भारतीय हिन्दू अवाम अमूमन ज़ात पात और दहशतगर्दी
का हामी रहा है, यही वजह है की वो किसी नुमाइंदे की क़ाबलियत को देख कर नहीं बल्कि उसकी
ज़ात, मज़हब और दहशतगर्दों से उसका लगाव देख कर वोट करतें हैं. हाल ही में २०१९ में आये नतीजे यकीनन चौकाने वाले
हैं लेकिन इसके पीछे का पसमंज़र देखने की ज़रुरत है. मुस्लिम हलकों से हिन्दू तो जीत रहा है लेकिन हिन्दू
हलकों से बीजेपी का मुस्लिम नुमाइंदा भी नहीं जीत पाता है.
भारतीय अवाम खून ख़राबा, तास्सुब, मार काट,
मुसलमानों को ख़त्म करने के अज़्म वाले नुमाइंदे फ़ौरन जीत हासिल कर लेते हैं. इससे ये बात भी साबित हो जाती है भारीतय हिन्दू
अवाम के दिलों दिमाग में आलूद और मवाद की अक्सरियत बे पनाह ज़्यादा है और ये लोग उन्ही
नुमाइंदों के हक़ में राये शुमारी करतें हैं जिनका किरदार मशकूक और सोच मुजरिमाना होती
है. पढ़े लिखे नुमाइंदों से इन लोगो को हसद
और घबराहट होती है ठीक उसी तरह जिस तरह शैतान को रेहमान से होती है.
मान लिया २०१९ के इंतेखाबात को अपने हक़
में करने के लिए बीजपी ने कोई भी धांधली नहीं की थी और इंतेखाबात खूब खुले और मुनसेफाना
अंदाज़ में मुकम्मल करने का दावा जो बीजेपी कर रही है वो सही और दुरुस्त हैं. लेकिन ये बात तो खुद बीजेपी के नुमाइंदों और रकूने
पार्लियमान को तस्लीम करनी होगी की अवाम की अक्सरियत दहशतर्दों और मुजरिम सोच को ज़्यादा
तस्लीम कर रही है. जिसके लिए दो मिसालें पेशे
खिदमत हैं.
१. २०१४ के
इंतेखाबात के बाद मोदी सूनामी ऐसी ही थी जैसी की आज की तारिख में है फिर क्या वजह है
की दिल्ली से कमिश्नर ऑफ़ पुलिस, आई.पी.अस. और वज़ीरे आला के लिए नुमाइंदगी रखने वाली
किरण बेदी हार जातीं हैं. वो तो बीजेपी से
ही थी. और इस बार एक तालीम साज़ (उस्ताद) आप के टिकट पे हार जाती हैं. तो क्या समझा जाए.
२. क्या वजह है की एक इंजीनियर इंतेखाबात हार जाता
है और दहशतगर्दाना इल्ज़ामात में मुलव्विस मस्तुरात जीत जाती है. तो हम क्या नजरिया
इख्तियार कर रहे है और आलमी बरादरी को क्या पैगाम देना चाहते हैं. फिर किस मुँह से हम आलमी बरादरी के सामने जा कर
दहशतगर्दों पे तक़रीर करेंगे और उसके खात्मे का अज़्म करेंगे. फिर अगर पाकिस्तान ने उठ के मुँह पे तमाचा मार दिया
के आपने तो खुद ही अड्डे पे दहशतगर्दों को पाल रखा है और हमने तो सिफर रवादारी दिखाई
है तो हमारी क्या इज़्ज़त रहेगी.
ये बात भी किसी से पोशीदा नहीं है की इस
बार बीजेपी के रकूने पार्लियमानिओं में ९% मुजरिमाना मामलो में मुलाविस नुमाइंदों का
इज़ाफ़ा हुआ है. तो क्या अब पार्लियामेंट (अड्डा)
सिर्फ मुजरिमों, दहशतगर्दों, ज़ीनाकारिओं, गिरोह गर्दाना ज़ानियों, डाकुओं, क़ातिलों के
लिए मेहफ़ूज़ पनाहगाह होता जा रहा है. जो भी
मुजरिम है और उसको कानूनी पकड़ का खदशा है बीजेपी में शामिल हो जाए ख़्वाहा इंतेखाबात
में हिस्सा ले या ना ले उसके अगले पिछले तमाम गुनाह और जुर्म माफ़. ये एक सोच बनती जा रही है और जितने भी मुजरिमाना
सोच वाले नुमाइंदे हैं वो सब बीजेपी से जुड़ रहे हैं. इसलिए नहीं के उनको अपना मुस्तक़बिल
आला दिख रहा है बल्कि उनको अपने जुर्म की फेहरिस्त से छुटकारा चाहिए.
