Thursday, 31 January 2019

हिन्दू दहशतगर्दों की आला दर्जे की बदकारियाँ, दीदादिलेरी, हटधर्मी

जहाँ भारत अपने अज़ीम रहनुमा और क़ायद महात्मा गाँधी के ७१वे क़त्ल दिन के मौके पे दुःख और गम में डूबा हुआ था वही, गुजरात के बाद वतन अज़ीज़ के दूसरे सबसे बड़े और भयानक तरीके से हिन्दू दहशतगर्दों की पनाह गाहा बनने वाले सूबे उत्तर प्रदेश से एक ऐसा मामला सामने आया जिसकी वजह से अवाम के अंदर गुस्सा और तशवीश है.  ३० जनवरी को योमे क़त्ल के रोज़ अलीगढ़ में दहशतगर्द तंज़ीम हिन्दू महासभा की क़ौमी सेक्रेटरी पूजा शकुन पण्डे और उनके कुछ १२ से १५ रकून महात्मा के मुजसमे पे गोलिया बरसा के दहशतगर्द नाथू राम की मुवाफ़ेक़त में नारे लागते हुए देखे गए.  बाद में मुजसमे पे पेट्रोल डाल के उसको आतिशे नार कर दिया गया.  वीडियो  देखिये.    
गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश हिन्दू दहशतगर्दाना हमलो और अमलियात के लिए मशहूर होने लगा है.  इसकी वजह भी साफ़ है जब सूबे का वज़ीर ही मुत्तासिब और दहशतगर्द ज़ेहनियत का होगा तो उसके असरात अवाम पे नुमाया होंगें.  जिस तरह से एक इत्र फरोश की दूकान के पास से और एक गटर या गंदगी के पास से गुजरने पे एक नाबीना इंसान को भी इस इस बात का इल्म हो जाता है की वो इत्र फरोश की दूकान के पास से या गटर के पास गुज़र रहा है, अब ये ज़रूरी नहीं की वो इत्र लगाए या उसकी नुमाइश करे बल्कि इत्र की खुशबू और गटर से निकलती हुई बदबू इस बात का एहसास दिलाने के लिए काफी है, उसी तरह गुजरात फिर उत्तर प्रदेश इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है के वहां अब हिन्दू दहशतगर्दी नुमा गटर खुल गया है जिसकी बदबू फ़िज़ाओं को मज़ीद गन्दा और बदबू दार कर रही है.

नियोगी वज़ीर की हुकुम बजाई करते हुए पुलिस बेगुनाह मुसलमानों, दलितों को उनके मज़हब और ज़ात की बुनयाद पे एनकाउंटर पे शहीद कर देती है, मुसलमानों को नेशनल सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया जाता है लेकिन क्या सूबे के वज़ीर इन असली दहशतगर्दों को नेशनल सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार करने की कुव्वत रखतें हैं.  उत्तर प्रदेश में नियोगी के वज़ीर बनने के बाद हर उस मौके पे ख़ित्ते की हालत तशवीशनाक और खतरनाक हो जाती है जब कभी भी वज़ीरे अज़ाम मोदी या हुकूमते हिन्द का कोई भी बड़ा ओहदेदार सूबे में मौजूद होता है. योगी के वज़ीरे आला मुंतखिब होने के बाद कुछ ३ या ४ बार ऐसी सुरते हाल वज़ीर आला के सामने दर पेश आई.  बिल आखिर हस्बे आदत योगी सूबे की उस सुरते हाल के लिए अपने मुख़ालफ़ीनों  के ऊपर तोहमत लगाते हुए नज़र आये.  चाहे वो २६ जनवरी योमे जमुहरिया पे होने वाला दहशतगर्द हमला हो या बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी हो या अलीगार्ड में बढ़ते हुए तनाज़े हों बुलंद शहर दहशतगर्द हमला उन सभी पे योगी मुख़लिफ़ीनों के ऊपर नज़र रखतें हैं और अपनों के खंजर को नज़र अंदाज़ कर देतें हैं.  असल में जो भी सूबे की बिगड़ती हुई अमन और अमान की सुरते हाल है उसमे सिर्फ और सिर्फ हिन्दू दहशतगर्द ही ज़िम्मेदार हैं. और ये वही लोग हैं जो अपने ही वतन की जड़ों को मज़ीद कमज़ोर करने में लगे हुए हैं. अगर उनकी कारगरदेगी हुकूमत हासिल करना थी तो वो उनको मिल गई है. आज भारत के कमों बेश २० से ज़ाइद सूबों में ज़ाफ़रानी हुकूमत है और मरकज़ ज़ाफ़रानी महाज़ के ज़ेरे हुकूमत काम कर रहा है, अब उनको और क्या चाहिए, अगर फिर भी अगर ये लोग दहशतगर्दाना मामलों में मुल्लावीस पाए जाते है मतलब साफ़ है ये मुल्क की एक और तक़सीम चाहते हैं.

गाय के नाम पे भी हिन्दू दहशतगर्दों का दोहरा किरदार अवाम के सामने आ गया के उस चौपाये के नाम पे जिस तरह से मुस्लिम नौजवानों का क़त्ल और ख़ूंरेज़ किया था असल मक़सद कुछ और था ना की गाय की हमदर्दी.  अगर गाये की हमदर्दी होती तो इस तरह से एक गाय को मार डालने वाले ड्राइवर की पहले हलाकत होती देखिये.


कुल मिला के मामले का लब्बो लुबाब ये निकल के आता है की अगर भारत बेन अक़वामी सतह पर एक अमन पसंद और जमुहरियाती मुल्क की हैसियत से अपनी साख खो रहा है और दहशतगर्दाना मलियात में आगे की जानिब तेज़ी से गामज़न है तो उसके लिए ज़ाफ़रानी महाज़ की मरकज़ में काम करने वाली मोदी हुकूमत और मुख्तलिफ सूबों में ज़ाफ़रानी वज़ीरों का हिन्दू देशतगर्दों पे कारवाही ना करने के सबब और हुकुम शाही वाली जमुहरियति ज़ेहनियत की वजह से खो रहा है.

