AUTONOMOUS
JOURNALIST
Eid Milan
programme in Pakistan
https://autojourna.wordpress.com/2020/10/30/eid-milan-programme-in-pakistan/ via @journalistzuber
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(BSF) का सब इंस्पेक्टर दीफाई फोजों के साथ लड़ते हुए मारा गया उसको दीफाई फौजों की हार्ट अटैक यूनिट ने मौत के घाट उतारा है। काम तमाम किये हुए खाकी आतंकी की पहचान शशांक रावत आला ज़ात का हिन्दू के रूप में हुई है और वोह महज़ २८ साल का जवान था। मारा गया आतंकवादी का बाप शिव चरण रावत पलवल के गांव धतीर में प्रोफेसर की हैसियत से काम करता है और उसकी माँ सुनीता एक निजी स्कूल में टीचर है। इस आतकवादी को जो संस्कार उसके घर से मिले थे उसी पर चल कर वोह हिन्दू आतंक की फाॅर्स में शामिल हो गया था। फिर इसके माँ बाप जो बच्चो में ज़हर भरने का काम करते होंगे, वैसे भी भारत में आज कल टीचर और प्रोफेसरों की हैसियत हिन्दू आतंक को बढ़ावा देने की हो गई है। जिसका ज़िक्र यह सहाफी कई मज़मूनों में कर चूका है।
मारा गया आतंकवादी हरयाणा का रहने वाला था। उसके मौत की वजह दिल में ज़बरदस्त खौफ और फिर दिल फट जाने से हुई। हार्ट अटेक।
मारा गया आतंकवादी शशांक की लाश को उसके पलवल की आदर्श कालोनी में लाया गया जहाँ उसके बाप शिव चरण रावत ने उसको जला डाला। मारे गए आतंकवादी की बहिन श्रीनगर में युवाओं में आतंक का ज़हर भरने का काम करती है। कहने को तो वोह डॉक्टरों है लेकिन उसके अय्याशी और आतंक की कहानी और कुछ है।
शशाक की महज़ २८ साल की उम्र में मौत से आतंकवादी के घर में मातम पसरा हुआ है। इस मौके पर आतंक की राजनैतिक विंग की मुख्या का मुख्या विधायक दीपक मंगला ने उसको श्रद्धासुमन दिए। एक आतंकी की लाश पर फूल डालने को ले कर पूरे देश में हगामा मच गया है। सभी पूछ रहे हैं की आतंक को बढ़ावा कब तक देती रहेगी भगवा तंज़ीमे। इस मौके पर विधायक उक्त आतंकवादी को देश का सपूत बोला और उसकी मौत को शहादत का दर्जा दिया। आगे उसने कहा एक वीर सपूत देशसेवा में शहीद हो गया उनके योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता। उनकी कमी कभी कोई पूरी नहीं कर सकता। विधायक के बयान के ऊपर भी सभी ने सख़्त एहतेजाज दर्ज किया है जिसमे उक्त विधायक दीपक मंगला आतंकी मौत के गुणगान और महिमा मंडन कर रहा है।
वमा अर्सलनका इल्ला रेहमतुल लीलआलमीन,
ब्रादराने मिल्लते
इस्लामियाँ,
सब से पहले इश्क़े रसूल में डूबे और सराबोर हुए तमाम मुस्लिम अवाम को ईद ऐ मिलाद की मुबारकबाद पेश करना चाहता हूँ। इस मुबारकबाद के हक़दार वोह मुनाफ़िक़ और बदबख्त, बदअक़ीदा कत्तई नहीं हैं, जो मिलादे मुस्तफा को बिदअत और गुनाह क़रार देतें हैं। और बोलतें हैं ऐसी ईद को बनाने वाले तमाम बिदअती जहन्नुम का ईंधन होंगे।
यह ख़वारा की नस्लों वाले बदबख़्त और बद अक़ीदा वही हैं जो कम इल्मी और इश्क़ से महरूम रहने की वजह से बंजर हो गए। अब इनकी तादात घटती जा रही है। दरअसल इन लोगों ने इश्क़ किया ही नहीं, अगर यह लोग इश्क़ करते तो इनको पता पड़ता की दुनिया की आग तो क्या जहन्नुम की आग भी इश्क़ करने वाले को रहत और सुकून फ़राहम करती है। क्योंकि माशूक़ को चाहत होती है उस इश्क़ को ज़ाहिर करने की जो उसको अंगारों में भी सुकून फ़राहम कर रहा है। दूसरी बात आशिक़ और मजनू को यह होश किधर रहता है की उसको अंगारों पे लिटाया जा रहा है या उसको अज़ीयत दी जा रही है उसको तो सुकून मिलता रहता है अपने प्रियतम का दीदार करते हुए, और उसको उस मंज़िल को पाना है जहाँ पर पहुंचने की हर शे ख़्वाहिश होती है, वोह तो चाहत के जूनून में काम करता रहता है और अज़ीयत का उसको होश ही नहीं रहता, क्योंकि वो देख रहा होता है गेसुए मुबारक और हसीन रुख़्सारे मुस्तफा।
नाज़रीन आप लोगों को मुस्तुफा जाने रेहमत की शान में क़सीदे और पीरो तरीक़त के बारे में कलाम भेजता रहता हूँ और आप हज़रात उस कलाम से बा ख़ूबी वाक़िफ़ होंगे।
अब ज़रा वाहियात और ना ज़ेबा कलेमात भी मुलाहेज़ा फरमाइए, अभी तक आप हज़रात को पाक कलाम और नाते रसूल भेजता था लेकिन कुछ हज़रात को उस कलाम से इज़ा पहुँचती थी, और वोह इश्क़े रसूल को मिलादे मुस्तफा को बिदअत, गुनाह बोलते थे। तो अब इस सहाफी ने ते किया है अय्याशी वाले कलेमात ज़िना करते हुए मर्द और औरत (ब्लू फिल्मे) हरामकारी करते हुए वीडियो बरहना मर्द और औरतें शराबख़ोरी करते हुए ऐसे वीडियो और निहायत ही अय्याश नुमा दोहरे मायने वाले नग्मे शाया किया करूंगा।
महज़ दो सूरतें हैं एक पाक दूसरी ना पाक, इसके दरमियान तीसरी कोई सूरत ही नहीं है। अब आप तमाम हज़रात से गुज़ारिश करता हूँ जिनको अय्याशी और वाहियात हरामकारी करते हुए वीडियो पसंद हैं ऐसे गुनाहे कबीरा करने वाले दोहरे मायने वाले शेर पसंद हैं वोह उसको तस्लीम कर लें और जिनको नबी की शान में कसीदे पाकीज़ा शेर पसंद हैं नातिया कलाम पसंद है वोह उसको तस्लीम करे।
इन दो सूरतों में से आपको क्या पसंद है आप खुद ही ते कर लीजिये। अगर नातिया कलाम और पाकीज़ा शेरों से आपको घबराहट और तकलीफ होती है तो आपके लिए वाहियात और गलीज़ शेरों का रास्ता खुला है।
