अज़ीज़ नाज़रीन,
आज आपके दरमियान अल्लाह उसके नबी और रूहानी शख़्सियत (अपने मुर्शिद) पर कामिल यक़ीन और नियत का इस्लामिक उसूल क्या हैं उस दर्स को ले कर हाज़िरे ख़िदमत हूँ। नाज़रीन नियत का दारो मदार मोमिन के दिल में किये हुए उस पुख्ता अज़्म जिसको वोह करना चाहता है। दिल से किसी बात को मान लेना और ज़ुबान से उसका इक़रार करना ही तो इस्लाम है। नाज़रीन इस्लामिक अव्वल कलमा ही मुल्हिद (नास्तिक) या इन्कार और इक़रार के उसूल से शुरू होता है, यानी यह कहना ग़लत नहीं होगा की हर काफिर या मुल्हिद ख़ुदा की ज़ात का इन्कार करता है बाद में ख़ुदा को जांचने परखने और महसूस करने के बाद वोह उसका इक़रार करता है और मुस्लिम या इस्लामिक हो जाता है। वोह कैसे इस फलसफे की तशरीह करता हूँ। इस्लाम का पहला कलमा है, "नहीं है कोई इबादत के लायक, मगर अल्लाह के"।
नाज़रीन यहाँ यह बात वाज़े कर दूँ की हर मुल्हिद (नास्तिक) या
मूर्ती पूजक इस्लाम का आधा कलमा ही तो पढ़ते हैं, मुलहिदों
को किसी ख़ुदा पर यक़ीन ही नहीं होता और उनका मानना भी यही होता है की सदियों से कायनात
का निज़ाम यूं ही चलता आ रहा है और चलता रहेगा।
और मूर्ती पूजकों ने अपने अपने ख़ुदा बना लिए। किसी ने इंसान को ही भगवान् का दर्जा दे दिया,
किसी ने छोला छाप फ़क़ीर को ही भगवान बना कर उसका मंदर बना दिया। लेकिन जिन्होंने उस आधे कलमे से पूरे कलमे पर जाने
से पहले तमाम तहक़ीक़ात की और इस्लाम, ख़ुदा, पैगम्बर और क़ुरान पर दौरान तहक़ीक़ उस ख़ुदा के जलवे उसकी रेहमत
को महसूस किया अपने बिगड़ते हुए कामों को सही होते देखा और दुश्मन के दुरुस्त और सही
कामों को उल्टा होते देखा तो फिर आ गए मालिके कायनात की गुलामी में और पढ़ लिया पूरा
कलमा “मगर अल्लाह के”। नाज़रीन इस्लामिक क़ानून और उसूल भी यही है
"ला इकराहा फिद दीन" दीन में कोई
ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है।
आज अगर कोई मज़हब सबसे ज़्यादा फ़ैल रहा है तो वोह है इस्लाम उसकी वजह है रसूले अरबी के मौजज़ात उसके बाद बुज़ुर्गाने दीन की करामात जिसको देख कर इंसान के मुँह से बेसाख़्ता निकला हक़ है तेरा मज़हब और हम गुमराही के अंधेरों में भटक रहे थे अब हम तेरे मज़हब की पैरवी करेंगें। इस्लाम तलवार के ज़ोर पर नहीं फैला है, जो लोग ऐसा मनफ़ी अक़्स इस्लाम का पेश करतें हैं वोह खुद ही अपने मुल्क में दीगर अक़लियतों को पीट पीट कर, उसकी गर्दन पर तलवार रख कर अपना पसंदीदा नारा लगवाते हैं। बोल जय जय………………… नहीं तो तेरी गर्दन क़लम कर देंगे। और मौत के घाट उतारा भी गया है। फिर खुले आम एक ख़ास मज़हब के लोगों के घरों पर तलवार तक़सीम की जाती है, ताके उस तलवार से वोह अपनी हिफाज़त कर सकें। तीन मूही ६ धारी तलवार उसको त्रिशूल बोला जाता है लेकिन वोह होती कितनी जानलेवा है, लेकिन अपनी करतूतों पर कोई नज़र नहीं और इलज़ाम दूसरों पर की तलवार के ज़ोर पर मुस्लिम बनाया गया।
