस्मानी फरोशी के बजाये ज़हन फरोशी करती है तो उनको ज़हन फ़रोश बोला जाता है और मीडिया के लंगूरों को सियासी एजेंट।
इन लंगूर और लँगूरनियों की जमात ने जितना भारत का नुकसान २०१४ से किया है उतना तो बरतानिया हुकूमत में भी नहीं हुआ था। अगर यह ग़द्दारे वतन लंगूर और लँगूरनियाँ अपने आक़ा का मफ़ात देखने के बजाये वतन के बारे में सोचते और हुकूमत की किसी भी ऐसे मुद्दे पर खिचाई करते जो वतन की साख आलमी बरादरी के सामने कम करती है, तो आज भारत की बेइज़्ज़ती उस दर्जे तक नहीं पहुँचती की उसको बेनक़वामी सतह पर अब बोलने की भी इजाज़त नहीं है। वहीँ अदना से अदना मुमालिक भारत को आँख दिखा रहे हैं। जो बांग्लादेश भारत के रहमो करम पर क़ायम हुआ था हिन्दू मुस्लिम फसाद पर वहां की वज़ीरे आज़म ने मोदी और बीजेपी को नसीहत दे डाली। बोलतीं हैं मोदी हुकूमत बीजेपी और संघ के ज़हरीले बोलों पर पाबन्दी लगाए उनकी ज़हरीली ज़ेहनियत से हमारे मुल्क में काशीदगी पैदा हो रही है और भारत की वजह से हमारे अवाम में ज़हर भर रहा है।
वहीँ दूसरी जानिब जिस कश्मीर फाइल की झूठी फरेबी और मुतासिब कहानी को खुद मोदी ने सराहा था और उस फिल्म की तारीफ की थी इसराइल के डायरेक्टर जनाब लुपिड ने आलमी अवार्ड में उस फिल्म को बकवास, बोगस स्टोरी बोल कर कोई दर्जा ही नहीं दिया। फिर उस फिल्म के बारे में तो लंगूर लँगूरनियाँ क़सीदे कस रहे थे उसका इश्तेहार कर रहे थे। लेकिन आलमी सतह पर मामला सब टाये टाये फिस्स हो गया।
क्या यह लंगूरों के लिए किसी ज़लालत से कम नहीं।
सहाफ़ी ज़ुबेर