हमारी सोसाइटी में एक मुनाफ़िक़ रहता है शायद दज्जाल कादयानी होगा, उसको बुज़ुर्गाने दीनों से लिल्लाहि बुग्ज़ और कीना; रसूल से अदावत उनकी शान में ना ज़ेबा कलेमात बोलना और सबसे बड़ी बात उसको कभी भी जुमे की नमाज़ तरावीह जो दो तीन मस्जिदें हैं उनमे से किसी में नहीं देखा, मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए नहीं देखा लेकिन ज़ाहिर ऐसा करता है जैसे की इस्लाम इसी के कंधो पर लदा हुआ है। पेशानी पर काला घट्टा दाढ़ी वगेरा सब कुछ लेकिन हर बार मिलादे मुस्तफा से पहले तन्क़ीदी उसका ही वीडियो सबसे पहले आता था। वतन के नाम पर मर मिटने की बातें उससे करवा लो और हर २६ जनवरी, १५ अगस्त उसको सरे फेहरिस्त देखा जा सकता है, उसको मिलादे नबी से नबी के जुलूस से तकलीफ है लेकिन भारत की योमे आज़ादी और योमे जमुहरिया में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेने और जुलूस वगेरा में शामिल होने में उसको कोई तकलीफ और परेशानी नहीं। यहाँ तक की जन गण मन पढ़ने और वंदे जैसे ज़हरीले और दहशत को बढ़ावा देने जैसे नारों से उसको कोई तकलीफ नहीं।
२०१९ में ईद मिलाद से क़ब्ल वही मौलानाओं की ख़ास जमात जिनका वीडियो हर साल डालता था उस साल भी डाला. मौलानाओं की एक जामात लगी वही पुराना फलसफा बताने रसूल ने नहीं किया सहाबा ने नहीं किया क़ुरान से साबित नहीं हदीस में कही ज़िक्र नहीं फिर क्यों बनाते हो, उसके ऊपर बद्दुआ दी थी, दिल से निकल गई। वोह दिन शायद जुमे का था और नमाज़ पड़ कर आया और वीडियो देखा फिर क्या था बोल दिया की अब पड़ लो नमाज़ बाबरी में हम राम का साथ देंगे। फिर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो दिया ताना गई बाबरी हाथ से और भेजो मिलाद नबी के खिलाफ वीडियो, दूसरी बद्दुआ दी थी मिलाद का ज़िक्र क़ुरान में कही नहीं है तो उस हिसाब से रमज़ान का भी ज़िक्र नहीं है अब में मेरे तमाम चाहने वालों से कहूंगा की इस साल रमज़ान की कोई तैयारी ना करें, ना तरावीह पड़ने जाएँ और ना ही नमाज़ें पड़े, एक आम महीने के जैसे बनाये इस साल के रमज़ान। जबकि वोह मेसेज सिर्फ ५ लोगों को भेजा था और कोई वायरल भी नहीं किया था लेकिन अल्लाह का करना ऐसा हुआ की २०२० में वाट लग गई। रमज़ान गए, जुमा गया नमाज़े गई, मस्जिदें बंद, उसके ऊपर हज गया क़ुर्बानी गई।
अभी तो काबा और रोज़ाये रसूल बंद हुआ है, अगर अभी भी नहीं सुधरे तो अल्लाह की रेहमत के दरवाज़े बंद हो जायेगें। यह बद्दुआ है। तुम करने जाओगे सवाब का काम और दर्ज होगा गुनाहों की फेहरिस्त में। सरे बाज़ार बरहना नज़र आवोगे। रेहमतुलील आलमीन के मिलाद से जिनको तकलीफ है फिर ऐसे लोगों को नबी की दुनिया में रहने की कोई ज़रुरत नहीं है। ऐसे लोग अपना ठिकाना किसी और दुनिया में तलाश लें।
यह तो अपनी अपनी फ़ितरी सोच है। वैसे भी सोशल मीडिया कम अय्याशी का अड्डा नहीं है। यहूद और नसारा तो लगे हैं पीछे, तो बस अब तैयार रहो दो रास्तों को चुनने के लिए एक अय्याशी, हरामकारी वाला दूसरा रहमतों वाला। अब देखना यही होगा की इन रास्तों पर चल कर कौन भटकता है और किस को हिदयात नसीब होती है। फिर असली वली और अल्लाह वाला वही होगा जो तमाम कीचड, गंदगी और गलाज़त को पार कर के अपने पैरहन पर उस गंदगी का एक भी क़तरा नहीं लगने दे और पाक कपड़ों के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर हो और नमाज़ क़ायम रखे।
Imran Khan drags India into his letter to Facebook
opposing Islamophobia.
https://autojourna.wordpress.com/2020/10/26/imran-khan-drags-india-into-his-letter-to-facebook-opposing-islamophobia/
Journalist Zuber Ahmed Khan
@JournalistZak
https://autojourna.wordpress.com/2020/10/25/severe-bombardment-of-pakistan-on-war-zone/ via @journalistzuber
Journalist Zuber
Ahmed Khan
@JournalistZak
https://autojourna.wordpress.com/2020/10/23/no-more-370-for-kashmir/ via @journalistzuber
अज़ीज़ नाज़रीन,
आज आप लोगों के दरमियान इस्लाम और मुसलमानो के बीच इख़्तेलाफ़ फैलाने और नबी की मोहब्बत को पामाल करने की यहूद-नसारा, काफिरों और मुनाफ़िक़ों की साजिश को ले कर हाज़िर हुआ हूँ. हर वक़्त ईद मिलाद के नज़दीक कुछ खुसूसी मौलानाओं की जमात के हमले तेज़ हो जातें थे, इस साल अल्लाह का करम है कोई भी वीडियो या बयान नहीं आया। उसकी वजह मार्च २०२० से अल्लाह का क़ेहर जिसमे सभी को सबक़ मिला। नमाज़ें गई, जुमे गए, रमज़ान गए, ईद गई, हज गया रौज़ए अक़दस की ज़्यारत गयी।
ये बात इस सहाफी ने अपने बोहोत से मज़्मूनों में वाज़े अलफ़ाज़ में कह दी है नबी सल्लाहो अलैहे वस्सलम का फरमान है की अगली उम्मत में ऐसे ऐसे मुसलमान आएंगे जिनके ज़िक्र, नमाज़ों और इबादात के आगे हर कोई अपनी इबादत को पस्त जानेगा. जिनका हर अमल इस्लाम के हिसाब से होगा. तक़वा होगा, तहम्मुल होगा, ज़िक्र होगा, इबादत होगी, परहेज़गारी होगी. लेकिन वो लोग दीन से ऐसे ख़ारिज होंगे जैसे की कमान से तीर. इतना सब होने के बाद कमी फिर किस चीज़ की होगी, वो होगा अदब मुस्तुफा और इश्क़े रसूल.