Tuesday, 29 January 2019

पाकिस्तान में पहली हिंदू महिला जज बनीं सुमन कुमारी


सुमन के पिता डॉक्टर हैं
  सुमन कुमारी ने पाकिस्तान की पहली हिंदू महिला जज बनकर इतिहास रचा
  हैदराबाद से एलएलबी और जुल्फिकार अली भुट्टो संस्थान से सुमन ने LLM किया है
  पाक के पहले हिंदू न्यायधीश जस्टिस राणा भगवानदास कार्यकारी चीफ जस्टिस भी रहे
  कम्बर-शाहदकोट निवासी सुमन को अपने शहर में भी बतौर जज पहली नियुक्ति मिली

इस्लामाबाद

सुमन कुमारी पाकिस्तान में दीवानी न्यायाधीश नियुक्त होने वाली पहली हिंदू महिला बन गई हैं। मीडिया में आई खबर में यह जानकारी दी गई है। कम्बर-शाहदकोट निवासी सुमन अपने पैतृक जिले में ही न्यायाधीश के तौर पर सेवाएं देंगी। डॉन समाचार पत्र के मुताबिक उन्होंने हैदराबाद से एलएलबी और कराची की सैयद जुल्फिकार अली भुट्टो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान से कानून में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है।
                                              पहली पाकिस्तानी हिन्दू जज अपने वालिद के साथ
सुमन के पिता पवन कुमार बोदान के मुताबिक सुमन कम्बर-शाहददकोट जिले के गरीबों को मुफ्त कानून सहायता मुहैया कराना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'सुमन ने एक चुनौतीपूर्ण पेशा चुना है, लेकिन मुझे विश्वास है कि वह कड़ी मेहनत और ईमानदारी से ऊंचा मुकाम हासिल करेंगी।' सुमन के पिता नेत्र रोग विशेषज्ञ हैं और उनका बड़ा भाई सॉफ्टवेयर इंजिनियर है। उनकी बहन चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।
                       अपने वालिद के साथ ख़ुशी का इज़हार करते हुए पहली पाकिस्तानी हिन्दू जज सुमन
 सुमन गायक लता मंगेशकर और आतिफ असलम की प्रशंसक हैं। पाकिस्तान में किसी हिंदू व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त किये जाने का यह पहला मामला नहीं है। पहले हिंदू न्यायाधीश जस्टिस राणा भगवानदास थे जो 2005 से 2007 के बीच संक्षिप्त अवधि के लिये कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे। पाकिस्तान की कुल आबादी में दो प्रतिशत हिंदू हैं और इस्लाम के बाद देश में हिंदू धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।

सहाफी जुबेर (अबू सहाफी) की हालात पे नुक़्ताये नज़र

जो संघ और बीजेपी के गुलाम और उनके हुकुम बरदाई मुस्लिम सियासतदां पाकिंस्तान को पानी पी पी के कोस रहे थे, और पाकिस्तानी वज़ीरे अज़ाम इमरान खान को अपने मुल्क के अकलियतों के तहफूज़ पे तव्वज्जो देने की सलाह दे रहे थे ये उन ज़मीर फरोश, मुस्लिम और इस्लाम के दुश्मनों को पाकिस्तानी तीसरा या चौथा तमाचा है.  ये वही लोग हैं जो मुल्क की मोहब्बत को इस्लाम और मुलसमानों की मोहब्बत पे तरजि देतें है और हर उस मसले पे जिसमे संघ और बीजेपी का नफा होता है वही बात करते है और मुलसमानों को ईज़ा पहुचातें हैं. इन लोगो को कश्मीरी अवाम की लाशें नहीं दिखती, भारतीय फौज का तशद्दुत नहीं दिखता लेकिन जब कभी भी फौज की हमदर्दी की बात आएगी सरे फेहरिस्त दिखेगें.  और कश्मीरी अवाम की लाशों और ख़ूंरेज़ पे ख़ामोशी इख़्तियार कर लेते हैं.  ये सियासदान कश्मीर को भारत का लाज़मी हिस्सा तस्सव्वुर करते हैं और उसको मूतनाज़ा नहीं मानते, यही तो बीजेपी और संघ मानते हैं. अगर तुम भी बीजपी,  संघ और तशद्दुत पसनद हिन्दुओं की बोली बोल रहे हो तो तुममे और बीजेपी में किया फर्क रह गया.

एक पाकिस्तान है जो तालीम का चिराग ले कर रास्ते की गंदेगी ओर अंधाकार को दूर करता हूआ सुख ओर खुशहाली पा रहा है ओर एक भारत मे हिन्दू तशद्दुत पसंद पड़ाई लिखाई तो करते नही हैं मज़ीद तारीख़ में तब्दीली कर के अपने आप को वतन का हाकिम तास्सुर करतें हैं. गलतबयानी करते फिरते हैं जो उन लोगो तक ही महदूत रह जाती है की राणाप्रताप हल्दी घाटी में अकबर महान से जीता था.  और शिवाजी औरंगज़ेब के से जीता था. जबकि दोनों ही बातें झूट और फरेब में मुश्तमिल हैं.  अब ये हिन्दू तशद्दुत पसनद सिर्फ और सिर्फ दहशतगर्दाना वारदातों में मुलव्विस रह कर अंधाकार मे घिर के मज़ीद पस्ती की तरफ जा रहे हैं.  रही सही कसर जो हिन्दू बच्चियाँ पढ़ना चाहती है वतन का नाम रौशन करना चाहती है उनके उपर कैद लगा रहे हैं ओर उनको स्कूल कॉलेज नही जाने दे रहे तुम लव जिहाद का शिकार हो जाओगी, मुस्लिम लड़कों से दोस्ती मत करो वो तुम्हे बर्बाद कर देंगे वगेरा वगेरा. ऐसी सोच से भारत तो तबाह ओर बर्बाद होगा ओर पाकिस्तान आबाद होगा.

