Friday, 11 December 2020

इंसान की सिफ़त और उसके ऊपर मदद

 मज़मून नवाज़ सहाफी जुबेर

११, दिसम्बर २०२० बरोज़ जुमा ४:१८ PM 


अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आप लोगों को इंसान की सिफ़त और उसके काम करने के तरीक़ेक़ार हिकमत पर मालिके कायनात की मदद के बारे में बताता हूँ।   नाज़रीन इंसान के काम करने के तरीक़े की ५ क़िस्मे होती हैं।  और उस तरीक़े के ऊपर मालिके कायनात की मदद शामिल होती है।   जिसमे से ऊपर की ३ एक आम इंसान की सिफ़त होती है और नीचे की २ सियासतदानों या हुक्मरानों की सिफ़त होती है। 

१.     काम करने का जज़्बा:  नाज़रीन इस क़िस्म के लोग पूरी मेहनत, ईमानदारी और सिदक़ दिल से अपने काम को करतें हैं और उनको काम को मुक्कमल करने का एक जूनून होता है।  ऐसे लोग पूरी अक़ीदत से अपने काम को अंजाम देतें हैं।   ऐसे लोग जो पूरी लगन और दिल से काम करतें हैं उनके कामों में  सो फीसद नहीं तो कमो बेश ९० फीसद लोगों को कामयाबी मिलती है।   बचे हुए जो १०% हैं उनका काम नहीं होता है क्योंके उससे अच्छा कुछ हो सकता है मालिके कायनात ने उनकी किस्मत में लिख कर रखा होता है। 

२.       नाज़रीन दुसरे किस्म के वोह लोग होतें हैं जो काम को बे दिल, आधे अधूरे दिल से और एक बोझ है सोच कर करतें हैं।  ऐसे लोगों को कामयाबी तो मिलती है लेकिन आधी अधूरी।   हाथ में आया लेकिन मुँह ना लगा वाला हिसाब होता है।   कभी कभी काम पूरा हो कर भी कुछ ऐसी परेशानी हो जाती है की पछताने के अलावा कुछ नहीं रहता, काश अगर हम इतना सा ख्याल कर लेते तो आज हमको हमारी मेहनत की पूरी कीमत वसूल होती।   ऐसे लोग सदा दुसरे दर्जे में रहकर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं।  या दुसरे के रहमो करम पर ज़िंदा रहतें हैं। 

३.    तीसरी क़िस्म के वोह लोग होतें हैं जो एक गुलाम की हैसियत से "आश्रम" में अपनी मर्ज़ी के बग़ैर काम करतें हैं।   उनके ऊपर सदा टांगती तलवार लटकी होती है या उनकी गर्दन पर तलवार रख कर बोला जाता है, बोल जय जय श्री……………….      बोल वंदे………………..      बोल भारत…………………. जय,  नहीं तो गर्दन क़लम कर देंगे।   मतलब जब्र, तशद्दुत, दहशत मचा कर काम करवाना।  ऐसे लोग इतने मजबूर और कमज़ोर हो जातें हैं की अपनी जान बचाने के लिए वोह ज़ालिम की ताईद भी करते हैं लेकिन उनका दिल इन ज़ालिमों के साथ नहीं होता।   फील वक़्त हो सकता है तलवार के ज़ोर पर ऐसे मजबूर कमज़ोर इंसान इन ज़ालिमों की हाँ में हाँ मिला लें और तलवार के ज़ोर पर हिन्दू मज़हब को फैलाने के काम को आगे बढाए लेकिन इस तरह से किये हुए कामों के दूरंदेश नताइज भयानक और डरावने होतें हैं।   क्योंके इंसान जो भी काम करता है दिल से नहीं बल्कि तलवार के ज़ोर पर और दहशत के ख़ौफ़ से करता है लेकिन उसका दिल उस काम को करने की इजाज़त नहीं देता तो ऐसे में अब मालिके कायनात उस इंसान के साथ होता है।   जैसे की हिन्दू मज़हब तलवार के ज़ोर पर फैला है, डरा धमका कर गर्दन क़लम कर देंगे इस ख़ौफ़ के ज़ोर पर फैलाया गया है।      