इस
सहाफी का फलसफा है और वो ये मानता है की अँधेरे को रोशन करने के लिए एक ही चिराग़ काफी
है और अँधेरा करने के लिए तमाम चिरागों को गुल करना पड़ेगा. फिर जिस हिसाब से ये मौलानाओं की ख़ास जमात नबी के
ऊपर हमलारेज़ होते हैं अगला निशाना और हमला इनका काबा तूल अल्लाह, क़ुरान और फिर इस्लाम
ही होगा. वो कैसे में समझाता हूँ.
१९२०-२५
तक नबी सल्लाहो अलयहे वस्सलम के अबाही घर पे तमाम हाजी हज़रात जाते थे और वहां पे बा
क़ायदा खड़े हो कर सलात और सलाम पेश करते थे.
२४ घंटे मिलाद का एहतेमाम खुद इंतेज़ामिया और सऊदी हुकूमत की
जानिब से होता था. फिर उस घर ऐ मुबारक को मिस्मार कर दिया गया. जन्नतुल बक़ी से तमाम साहब ऐ किराम रिज़वानुल्लाहे
अजमईन के मज़ारात ख़ातूने जन्नत का मज़ारे मुबारक तहलील कर दिए. दलील ये
दी गई के नबी के घर में हाजी हज़रात जा कर बिदअत करते थे हदीस और क़ुरान में कही भी नबी
के घर की ज़ियारत और उसकी अज़मत और क़ब्रों की ज़ियारत का ज़िक्र नहीं आया है सिवाए मस्जिदे
नबवी के. ठीक है बिलकुल सही है.
लेकिन
आप क़ुरान का हुकुम मान के नबी की निशानियां नहीं मिटा रहे हो, बल्कि यहूद मंसूबे को
पूरा करने की वजह से आप तमाम निशानियां मिटा रहे हो. जिस नबी की वजह से आज इस्लाम को लोग जानतें हैं
कल ये ही निशानियां सबूत होंगे की इस्लाम हक़ मज़हब है और क़ुरान जिसकी दलील दे रहा है. अगर दलील के बाद सबूत ही नहीं होंगे आप सबूत ही
मिटा दोगे तो ५०००, १०००० साल बाद आपकी किस बात पे अवाम यक़ीन करेगा.
दूसरी
बात अल्लाह क़ुरान में फार्मा रहा है की सफ़ा और मरवा की पहाड़िया अल्लाह की निशानियों
में से हैं. इन्तेज़ामियाँ ने पूरी सफ़ा और मरवा
की पहाड़ियों को ढांक दिया अब सिर्फ ऊपर ऊपर थोड़ी थोड़ी पहाड़ की नोकें बची हैं. मतलब अल्लाह की निशानियों को पोशीदा कर दिया.
वोह पेड़ जिसके साये तले नबी पाक ने सहाबा की बैत ली थी जिस पेड़ का और नबी के हाथ में साहिबा की बैत का ज़िक्र क़ुरान २६वे पारे में अल्लाह खुद कर रहा है. और उस पेड़, नबी और उनके साहबियों पर अल्लाह की रेहमत है। वोह पेड़ कहाँ गया उसको उखाड़ कर फेकने के पीछे क्या फलसफा है. वैसे भी दुनयावी हिसाब से देखा जाए और अक़वामे मुताहिदा के क़ानून के हिसाब से हरे भरे पेड़ को बिलडोज़र से जड़ से उखाड़ फेकना क़ानूनन जुर्म है, ऐसा करने वाले मुल्क के खिलाफ आलमी फौजे एक्शन ले सकती हैं। ग़ारे हिरा को बूझा देने या पोशीदा करने के पीछे की क्या मंसूबा बंदी है।
कुछ
नहीं यह यहूद-नसारा, काफिर और मुनाफ़िक़ों की
साजिश है, अगर किसी क़ौम को तबाह करना है और तारीख़ में उसको ख़तम करना है तो उसके रहबर और क़ायद
के लिए
बदगुमानी पैदा कर दो. वोह इश्क़ ही ख़तम कर दो जिसकी वजह से वोह
क़ौम अपने क़ायद के लिए मर मिटने पर तैयार रहती है। और यहाँ सवाल सिर्फ क़ायद का नहीं बल्कि अल्लाह की ख़ास तवज्जो और रूहानी कूव्वत
का भी है। नबी सल्लम की मोहब्बत ख़त्म
अल्लाह की ताक़त और क़ुव्वत ख़तम फिर हम हो जायेगे इनपर ग़ालिब। पहले इन लोगों ने बुर्ज़ुर्गाने
दीन के ख़िलाफ़ बदगुमानी
पैदा की, उनके इश्क़ को ख़तम कर दिया. उसके बाद अगला हमला खुलफ़ा ऐ राशिदीन और सहाबा ऐ इकराम
फिर नबी की आल दुख्तराने जन्नत और इमामे हुसैन
की मोहब्बत को ख़त्म कर दिया बिल आखिर हमला रसूले अरबी की ज़ात पर हुआ. आख़िर हमला काबातुल्लाह और सीधा
अल्लाह के वजूद पर ही होगा. यह
अरब अगर मुस्लिम हमदर्द होते तो बाबरी मस्जिद जो अल्लाह का घर है उसके ऊपर काफिर दहशतगर्दों
के ऊपर हमला कर देते। दिल्ली में क़ुरान की
पूरी की पूरी अलमीरा जला के राख कर दी मस्जिदों की बेहुरमती की लेकिन अरब खामोश रहे। इनको यहूद का इशारा था की कुछ मत बोलना। चलो नबी की ज़ात से तुमको तकलीफ है लेकिन क़ुरआन
तो अल्लाह का कलाम है, मस्जिद तो अल्लाह का घर है, फिर क्यों ख़ामोशी इख्तियार की। दज्जाल ऐसे
ऐसे शैतानी करिश्मे
दिखायेगा की बद अक़ीदा
और कमज़ोर ईमान वाले जिनके पास इश्क़ और मोहब्बत
का ईंधन कमजोर होगा,
जिनके पास खुशबू की कमी होगी उनके चिराग बुझ जायेगे वही लोग बहक जायेगे और दज्जाल को ही ख़ुदा तस्सव्वुर कर सजदा रेज़ हो जायेगे.
