Friday, 30 November 2018

जशने आज़ादी या यौमे जमुहरिया बनाना इस्लाम का हिस्सा नहीं: सहाफी जुबेर


इस सहाफी के कौमी इजलास में मुस्लिम मौलानाओं की शमूलियत का फ़तवा अब रंग लाने लगा है.  इस फतवे पे काफी प्रतिक्रियाएं इस सहाफी को उसके फेस बुक मैसेंजर तथा वाट्सअप नंबर में आने लगी हैं.  इस फतवे के मुवाफिक इसको सराहा रहे है और दलील को सही बता रहे है. लेकिन संघी जो आम तोर पे नंगी गालियां देने में माहिर हैं गलीज़ ओछी ज़ुबान इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते है इश्तेआल अंगेज़ी भरे कमेंट कर रहे हैं.  कुछ मौलानाओं ने फतवे की वैधता और प्रामाणिकता पे ही सवालिया निशान लगा दिए.  उनका कहना था ऐसे कोई भी उठ के फतवे देने लगेगा तो इस्लाम मज़हब रोडों की ज़ीनत बन के रह जाएगा.  बिलकुल सही बोलै मौलाना साहबों ने; जब एक सहाफी को ये हक़ नहीं के वो कौमी इजलास में किसी भी अफ़राद की शमूलिया का फ़तवा दे तो कोई भी अधिवक्ता, संघी तंज़ीमों से ताल्लुक रखने वाला मौलाना, सरकार का ज़र खरीद गुलाम कैसे किसी भी इस्लामिक मसले में फ़तवा दे सकता है.  ईद मिलाद मानना या ना मानना ऐसे मसलो पे किसी भी गैर ज़रूरी अफ़राद को बोलने का क्या हक़ है.

दूसरी बात जो राष्ट्रिय मुस्लिम मंच के मौलाना है सब जानते है वो संघ की खरीदी हुई वो काली भेड़े है जो इस्लाम और मुसलमानो को सिर्फ और सिर्फ इज़ा पहुंचाने का काम करती है.  ऐसी ही तंज़ीमे फलस्तीन में और सऊदी के हकीमो के रूप में मौजूद है जो यहूदी इशारों पे नबी का लाया हुआ इस्लाम मज़हब छोड़ के अपना खुद का 'मॉडर्न इस्लाम' चलाते है.  

कुफ्रिस्तान के जो मौलाना और दिगर मुस्लिम अवाम एक मुस्लिम देश पाकिस्तान पे तनक़ीद करते है और हिन्दू तथा भारत सरकार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की जाने अनजाने पैरवी करते है; हाफिज सईद की गिरफ्तारी और सजा की मांग करते है उनसे ये सहाफी सिर्फ इतना ही पूछना चाहता है, की उनकी ये मांग करने का क्या ठोस आधार है; और उनके पास क्या सबूत है के हाफिज साहब बंबई अटैक में शामिल थे.  अगर वो सही मौलाना है और उनको ज़रा सा भी इस्लाम का इल्म है तो उनको ये मालूम होना चाहिए की किसी भी इंसान पे कोई भी बे बुन्याद बात करना जिसका कोई भी सबूत इनके पास नहीं है वो बोहतान है और इत्तेहान है.  फिर हाफिज साहब तो मुस्लिम नमाज़ी परहेज़गार खुश दिल सूरत वाले एक इंसान हैं.   और बोहतान की इस्लामिक क्या सजा है इन मौलानाओं को मालूम होना चाहिए.  ये लोग दूनायवी ज़िन्दगी को ही सब कुछ समझ बैठे है और उखरवी ज़िन्दगी के लिए अपने हक़ में कांटे बो रहे है.  अगर इन मौलानाओं के पास कुछ भी ठोस सबूत है तो पेश करें नहीं तो ये सहाफी रौज़ए महशर में अल्लाह के हुज़ूर इनका दामन गीर होगा, के इन्होने बगैर किसी सबूत के मेरे मुसलमान भाई के ऊपर तोहमत लगाईं थी. अल्लाह के हुज़ूर कोई हीले बाज़ी और गलतबयानी नहीं चलेगी. जो मुजरिम होगा और झूट बोलेगा तो उसके बदन के आज़ा गवाही देने लगेंगे ऐ बारी ताला तेरा ये बंदा झूट बोल रहा है इसके इस गुनाह में इसका ये आज़ा बराबरी का हिस्सेदार है.  

अगर ये मुस्लिम मौलाना भारत की सुरक्षा एजेंसीज द्वारा दी गई किसी भी सामग्री को देख के गुमराह हो रहे है और हाफिज सईद और पाक के खिलाफ इश्तेआल अंगेज़ी कर रहे है तो भारत की सुरक्षा एजेंसीज की ओकात तो बोहोत पहले ही इस सहाफी को पता चल गई थी जब वो सहाफत में आया था.  जिस तरह से झूठे केसस में मुस्लिम नौजावानों को फसाया गया था फिर उनकी जवानी बर्बाद हो कर कोई २० साल कोई २५ साल उस इलज़ाम से बरी हुए.  दूसरी बात भारत की सुरखा एजेंसीज की किस बात पे यकीन किया जाए के उनके दूआरा पेश किये हुए सबूत पर्याप्त हैं जो मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ ब्लास्ट में १५ और २० सालो तक ये सुनिश्चित नहीं कर पाई के असली मुजरिम कौन है और सबूतों के अभाव में सभी हिन्दू आतंकी जेल से बरी हो गए.  हाल ही में दिल्ली में दो मदरसों के तालिबे इल्मों में भारत की इन सुरक्षा एजेंसिओं को आतंकी नज़र आने लगे थे. जिसके ऊपर इस सहाफी ने २१ नवंबर को एक ट्वीट किया है.