४.     चौथी किस्म होती है साजिश कर के काम करना: इस तरह की क़िस्म ऐसे लोगों की होती है जिनके किरदार, जिस्म और समाज से मुनाफ़ेक़त की बू आती है ऐसे लोग कभी भी सच्ची, ईमानदारी की बात नहीं करते बरक्स हर दम धोका देना, फरेब, झूटी बात करना, साजिश के साथ सदा ही अपने मुख़ालिफ़ों को पस्त करने की हिकमत में रहतें हैं।  इन लोगों को अपने क़ुव्वते बाज़ू पर एतेमाद नहीं होता है, यह लोगों में जिस्मानी और ज़ेहनी कमज़ोरी देखी जा सकती है तभी ऐसे लोग अपने घरों की औरतों को डरा धमका कर ख़ौफ़ के माहौल में जीने को मजबूर करतें हैं।   कभी पेट्रोल डाल कर आग लगा देंगे, कभी ज़िंदा चिता पर जला डालेंगे, कभी लड़की पैदा होने में तेरा ही हाथ है। साजिशन अपने मुख़ालिफ़ों पर जीत दर्ज करने वालों के दूरंदेश नताइज कभी भी ख़ैरख़्वाह नहीं होते।   हो सकता है उनको अपनी ११ या १२ साजिशों में से कुछ में कामयाबी मिल जाए लेकिन ऐसी कामयाबी मुस्तक़िल नहीं होती है।   बल्कि आरज़ी होती है और कुछ दिनों के बाद सबके सामने हक़ीक़त आ जाती है।  सऊदी अरब में इस्लाम के इब्तेदाई दौर में काफिर बोहोत साजिश करते थे इस्लाम और मुसलमानों को तकलीफ देते थे, उस वक़्त उनकी कुछ एक साजिशें कामयाब भी हुई  लेकिन आज काफिरों का कोई नाम लेवा नहीं है किसी भी साजिशकर्ता का वली वारिस मादर ज़ात बच्चा तक नहीं बचा।  नस्लें ख़तम हो गई नस्लें बर्बाद हो गई लेकिन सऊदी से इस्लाम को ख़तम नहीं कर पाए।  उसी हिसाब से नस्लें बर्बाद हो जाएगी लेकिन हैदराबाद का नाम नहीं बदल पायेगें।  

५.    पांचवी किस्म ऐसे लोगों की होती है जिनको ज़नख़ों की जमात बोल दिया जाए तो कुछ गलत ना होगा।  यह लोग हर मुद्दे पर फरारी इख़्तेयार करने के क़ाइल होते हैं।   जहाँ कुछ मर्दानगी दिखाने का मौक़ा आया यह लोग फरार हो जातें हैं।   कभी लेडीज सलवार, कुर्ती पहन कर कभी अपनी खुद की शरीके हयात को ही छोड़ भागते हैं।   ऐसे लोग मस्तूरातों का दिल जीतने में क़ासिर होतें हैं।  मर्द वोह जो अपनी लुगाई की ना सिर्फ अस्मत ज़ालिमों से बचाये बल्कि अगर ज़रुरत पड़े तो ज़ालिम को मौत के घाट उतारने से भी नहीं चुके।  एक ख़ातून दिल उसी मर्द को देती है जिसको देख कर उसको लगे की यह मर्द कभी भी मेरी मजबूरी का फायदा नहीं उठाएगा और अगर इससे शादी हो गई तो हर ज़ालिम से हर ज़ुल्म से मुझे और मेरे बच्चों को मेहफ़ूज़ रखेगा।  एक ख़ातून अपने मर्द की आग़ोश में अपने आपको सबसे ज़्यादा मेहफ़ूज़ समझती है वहीँ जो मर्द ख़ुद ही अपनी लुगाई के दामन में छुपे जा रहा हो तो ऐसे मर्द को वोह ख़ातून अपना शोहर या पती तस्लीम करने को राज़ी नहीं होगी।   बिल फ़र्ज़ माँ बाप ने ज़बरदस्ती शादी कर दी तो वोह ऐसे रिश्ते से अलहदगी इख़्तेयार करना सही और दुरुस्त समझेगी जो रिश्ता उसको समाज में इज़्ज़त और विक़ार नहीं दिलवा सके।   जो पती उसकी इज़्ज़त के लिए दुनियां वालों के मुँह पर तमाचा नहीं मार सके, बरक्स फरारी इख़्तेयार कर ले। 

नाज़रीन असली शेरों और मर्दों की यह कुछ सिफ़त बयान की हैं, असली मर्द वोह जो ज़मीन और औरत का दिल जीत ले ना की साजिश, धोखा, बेईमानी से दुसरे की ज़मीन और इबादतगाहों पर क़ब्ज़ा करे और अदालत से झूठे सच्चे कागद पेपर बनवा ले। असली मर्द वोह जो खुद अपने हाथों से अपने परिवार के लिए छोटा ही सही लेकिन घरोंदा बनवाये (मतलब हलाल की कमाई से) और अगर हाकिमे वक़्त है तो अपनी सरपरस्ती में अवाम के लिए फलाही कामों को करवाए।  ना की दुसरे बादशाहों के किये हुए कामों और इमारतों को एक हिजड़े और कमज़ोर इंसान की तरह अपनी इमारत बोल कर क़ब्ज़ा करना चाहे।  

जो उसूल औरत के लिए हैं वही ज़मीन के लिए।  असली मर्द के अमल, हक़गोई, उसका जज़्बा और इन्साफ को क़याम करने का जूनून औरत का दिल जीतते हैं वही साजिश कर के धोखा दे कर औरत को अपने आश्रम की ग़ुलाम तो बना सकते हो लेकिन दिल नहीं जीत सकते।  

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