लेकिन जिनको अल्लाह
हिदायत दे देगा और जिनके पास मुस्तुफा की
मोहब्बत का ईंधन लबरेज़ होगा जो लोग मुस्तुफा के इश्क़े
हक़ीक़ी से बखूबी वाक़िफ़ होंगे वोह लोग मेहफ़ूज़ रहेगें.
सीधा सा फलसफा है किसी हस्ते खेलते खुशहाल
घर को बर्बाद
करना है तो मिया बीवी के दरमियान
की मोहब्बत वाल्दैन और
औलाद के दरमियान
की मोहब्बत को न इत्तेफ़ाक़ी
और नफरत में बदल दो. वही फलसफा क़ौम और मिल्लत पर लागू होता है. किसी हस्ती खेलती क़ौम को बर्बाद करना है तो उनमे आपस में
नाइत्तेफ़ाक़ी और नफरत भर दो. उनके रहबर और क़ायद के ख़िलाफ़ बुग्ज़ कीना और बदगुमानी
भर दो वोह क़ौम अपने आप अल्लाह
की रेहमत से दूर होती जाएगी. क़्योंके इश्क़
एक ऐसी दवा है जो अच्छे अच्छे मूज़ी मर्ज़ को ठीक कर देता है.
ख़्वाह वोह इश्क़ हक़ीक़ी हो या इश्क़े मजाज़ी. अगर कोई दो नर मादा आपस में उस हद तक प्यार करते हैँ की अगर दोनों में से कोई एक जुदा हुआ
तो दोनों मर जायेगे तो ऐसे जोड़े के प्यार में अल्लाह
अपनी कायनात के निज़ाम भी तब्दील कर देता है. और वही फलसफा इश्क़े हक़ीक़ी के लिए है. अगर कोई मोमिन या मोमिना मुस्लिम
या मुस्लिमा रसूले अरबी से उस हद तक इश्क़ करे की उनकी शान
में एक बदगुमानी
उसकी जान पर बन जाए तो अल्लाह
ऐसे प्यार करने वालों के ऊपर रेहमत नाज़िल करता है. फिर जब इश्क़ का जूनून मज़ीद आगे बढ़ता है और अल्लाह
से प्यार का सिलसिला शुरू होता है तो अब ऐसे बन्दे की रज़ा और
दिली तस्कीन के लिए अल्लाह
अपने निज़ामे कायनात
को भी तब्दील
कर देता है. फिर होता क्या है अब जैसा वोह
आशिक़ सोचता है चीज़ें
वैसी होना शुरू हो जाती है। सिर्फ दिल में ख़्याल करता है अल्लाह उसकी मर्ज़ी को फ़ौरन पूरा करता है. दूसरी बात ऐ इश्क़ सिर्फ नमाज़ पड़ने से नहीं होता. यह आशिक़ और माशूक़ का फलसफा ही अलग है.
यह तसव्वुफ़ की पहली सीढ़ी होती है. वार्ना
तो इब्लीस ने कम सजदे नहीं किये, सबसे
अज़ीम और फरिश्तों
का सरदार था. फुकहा बतातें
हैँ दोनों आलम का कोई सा ज़र्रा और खित्ता
बाक़ी ना होगा जहाँ इब्लीस
ने सजदा न किया होगा. लेकिन महज़ एक सजदा ना करने से राहे गांजा हुआ और लानत का तोग सुबह क़यामत तक उसके गले में लटका दिया.
अब इब्लीस
को काम भी बारी तआला ने वही दिया, जा तू बहका हर मोमिन-मोमिना
को हर मुस्लिम
मुस्लिमा को और आलमे इंसानियत को तबाह कर बर्बाद कर तेरे को सुबह
क़यामत तक खुली छूट है. लेकिन ऐसा करते वक़्त अल्लाह ने एक शर्त रख दी लेकिन जो मेरे अज़ीज़ और प्यारे
बन्दे होंगे फिर भी तेरे बहकावे से दूर रहेंगे.
अब में उन लोगों से पूछना चाहता हूँ जो बुज़र्गाने दीन से आगे बढ़
कर रसूल्ललाहा तक पहुंच गए हैँ और आमाल की बातें करतें हैँ. के जब अल्लाह
ने शैतान को इतनी क़ुव्वत
दी के वोह कुछ भी कर सकता है उसका वार आगे
से पीछे से ऊपर नीचे से कही से भी हो सकता
है वोह कही से भी बहका सकता है तो जिन लोगों
का अल्लाह ने ज़िक्र
किया है,
क्या उनको इतनी क़ुव्वत फ़राहम नहीं करेगा की वोह शैतान को क़ब्ज़े में कर सकें. जिस शैतान को अल्लाह
ने सब कुछ करने की क़ुव्वत दी तो उसका उल्टा करने की क़ुव्वत
क्या बुज़ुर्गाने दीनों को
अल्लाह ने नहीं दी होगी बिलकुल दी है.
और शैतान का फितना यही से शुरू होता है पहले ऐसे बुज़ुर्गों
के लिए बदगुमानी
पैदा करो जो उसको इख़्तेयार में करतें हैँ, उसके बाद अल्लाह के रसूल पर बदगुमानी फिर अल्लाह के लिए बदगुमानी
फिर दीन से ख़ारिज.