योगी आदित्यनाथ, मोदी, अमित, पाकिस्तानी
बेगम शायद ही कोई इन नामों से वाक़िफ़ ना होगा.
इनके ऊपर क़त्ल से ले कर तो दहशतगर्दी तक के केस चल रहे थे. लेकिन योगी, मोदी और अमित अपनी अपनी कुर्सियां संभालने
से पहले ही उनके पाकीज़गी का फरमान आ जाता है.
अब बची महज़ पाकिस्तानी बेगम तो जल्द ही उसको भी दहशतगर्दी के केस से छुटकारा
मिल जाएगा. रहा सवाल मध्य प्रदेश के एक दो क़तल के केसेस, तो वो अगर नहीं ख़त्म कए गए
तो हुकूमत गिरा कर बीजेपी हुकूमत बनाएगी और ख़तम कर दिए जायेगे.
ये चीज़ यहाँ पर ही नहीं रूकेगी अगर इन ज़ाफ़रानी
ज़ेहनियत का मक़सद सिर्फ इक़्तेदार हासिल करना ही होता तो आ चुके है लेकिन इनका मक़सद तो
गांधी और करकरे को शहीद करने के बाद उनकी रूह तक को मारना है. अभी दिखाया जा रहा है के में माफ़ नहीं करूँगा. लेकिन जल्द है गाँधी की उस सोच को ख़तम कर के गोडसे
की सोच को पेवस्त किया जाएगा. और गोडसे को
एक वतन परास्त तस्लीम करवाया जाएगा फिर गाँधी हो जायेगे एक गद्दार और पाकिस्तानी हामी
मुस्लिमों के हमदर्द, और ये सारी उधेड़ बून इसी लिए ही जारी है. सिर्फ इक़्तेदार हासिल करना मक़सद नहीं है मक़सद उस
गाँधी वादी सोच और गंगा जमुनी तहज़ीब को ख़तम करना है जिसकी संगे बुनयाद १९२५ में हिन्दू
दहशतगर्दों ने रखी थी. और एक तवील अर्से के
बाद अब उनको मौक़ा मिला है तो वो जल्द ही अपने एहम अजेंडे पे आ जायेगे.
क्योंकि जिस तरह से एक बड़े पैमाने पे इनकों
मैंडेट मिला है उसके बाद तो वो सब बंद होना चाहिए था जो २०१४ से होता आया है. लेकिन महज़ ४ दिनों में जबकि अभी हलफबरदारी भी नहीं
हुई और कमो बैश ५ या सात ऐसे ना ज़ेबा वाक़ियात हो गए जिसकी तवक़्क़ो हर हिन्दू कर रहा
था. और मज़े की बात ये सभी वाक़ियात मुस्लिम
और दलित अवाम के साथ ही हो रहे है. फिर जीत
के इतने बड़े मेंडेट के बाद भी इस तरह के हमलों की ग़ैर ज़रूरी बयानात की बाढ़ आ जाना, ज़हरीली ज़ुबान और तेज़ होना दिल में जीत के ऊपर वस्वसा और शुकूक को पैदा करती हैं. इन लोगो को लगता होगा दलित, क्रिस्टी और मुस्लिम
के वोट हमको नहीं मिले नहीं तो हमको जीत के लिए उधेड़ बून और बेईमानी भी नहीं करनी पड़ती.
तभी तो अभी तक जितने भी हमले हुए दलित और मुस्लिमों पे ही हुए. गावों में जहाँ अवाम
की सोच मुतस्सिब होती है वहां मुस्लिम समाज के साथ ऐसे वाक़ियात हो रहे हैं और वो आम
बात है लेकिन मेट्रोपोलिटन शहरों दिल्ली और बम्बई में ऐसे वाक़ियात झिंझोड़ने से कम नहीं
है.