Zuber Ahmed Khan shared a post.

केजरीवाल पे हमले के पीछे हिन्दू आतंकी और भाजपा का हाथ. चुनाव आते ही ब्लास्ट शुरू हो गए और पाकिस्तानी एजेंसी आई.अस.आई. जो बरसो से खामोश थी फिर से सक्रीय हो गई. मुस्लिम समुदाय के आतंकी फिर से सक्रीय हो गए और कुछ की गिरफ्तारी भी की गई. सुरक्षा एजेंसीज को आतंकी हमलो के फीडबैक मिलने लगे. दिल्ली के आस पास आतंकी सक्रीय हो गए और भारत की प्रभुता और सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस होने लगा. क्या ये भी इत्तिफाक नहीं है. सिर्फ और सिर्फ भाजपा का षड्यंत्र और सस्ती लोकप्रियता और सहानुभूति के लिए किया गया कृत. एक तीर से दो निशाने, ऐसी झूटी और फरेबी खबरों के आधार और पाक के नाम पे वोट का ध्रूवीकरण कर के २०१९ का चुनाव जीतना और अगर हार गए तो इस तरह की गतिविधिया जारी रख कर सत्ताधारी पक्ष और सरकार के काम पे कटाक्ष करना और कहना हम ५ साल तक सत्ता पे रहे लेकिन एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ. फिर वोट बैंक की राजनीती का इलज़ाम लगाना वगेरा वगेरा.... तो ऐसी धूर्त और कपटी मानसिकता भाजपा, संघी और आतंकिओं की है वो सदा ही पीठ पे वार करते है और आमने सामने की लड़ाई में पिछवाड़ा दिखा कर भाग जाते है.



इन मौलानाओं को बम्बई के १६६ लोगो की जान के ऐवज़ में हाफिज सईद की गिरफ्तारी चाहिए क्या इन्होने जितने भी मुस्लिम २०१४ के बाद गौ आतंकिओं के हमले; हिन्दू आतंकिओ की भीड़ द्वारा झूठे इलज़ाम में मार दिए गए, उनके लिए इन्साफ की मांग भारत सरकार से की थी.  अगर भारत सरकार ने नहीं सूनी तो क्या इन्होने उस मुद्दे को अंतराष्ट्रीय मंच पे ले जाने की पहल की थी.  इन मुस्लिम दानिशमंदो को कूव्वत नहीं के वो भारत सरकार के आतंकवाद के खिलाफ बोल सके लेकिन ये सहाफी अपनी हैसियत और कूव्वत के हिसाब से अपना काम अंजाम दे रहा है और इसको फख्र है उसने  किसी भी हिन्दू आतंकी तंज़ीम या सरकारी आतंकवाद के साथ समझौता नहीं किया .  जो गलत था उसको कहा और लिखा.  बिलफ़र्ज़  अगर कोई कमी नज़र आती है तो कहें, या ध्यान में लाएं अगर वो कमी है तो उसको दूर किया जाएगा. इंशाअल्लाह.

कुफ्रिस्तान में कुछ ज़र खरीद मुस्लिम समाज में मौलाना हाफिज सईद साहब को लेकर इश्तेआल और छाती कूट रहे है; जिनको के पाक उच्चत्तम न्यायलय ने और सरकार ने तमाम जुर्म से बरी किया है.  ये मौलाना आतंकी संघ के चेले और उसकी गंदगी है.  इनके दिलों पे १० साल पुराना बम्बई का दर्द अभी तक पेवस्त है जबकि मूस्लिम नौजवानो को आदमखोर आतंकिओं की भीड़ ने २०१८ तक पीट पीट के शहीद कर डाला वो बातें याद नहीं है.  उत्तर प्रदेश में कासिम पानी पानी चिल्लाता रहा लेकिन आतंकी उसके ऊपर लाते घुसे बरसाते रहे.  उससे भी ज़्यादा दुख वाली बात उनकी जसत को पुलिस की निगरानी में घसीट के ले जाया गया.  लेकिन इन मौलानाओं ने भारत सरकार के आतंक के खिलाफ एहतेजाज नहीं किया. 


ये सहाफी, अधिवक्ता इमरान साहब से भी सवाल करता है जो टीवी डिबेट में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ईद मिलाद पे फतवे देतें हैं और हदीस का मफूम समझाते है के अगर किसी शख्स को सही बात पता थी और उसने दूसरों को नहीं बताई तो वो रौज़े महशर में सजा का मुर्तकिब होगा.  एक बात शायद इमरान साहब और तमाम मौलाना जो हाफिज सईद पे बवाल कर रहे है और भारत सरकार के आतंक का एक हिस्सा बन रहे है उनको श्याद ये पता नहीं होगी के ज़ुल्म सहना और उसको रोकने के लिए लड़ाई ना करना भी गुनाहे अज़ीम है और इन सभी की क़यामत के रोज़ जवाब देहि बनती है जब मुसलमानो के खिलाफ ज़ुल्म हो रहा था आपने किस हद तक उसको रोकने का काम किया. 