Monday, 28 January 2019

कश्मीर में सहाफी हुए भारतीय आर्मी के गुस्से का शिकार

भारतीय आर्म्ड फोर्सेज कश्मीरी अवाम के साथ तशद्दुत, जब्र और उनकी नस्ल कुशी, मासूम बच्चिओं और १७ साला से लेकर हर उम्र की मस्तूरात के साथ ज़िना बिल ज़ब्र, गिरोह गरदाना ज़िना, कश्मीरी इंसानी हुकूक की हक़ तलफि के लिए मशहूर है और ऐसी चीज़ें भारतीय फौज के लिए कोई एहमियत नहीं रखती और बड़ी बात नहीं है.   क्योंकि फ़ौज को इस तरह की कारवाही पे हुकूमते हिन्द की पूरी रज़ामंदी है अगरचे वो सरकारी दहशतगर्द की किस्म में आतें है फिर  भी हुकूमते हिन्द इस तरह की कारवाही पे आँखे बंद किये हुए खामोश है.


लेकिन २०१८ के बाद से जैसे जैसे २०१९ नज़दीक आ रहा है, सहाफिओं पे भारतीय फौज के इस तरह के हमले ज़्यादा ही बढ़ गए हैं.  अभी तक कश्मीरी अवाम भारतीय फौज के निशाने पे होता था.  और उनको संग बाज़ या दहशतगर्द बोल के बन्दूक की ज़द में ले कर शहीद कर दिया जाता था.  लेकिन अब भारतीय फौज के पेलेट गन के छर्रे यहाँ तक सहाफिओं की आँखों को भी ना बीना कर रहे है.  २०१८ से ले कर हाल ही में २६ जनवरी को हुए सहाफिओं पे भारतीय फौज का ये तीसरा हमला है.  फिर भी भारतीय इंतेज़ामिया और सरकार भारतीय फौज के इस तरह के हमलों को बोहोत ही संजीदगी से ना ले कर इसको बड़ा हमला नहीं बोल रही है, क्योंकि अगर ऐसी ख़बरें पब्लिक डोमेन में आ गई तो फौज और इंतेज़ामिया की इज़्ज़त ख़राब होगी.   


ऐसे ही सहाफिओं के ऊपर भारतीय फौज के हमले का एक वीडियो, इस सहाफी ने अपने मज़मून के साथ २०१८ में शाय किया है, जिसमे फ़ौज के जवान सहाफिओं पे ज़ब्र और उनके साथ धक्का मुक्की कर रहें हैं, और उनको अपनी बन्दूक के हत्थे से मार रहे हैं.
हाल ही में २६ जनवरी भारतीय फौज के पेलेट गन के जान लेवा छर्रों की ज़द में कुछ मुसव्विर  सहाफी आ गए जो भारतीय फौज के  एनकाउंटर की जगह पे मज़ीद जानकारी, हमले की फोटो और वीडियो लेने गए थे.  एनकाउंटर वाली जगह पे भारतीय फौज के सहाफिओं पे इस तरह के हमले,  दो बातें साबित करने के लिए काफी हैं एक या तो एनकाउटर मुतानाज़ा हैं दूसरा कश्मीरी अवाम के लिए जो ज़हर भारतीय फौज के दिलों दिमाग में भरा गया है वो आलूद सहाफिओं पे भी निकल रहा है.   क्योंकि अगर एनकाउटर हक़ था तो सहाफिओं पे पेलेट गन के छर्रों की बौछार करने की कोई ज़रुरत ही नहीं थी.  उनको अपना काम करने देना था.  फिर एनकाउंटर के फलसफे और जेहादिओं और फौज के बीच क्रॉस फायर की हक़ीक़त अवाम के सामने अपने आप आ जाती.  इस तरह की चीज़ें भारतीय फौज के एनकाउटर के फलसफे पे शक की काफी गुंजाइश रखतीं हैं.  आर्मी मासूम कश्मीरी अवाम को एनकाउंटर के नाम पे मौत के घाट उतार रही है.  और यही वजह है आर्मी ने मुस्सविर सहाफियों को एनकाउंटर की जगह पे जाने से रोका और उनके ऊपर भी हमला किया और छर्रों की बौछार की, जिसकी वजह से एक ना बीना हो गया और अपनी आँखों की रौशनी पूरी तरह से खो दी.  भारतीय फौज के सहाफियों पे हमले के बाद उन्होंने अपना बयान मीडिया से रू बरू हो कर दर्ज करवाया. देखिए.
हिन्दू शिद्दत पसंद मंशियाती ज़हर कश्मिरिओं के खिलाफ जो आर्मी के दिलों दिमाग में भरा गया था और पुलिस, इंतेज़ामिया, अदलिया, निज़ाम,  तालीम के ज़रिये मुस्लिम अवाम के खिलाफ भरा गया था वो अब साढ़े चार साल बाद अपना रंग दिखाने लगा है. और मोदी की बीजीपी हुकूमत में अवाम के बाद कश्मीर में अब सहाफी आर्मी का नरम निशाना बन चुके हैं.
ये सहाफी पूरी तरह से कुंद हो चूका है और समझने से क़ासिर है के हम कहाँ पहुंच चुके हैं. जब भारतीय अवाम अपने वतन का ७० वां  यौमे जमुहरिया बना रहा है  लेकिन क्या हम फख्र के साथ सही और दुरस्त बात को कहने और उसका इज़हार करने की कुव्वत रखतें हैं.  अगर एक सहाफी को अपना फ़र्ज़ निभाने से रोका जा रहा है जो सच्ची बात को और हमले की तस्वीर के उस रुख को सामने लाना चाहता है जो सच्चाई पे मुश्तमिल है.  जो भारतीय फ़ौज के इंसानी हुकूक की हकतलफी, दोहरा रवैया, अवाम को दहशतगर्दी के इलज़ाम में मौत के घाट उतारने के अमल को बरहाना कर रहा है और अगर ऐसा करने से उसको रोका जाता है तो हमको अपने आपको एक जमुहारियाई मुल्क कहलाने का कोई हक़ नहीं है, और किसी भी भारतीय को यौमे जमुहारिया बनाने का कोई हक़ नहीं होना चाहिए.  भारतीय फौज ग़लतफहमी का शिकार हो गई थी के सहाफियों पे गोलियाँ बरसाने से उनकी बदकारियाँ और बदमालियाँ छुप जायेगी लेकिन बावजूद पेलेट गन के छर्रों से और सहाफिओं के रस्ते में रोड़ा अड़ाने से वो सच्चाई को बदल नहीं सकते की भारतीय फौज के दिलों दिमाग में कश्मीरी अवाम के खिलाफ आलूद और ज़हर भरा है जो एक दर हक़ीक़त है और रहेगी.   के किस तरह से दहशतगर्दी के नाम पे भारतीय फौज कश्मीरी अवाम को एक लाइन से खड़ा कर के गोलियाँ मार देते हैं, ख़वातीन के साथ कभी बन्दूक की नौक पे कभी उनके अपने नाबालिग बच्चों और भाइयों को दहशतगर्दी के इलज़ाम में जेल भेजने के इलज़ाम में बदकारियाँ करतें हैं.
हूकूमते हिन्द के ज़र खरीद गुलाम या लंगूर सहाफी और लंगूर मीडिया हाउसेस फ़ौज के जंगी जराइम, इंसानी हुकूक की हक़ तलफि, ख्वातीनों के हुकूक की हक़ तलफि को पोशीदा रखने की पुरज़ोर कोशिश करतें हैं और फौज की कारगरदेगी की वकालत करतें हैं क्योंकि उनको फौज की हौसला अफ़ज़ाई, और सरहाना करने के लिए मुवावज़ा मिलता है.  लेकिन ऐसे सहाफी भरोसे के काबिल नहीं होतें हैं, यहाँ तक के वो भारतीय फौज के प्यार में अंधे हो कर मासूम इंसानी लाशों की अनदेखी कर रहे हैं.  वो लोग ऐसा करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि ये उसी गुलाम जमात से हैं जो सड़े गले खाने को भी खाने के लिए मजबूर हैं और इनमे इतनी कुव्वत भी नहीं बची है की दूसरा खाना मांग सकें.   
कुछ भारतीय अवाम (आर.अस.अस. और बीजेपी हिमायती) मौलानाओं की एक जमात (संघ प्रचारक और अवामी मुस्लिम मंच के कारकूनों) ने इस सहाफी के हिंदी मज़मून जिसमे उसने यौमे जमुहरिया को सियाह दिन के जैसा बनाने की दरख्वास्त की थी सख्त अलफ़ाज़ में मज़म्मत कर रहे थे.  वो सभी यौमे जमुहरिया पूरे जोश व खरोश के साथ बनाने के अज़्म के साथ तैयार थे.  उनको हुकूमत के किसी भी अम्ल पे गैर जमुहरियाई शक्ल नज़र नाही आ रही थी.  इन लोगों को और कितने सबूत फ़राहम करना चाहिए,  के जमुहरियाती मालियात चिंदे चिंदे हो चुकी है और वो खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गई है.  भारतीय हुकूमत, उसके एजेंट्स, नुमाइंदे, हाकेमीन या कोई भी सरकारी इदारा सभी जमुहरियाई मालियात की खिलाफवर्जी कर रहे हैं और कोई भी जमुहारियाती मालियात के पैमाने पे खरा साबित नहीं हो रहा है.