मेरा फलसफा एक दम अलग है, अगर किसी वली
की कोई करामात ज़ाहिर हुई तो वोह बुज़ुर्ग अल्लाह के नज़दीक है ना की वोह बुज़ुर्ग ही
अल्लाह है. और वही सोच का फ़र्क़ है. अगर यह मान लिया की कोई भी बुज़ुर्ग
ही सब कुछ कर सकतें हैँ और अल्लाह नहीं तो गए काम से. लेकिन अगर यह माना की अल्लाह
ने इनको ताक़त अता की है इस काम को करने के लिए इनको मुताइन किया है तो वही सही बात है. जिस शैतान को अल्लाह अपनी नाफरमानी करने पर सुबह क़यामत तक तमाम क़ुव्वत और ताक़त दे सकता है तो क्या अल्लाह के फर्माबरदार बन्दों को अल्लाह बतौर इनाम कुछ भी क़ुव्वत और ताक़त नहीं देगा।
शैतान को किसी भी इंसान को ख़ास मोमिन को गुमराह
करने में एक सेकंड नहीं लगता है. और वस्वसे
शक शुकूक के वही नज़र होते है जो सिर्फ अल्लाह
वाले हैँ. क़्योंके शैतान
भी सिर्फ अल्लाह
वाला था और उसका वसीला भी नमाज़ थी. उसने अपनी नमाज़ों
पर तक्क्बुर किया ग़ुरूर किया “अना
ख़ैरुन मिनहूम” बस वही पर दच्चा
खा गया.
ऐसे सभी मुसलमान जो ईद मिलाद को बिदअत और गलत मानते है. ईद मिलाद की मुबारकबाद नहीं देते, मिलाद में शरीक नहीं होते, नाते रसूल नहीं पड़ते, ईद मिलाद के जुलूस और इजलास का एहतेमाम नहीं करते और ना ही शिरकत करते हैं. फिर अगर वो अपने वतन के किसी भी क़ौमी इजलास में शरीक होते है तो वो गुनाहे कबीरा कर रहे है. ख़्वाह वो वतन दारूल अमन ही क्यों ना हो. अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.
चिराग़ रौशन हम करेंगें यहाँ
होगी दूर तारीकी वहां।
छाता खोलेगें हम यहाँ
गर करोगे बदगुमानी तुम वहां।
सहाफी जुबेर
अक़वामे मुताहिदा की इंसानी हुक़ूक़ की अंजुमन (UNHRC) में पाकिस्तान और नेपाल को फिर से मुंतखिब कर लिया गया है, वाज़े रहे जहाँ चीन के मुज़ाहिरे में ख़ासा ज़वाल आया और वह अदना मार्जिन से एक सीट जीत पाया है, वहीं पाकिस्तान ने ना सिर्फ रिकॉर्ड मार्जिन से जीत दर्ज की है बल्कि अपना गुजिश्ता रिकॉर्ड मज़ीद मुस्तहकम और बेहतर किया है.
जनरल असेम्ली में बरोज़ मंगल को
हुए राये शुमारी में मुख़्तलिफ़ मुमालिकों में बेहतरीन इंसानी हुक़ूक़ की अमल करदा मुल्कों
में पाकिस्तान सरे फेहरिस्त रहा। चीन को १३९
वोट मिले, जबकि २०१६ में उसे १८० वोट मिले थे.
इस मुद्दे और चीन के ज़वाल पर ह्यूमन राइट्स वॉच के यूएन डायरेक्टर लुइस चारबोन्यू
ने एक तन्ज़िया ट्वीट किया। जिसका लब्बो लुबाब
यह दिखाता है कि 'कई सूबों में चीन में इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी के रिकॉर्ड से परेशान
हैं.
भारत के नक़्शे क़दम चलने वाला और हर मुद्दे पर भारत की पोशीदा या खुली हिमायत करने वाले सऊदी अरब को ४ सीटों के लिए हुए राये शुमारी में ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा है। यह सहाफी इस हार में भारत का ज़बरदस्त नुकसान देख रहा है। क्योंकि भारत सऊदी का और सऊदी भारत का हिमायती बन कर उभर रहा था। कश्मीर, फलस्तीन हिन्द पाक रिश्तों पर हर वक़्त सऊदी की राय पाकिस्तान से मुख़्तलिफ़ हिन्दुस्तानी मुवाफ़ेक़त की होती थी। लेकिन मालिके कायनात ने दिखा दिया जो राये पाकिस्तान की वही राये उसकी।
भारत ने सऊदी को एक मोहरे जैसा इस्तेमाल करने की जुर्रत की और अपने ख़स्ता हाल बोसीदा इंसानी हुक़ूक़ की नुमाइंदगी खुद ना करते हुए सऊदी को बार्रे सग़ीर में एशियाई और अलकाहील मुमालिकों की नुमाइंदगी करने के लिए राज़ी किया लेकिन उसको ९० वोट ही मिले, जबकी राये शुमारी जीतने के लिए उसे ९७ वोटों की ज़रुरत थी. सऊदी अरब की मक़बूलियत में भी भारी ज़वाल और पस्ती दर्ज की गई है। क्योंकि इसने २०१६ में १५२ वोट हासिल किए थे.
