Wednesday, 9 December 2020

Azadi Return, आज़ादी की वापसी.

अज़ीज़ नाज़रीन, 

आपको कश्मीर के चीख़ बाज़ों के आज़ादी के नक़्क़ारे याद होंगे, अगर आप लोग हुकूमत की चाबुक और बंदूक की गोलियों से ख़ौफ़ज़दा हो कर आज़ादी के नक़्क़ारे भूल गए होंगे तो फिर से याद कीजिये।   जी हाँ कश्मीर की बर्फीली वादियों से आज़ादी का वही नक़्क़ारा वही अंदाज़ फिर लौट आया है।  जिसको कभी कश्मीरी अवाम कई सालों तक बोला करते थे, लेकिन अगस्त २०१९ से पेश्तर और ख़ुसूसी उस काले दिन के बाद कश्मीर के चीख़ बाज़ों का वोह आज़ादी का तराना हर ज़ुल्म, दहशत, ना इन्साफी की लड़ाई के लिए एक आइकॉन ना सिर्फ भारत बल्कि बेरुन मुल्क पाकिस्तान, इंग्लैंड, अमेरिका, दुबाई,  रूस में बना। ऐसा करने के पीछे मक़सद कश्मीर के अवाम के साथ इज़हारे एकजहदी और उनके ग़म में इज़ाहरे शमूलियत करना होता है। 

नाज़रीन आज़ादी आज़ादी आज़ादी, हम क्या चाहते आज़ादी, हम ले कर रहेंगे आज़ादी, चाहे डंडे मारो, चाहे जेल में डालो……………. चीख़ बाज़ों के इस तराने को लंगूर वतन के खिलाफ ग़द्दारी करने जैसा अमल क़रार दे कर हर उस इंसान के खिलाफ सख़्त अलफ़ाज़ में खबरे शाया करने लग गए जो इस आज़ादी के तराने को गाता था।  उसकी वजह महज़ यह थी की यह तराना कश्मीर और कश्मीरी अवाम से मुनसलिक था।   उसका नतीजा क्या हुआ, खुद लंगूरों ने इस तराने को मक़बूल कर दिया।  

पहले महज़ यह तराना कश्मीर तक महदूत था उसके बाद जब कोई आज़ादी का तराना पड़ता लंगूर और लँगूरनियाँ पूरी पूरी ब्रेकिंग न्यूज़ चला देते, अलीगढ़ में भी लगे आज़ादी के नारे, कानपुर में भी लगे आज़ादी के नारे, दिल्ली में भी लगे आज़ादी के नारे।   उसके बाद हुआ क्या जो आग लंगूरों ने सुलगाई थी जिसके पीछे इनकी नियत गलीज़ और गन्दी थी उसका नतीजा यह हुआ की तमाम भारत में यहाँ तक केरला और तमिलनाडु  तक में उसी अंदाज़ में मोदी इंतेज़ामिया के ज़ुल्म, जब्र, दहशत और ना इंसाफ़ी के खिलाफ आज़ादी के नक़्क़ारे गूंजने लगे और यह तर्ज़ एक प्रतिक बन गया।    

वही आज़ादी के नक़्क़ारे फिर से फ़िज़ाओं में गूजने लगे हैं।  अवाम अब मोदी से और ऐसी निकम्मी हुमूकत से आज़ादी के नारे उसी तर्ज़ पर लगा रही है जिस तर्ज़ पर गुजिश्ता साल "का" और ऐन.आर.सी. की मुख़ालेफ़त में लगाए गए थे।

मोदी इन्तेज़ामियाँ, खाकी दहशत और लंगूर-लँगूरनियों को इस बात को तस्लीम करना होगा कश्मीर के जिस आज़ादी के नक़्क़ारे की आवाज़ का गला इन लोगों ने घोंटना चाहा था वही नक़्क़ारा अब एक चिन्ह बन चूका है,  और अब कश्मीर से निकल कर ना सिर्फ तमाम भारत को बल्कि निस्फ़ दुनियां को अपनी आगोश में ले चूका है, जिसकी पेशनगोई इस सहाफी ने साल २०१८ आखिर और २०१९ के शुरूवाती महीनों में कर दी थी की जिस आज़ादी के नक़्क़ारों की आवाज़ को तुम लोग दबाना चाहते हो वही आवाज़ तमाम भारत में गूंजेगी।     

८ दिसम्बर को मजिलस इत्तेहादुल मुस्लेमीन के हाल ही में मुंतखिब रकूने असेंबली और सूबे बिहार के सदर जनाब अख्तरुल ईमान ने एक इजलास को खिलताब किया और हुकूमत के खिलाफ पुर अमन एहतेजाज दर्ज करवाया।   इस मौके पर उन्होंने इस काले क़ानून को वापिस लेने की मोदी इंतेज़ामिया से गुज़ारिश भी की है।    

कश्मीर का यह आज़ादी का नक़्क़ारा नौजवान और तुलबा में इस क़दर मक़बूल हुआ था, क्लास रूम, कॉन्फ्रेंस हाल, लेक्चर हर जगह आज़ादी आज़ादी आज़ादी के नारे बुलंद होते थे।   यह बात अलहदा है की मोदी इन्तेज़ामियाँ ने कोविद-१९ के क़ेहरे इलाही की आड़ में इन नक़्क़ारों की गूँज को दाबाना चाहा, लेकिन अवाम के दिलों दिमाग में सुलगते हुए वही अलफ़ाज़ को साफ़ ना कर सका।  वोह आज भी नौजवानों के ज़ेहनों में उतने ही तरो ताज़ा हैं जितने की दिल्ली के ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के हमले के ज़खम।   जिस तरह से दिल्ली के दहशतगर्दाना हमले के ज़ख़्म आज भी उतने ही ताज़ा और खून से सुर्ख है उसी तरह आज़ादी की चीख़ में आज भी वही अलफ़ाज़ मौजूद हैं।   हाँ वक़्त की आंधी ने थोड़ा सा इधर उधर कर दिया था लेकिन अलफ़ाज़ सूर ताल और ले फिर से मिल चुकी है।    

आज ९ महीनों के वक़्फ़े के बाद वही नक़्क़ारे एक बार फिर से हिन्द की सरज़मीन पर पैदा हुए हैं। 

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