See English version

Kashmir: Even Journalists faced rage of Indian Army.

Friday, 25 January 2019

सय्यदना की रूहानी ताक़त के आगे पस्त हुई शैतानी ताक़त

रूहानी शख्सियात और शैतानों की शैतानी.

बीजेपी और मोदी हमेशां से मुस्लिम समाज में निफ़ाक़ और फूट डाल के अपना सियासी फ़ायदा देखते हैं.  लेकिन हर बार ये लोग अपने ही फेके हुए जाल में फस जाते हैं फिर बदनाम और रूसवा होते हैं.  ये वीडियो हाल ही में ११ दिसंबर को तीन राज्यों से बीजेपी की ताजपोशी रूह पोश हो जाने के एक हफ्ते के बाद मसूल हुई थी.  लेकिन कुछ मसरूफियात थी इसलिए इस वीडियो और सय्यदना की रूहानियत की निस्बत से कुछ कलमबंद नहीं कर सका. लेकिन जब सब कुछ आईने की तरह साफ़ हो चुका है और मोदी का हर बातिल बरहना हो गया है तो इस सहाफी का फ़र्ज़ ए ऍन है की हक़ और बातिल के बीच कुछ मज़मून शाय करे और नाज़रीन को हक़ीक़त और सय्यदना की रूहानियत से रू बरू करे.
हकीकत में अगर देखा जाय तो ये सय्यदना का रूहानी फेज़ था मुस्लिम अवाम के ऊपर जो मोदी की शैतानी को कामयाब नहीं होने दिया. जिस तरह से वीडियो में सय्यदना को एक शैतानी ताक़त का मरकज़ और खोड़ला कहा जा रहा है असल में वो उनकी रूहानियत है.  क्योंकि मोदी के दिल के कैफियत उनके ऊपर ज़ाहिर हो गई होगी के वो मुस्लिम समाज में निफ़ाक़ डालने की निस्बत से ना की मुसलमानो का भला करने की निस्बत से उनके पास आये हैं.  मोदी हुए या बीजेपी के कारकून या कोई और संघी सभी को ऐसा लगता है शिया, बोहरी, सुन्नी, वहाबी, बरेलवी या एहले हदीस ये अलग अलग मज़हब है जो की बिलकुल गलत है.  और ये ही कट्टरपंथी हिन्दू समाज की खुली गुमराही है के वो बोहरी समाज या शिया समाज के मौलाना के पास जा के उस समाज को फायदा देने की बात तो करते है लेकिन दीगर मुस्लिम समाज की अनदेखी करते है.  और यहीं से ये कट्टरपंथी हिन्दू रूसवाई के अंधेरों में गारकाब हो जाते हैं.  क्योंकि शिया, बोहरी, देवबंदी, सुन्नी, बरेलवी, एहलेहदीस ये सभी मुस्लिम हैं और एक अल्लाह को और नबी मोहम्मद सल्लम को आखिर पैगम्बर तस्लीम करते हैं. तो कोई भी अगर इनसे मुस्लिम समाज को इज़ा पहुंचाने का काम करने को कहेगा तो ये मौलाना तो ऐसा नहीं करेंगे लेकिन कहने वाले का हाल बूरा हो जायेगा.    

