अज़ीज़ नाज़रीन,
भारत की जानिब से ज़ाफ़रानी हुकूमत ने शिद्दत, जब्र और दहशत मचा कर कश्मीर की मुस्तक़िल दफा ३७० और ३५ A को ०५ अगस्त २०१९ के उस मनहूस और काले दिन मंसूख कर दिया था। १५ अगस्त के उस मनहूस दिन बाद भारत ने पाकिस्तान के सूबे बाटलिस्तान और गिलगित पर अपना क़ब्ज़ा ज़ाहिर करना शुरू कर दिया था। लेकिन हक़ीक़त से आप तमाम हज़रात भी वाक़िफ़ हो जाएँ की ३७० मंसूख करने के बाद भारत और पाकिस्तान की कश्मीर तनज़िया पर क्या असल हैसियत है।
जहां एक जानिब पाकिस्तान के सूबे बाटलिस्तान और गिलगित में ३७० मंसूख करने के बाद इन्तेख़ाब में इमरान खान की तंज़ीम तहरीके इन्साफ को ज़बरदस्त कामयाबी मिली और जिस बाटलिस्तान और गिलगित पर भारत अपना दावा बताता था वहां नई हुकूमत इमरान ख़ान और तहरीक इन्साफ की क़ायम हुई। वहीँ दूसरी जानिब जिस जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान अपना दावा बताता था या उसको आज़ाद करवाने की हिकमत पर अमल करदा था वहां पर हुर्रियत के परवानों की जीत हुई और भारत की ज़ेहरीली, फ़िरक़ापरस्त, दहशतगर्द तंज़ीम की ज़बरदस्त हार हुई।
ज़ाफ़रानी मिडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ महज़ १ या २ ज़ाफ़रानी सीटों
के जीतने पर जश्न बना रहें हैं। श्रीनगर में
भाजपा के फौजी हुए दाखिल १ सीट जीती। तो उन
तमाम लंगूरों को बता देना चाहता हूँ की यह इन्तेख़ाब १ या २ सीटों के लिए नहीं थे बल्कि
यह इन्तेख़ाब उस फैसले का रेफरेंडम थे जो ज़ाफ़रानी हुकूमत ने शिद्दत और दहशत मचा कर लिया
था, यह इन्तेख़ाब
ग़ुलामी से आज़ादी का रेफरेंडम था। गुपकर की
इस जीत ने इस बात को ज़ाहिर कर दिया है की अवाम क्या चाहता है।
दूसरी बात ३७० हटाने के बाद फ़ौरन पहले इंतिख़ाब में अगर ज़ाफ़रानी तंज़ीम को मुतालिक अक्सरियत हासिल होती, वोह तमाम सियासी तंज़ीमों को पस्त कर के सूपड़ा साफ़ कर देती और ज़ाफ़रानी परचल लहरा देती तो ज़ाहिर होता की अवाम बीजेपी के फैसले के साथ है। लेकिन हुआ उसका उल्टा और अवाम ने ज़ाफ़रानी तंज़ीम को धुल चटा दी उसको उसको औक़ात दिखा दी तो ज़ाहिर होता है की अवाम क्या चाहता है। अब अगर आगे के किसी और इन्तेख़ाब में भारत जालसाज़ी कर के, फरेब से, धोख़ा दे कर, वोट की ख़रीद फ़रोख़्त कर के एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर इन्तेख़ाब को जीतने की कोशिश करता है तो वोह भारत के हक़ में रेफरेंडम नहीं माना जाएगा। क्योंकि ३७० और ३५ A के बाद सबसे पहले इन्तेख़ाब को ही अवाम का फैसला तस्लीम किया जाएगा। अब भारत को चाहिए की कश्मीर को एक आज़ाद रियासत का वही दर्जा दे जो १९४७ के वक़्त था या फिर उसको पाकिस्तान के साथ ज़म कर दे। अगर मज़ीद भारत हठधर्मी दिखाता है तो होगी हक़ीक़ी जंग जो की अक़वामे मुत्तहेदा की सरपरस्ती और तमाम अमन पसंद मुमालिकों की जानिब से भारत के जब्र, शिद्दत, दहशत, ज़ुल्म, नाइंसाफी, क़त्ले आम के खिलाफ होगी।
नाज़रीन एक बात और ग़ौर करने वाली है भलें ही ज़ाफ़रानी तंज़ीम ३७०
पर अपनी पीठ थपथपाती रहे लेकिन ना सिर्फ कश्मीर बल्कि भारत के ५ हल्क़ों के अवाम ने भी