अब ये सोच जर्राहा यानी की डॉक्टर्स तक
पहुंच गई है डॉक्टर्स और टीचर्स ये दो तपके अवाम में खूब फ़ौक़ियत और इज़्ज़त का मुक़ाम
रखते हैं. क्योंकि टीचर बच्चे को सही और गलत
की तालीम देता है और खुशनुमा समाज बनाने में कारगर साबित होता है वही डॉक्टर एक मरीज़
को ज़िन्दगी देने में मददगार साबित होता है.
लेकिन इस नए भारत में टीचर और डॉक्टर दोनों ही दिमागी मरीज़ हैं और उस आलूद,
ज़हर का शिकार हैं जो इनके दिलों दिमाग में पेवस्त किया गया था, फिर इनका इलाज़ कौन करेगा. २०१४ में
ऐसे कई वाक़ियात नज़र में आये जहाँ हिन्दू टीचर ने खुद मुस्लिम या दलित तुलबा को ज़लील
किया या उनके साथ ना ज़ेबा किरदार उनके मज़हब की बुनयाद पे इख्तियार किया और अब इस हुकुमत
में डॉक्टर्स भी इस ज़हर से बीमार हो गए.
बम्बई की डॉक्टर पायल इमरान तड़वी को उनके
अहबाब और दीगर आला ज़ात के डॉक्टर्स ने इस हद तक हरसा और ज़ेहनी तशद्दुत, अज़ीयत पहुंचाई
की उन्होंने इन दहशतगर्दों के सामने सरे तस्लीम ख़म होने के बजाये खुदकशी को बेहतर समझा. दूसरा वाक़िया दिल्ली का है जहाँ पर पूना के एक दलित
डॉक्टर को ना ज़ेबा नारा लगाने के लिए मजबूर किया गया.
गावों से होता हुआ ये ज़हर बम्बई, दिल्ली
के बाद पंहुचा लखनऊ जहाँ पर ४ बुर्का पोश मुस्लिम मस्तुरातों को मेट्रों में दाखिल
नहीं होने दिया. नवजवानों का मुतालबा था की
सभी अपना नक़ाब उतारें तब ट्रैन में चढ़ सकती हैं.
इन चारों में से तीन बच्चियाँ थी और एक उनकी वालेदा जो अपने एहले खाना के साथ
घर से निकली थी. वालिद ने अपनी शिकायत में
कहा है की हमको मेट्रो के टिकट और दिन भर की टैरिफ का पैसा वापिस किया जाए और उन गुंडों
बदमाशों के खिलाफ शिकायत की है.
अब ये बात समझने से क़ासिर है की अभी तो
हुकूमते हिन्द ने बुर्क़े पे अवामी सतह पे पाबन्दी नहीं लगाईं है और ना ही रेलवे का
ऐसा कोई कानून है की बुर्का पेहेन के नहीं चढ़ सकते तो ये गुंडे किस क़ानून के तहत बच्चिओं
और उनकी वालेदा से बुर्का उतारने को कह रहे थे.
खैर अभी तो इस तरह के हादसे और बढ़ेंगे और
इन सब चीज़ों से निजात पाने का एक वाहिद हल है एक और बटवारा. मुस्लिम अवाम के लिए एक
अलहदा मुल्क़. तमाम सयासी तंज़ीमों (एन.डी.ऐ.
छोड़ के) से गुज़ारिश है की मुस्लिम अवाम की एक राये शुमारी की जाए के ऐसे हालात में
वो हुकूमते हिन्द के साथ रहना चाहते हैं या अलग मुल्क़ की हिमायत करतें हैं. इस राये शुमारी के बाद आलमी बरादरी और बेन अक़वामी
पार्लियामेंट यूं.एन. में दरखास्त देनी चाहिए और अलग मुल्क़ के लिए बेन अक़वामी हिसाब
से यूं.एन. के ज़ेरे क़ियादत राये शुमारी होनी चाहिए. मुल्क़ और बेरुन मुल्क़ राये शुमारी में सिर्फ और
सिर्फ मुस्लिम अवाम को शामिल किया जाए फिर अगर अलग मुल्क़ बनता है तो उसमे सिख, क्रिस्टी
और दलित अवाम का खैर मक़दम है. उनको वो सभी
हुक़ूक़ फ़राहम होंगे जो आज कल इनको हिंदुस्तान में नहीं मिल पा रहे हैं.
Journalist Zuber