ये सहाफी समझने से क़ासिर है की संघी, बीजेपी और कट्टरपंथी हिन्दू समाज को ये ग़लतफहमी कहाँ से हो गई के शिया, सुन्नी, बोहरी ये अलग अलग है ये सभी इस्लाम को मानने वाले हैं इस्लामिक स्कूल ऑफ़ थॉट्स अलग हैं लेकिन ख़ास अक़ीदा वही है जो एक सच्चे मुसलमान का होना चाहिए. एक अल्लाह की हम्दो सना और पैगम्बर मोहम्मद सल्लम को नबी अखिरूज़मा तस्लीम करना, अल्लाह के तमाम पेगम्बरों, नबिओं, अम्बियाओं, उसकी तमाम किताबों पे ईमान अल्लाह के तमाम फरिश्तों और रोज़ाये जज़ा पर ईमान. 

यू.पी.ए. दोयम के इंतेखाबात के पहले ऐसा ही गलीज़ हरबा राजनाथ सिंह ने खेला था और लखनऊ में लाल सफ़ेद चेक का इस्लामिक गमछा गले में पेहेन के मौलाना क़ल्बे जव्वाद के पास पहुंच गए, और लगे सिर्फ शिया हज़रात को फवाइद की बारिश करने की बातें करने.  अब मौलाना साहब भी कोई कच्ची गोलिया थोड़ी खा के बैठे थे समझ गए की ये मुसलमानों के अंदर शिया सुन्नी का निफ़ाक़ डाल के अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहते हैं.  उन्होंने भी नहले पे दहला मार दिया और मीडया से खिताब करते हुए साफ़ अलफ़ाज़ में कहा राजनाथ सिंह जी एक ख़ास तपके के फवाइद की बात कर रहे थे हमने उनसे कहा सारे मुसलमानो की बात करिये बाबरी मस्जिद की निस्बत से भी हमारा फैसला साफ़ है उसकी बाज़याबी मुसलमानो को दीजिये तो हमारा वोट आप को पड़ेगा.  फिर हुआ वही जो होना था यू.पी.ए. दोयम के वक़त बीजपी की क्या हालत हुई थी सबको मालूम है.  लेकिन इस गहमा गहमी में सभी राजनाथ और मौलाना साहब की मीटिंग को भूल गए लेकिन हम जैसे सहाफी और दानिशमंद तो सभी बातो का ज़खीरा रखते है और सही वक़त पे उसको मन्ज़रे आम करते हैं. 

बीजेपी की २०१४ में सरकार बनने के बाद हिन्दू शिद्दतपसन्द तंज़ीमे और उनके सरबराह बोहोत उछल कूद मचा रहे थे. एक टी वि इंटरव्यू में सुब्रमणियम स्वामी कहते हैं हम चाहते हैं शिया सुन्नी आपस में लड़ के मर जाएँ जो बचेगें उनको हम अरबिस्तान या पाकिस्तान भेज देंगे फिर भारत होगा हिन्दू राष्ट्र.  इससे ये बात फिर साबित हुई मुस्लिम माशरे में निफ़ाक़ डालने वाले सिर्फ और सिर्फ सियासी रहनुमा और सियासी जमातें हैं.   कोई भी सच्चा मुसलमान या मौलाना चाहे वो किसी भी इस्लामिक स्कूल ऑफ़ थॉट्स का हो मुसलमानों में निफ़ाक़ हरगिज़ नहीं डालेगा, या उनकी दिल अज़ारी हर्गिज़ नहीं करेगा.  हाँ अब जो संघ और बीजेपी के दलाल होंगे वो बाबरी मस्जिद और मदरसों पे आम मसुलमान से मुख्तलिफ राये रखते होंगे और ये ही हैं मुनाफ़िक़ इस्लाम और मुसलमानो को इज़ा पहुंचाने वाले गद्दार मुसलमानों के दुश्मन  और अगर खिलाफते उस्मानिया अभी भी हयात होती तो ऐसे मुनाफ़िक़ों की गर्दन क़लम करने का फ़तवा आईद हो चुका होता.

ऐसा ही एक मामला इस सहाफी के पीरो मुर्शिद के सामने पेश आया था जब वो हयात थे.  २०१४ में उत्तर प्रदेश के इंतेखाबात के वक़्त एक सामजवादी के एक आला रहनुमा ने उनके पास आ के दुआ की दरख्वास्त की, और उनको शेरवानी का कपडा पेश किया उसके साथ सिलाई के पैसे भी दिए.  उस नुमाईंदे के साथ मीडिया का हुजूम भी था. हज़रत ने मीडिया को फोटो वगेरा लेने को मना किया और इस दुआ को गैर सियासी ही रखने को कहा.   उस ना मुराद ने अल्लाह के वली की निस्बत को गलत तरीके से पेश किया और चोरी से हज़रत के फोटो उसके साथ हाथ मिलाते हुए मीडिया के सहारे खींच लिए.  दुसरे रोज़ अपने रसूख से उसने ख़बरों को अखबारों की सुर्खियां बना के पेश किया, समूचा उत्तर प्रदेश का मुस्लिम सामजवादी को वोट करे ऐसी अपील हज़रत ने की है. जब की उन्होंने उसके अच्छे मुस्तक़बिल के लिए दुआ की थी ना की समाजवादी की कामयाबी की और ना ही ऐसी कोई अपील मुस्लिम सामज से की थी. बस खबर देखते ही हज़रत का दिल दुःख गया जो बात उन्होंने नहीं कही वो उनके ऊपर बोहतान के जैसी लादी जा रही है और हो गया २०१४ में बेडा गर्क समाजवादी का.    