इतना सब होने के बाद फिर अगर भगवा सरकार मुस्लिम नौजवानो से भारत के वफादार रहने की उम्मीद करती है तो वो किसी बेवकूफों की दुनिया में जी रही है.  हाँ कुछ ज़र खरीद मौलाना, सहाफी आपकी भभूति लगा के आपके कसीदे पड़ते रहगे लेकिन जो सच्चा मुस्लिम हमदर्द होगा वो कभी भी गलत बात पे आपका साथ नहीं देगा.  कांग्रेस ने मुस्लिम और मराठा आरक्षण दिया था तो यही बीजेपी थी जिसने २०१४ के बाद न्यायालय में जा के दावा फाइल किया और आरक्षण ख़त्म करवा दिया अब मुस्लिम नोजवानो को ना तो नौकरीओं में और ना ही शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण है.  जब मराठा और मुस्लिम आरक्षण ख़त्म किया तो कैसे सिर्फ मराठा समाज को १६% भगवा सरकार ने आरक्षण दे दिया.  हम किसी की हकतलफी नहीं करना चाहते और ना है हम मराठा आरक्षण के खिलफ है परन्तु जो हक़ मुस्लिम समाज का था वो भी आपने लूट लिया और ख़त्म कर दिया, फिर हिन्दू आतंकी और सरकार हमसे गर्दन कटाने की उम्मीद रखते है.   

हर मसले पे मुस्लिम ही कुर्बानी क्यों दें.  बाबरी मस्जिद मसले पे जब न्यायलय में मुस्लिम समाज का पक्ष मज़बूत होता जा रहा है तो लंगूर, लँगूरनिया, जर खरीद रिज़वी जैसे दलाल मुसलमानों में इन्तेशार पैदा करना चाहते है और सभी लंगूर, दलाल मुस्लिम कुर्बानी मांग रहे है. लंगूर और लागूरनिया कहते नहीं थकते मुस्लिम बड़ा दिल नहीं कर सकते क्या.  वो अपना हक़ नहीं छोड़ सकते क्या, हिन्दू समाज को मंदिर की ज़मीन नहीं दे सकते क्या.  हर जगह जब वतन को लहू की ज़रुरत पड़े तो काहे को मुस्लिम ही याद आते है.  फिर इतना ही नहीं इतिहास के पन्नो में आप उनको किस नाम से जानते हो ये बड़ी बात है.  आक्रांता, ज़ालिम, लूटेरे मंदिर तोड़ के ताज बनाया, मंदिर तोड़ के जामी मस्जिद बाँधी.  आज अगर मुस्लिम समाज ने कुर्बानी दे भी दी तो इस बात की क्या ग्यारंटी है की १००० साल बाद जाते उनके वंशजो को जो गाली आज दी जा रही है वही गाली नहीं दी जायेगी.  नहीं अब नहीं हरगिज़ नहीं मुस्लिम बाबरी भी लेंगे और अपना हक़ भी. इंशाअल्लाह

पाकिस्तान बोहोत ही नेक काम कर रहा है जो कश्मीर में इंसानियत के क़त्ल और इन्साफ की आवाज़ बेरुन मुल्क बुलंद कर रहा हैं और आतंकवादी देश के ज़ुल्म, सितम, सामूहिक हत्या, नरसंघार को अंतराष्ट्रीय  मंच पे मज़बूत कर रहा है. अल्लाह उस पाक वतन को और प्रधान मंत्री इमरान खान साहब को हमेशा सलामत रखे और खुश रखे.  पाक सरकार से गुज़ारिश है कश्मीर के लिए जो कर रहे है वो तो करें ही उसके साथ दो चीज़ों के ऊपर मज़ीद तवज्जो दें.  एक कुफ्रिस्तान, लचिस्तान में जो मज़ालिमों का सामना मूस्लिम समाज को सहना पड़ रहा है उसके ऊपर भी इंग्लैंड और अमेरिका में भारत की खोकली धर्मनिरपेक्षता को नंगा करे और मूस्लिम समाज के लिए उनका हक़ दिलवाने की मांग करे.  दूसरी बात भारत से विभाजन के लिए मुसलमानो की मांग को अंतराष्ट्रीय मंच पे मज़बूत करें.  इस सहाफी ने एक पेटिशन डाली है,    उसकी एक कॉपी आपकी सरकार को वाया पाक एम्बेसी दिल्ली से भिजवाता हूँ ताके आप विभाजन की मांग को अंतराष्ट्रीय मंच पे और मज़बूत कर सके.

ये सहाफी इन तमाम मामलों पे अपने कश्मीरी भाईयों, पाक और हाफिज साहब के साथ है.  इसलिए नहीं; क्योंकि वो मुसलमान हैं बल्कि इसलिए के वो हक़ पे हैं और कश्मीरी भारतीय आतंक, ज़ुल्म के शिकार है.  इसलिए ये सहाफी हर बार की तरह इस साल भी भारत का योमे जमुहरिया नहीं  बनाएगा उसकी जगह ५ फरवरी को कश्मीर डे बनाएगा.  और अल्लाह से कश्मीर की आज़ादी और मुस्लिम समाज के लिए भारत का एक और बटवारे की दुआ करेगा.          