पाकिस्तान को १६९ और नेपाल को १५० वोट मिले. ये दोनों जुनूबी एशियाई मुमालिक तीन साल और काम करेंगे. उज्बेकिस्तान १६९ वोटों के साथ के साथ एशिया बेहरे अलकाहील से मुंतख़िब चौथा मुल्क रहा. भारत और बांग्लादेश २०१८ में आखिरी बार मुंतख़िब हुए थे और अगले साल के आखिर तक बाहर कर दिए जायेगें।
सहाफी ज़ुबेर की हालाते हाजरा पर नुक़्ता ऐ नज़र
दुश्मने पाकिस्तान का हर ग़लीज़ और पुरालूद हरबा पलट कर उस ही जानिब दो गुनी ताक़त और क़ुव्वत से लौटा दिया जा रहा है।
हाल ही में दो नए चेहरे सियासत और मज़हबी रहनुमाई के लिए जाने जायेगे। एक पाकिस्तान के इमरान खान और दूसरा सऊदी का अय्याश, हरामख़ोर शेहज़ादा सलमान। जहाँ एक जानिब पाकिस्तान के इमरान ख़ान तमाम गुनाहों और बदकारियों से तोबा कर के मज़हबे इस्लाम के फलसफे पर चल रहें हैं।जिस पर के चलने का हुकुम क़ुरान देता है, हदीस में बयान है और जिस पर चल कर बड़े बड़े हाकिमे वक़्त सल्तनते चलाते वक़्त अपने मज़हब को कभी भी फरामोश नहीं करते थे। जो इस्लाम का इन्साफ, हक़पसंदी का हुकुम वही उनका होता था। तो जहाँ इमरान ख़ान ने हिदायत पाई वहीँ दूसरी जानिब शेहज़ादा सलमान मुनाफ़िक़ों के हमराह चला और काफिरों, इस्लाम दुशमन, मुसलमानों के क़ातिलों की बोली बोलने लगा। फिर उस ही शहज़ादे ने नया मज़हब ईजाद कर डाला जदीद इस्लाम। पस ऐसे ही लोग अल्लाह की हिदायत से महरूम रहेंगे, और मज़हबी वाल्दैन के होते हुए भी नस्लें गुमराह हो जाएगी, और जिनको अल्लाह हिदायत देगा वोह गुमराही के अंधेरों से उजाले की जानिब आएंगे और कामयाब होंगे।
उइगर मुसलमानों के हक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी की बोहोत सी खबरे भारत में मन्ज़रे आम हुई और भारत ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया की चीन इंसानी हुक़ूक़ के हलके में क़दम ना जमा सके फिर उसने कई मुमालिकों को चीन के खिलाफ इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी में अपना हमख़याल बना लिया, बावजूद उन सभी के एतेराज़ के चीन भले ही अदना मार्जिन से लेकिन जीतने में कामयाब रहा. चीन की जीत इस बात की तस्दीक़ करती है की भारत का चीन और पाक के खिलाफ झूठा प्रोपोगंडा कुछ काम ना आया। इस तरह भारत को तीन ज़बरदस्त झटके लगे और तीन क़िले भारत के तबाह हो गए।
१. पाक का रिकॉर्ड मार्जिन से मुन्तख़िब होना और तमाम मुमालिकों में सफे
अव्वल रहना।
२. जिस सऊदी पर भारत ने जूआ खेला और दाव लगाया उसका ना सिर्फ पस्त
होना बल्कि पहले के मुक़ाबले मज़ीद मकज़ोर होना।
३. चीन के खिलाफ उदगीर मुस्लिम अवाम के खिलाफ फैलाया हुआ झूट फरेब कुछ काम ना आना। अब भारत को चाहिए की हमदर्दी दीगर मुस्लिम अवाम के लिए दिखाने के बजाये अपने मुल्क के मुस्लिम अवाम के लिए काम करे।
जिस पाकिस्तान के इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर बोहोत इश्तेआल अंगेज़ी करते थे झूट फरेब पर हसी मज़ाक़ करना मखौल उड़ाना लेकिन जब से इमरान पाकिस्तान में बे पनाह मार्जिन से मुन्तख़िब हो कर आये थे फिर भी इस्लाम और रसूले अरबी के सादगी के पैग़ाम को फैलाते हुए नज़र आते थे तभी इस सहाफी ने अपने तमाम मज़्मूनों में कहा था अब पाकिस्तान की तक़दीर तब्दील होगी।
इमरान ख़ान का अमल इस बात की तस्दीक़ करता था की वोह इस्लाम के पैरोकार और नबी सल्लम की सुन्नतों की पैरवी कर रहें हैं, ना की दिखावा। और जिसने अल्लाह के मेहबूब की सुन्नतों की पैरवी की और उनके इश्क़ में अपने आपको फ़ना कर लिया वोह शख्स रुसवा और ज़लील हो ही नहीं सकता।अल्लाह उसको इज़्ज़त देगा। और यही बात मेरे २०१८ के तमाम मज़मून में मेने इमरान के मुन्तख़िब होने के बाद कही है।
महज़ सऊदी का बाशिंदा होने से अल्लाह के इनाम और इकराम नहीं मिलते हैं
जो गुनाह किये हैं उसकी रूसवाई और ज़लालत तो मिल कर रहेगी। सऊदी हुक्काम काफिरों मुशरिकों मुनाफ़िक़ों को क़रीब
करते रहे और अल्लाह को दूर। मोदी को इसी सऊदी
ने इंसानी हुक़ूक़ का मुहाफ़िज़ का तमगा दिया दूसरा सऊदी का सबसे अज़ीम तमगा ऐ इंसानी दिया
इज़्ज़त अफ़ज़ाई की जिसका ज़ाफ़रानी पार्टी ने जश्न मनाया और हिंदुस्तान पाकिस्तान में मुक़ीम
मुस्लिम अवाम पर सख़्त तनक़ीद की, हमारे मोदी जी तो सऊदी में भी मक़बूल हैं, जहाँ से इस्लाम फैला और रसूले अरबी की पैदाइश गाह
है, वहां भी मोदी जी मक़बूल हैं। लेकिन बारी
इलाह को तो कुछ और ही मंज़ूर था। क्योंकि सऊदी
सल्तनत पर मोदी का सेहर असर कर रहा था सो वोह ग़ाफ़िल हुए। अभी अक्टूबर के पहले हफ्ते में शेह्ज़ादा सलमान
सऊदी के नज़दीक एक जज़ीरे पर रात की तारीकी में मग़रिबी मस्तूरातों के साथ उस तहज़ीब का
हिस्सा बन कर अय्याशी करते हुए मीडिया के कैमरे में क़ैद हुआ। फिर उसका दूसरा गुनाह क़तल करने का साबित हो चूका
है। बग़ैर किसी शराई उज्र उसने सहाफी खगोशी