फिर कॉग्रेस के युवराज राहुल गांधी मुतावातिर हार रहे थे.  २०१८ में ५ सूबों के इंतेखाबात के कुछ अर्से पहले अजमेर में ख्वाजा अजमेरी के दर पे चले गए.  ख़ामोशी से दुआ मांगी अपने मुस्तक़बिल के लिए अपनी पार्टी के लिए और आ गए ना कोई मीडिया की सुर्खिया और ना कोई खबर लेकिन वली का करम हुआ और हो गए कामयाब.  उसी तरह से २०१७-१८ में शेखर धवन भारीतय क्रिकेट के गब्बर बुरी तरह से फेल हो रहे थे. फ़ार्म ज़बरदस्त ख़राब चल रहा था यहाँ तक के टीम से निकाले जाने की नौबत आ पहुंची थी. पहुंच गए ख्वाजा के दर पे और हो गया बेडा पार.  फिर तो रनों को बौछार कर डाली.  अब ऐसी बाते भले ही पब्लिक डोमेन मिडिया में खबरों की सुर्खिया नहीं बने लेकिन हम जैसे सहाफियों की ज़िम्मेदारी है की सच्ची खबर की जड़ तक पहुंच के नज़रीनों को रू बरू करवाएं.  फिर विराट कोहली जो ऑस्ट्रेलिया २०-२० फिर एक दिवसीय बुरी तरह फ्लॉप रहे उसके बाद टेस्ट में १-१ की बराबरी में थे.  फिर किया था पहुंच गए काला रूमाल बाँध के अपनी शख्सियत छुपा के ख्वाजा के दर पे और मांग ली मन्नत और देखिये अब क्या हाल है. 

जिस तरह ज़ाफ़रानी सहाफी और मीडिया सैयददना मुफ्फदल की रूहानी को गलत तरह से पेश कर के उनको ज़लील कर रहें हैं ये सहाफी ऐसी ख़बरों की सख्त मज़्ज़मत करता है और ऐसे ज़ाफ़रानी सहाफिओं और मिडिया को चैलेंज करता है की किसी भी कामिल मुस्लिम मौलाना की जिस किसी भी पंडित से चाहें डिबेट करवा लें फिर देखें कौन है खोड़ला पनोती बाज़ और कौन है रूहानी. 

Thursday, 24 January 2019

यौमे जमुहरिया, यौमे सियाह जैसा बनाये: सहाफी जुबेर (अबू सहाफी)

हुकूमते हिन्द के ख़िलाफ़े आईन हिकमते अमली से तमाम अवाम परेशान और बेचैन है. अब तो ज़ाफ़रानी महाज़ में से भी मोदी के ख़िलाफ़े आईन हिकमते अमली पे आवाज़ें उठने लगीं हैं.  अब सिर्फ हिन्दू तशद्दुत पसंद तंजीमें ही मोदी हुकूमत के साथ हैं, और मोदी की हर बदकारिओं, बदामलियों में हुकूमत के साथ शाना बा शाना नज़र आ रही हैं.  

इस सहाफी के यौमे जमुहरिया पे सियाह डी.पी. रखने के ऊपर और हक़ बयानी पे तनक़ीद शुरू हो गई है.  अवाम का एक तपका पुरज़ोर तरीके से मुखालिफत कर रहा है और इस सहाफी को पाकिस्तान का हिमायती बोल के उसके खिलाफ खड़ा हो गया है.  उनका कहना है जिस मुल्क का खाते हो, जिस मुल्क का हवा, पानी इस्तेमाल करते हो, जिस मुल्क में रहते हो उसके साथ गद्दारी करते हो.  उनको हुकूमते हिन्द के ऊपर इस सहाफी की तनक़ीद से इतनी इज़ा और ज़र्ब नहीं पहुंची जितनी उसके हक़ गोई से पहुंची है जिसमे इस सहाफी ने पाकिस्तान को हर शोबे में भारत से बेहतर और बोहोत बेहतर बताया है.  जिसकी वजह से पाकिस्तान का अक्स और तस्सव्वुर भारत से बेहतर साबित हुआ.  जो एक दर हकीकत है.

ये सहाफी उन तमाम नाक़दीन अवाम से कहना चाहता है के रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी अल्लाह की है और कोई भी इंसान या ज़मीन का टुकड़ा किसी भी इंसान को एक दाना भी नहीं खिला सकता अगर वो उसकी किस्मत में नहीं है.  और अल्लाह बिला तफ़रीक़ कौम और मिल्लत ना सिर्फ मुसलमान बल्कि हिन्दू, क्रिस्टी, सिख या सभी को रिज़्क़ फ़राहम करता है.  उसको भी रिज़्क़ देता है जो उसको मानता है और उसको भी देता है जो नहीं मानता बल्कि जो उसका मुनकर होता है उसको भी देता है.  दूसरी बात बहती हुई हवा को रोक दो उसका रुख मोड़ दो या पानी रोक दो जो अल्लाह की नेमत है.  फिर जब भारत में मानसून वक़्त पे नहीं आता है तो मिन्नतें किस से की जाती है अल्लाह और सिर्फ अल्लाह से.  तो तन्क़ीदीयों काहे को ऐसी बात कहते हो जो तुम्हारे बस में नहीं है, जिसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ अल्लाह ने अपने ऊपर रखी है.  फिर कोई कहता है भारत से कमा रहे हो,  कोई भी एहसान नहीं कर रहा है इस सहाफी के ऊपर.  वो अपना काम करवाता है उसके बदले में ये सहाफी उज्र लेता है उसमे भारत और पाकिस्तान किधर से आ गया.  दूसरी बात कभी भी इस सहाफी ने २०१० के बाद कहीं भी जॉब करते वक़त ऐसा एहदनामा या करार नहीं किया की हक़ गोई की बात नहीं करूँगा. 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा जमुहरियाती मुल्क है.  लेकिन मोदी हुकूमत आने के बाद जमुहरियत का क़त्ल होने लगा.  और जमुहरियाती मालियात में भारत तेज़ी से पीछे की जानिब जाने लगा.  जिसमे शामिल है ई.वि.ऍम. स्केम, ज़रकारवाज बंदी (नोट बंदी), जो अवाम के हर तपके के लिए परेशान कुन साबित हुआ.  दूसरी बात ये मोदी हुकूमत की कैसी जमुहरियाती अमल है की मुल्क में ज़रकारवाज बंदी लागू की और मुख़लिफ़ीनों को भनक तक नहीं लगने दी.  जो फैसला मुल्क की माशियत के लिए तबाह कुन साबित हुआ क्या उसमे मोदी हुकूमत को मुख़लिफ़ीनों को भरोसे में नहीं लेना चाहिए था.