निर्णय

१.     तमाम गवाहों और दलीलों को सुनने के बाद इस सहाफी की अदालत इस नतीजे पे पहुंची है की क़ौमी इजलास आज़ादी का जशन बनाना या यौमे जमुहरिया बनाना इस्लाम का हिस्सा नहीं है.  अगर कोई मुस्लिम ना बनाये तो वो इस्लामिक क़ानून के हिसाब से एंटी नेशनल नहीं हो सकता.

२.    फिर जो मुस्लिम मौलाना ऐसे इज्लासों और महफिलों में शामिल होते है और किसी भी मज़हबी महफ़िल या नात खानी की महफ़िल पे तनक़ीद करते है और ऐसी महफिलों को गुनाह, कुफ्र और बिदअत बोलते है कौमी इज्लासों में शिरकत करने वाले वो सब लोग गुनाह के मुर्तकिब है. अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.


See in English

Celebration of National Festivals is not the essential practice of Islam: Journalist Zuber

Wednesday, 28 November 2018

इमरान भाई ले गए नंबर, सिद्धू पा जी छा गए देश के अंदर


लँगूरनिओं को भले ही तीखा लग रहा है, जिस्म की जलन साफ़ दिखाई दे रही है लेकिन मजबूरी इतनी के बदन की आग और ज़ुबान की जलन को शब्दों की मार्यादा और घर की इज़्ज़त ने रोक के रख दी.  खैर. 

करतारपुर कॉरिडोर से तीन बातें साफ़ तौर से निकल के सामने आई.  एक इमरान खान पाक प्रधान मंत्री का कद इस कॉरिडोर से और बढ़ गया और वो इस मसले पे नंबर ले गए दूसरा सिद्धू पा जी उनका कद पहले से और बढ़ गया और उन्होंने भारत के प्रधान मंत्री, विदेश मंत्री और सूबे के मुख्य मंत्री को भी छोटा और बोना बना दिया तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात भारत के मीडिया की लँगूरनिओं की जलन और हसद.  

ये तो कांग्रेस जैसी ना समझ पार्टी थी जो चुनावी मौसम में भी इस तरह की पहल और शांति वार्ता को भी भूना नहीं पाई.  अगर परिस्तिथि बिलकुल विपरीत होती कांग्रेस केंद्र में शासित होती और बीजेपी विपक्ष में और उसके किसी नुमाइंदे ने इस तरह से ७० साल से लंबित किसी मसले पे पहल कर के शांति की राह को आगे बढ़ाया होता तो संघी और भक्त चीख चीख के हल्ला मचा मचा के बवाल कर देते.  इस समूची शोर शराबे में मीडिया की लँगूरनिया और लंगूर भी बारबार बीजेपी का साथ देते.  

मीडिया की लँगूरनियों के जलन के दो मुख्य कारण इस पत्रकार को समझ में आते है

१.     जिस सिद्धू के ऊपर इमरान की शपत विधि से लौटने के बाद लंगूर और लँगूरनियों ने हल्ला बोल किया था उसके विपरीत परिणाम निकले सिद्धू का कद घटने के बजाये और बढ़ गया, और उनकी वह वाही से लँगूरनिया दुखी है.  

२.     करतारपुर कॉरिडोर खुलने का श्रेय बीजेपी और मोदी सरकार को मिलने के बजाये पाक और सिद्धू को मिला.

लँगूरनिया और लंगूर कितना ही उधम मचा ले जलते हुए अंगारों पे लौट ले लेकिन सिद्धू का बाल भी बांका नहीं कर सकते उसके साथ हम है.  और सिद्धू हमारे कहने के ऊपर एक सेक्युलर पार्टी से जुड़े थे.  जब देश में मुस्लिम नौजावानों गौ आतंकिओं द्वारा खून बहाया जा रहा था और मुस्लिम नौजवानो को पडतडित किया जा रहा था तो सिद्धू ने कहा था देश में २०१४ के बाद असहिष्णुता बेहद बढ़ गई है उनको इस पत्रकार ने ट्वीट किया था, सिद्धू पा जी आप गलत पार्टी में एक अच्छे इंसान है अगर आप ऐसा सोचते है तो छोड़ दीजिये बीजेपी और ज्वाइन कीजिये कोई सेक्युलर पार्टी.  हालांकि इस पत्रकार ने किसी भी पार्टी का नाम नहीं दिया था.  और आज वही सिद्धू जिसकी बीजपी में कोई इज़्ज़त नहीं थी किस मुकाम पे पहुंच गया.  

ऐसा ही ट्वीट और सुझाव शत्रुघन सिन्हा को भी ये पत्रकार कर चूका है और ऐसा ही अनुरोध अब ये पत्रकार हरसिमरीत जी से भी करेगा.  आप एक अच्छी सोच वाली पार्टी को चुन लीजिये. 

बस अब तो लँगूरनियों के लिए एक देवदासी के सामान मीडिया रुपी मंदिर के महंतों का आदेश मानने के बजाए कुछ भी नहीं बचा है.  अभी तक बीजेपी और संघ के ओहदेदारों को ये देवदासी लँगूरनिया खुश करती थी और अब कांग्रेस की बारी है...... 