का क़त्ल करवाया। तीसरा गुनाह इस्लाम को अपने
हिसाब से चलाने का गुनाह और नया मज़हब बनाना जदीद इस्लाम। जिसमे तमाम क़िस्म के जूए, शराबखोरी, मस्तूरातों
के साथ तालुकात जाइज़ हैं।
यह भी देखें
जो मुनाफ़िक़े इस्लाम नबी की मिलाद और आमद का जश्न बनाने पर फतवे लगाते हैं, क्या उनकी ग़ैरत इस बात की इजाज़त देती है की की अय्याश शहज़ादे की ना क़ाबिले बर्दाश हरकतों के ख़िलाफ़ भी फतवे दे सकें। जब दीन में किसी भी क़िस्म की तरमीम और इज़ाफ़त इन मौलवियों को बर्दाश्त नहीं वोह बिदअत हो जाती है, यहाँ तो शहज़ादे ने एक नया मज़हब शुरू कर दिया है, उसके ख़िलाफ़ एक भी फतवा नहीं आया।
यह मौलानाओं की जमात भी हाकिमे वक़्त से ख़ौफ़ ज़दा रहती है, जबकि अल्लाह से नहीं। इनका एक भी फ़तवा शहज़ादे सलमान के नए मज़हब के ख़िलाफ़ नहीं दिखा वहीँ आम मुसलमान पर हर ईद मिलाद पर फतवे जारी हो जातें हैं। मज़हब में इज़ाफ़त मज़हब में ऐसा काम करना जो नबी ने नहीं किया बिदअत है और हर बिदअती दलाला और हर दलाल जहन्नुमी। इनका फतवा आम मुसलमान के लिए होता है, ख़्वाह वोह मुसलमान नबी की आमद का जश्न बनाये अपने घरों में मिलाद और दरूद का एहतेमाम करे इनके नज़दीक वोह सब जहन्नुमी हैं। जबकी ऐसी महफ़िल सजाना जिसमे नबी की शान बयान की जाए नबी की नाते पड़ी जाए तो उस महफ़िल में अल्लाह के फ़रिश्ते नूर और रेहमत की बारिश करते रहतें हैं। जबकी होता क्या है नबी की आमद पर तो फतवे दे दिए जातें हैं लेकिन शहज़ादे की अय्याशी पर नहीं, बेरुन मुल्क मस्तूरातों के साथ मग़रिबी तहज़ीब के हामी हो कर रात भर गुनाहों की महफ़िल में शामिल रहा लेकिन एक भी फ़तवा नहीं आया।
वही मोदी के मदू करने पर भारत में सूफी इजलास में तमाम मौलाना अपना घागरा ऊपर उठा कर मोदी जी की एहलिया बन कर उसकी हम जींस ख़्वाहिशें पूरी करने के लिए उसके हरम में पहुंच गए।जबकी मोदी मुस्लिम नस्ल कुशी करने वाला इस्लाम को इज़ा पहुंचाने वाला दरिंदा है। फिर इनको सूफी का मतलब तो भी मालूम हैं इनकी हरकतों ने सूफी ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा बन्दे नवाज़, निज़ामुद्दीन औलिया (महबूबे इलाही), सलीम उद्दीन चिश्ती, सय्यद अली मीरा दातार इन तमाम वालियों के उसवाये हसना की अनदेखी की है, कोई भी सूफी किसी भी वक़्त के हाकिम के हरम का गुलाम नहीं बना। जो भी हाकिम होता था उन फ़क़ीरों के दर पर चोखट पर एड़िया रगड़ते हुए जाता था।
Journalist Zuber Ahmed Khan
@JournalistZak
Journalist Zuber Ahmed Khan
@JournalistZak
India become most popular destination of Corona after US.
https://autojourna.wordpress.com/2020/10/11/india-become-most-popular-destination-of-corona-after-us/
जम्मू-कश्मीर
के साबिक़ वज़ीरे आला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सबसे ज़्यादा तजुर्बेकार और बुज़ुर्ग
सियासत दान फारूक अब्दुल ने बरोज़ इतवार अपनी ख़्वाहिशात और उम्मीद का इज़हार किया कि
चीन की मदद से जम्मू-कश्मीर में मंसूख की गयी दफा ३७० फिर से अमलपैदा हो
जाएगी। फारूक अब्दुल्ला कहते रहे हैं कि दफा ३७० और दफा
३५ ए की बहाली और जम्मू-कश्मीर को भारत के एक सूबे का दर्जा दिलवाने के
लिए वो पुरअज़्म हैं.
ऐवान के मानसून इजलास के दौरान भी फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में ०५ अगस्त २०१९ से पहले के हालात बहाल करने की मांग कर चुके हैं।
सहाफी जुबेर की मसला ऐ कश्मीर की ताज़ा सूरते हाल पर नुक़्ता ऐ नज़र।
फ़ारूक़ साहब आप किस को बेवक़ूफ़ बना रहे हो, क्या आप यह समझते हो की कश्मीर का अवाम इतना ना
समझ और कम अक़ल है की वोह आप जैसे ज़मीर फरोश हिन्दुस्तानी की कश्मीर के लिए गद्दारी
और गले लग कर क़त्ल करने की हिकमते अमली से वाक़िफ़ ना होगा। चलो कश्मीर का अवाम आपके हिन्दुस्तानी मौक़िफ़ को
ना समझ पाए लेकिन यह हम जैसे सहाफियों की ज़िम्मेदारी होती है की हक़ और ना हक़ को अलहदा
कर के चीज़ों को अवाम के रू बरू रखा जाए। फिर
जमुहरियत में जो भी फैसला अवाम करे उसको माना जाए।
कश्मीर की अवाम की जानिब से फैसला करने वाले आप होते कौन हैं। ना तो आप कश्मीर की नुमाईंदगी कर रहे हो और ना
ही आप किसी हूकूमती निज़ाम का हिस्सा हो, तो
आप एक तरफा फैसला कैसे कर सकते हो। चीन से
आपको क्या चाहिए और क्या नहीं वोह आपका फैसला हो सकता है लेकिन जमुहरियत में अवाम का
फैसला आला होता है। और कश्मीर का अवाम अपना
फैसला सुना चूका है, ०५ अगस्त २०१९ से ले कर
किसी सूरत अवाम अपने आपको भारत का तस्लीम करने को तैयार नहीं है।
अभी तक आप लोग धोखेबाज़ों, ग़द्दारों, गले लग कर गर्दन उतारने वालों,
मुनाफ़िक़ों, इस्लाम मुस्लिम दुश्मनों, दहशतगर्दों के हामी बन ३७० की वकालत कर रहे हो। जैसे ३७० को एक ही झटके में मंसूख कर दिया था इस