३७० मन्सूख़ करने के बाद फ़ौरन हुए इन्तेख़ाब में उसको अपना फैसला सूना दिया है की वोही
ग़लत है। महाराष्ट्र में हुकूमत गई बिहार में
दुसरे दर्जे पर काम करने पर मजबूर हुए यह ज़ाफ़रानी। बिहार में इनकी क़िस्मत में वज़ीरे आला के लिए दरी
चादर बिछाने उठाने और कुर्सियां लगाने के अलावा अब कोई काम नहीं है। हैदराबाद, राजिस्थान और कश्मीर बल्दिया इन्तेख़ाब ने दिखा दिया की तुम्हारे
अंदर वोह सलाहियत नहीं है की तुम मुल्क को अमन और फलाह के रस्ते पर चला सको।
इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों को हर मुद्दे पर खून ख़राबा और क़त्लों
ग़ारत करने की आदत हो गई है। पाकिस्तान पर सर्जिकल
स्ट्राइक करते करते अब अपने ही मुल्क के अवाम पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की बातें करने
लगे,
उससे ज़ाहिर होता है की इन ज़ालिमों के दिलों दिमाग में सिर्फ
खून करना ही भरा है।जिसका ज़िक्र इस सहाफी
ने २०१५ के बाद कई एक मज़्मूनों में कर दिया था की अभी यह लोग पाकिस्तान के ऊपर जब्र
और खून खराबे की बातें करतें हैं लेकिन जब इनको और कोई नहीं मिलेगा तो अपने खुद के
अवाम का क़त्ल और खून करने की बातें करेगें।
अब अवाम ने इनको बराबर जवाब दिया हैं सर्जिकल स्ट्राइक के बदले जम्हूरियत का
स्ट्राइक।
जिस कश्मीर को यह ज़ाफ़रानी अपनी जागीर समझते थे और अवाम के ऊपर
ज़ुल्म दहशत जब्र करते थे उस जगह भी धमाका बड़ा ही फैसला कुन हुआ। जो कहते थे इलाक़ा तुम्हारा और धमाका हमारा यह उनको जवाब है, इलाक़ा तेरा और धमाका हमारा। क्योंकि कश्मीर को यह ही लोग अपना बोलते थे,
हम तो आज़ादी चाहते थे।
कुल मिला कर यह सहाफी इस नतीजे पर पंहुचा है की इन ज़ाफ़रानी शिद्दत,
दहशत, खून खराबे, ज़ुल्म सर्जिकल स्ट्राइक फ़िरक़ापरती का वाहिद हल है जम्हुरियाई
स्ट्राइक। हर हल्क़े पर इनके सर्जिकल स्ट्राइक
और ज़हरीले ज़ुबान का जवाब जम्हुरियाई स्ट्राइक से दो।
भारत की बुलेट, दहशत, दरअंदाज़ी पर कश्मीर के अवाम की बलोट की जीत हुई। भारत ने बुलेट का सहारा लिया और कश्मीर के अवाम ने अपने बलोट के रेफरेंडम का सहारा लिया अब अगर भारत को थोड़ी से भी शर्म हया बाक़ी रही हो तो कश्मीर को आज़ाद कर दे और अवाम के जज़्बाए हुर्रियत का पासो लिहाज़ करे, जब अवाम तुम्हारी ग़ुलामी में रहना ही नहीं चाहता तो जब्र और शिद्दत मचा कर मसले को मज़ीद पेचीदा ना करे। कश्मीर तो आज़ाद होगा और हर हाल में होगा, अभी अगर नहीं किया तो जंग से आज़ाद होगा लेकिन होगा ज़रूर। अब देखना यही होगा की भारत अपनी कितनी बर्बादी कर के आज़ादी देता है।
दूसरी बात अब बात महज़ कश्मीर तक महदूत नहीं रह गई है बरक्स जो ज़ुल्म शिद्दत जब्र मुस्लिम अवाम के साथ किये हैं वोह भी अब उसी जानिब सोचने लगे हैं। हुर्रियत। उनके मज़हबी एतेक़ाद पर चोट, उनकी शकसी आज़ादी पर चोट, उनके इंसानी हुक़ूक़ पर चोट, उनके रोज़गार पर चोट, उनकी तालीम पर चोट जब इतनी चोटें दी तो सोना कुंदन हो जाता है वही हाल अब मुस्लिम अवाम का हुआ। जो कश्मीर के बाद एक और नासूर की पेशनगोई कर रहा है।
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