रहा सवाल सिद्धू का तो अब मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ तो क्या भक्त, अंध भक्त, संघी आतंकी और खुद बीजेपी वाले उनका बाल भी बांका नहीं कर सकते उनको बुलंदिओं तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता.

राष्ट्रिय पर्व बनाना हराम है भाग - १.

काफिर, कट्टरपंथी, मुनाफ़िक्स, यहूदी, नसारा नबी अखिरूज़मा की शाने बे कस पनाह में बरजस्ता गाली गलौच करते है और बदकलामी करते हैं. खैर जब उनको नबी पे यकीन ही नहीं और उनकी अज़मत वो जानते ही नहीं तो ऐसे लोगो की बातों का हालांकि दिल दुखता है मलाल होता है लेकिन कोई शिकवा नहीं.  लेकिन इस नशिस्त में लेखक कुछ मुस्लिम मौलानाओं के बारे में बात करेगा जो नबी की अज़मत और अफ़ज़लियत को कम करते है.  कुछ मुस्लिम मौलाना ये फतवा देते हैं नबी सल्लाहो अलैहे वस्सलम की मिलाद और योमे विलादत बनाना, उस दिन की मुबारकबाद देना गलत है, गुनाह है और कुछ तो हद से ज़्यादा बढ़ जातें है बोलते है कुफ्र है.  उनके हिसाब से जो चीज़ हदीस और कुरान से साबित नहीं बिदअत है और हर बिदअती जहन्नुमी  है.  

ये पत्रकार सभी हिन्दू, यहूदी और ईसाई धर्म के दानिशमंदो और ख़ास निचे लिखे मुस्लिम मौलानाओं से पूछना चाहता है

१.     मौलाना हसन मियाँ साहब फिरंगी मेहली
२.     मौलाना सईद नूरी साहब (राजा अकेडमी)
३.     हज़रत अदनान अब्दुल वाली साहब फिरंगी मेहली
३.     जनाब ज़ाकिर नाइक साहब
३.     मौलाना सर्फुद्दीन इल्यासी साहब
४.     मौलाना जमील इल्यासी साहब
६.     मौलाना क़ल्बे सादिक साहब
७.     मौलाना क़ल्बे जव्वाद साहब
८.     अधिवक्ता इमरान साहब

की किसी भी देश के राष्ट्रिय पर्व को बनाना और उसमे शामिल होना जुलूस निकालना राष्ट्रिय गान गाना, राष्ट्रिय पर्व की मुबारकबाद देना अपने डीपी पे उस देश का झंडा वगेरा उस ख़ास दिन लगाना गलत है और गुनाह है या जाईज़ है.

मेरा सवाल उन मौलानाओं से एक दम साफ़ और खुल्ला है जो कहते है नबी की मिलाद बनाना, ईद मिलाद की मुबारकबाद देना, उस दिन नबी की शान में नाते कलाम पढ़ना,  अपनी डीपी पे गुम्बदे खिज़रा का फोटो लगाना गलत है, बिदआत है कुछ पाक के देवबंदी मौलाना कहते है गुन्हा है और कुछ कहते है मकरूह.  अगर नबी की मिलाद बनाना गलत है गुन्हा है तो आप उन मौलानाओं और मुस्लिम लोगो को क्या कहेगे या उसपे क्या फतवा देंगे जो अपने देश के राष्ट्रीय पर्व ख़ास भारत के १५ अगस्त और २६ जनवरी को ना सिर्फ बनाते है बल्कि तिरंगा झंडा अपने कपड़ो, डीपी और कभी गालों पे लगा के फख्र महसूस करते हैं.  ये लोग १५ अगस्त और २६ जनवरी को जुलूस, सामूहिक प्रोग्राम तथा झंडा वंदन में भी शरीक होते है.  फिर ये लोग राष्ट्र गान वगेरा भी पड़ते है. 
इस पत्रकार की एक शिया हज़रात, बोरी और एहले हदीस मौलाना साहब से इस मुद्दे पे  तवील गुफ्तगू हुई.  इस पत्रकार के सवाल पे तीनो मौलाना कहने लगे की हमें हमारे वतन से प्यार है और उस प्यार को हम उस ख़ास दिन दिखाते है.  फिर एहले हदीस और शिया मौलाना इस पत्रकार को अहमक़ समझ के हदीस और क़ुरआन का मफूम समझाने लगे. हदीस में आया है अपने वतन से और जहाँ रहते हो उस जगह से प्यार करो.  पहली बात तो ये की ऐसी कोई भी हदीस इस पत्रकार की नज़र से नहीं गुज़री हाँ अगर कोई सही, मुसनद हदीस है, बुखारी शरीफ की हदीस है तो सर आँखों पे, लेकिन अगरचे ये हदीस भी है तो वो दारुल अमन के लिए है ना की दारुल हर्ब के लिए.  और जहाँ तक भारत का सवाल है वो दारुल हर्ब है, फिर एक मख्सूस दिन ख़ुशी का इज़हार करना जिसका हदीस और क़ुरआन में कही भी ज़िक्र नहीं मिलता कहाँ तक जाईज़ है फिर क्या ये इस्लामिक तालीम की खिलाफवर्जी नहीं है. तो चुप.