बात की क्या ज़ामिन हैं की आगे ऐसा धोखा नहीं होगा। बेहतर है अब तो अलहदगी की बात कीजिये। या तो पाक के साथ जाइये या कश्मीर को अलग मुल्क
बनाइये। जो बार बार धोका खाये, जान गवाए उसको
बेवक़ूफ़ और जाहिल कहते हैं। पहला धोखा आपके
वालिद शेख अब्दुल्लाह ने खाया और राजा हरी सींग का साथ दिया और राजा ने भारत का।
फिर दूसरा धोखा तुमने खाया जब ३७० मंसूख कर दी गई। कश्मीर पर हिन्दू दहशत फैला कर जब्र और बर्बरियत
कर के अवाम का क़त्ले आम कर के नस्ल कुशी कर के मस्तूरातों की इज़्ज़त को पामाल कर के
कश्मीर को हिन्दू ने क़ब्ज़ा करना चाहा। अगर
कोई भी हीले बाज़ी से कश्मीर में कुछ भी हिन्दुस्तानी माफात या मोक़ूफ़ को देखते हुए तुम
एक तरफ़ा फैसला करोगे तो तुम्हारी नस्ले भुगतेगी और धोखा खायेगी।
अब तो हिंदुस्तान से अलहदगी की बात करो सिर्फ आज़ादी हिन्दुस्तान से
आज़ादी। तुम जैसे ग़द्दारे क़ौम और मिल्लत, कश्मीर
के दुश्मन हैं, जो हिन्दुस्तानी ज़ुबान बोलतें हैं। कश्मीरी अवाम के साथ कश्मीर के साथ तुम्हारी ग़लीज़
ज़ेहनियत और हिन्दुस्तानी ग़ुलामी साफ़ ज़ाहिर हो रही है। जिस चीन की मदद से ३७० की बहाली की उम्मीद दिखा
रहे हो, उसकी मदद से आज़ादी क्यों नहीं मागतें। क्योंकि अगर आज़ादी मांगी तो हिन्दुस्तान से कश्मीर
का रिश्ता ही टूट जाएगा, और ३७० मांगी तो राब्ता क़ायम रहेगा। कभी भी हिंदुस्तान फिर से वही हालात पैदा कर सकता
है जो ०५ अगस्त २०१९ को किये थे।
तुम्हारी नियत और ग़लीज़ ज़ेहनियत उसी वक़्त ज़ाहिर हो गई थी जब तुमने अड्डे
पर जा कर दहशतगर्दों से मदद मांगी थी, और ३७० बहाल करने की गुहार लगाई थी। जब एक चीज़ मोदी इन्तेज़ामियाँ ने मंसूख कर दी और
वोह समझती है की उसकी कोई ज़रुरत नहीं है फिर भी तुम उसके पीछे पड़े हो। या तो तुम बोहोत बड़े जाहिल हो या हिन्दुस्तान और
मोदी के इशारे पर चलने वाले मोहरे। तुम्हारा
किरदार वही है जो ज़ाफ़रानी पार्टी बीजेपी में ना सिर्फ वज़ीर रहे बल्कि अपनी खिदमात भी
वाजपाई को दी थी। फिर तुमसे कश्मीर के हक़
में सही और दुरुस्त फैसला करने की सलाहियत कहाँ रही। अवाम क्या चाहता है तुमको इस बात की फ़िक्र क़त्तई
नहीं है बल्कि हिन्दुस्तान क्या चाहता है उस बात को हल करने में ज़्यादा तवज्जो दिखा
रहे हो।
अब जब बात तक़रीबन भारत के हाथ से निकल गई है और कश्मीर तक़रीबन आज़ाद
हो चूका है तो तुम फिर से मरे हुए इंसान में जान डालने की हिकमत कर रहे हो। क्या यह कश्मीर की अवाम के साथ ग़द्दारी नहीं होगी।
जिस हिसाब से हिंद्स्तान की तक़सीम के वक़्त जो चाल नेहरू ने चली थी वही
चाल मोदी चल रहा है। जब हिन्दू दहशत और बर्बरियत
हद दर्जे बढ़ गई थी और हर सिम्त मुस्लिम अवाम को काटा जा रहा था तब यह ते हुआ था फील
वक़्त पाकिस्तान का किस्सा बंद कर दिया जाए और हिन्दुस्तान को तीन रियासतों में तक़सीम
रहने दिया जाए उसकी मरकज़ हिंदुस्तान के पास हो।
फिर किसी भी हिस्से को अगर कुछ भी मुस्तक़बिल में कोई कमी नज़र आती है तो वोह
आज़ादी की बात कर सकता है। जिसके ऊपर जिन्ना
साहब भी राज़ी हो गए थे। लेकिन नेहरू के बढ़
बोल उसको ले डूबे। वोह बोल बैठा की था, अंग्रेज़ों
को चले जाने दो और इक़्तेदार हमारे पास आने दो फिर क्या करना है हम जानते हैं। उसके ऊपर जिन्ना साहब फिर भड़क गए और उन्होंने कहा
हमारे साथ तुम धोखा करोगे, अगर मुस्तक़बिल में मुस्लिम अवाम के साथ जो बर्बरियत आज हुई
हुई है वही जारी रही तुम इक़्तेदार के नशे में मुस्लिम अवाम का दो गुना क़त्ले आम करोगे,
हमें पकिस्तान एक मुस्लिम रियासत दे दो। वही
हालात आज है। अब जब कश्मीर आज़ाद होने को है
तो तुम जैसे मुनाफ़िक़ों और ग़द्दारों को फिर से सर उठाने का मौक़ा मिल रहा है।
ना सिर्फ कश्मीरी अवाम को बल्कि हर मुस्लिम को मेरा ०५ अगस्त २०१९ के
बाद का मज़मून बा खूबी मुताला करना चाहिए। शैख़ अबदुल्लाह की ग़लती ना दोहराएँ मुसलमान। बाक़ी आपकी मर्ज़ी अगर आप एक काफिर पर एक बार दो
बार तीन बार बार बार ठोकर खाने के बाद भी भरोसा कर रहें हो तो आपका मुहाफ़िज़ अब तो अल्लाह
भी नहीं होगा। क्योंकि अल्लाह भी उसी की मदद
करता है जो अपने मुस्तक़बिल के हिकमत वैसी ही इख्तियार करता है। नहीं तो हिज़्बे बेहर रसूले अरबी से ज़्यादा अच्छी
कोई नहीं जानता था, लेकिन उन्होंने जब जब वही नाज़िल हुई हर वोह काम किया जो दुनियावी
अंदाज़ में किया जाता हैं।
इस जैसे गद्दारों और हिन्दुस्तानी ग़ुलामों से से कश्मीरी अवाम और मुजाहिद बच कर रहें। यह शख़्स हिन्दुस्तानी गुलाम है और इसके बाप शेख अब्दुल्लाह के नक़्शे क़दम चल रहा है। ३७० की बहाली की बात करना इसकी गद्दारी का सबूत है। अभी तो ऐसे बोहोत आएंगे, जब कश्मीर तक़रीबन आज़ाद हो चूका है तब ऐसे अनासिर उच्चक कर आएंगे।
हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...