फिर जब तहक़ीक़ कर के तमाम चीज़ों और उस रूहानी एहसास को महसूस
कर के इस्लाम में दाखिल हो गए तो अब उसके ऊपर कामिल यक़ीन भी करना होगा। क्योंकि तहक़ीक़ में वही तमाम चीज़ें सही और दुर्सुत
पाई गई थी। ना के किसी बादशाह के झूट,
फरेब, धोखेबाज़ी, जालसाज़ी की तरह पाई थी।
और जो झूट पर फरेब धोखेबाज़ी पर अपना महल बनता है वोह हमेशां हमेशां नहीं रहता
बल्कि रेत का क़िला साबित होता है जो बरसात आते ही ढह जाता है लेकिन यक़ीन की जो पक्की
इमारत होती है वोह तहक़ीक़ कर के महसूस कर के
बनाई जाती है तो वोह ऐसी ही मज़बूत होती है जैसे की फौलाद फिर उसमे किसी भी दुश्मन और
शैतान को दाखिल होने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती।
आइये अब तब्सिरा नियत पर कर लेते हैं। नाज़रीन नियत की निस्बत से इस्लामिक फलसफा और क़ानून
एक दम वाज़े है मोमीन के क़ल्ब में किसी काम को करने के बारे में अज़्म करना ही नियत होता
है। फिर हर ईमान वाला और बद ईमान जिसने अपने
दिल में कोई नियत की है तो उसके हिसाब से उसके आमाल होतें हैं और अल्लाह की सज़ा और जज़ा भी उसको उसके
नियत के पूरा करने और ना करने पर होती है।
कोई बंदा ऐ मोमीन नेक नियती से किसी नेक काम करने का इरादा करता तो उसको पूरा करने के लिए तमाम कायनात की मदद होती है और अल्लाह के फ़रिश्ते उस बन्दे के काम को आगे से आगे पूरा करतें हैं ताके उस सवाब का वोह मुस्तहिक़ हो जाए और उस पर सवाब की मोहर लग जाए। दो सच्चे मोमीनों में ज़ुबान से की हुई नियत ही काफी है उसके लिए मोहायेदे की शक़्ल में कोई क़ानूनी दस्तावज तैयार करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है। दिल में नियत कर ली और उसको ज़ाहिर कर दी तो काफी है। लेकिन बेहतर है की रक़म, दौलत, जायदात के मसले पर अगर कोई तहरीरी दस्तावेज़ तैयार कर लिया जाए, और अगर मुक़ाबिल कोई ग़ैर मुस्लिम है तो हर हाल में तहरीर करवालेना क़ुरान के हुकुम के हिसाब से दुरस्त है। और मोमिनीन के लिए ऐसा ही करना अफ़ज़ल अमल होगा।
हज़रते उमरे फ़ारूक़ के दौरे ख़िलाफ़त में जब जेरुशलम फतह करने को
चले तो ग़ुलाम और हाकिमे वक़्त खलीफा उमर के दरमियान एक मोहायेदा हुआ उस पर दोनों सख़्ती
से अमल करते रहे लेकिन जब जेरुशलम नज़दीक आया तो ग़ुलाम के दिल में शैतान ने वसवसा डाला
लेकिन हाकिम वोह थे जिनको देख कर शैतान अपना रास्ता बदल देता था। हज़रते फ़ारूक़ बोले नहीं कुछ भी हो जो मोहायदा हो
गया सो हो गया अब दुनिया से क्या करना है, यहूद हाकिम या आला तालीमी अफ्ता माशी क़वी हमें कुछ भी तस्लीम करें हम वही करेंगे जो मोहायदा चलने
से क़ब्ल ते हो चूका था। जब उमरे फ़ारूक़ का यह
अज़्म और सख़त बर्ताव देखा तो शैतान पिटा, शैतान का वोह हरबा नाकाम साबित हुआ