दूसरा सवाल इस पत्रकार ने किया ठीक है आपकी बात मान लेते है, आपका अपने वतन के लिए प्यार बेहद बढ़ गया और आप प्यार में इतने दीवाने हो गए की आपने कौमी तराना गाया, अगरचे उसमे कुछ अलफ़ाज़ इस्लाम की तालीम की खुली खिलाफ वर्ज़ी करते हैं (भारत भाग्य विधाता और ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर इंसानो के भाग्य का विधाता सिर्फ और सिर्फ अल्लाह है). कपड़ो पे, डीपी पे, और गालो पे तिरंगा भी लगाया और जुलूस में भी शामिल हुए.  तो अगर ये प्यार किसी मुस्लिम का अपने नबी के लिए हद से बढ़ जाता है उस नबी के लिए जिनके लिए समूची कायनात कायम की गई , उन नबी के लिए जिनको दुनिया में भेजना ही मकसद अल्लाह का अपने आपको ज़ाहिर करना था, उन नबी के लिए जिनकी वजह से आप और हम मुसलमान है और वो अपने प्यार का इज़हार नाते नबी पड़ के करता है तो क्या हर्ज है, अपनी डीपी पे सब्ज़ गुंबद का फोटो रखता है तो क्या हर्ज है, जुलूस वैगेरा में शामिल होता है जशने ईद मिलाद मनाता है,  ईद मिलाद की मुबारकबाद देता है तो क्या हर्ज है.   

                                                                                          भाग २ में जारी है ...

Note:-

1.          Soon English version of this article will be publish on  http://autonomousjournalist.wordpress.com 

2.    जल्द देखिये शहज़ादे सलमान के नए मज़हब "मॉडर्न इस्लामऔर पत्रकार 
        खगोशी की हत्या पे इस पत्रकार का आलोचनात्मक लेख.             

See in English

 

It is sinful to celebrate National festivals Part – 1.  

                                                                    

Tuesday, 27 November 2018

राष्ट्रिय पर्व बनाना हराम है भाग - २

                                                                                                      भाग १ से जारी......


उसपे देवबंदी मौलाना कहते हैं ठीक है ये वतन का मामला है लेकिन हम दुनयावी इंसानो की बात कर रहे हैं.  उसके ऊपर इस पत्रकार ने फिर से सवाल पूछ लिया.  क्या वजह है की सऊदी डे बनाया जाता है और हर तरह के करतब किये जाते है.  फौज की नुमाइश की जाती है.  किंग दुबाई का सालगिरह बनाया जाता है. और उस रोज़ भूर्ज खलीफा कुम्कुमो और आलीशान रौशनी से सरफ़रोज़ हो जाती है.  उस दिन ना सिर्फ किंग की अवाम बल्कि बेरुन मुल्क बर्तानिया, और अमेरिका से ख़ास मेहमानो का खैर मकदम किया जाता है.  किंग पैलेस में पार्टी होती है जहाँ शबाब, शराब और कबाब की रौनक होती है. नंगा रक्स होता है.  वो चलता है.  ओमानी किंग क़ाबूश का योमे विलादत भी बड़ी धूम धाम से बनाया जाता है.  अभी तक इस पत्रकार के पास ऐसी कोई खबर तो नहीं है की उस रोज़ शबाब और शराब बहती है, लेकिन उस रोज़ सामूहिक अवकाश ज़रूर रहता है.  लेकिन एक मिलाद जिसमे नाते रसूल पढ़ा जाता है, फरिश्ते खुद रेहमत बरसाते है और अल्लाह उन तमाम लोगो को अपनी आग़ोशे रेमत में ले लेता है जो नबी की ऐसी रेहमत वाली मिलाद में शामिल होते है तो वो गलत है. क्या फलसफा क्या है.    

सऊदी किंग के यौमे विलादत पे जश्न मूननकीद किया जाता है.  कभी बेरुनी मुमालिकों के सरपरस्तों के योमे विलादत में शमूलिया दर्ज की जाती है. जिसमे मगरीबी देशो के सरपरस्त अपनी मगरीबी ड्रेस कोड के साथ मौजूद होते हैं.  ऐसे जलसों पे किसी भी दानिशमंद और उलेमा को एतेराज़ नहीं होता केक काटे जाते है.   मगरिबी तहज़ीब के गुलाम हो कर बाकायदा मर्द औरत एक साथ केक काटते है.   जब सऊदी सफीर एक दुसरे देश के सरबराह की सालगिरह में शामिल हो सकते है और उनके ऊपर कोई फ़तवा नहीं तो मुसलमान को अपने आका का मिलाद मनाने के ऊपर फतवे क्या जाइज़ हैं.
कर्नाटक के एक अधिवक्ता इमरान भाई नए नए मुल्ला बने उनके ऊपर भी इस्लाम का भूत सवार हुआ और देने लगे ऊल जलूल फतवे. किसी ने उनसे एक टीवी डिबेट में सवाल कर लिया क्या ईद ए मिलाद बनाना जाईज़ है.  तो वो सज्जन कहते है आम तोर पे हम मौलानाओं की जमात ऐसे विवादित सवालों पे ख़ामोशी इख्तियार करना बेहतर समझती है, लेकिन अगर मालूमात होते हुए भी जवाब नहीं दिया तो वो मेरी रौज़े महशर में पकड़ का बाइस बनेगे.  ये इमरान भाई कहते है ईद मिलाद बनाना ना जाईज़ है, क्योंकि जो काम नबी ने अपनी हयाते ज़िन्दगी में कभी नहीं किया उनके बाद सहाबा ने कभी नहीं किया और जिसका ज़िक्र क़ुरआन और हदीस से साबित नहीं होता तो वो सभी काम बिदअत हैं और में ऐसी ईद की ना तो मुबारकबाद देता हूँ और ना ही बनता हूँ.     