फिर बल जब्री से ताक़त की बुनयाद पे मोदी हुकूमत ने बोहोत से फैसले एवान में ख़िलाफ़े जमुहरिया लिए और जब्र, तशद्दुत से अपने मुवाफिक बिल पास करवा लिए.   ट्रिपल तलाक़ पे मोदी ने लोक सभा से बिल पास करवाया जबकि उसमे किसी भी मुस्लिम नुमाईंदगी से गुफ्तगू करना भी मुनासिब नहीं समझा, जो सबसे ज़्यादा मुत्तासिर होगा.  ऐसी सोच और ज़ेहनियत एक जमुहरियती  मुल्क के लिए खतरा हैं, और ऐसे हाकिम जो ऐसी ज़ेहनियत रखते हैं वो कभी भी  जमुहरियत पे यकीन नहीं रखते और ना ही इज़्ज़त करते है पार्लियामेंट की, बल्कि उनकी सोच ही तशद्दुत पसंद हो जाती है.   

मोदी हुकूमत आने के बाद तास्सुरात का इज़हार करने की आज़ादी को भी छीन लिया गया.  ना सिर्फ बा इज़्ज़त शहरी बल्कि सहाफी, वुक्ला हज़रात, और सियासतदां भी मोदी, बीजपी या ज़ाफ़रानी तशद्दुत के खिलाफ नहीं बोल सकते.  उनके खिलाफ कुछ भी अलफ़ाज़ बोले के हो गए गद्दार, मुख़ालिफे मुल्क.  अब ऐसी ज़ेहनियत को क्या कहेंगे जो ज़ाफ़रानी महाज़, मोदी हुकूमत और संघ की बोली बोले सिर्फ वही मुल्क का वफादार है बाकी सब गद्दार. फिर ऐसे हाकिमों की योमे जमुहरियत में शमूलियत का किसी भी बा इज़्ज़त शहरी को ज़ौक़ और शौक नहीं होना चाहिए.

ये सहाफी मुल्क के हर उस अवाम, बा इज़्ज़त शहरियों और सियासतदानों से गुज़ारिश और दरख्वास्त करेगा जो जमुहरियत पे यकीन रखते हैं और समझते हैं की मोदी हुकूमत हूकूमशाही पे यकीन रखती है और जमुहरियत का क़त्ल कर रही है, वो सभी २६ जनवरी योमे जमुहरिया को सियाह दिन के जैसे बनाये.  अगरचे किसी भी क़ौमी इजलास में शमूलियत दर्ज करवाना ज़रूरी है तो एक काला फीता गले में डाल के जाए या काली पट्टी वाली घडी पहन के जाएँ, ताके हुकूमते हिन्द को अपने ख़िलाफ़े जमुहरिया अमल पे पशेमानी और नदामत हो सके.

Tuesday, 22 January 2019

पाकिस्तान पाकिस्तान मेरी जान पाकिस्तान


नाज़रीन ये सहाफी भारीतय अवाम का पाकिस्तान की निस्बत से जो आम तस्सवुर है के वहां अकलियतों के हुकूक की हक़ तलफी की जाती है.  पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जो ना इंसाफ़ी, दहशतगर्दी, मस्तूरात के हुकूक की हकतलफी, बॉर्डर पे भारतीय आर्मी जवानो की मौत का ज़िम्मेदार है उस गलत बयानी से पर्दा उठा कर उसको बरहना करेगा, और हकीकत से आप तमामी हज़रात को रूबरू करेगा.   इस तरह की गलतबयानी, झूट आम तोर पे संघी आतंकिओं की जमात, तशद्दुत पसंद हिन्दू अवाम और बीजपी के सियासतदानों की जानिब से फैलाई जाती है.  इन लोगो की जानिब से ऐसी गलतबयानी फैला के ये लोग अपने गुनाहों और बदकारिओं पे पर्दा डाले रखते है.   असल में भारत में अकलियतों के साथ जिसमे ख़ास कर के शामिल है मुस्लिम और क्रिस्टी जब्र किया जाता है,  तशद्दुत की जाती है.  उनको अज़ीयत पहुंचाई जाती है, हलाक किया जाता है, वो ना इंसाफ़ी का शिकार होते हैं.

ये सहाफी पहले भी अपने कई मज़मूनों में भारत और पाकिस्तान के मुक़ाबले में इस बात को मन्ज़रे आम कर चूका है की कई सूरत से पाकिस्तान भारत से बेहतर और बोहोत बेहतर है.  जहाँ भारत में अकलियतों (मुस्लिम और क्रिस्टी) समाज को अपने मज़हबी एतिक़ाद पे चलने और उसकी मश्क करने की इजाजात नहीं है वहीँ पाकिस्तान में हिन्दू अपने मज़हबी एतेक़ाद के हिसाब से आज़ादाना तरीके से अपने मज़हब की मश्क और मुशाहिदा कर सकते हैं.
हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलुंद शहर में तीन मुस्लिम नौ जवानो को नेशनल सेफ्टी एक्ट (NSA) के तहत एक गाय के क़त्ल के झूठे इलज़ाम में ग्रिफ्तार किया गया.  इस बेरहम एक्ट के तहत गिरफ्तार किये हुए मुजरिम ज़मानत के लिए अर्ज़ी नहीं कर सकते हैं और ना ही उनके लिए किसी भी तरह की कानूनी सलाह मशोरे की इजाज़त होती है,  ना ही कोई कानूनी तरीकेकार हिकमते अमली उनके लिए फ़राहम हो सकती है.   इस कानून के तहत गिरफ्तार किया हुआ मुजरिम अपने रिश्तेदारों से ना तो मिल सकता है और ना ही उसको हक़ है की किसी भी दफा पे अला ओहदेदारों से सवाल जवाब तालाब कर सकता है.