और जेरुशलम फतह हुआ।
नाज़रीन बताने का मक़सद वही है हाकिम हो या मुर्शिद एक बार दो
बार या तीन बार हाकिम की हरामकारी, बदबख़्ती, जालसाज़ी या मुर्शिद के कश्फ़ करामात,
दीनी तालीम, शरीयत का पासो लिहाज़ का इल्म हो गया तो अब यह नाज़रीन आपके हाथ
है की किसके ऊपर अँधा यक़ीन किया जाए और किसके ऊपर ना किया जाए।
और बार बार सवाल मुस्लिम अवाम से ही किया जाता है, वही बक़ौल फ़्रांस के सदर और संघी एजेंटों के की तमाम आलम में मुसलमानों से ही उनके ख़रा और सही होने का सबूत माँगा जाता है और वही देतें फिरते हैं। पाकिस्तान को जितना हिन्द के अवाम लंगूर और लँगूरनियाँ, फ़ौज से किनाराकश हुए दिफ़ाई महरीन बदनाम करतें हैं और उससे उसका ख़रा होने का सबूत मांगते हैं तो जो सच्चा होता है ख़रा होता है महंगा होता है अनमोल होता है उसकी ही जांच की जाती है। नहीं तो मोदी और भारत की ज़ाफ़रानी हुकूमत को कोई कोड़ी के भाव पाकिस्तान, अफगानिस्तान, या अरबिस्तान में नहीं पूछता। आते हो आओ जाते हो जाओ तुम तो बरसात में स्टॉक हाल के बहार पड़े पड़े जंग खाते हुए उस लोहे की मिसाल हो जिसकी क़दर सिर्फ भंगार वाला ही कर सकता है ना की सुनार की हज़ारों लाखों के आला तरीन शो रूम में कांच की संदूक में सजा सकता है।
नाज़रीन जिस तरह से सोने को गन्दा और मिलावट कर के कुछ लोग अपना
नफा बढ़ाते हैं उसी तर्ज़ पर कुछ लोग मुस्लिम अवाम में और इस्लाम में मिलावट कर के मुनाफ़िक़ों
को पैदा करतें हैं। अब यहाँ पर भी सच्चे और
ईमान वाले की जांच में जो ईमान वाला होगा वोह सोने की तरह ख़रा पाया जाएगा उसकी सिफ़त
क़ुरान,
हदीस में बा खूबी बता दी गई हैं,
वहीँ मिलावटी मुनाफ़िक़ नक़वी, शाहनवाज़, ज़फर, मोहसिन जैसे लोग पीतल में सोने का पानी चढ़ाये हुए पाए जायेगें, हर मुद्दे
पर झूट,
फरेब दग़ाबाज़। हक़ और
ईमान वाली कोई भी सिफ़त उनमे नहीं होंगी।
और यही लोग इमाम हुसैन के क़ातिलों के साथ पाए जायेगे और ऐन मौक़े पर अपने एहद और ख़ुतूत को झुटला देंगे। कश्मीर पर अपना खुद का दस्तूर को तोड़ डाला। दग़ा किया, फरेब मचाया। ३७० हटाना ग़लत नहीं था, लेकिन जिस अंदाज़ में बंदूक की नौक पर तलवार गर्दन पर रख कर झूट फरेब जालसाज़ी से अवाम को गुमराह कर के किया वोह ग़लत था।
१. कश्मीर के अवाम के हक़ में फैसला और उन्ही से नहीं पुछा गया।
२. ट्रिपल तलाक़ पर मुस्लिम नौजवानों, नस्लों को तबाह, इस्लामिक शरीयत तब्दील पर फैसला और ओलेमा दीन से कुछ भी नहीं पुछा।
३. भारत के असासे बेच दिए लाल क़िला बरतानिया ताजिर को ताज पाकिस्तान को और भारत के अवाम से नहीं पुछा।
४.
मुस्लिम शहरियत का मसला और मुस्लिम अवाम से मुस्लिम क़ियादत से
नहीं पुछा।
५. किसानों के हक़ का फैसला और किसानों से नहीं पुछा गया।
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