आगे ये इमरान भाई कहते है जो सिर्फ नबी से मोहब्बत करते है वो ईद मिलाद बनाते है और जो नबी और अल्लाह से मोहब्बत करते है और उसके एहकाम को मानते है वो नहीं बनाते.  मेरा सवाल इमरान भाई से है जनाब आपने नबी की मोहब्बत और अल्लाह की मोहब्त वाले लोगो की तशरीह कर दी लेकिन कुछ बीच वाले भी है.  जो ना तो नबी से मोहब्बत करते है और ना अल्लाह से बल्कि वो अपनी मुल्क खोवाह वो दारुल हर्ब ही क्यों ना हो उससे मोहब्बत करते है और जशने आज़ादी, जशने जमूहरिया बनाते है ऐसे लोगो के ऊपर भी फतवा ठोंक दीजिये.  जशने ईद मिलाद बनाने वाले बिदअती और जो जशने आज़ादी वगेरा बनाते है और क़ौमी तराना गाते है उनको क्या कहेगे. 

देओबंद एक बोहोत बड़ा इस्लामिक तालीमी और तहज़ीब का मरकज़ है.  इस मरकज़ के तहत कई मदरसे और तालीमी इदारे पूरी दुनिया में चल रहे है.  फिर कभी भी इन्होने अपने मदरसों में ईद मिलाद का प्रोग्राम मुन्नकीद नहीं किया.  लेकिन  देओबंद के मदरसों में भारत में जश्ने आज़ादी और जश्ने जमूरियत पूरे ज़ौक़ और एहतेमाम के साथ बनाई जाती है.  इतना ही नहीं सभी तालिबे इल्मों को कौमी परचम के नीचे बिठाया जाता है.  जो हाल भारत का है वही पाकिस्तान का है.  पाकिस्तान में तो उनके परचम को ये मौलाना अपने हाथों से लहराते है इनको ऐसा करने से कोई परहेज़ नहीं और ना ही फिर इनका मज़हब खतरे में पड़ता है.  लेकिन अगर ईद मिलाद की बात आई तो इनका मज़हब खतरे में पड़ जाता है और बिदअत, गुनाह के फतवे लगाने लगते है.  पाकिस्तान, हिन्द, बंगलादेश और रूहे ज़मीन के किसी भी खित्ते में हो कुछ ख़ास मौलानाओं की जामात  जश्ने ईद मिलाद बनाने को बिदअत और मना करते है.  क्या ये सऊदी और दीगर मुस्लिम हाकिमो और बादशाहों के जश्न विलादत और उनके देशो के खुसूसी दिनों के ऊपर कोई आलोचना करने और फ़तवा देने का जज़्बा तथा हिम्मत,कुव्वत रखते है. 
फ़तवा (आदेश):
१.       हालत का जायज़ा और तमाम फतवो का आकलन करने के बाद ये पत्रकार इस नतीजे पे पंहुचा है अगर एक मुसलमान का जशने ईद मिलाद बनाना बिदअत और गलत है तो दारूल हर्ब जैसे देशो की जशने आज़ादी, जशने जमुरिया, बनाना कौमी परचम को अपना डीपी बनाना, कपड़ो पे लगाना, कोमी परचम लहराना और कौमी तराना गाना, और ऐसे इज्लासों में शिरकत वा शमूलियत करना हर उस मुसलमान के लिए हराम है और गुनाहे कबीरा है.

२.       ऐसे सभी मुसलमान जो ईद मिलाद को बिदअत और गलत मानते है.  ईद मिलाद की मुबारकबाद नहीं देते, मिलाद में शरीक नहीं होते, नाते रसूल नहीं पड़ते, ईद मिलाद के जुलूस और इजलास का एहतेमाम नहीं करते और ना ही शिरकत करते हैं. फिर अगर वो अपने वतन के किसी भी क़ौमी इजलास में शरीक होते है तो वो गुनाहे कबीरा कर रहे है. ख़्वाह वो वतन दारूल अमन ही क्यों ना हो. अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.
 
३.       जो भी मुसलमान ऐसे किसी भी जश्न में शामिल होते है और कौमी तराना गाते है, कौमी परचम लहराते है और जुलूस वगेरा में शामिल होते है वो सब जहनुम्मी है और ऐसी महफ़िलो पे उन मुसलमानो के ऊपर अल्लाह और उसके फ़रिश्तो की लानत है.

४.     ये फ़तवा एक आम दुनयावी मुसलमान के ऊपर लागू नहीं है.  अलबत्ता कौमी तराने के उस अलफ़ाज़ (भारत भाग्य विधाता) को पढ़ने से बचे.
नोट: .  शहज़ादे सलमान ने अक़ाए इनामदार ताजदारे मदीना के मूल इस्लाम को छोड़, अपना नया इस्लाम मज़हब शुरू किया "मोड्रन इस्लाम"  जिसमे शामिल है बेहयाई, नंगा पन तो उसका साइड इफ़ेक्ट भी दिखने लगा है. जिसका जीता जागता सबूत है पत्रकार खगोशी के क़त्ल में सऊदी शहज़ादे का शामिल होना.