अभी तक उत्तर परदेश में नियोगी वज़ीरे अला के काबिज़ होने के बाद कुछ १६० मुस्लिम नौजवानो को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया जा चूका है और वो जेलों में सड़ रहे हैं.  जिसमे शामिल है २६ जनवरी को हुए कासगंज के दहशतगर्दाना हमले के मज़लूमीन.  इस दहशतगर्दाना हमले में मुस्लिम अवाम ने बड़े पैमाने पे अपनों को खोया उनकी तिजारत और कारोबार को हिन्दू दहशतगर्दों ने आतिशे नार किया, लेकिन जब इस कठोर कानून के तहत गिरफ्तारी की गई तो वो थे मुसलमान.  जबकि हिन्दू दहशतगर्द जो कासगंज के २६ जनवरी और बुलुंद शहर के दहशतगर्द हमलो में शामिल थे जिसमे एक पुलिस अफसर और एक शहरी की हलाकत हुई थी उनकी गिरफ्तारी IPC की सादे दफाओं में की गई.   पुलिस ने नियोगी वज़ीरे आला के हुकुम बरदाई करते हुए केस को मज़ीद नर्म बना दिया ताके शक की गुंजाइश दहशतगर्दों की जानिब चली जाए और वो जेल से जल्द बरी हो जाए.   

ये ही वजह है की ये सहाफी पाकिस्तान से मोहब्बत करता है और पाकिस्तान से मोहबत के एहसास, तसव्वुर और भारत से नफरत का खुल के इज़हार करता है.  पाकिस्तान से मोहब्बत का पैमाना इस सहाफी का उसकी इस्लामिक जमुहरियात का होना और भारत से नफरत हिन्दू अक्सरियत का होना हरगिज़ नहीं है.  बल्कि ये मोहबत है उस मुल्क के लिए जहाँ इन्साफ पसंदी है, अकलियतों के हुकूक हैं, मस्तूरात के लिए इज़्ज़त और अवाम के सभी हिस्सों के लिए बिला तफ़रीक़ कौम और मिल्लत बराबरी के मौके फ़राहम हैं.  और ये नफरत है उस मुल्क के लिए जो अब दहशतगर्दों (राम राज्य) के असवाल के तहत आ चूका है.  जो अब मुलव्विस है इन्साफ के क़त्ल में, हिन्दू अवाम की रहनुमाई में, मस्तूरात की हक़ तलफी, अकलियतों की हक़ तलफी, हिन्दू दहशतगर्दों ने जीने का हक़ छीन लिया है.

अगरचे पकिस्तान ने इस्लामिक जमुहीरियत के तहत अपना दर्जा बदला और उसको अपनाया लेकिन फिर भी वहाँ इंसानी हुकूक बिला तफरीक कौम और मिल्लत तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है, सभी को इन्साफ फ़राहम किया जाता है.  जबकि भारत एक दुनयावी जमुहीरियत है, लेकिन वहां हर इंसानी हुकूक की हक़ तलफी होती है.  अकलियतों के साथ उनके मज़हबी एतेक़ाद की वजह से ना इंसाफ़ी होती है तो ऐसी चीज़े दुनयावी जमुहरियात जैसे अलफ़ाज़ पे काला धब्बा हैं.    

भारत में मुसलमानो के साथ इस सभी ज्यात्तिओं, नाइंसाफ़ी, जब्र का जायज़ा लेते हुए ये सहाफी २६ जनवरी योमे जमुहरिया के पूरे रोज़ व्हाट्सअप पे अपनी डी.पी या तो काली रखेगा या नहीं रखेगा.  ऐसा कर के वो भारत हुकूमत के खिलाफ गुस्से और एहतेजाज का इज़हार करेगा और दिखाना चाहेगा.

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Pakistan, Pakistan Meri Jaan Pakistan.


Tuesday, 15 January 2019

मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है, जो है नाम वाला......बदनाम है


राज ठाकरे महाराष्ट्र की सियासत में खूब दखल रखते हैं, वो और उनकी पार्टी किसी भी सियासत दान का सियासी पार्टी का जोग्राफिया बिगाड़ने की कुव्वत रखतें हैं.  अगरचे पिछले महाराष्ट्र के इंतेखाबात में उनकी नव निर्माण को खासी कामयाबी हाथ नहीं लगी थी.  लेकिन अब राज ठाकरे बदले हुए अंदाज़ में हैं और २०१९ में सियासत की नई पिच पे बिछाई हुई बिसात पे खेलने को तैयार हैं.  हालांकि वो कभी मोदी के सबसे बड़े मवाफ़िक़ीनों में से माने जाते थे और वो उससे मिलने गुजरात भी गए थे.

सियासत की नई पिच पे महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के सरबराह राज ठाकरे ने सख्त अज़्म किया है की सभी मुख़ालिफे वतन, दहशतगर्द और हिटलर ज़ेहनीयति लोगों से दूरी बनाये रखेगें. यही वजह है राज ठाकरे ने दिल्ली की सियासी जामत कांग्रेस के सरबराह राहुल गाँधी को अपने बेटे की शादी में मदु किया लेकिन मोदी को नहीं कियाये शादी २७ जनवरी को संत रेगिस होटल लवर परेल में होना करार पाई है
ये बीजेपी के कभी मुआफ़िक रहे साथिओं में से एक राज ठाकरे का मोदी-अमित जैसे सियासतदाओं को ज़ोरदार झटका और तमाचा है, जहाँ राज ने लाल कृष्णा आडवाणी को मदु किया और मोदी को  भूल गए.
जिन खुसूसी सियासी शख्सियतों को राज ने अपने फ़रज़न्द की शादी में मदु किया है उसमे शामिल है कांग्रेस प्रेजिडेंट सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, अंजुमने वज़ीर राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, प्रकाश जावड़ेकर, धर्मेंद्र प्रधान और मोहतरमा मेनका गांधी.
एक सहाफी के सवाल पे क्या वो शादी में मोदी को बुलाएंगे, सहाफिओं से खिताब करते हुए ठाकरे ने बेबाकी से जवाब दिया, "क्या मोदी माशी और शादी शुदा ज़िन्दगी पे यकीन रखते हैं?
राज ठाकरे के फ़रज़न्द अमित की शादी मशहूर तबीब डॉ. संजय बुरडे की दुख्तर मिताली बुरडे के साथ ते होना करारा पाया हैशादी की रस्मे सादगी से अदा की जायेगी. मिताली पेशे से एक फैशन डिज़ाइनर हैं, और फैशन की दुनिया में उनका अपना ब्रांड है.

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अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...