 . जब जब मुसलमान इस्लामिक क़ानून की खिलाफ़वरज़ी करेंगे तबाही आएगी.  इस मुद्दे पे जल्द ही देखिये लेखक का लेख.

3. Soon English version of this article will be publish    on  http://autonomousjournalist.wordpress.com

Sunday, 25 November 2018

बेगानी शादी में शिव सैनिक दिवाना

बीजेपी के बाद लेखक के लेख की पाखंडिओं और फ़रेबीओ की अगली क़िस्त होगी शिव सेना और उसका सरगना उद्धव ठाकरे.  हाल ही में जिस तरह से शिव सेना ने बीजेपी से रामचंद्र का अपहरण कर के अयोध्या को मराठी माणूस से भर डाला और उत्तरभारतीय मुक्त कर डाला उससे शिव सेना की राजनैतिक मंशा साफ़ ज़ाहिर हो रही है.  

बाबरी मस्जिद में जब मूर्तिया रखी गई तब तो शिव सेना का वजूद भी नहीं था.  फिर १९९२ से पहले ये बीजेपी ही थी जिसने अपनी राजनैतिक आकाँक्षाओं को परवान चढाने के लिए रामचद्र नामक सीढ़ी का सहारा लिया था, और आडवाणी प्रधान मंत्री बनने का ख्वाब लिए रथ यात्रा पे सवार हो गया था. फिर २ से लेकर संसद में २८० का आकड़ा भाजपा ने गाहे बगाहे रामचंद्र का नाम ले कर ही पार किया था.  शिव सेना ने भी सोचा होगा जब गुजरात का एक सिंधी और एक चाय वाला रामचंद्र जी के नाम पे समूचे भारत पे राज कर सकता है तो हम क्यों नहीं.

जिस राम चंद्र को राजनैतिक पार्टिया अपने मफ़ात के लिए रोड, गली, नुक्कड़ पे बदनाम कर के अपना उल्लू सीधा कर रहे है, शिव सेना भी उस मानसिकता से अछूती नहीं रही.  शिव सेना ने भी भांप लिया जिसने राम का नाम लिया उसका बेडा पार है.  भले ही राम नाम एकांत में दिव्य शक्ति प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि मिडिया में डिबेट और रोड पे हल करने जैसा मुद्दा ही क्यों न बन जाए.  फिर शुरू की दीगर राजनैतिक पार्टिओं की तरह शिवसेना ने भी राम नाम जपने की कवायत.  लेकिन इस कवायत से ये भी साबित हो गया शिव सेना भी बीजेपी की तरह पाखंडी और मफ़ात परास्त पार्टी है.  जो अपने राजनैतिक फायदे के लिए उत्तर प्रदेश तो क्या पाकिस्तान भी चली जायेगी, और अगर मराठी माणूस और हिन्दू जनता का एक बड़ा तपका आलमगीर औरंगज़ेब को सराहना शुरू कर देगा तो शिवा सेना उनको भी सराहेगी.  

शिव सेना को अपना जनाधार महाराष्ट्र में खिसकता नज़र आ रहा है, और २०१९ में उसकी क्या हैसियत होने वाली है ये बात भांप ली; उद्धव ठाकरे ने सोचा होगा सदन में महाराष्ट्र से नहीं तो उत्तर प्रदेश से संसद चुन के आ जाए तो अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए उत्तर प्रदेश की जानिब कूच कर दिया.   सवाल शिव सेना की मंशा पे तो उठना लाज़मी है. क्योंकि १९९२ से राम मंदिर मुद्दा बे हद गरमाया है और इतने वर्षो में श्री उद्धव ठाकरे इस तरह से अपने पूरे लाव लश्कर, ताम झाम के साथ कितनी मर्तबा अयोध्या गए.  उद्धव को छोड़ो उनके पिता श्री हिन्दू हर्दय सम्राट बाल ठाकरे अपनी हयाते ज़िन्दगी में कितनी बार अजोध्या गए और राम लल्ला के दर्शन किया.

अब ज़रा पीछे की जानिब चलते है ये वही शिव सेना है जो कभी उत्तर भारतीओं के लिए केहर साबित होती थी.  ना तो उनको बंबई में ठेला लगाने दिया जाता था, और ना ही रोज़गार के दुसरे साधन मोहिय्या करने दिए जाते थे.  उद्धव ठाकरे को ये नहीं भूलना चाहिए जब रेलवे के इम्तिहान थे और राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों पे हमला किया था तब एक प्रेस नोट जारी कर के उद्धव ने कहा था मुंबई किसी के बाप की जागीर नहीं है मुंबई में वही रहेगा जो मराठी अस्मिता की बात करेगा. जिसको सभी प्रमुख अखबारों ने छापा था.  फिर ये वही उद्धव ठाकरे है जो कभी हिंदी भाषा के खिलाफ ज़हर उगलते हुए देखे जा सकते थे और महाराष्ट्र में सभी सरकारी दफ्तरों में मराठी अनिवार्य करने में अव्वल थे.  और अब उत्तर प्रदेश से इतना लगाव की हिंदी में जा के भाषण बाज़ी कर रहे है.

लेकिन यहाँ भी उद्धव ठाकरे की दोहरी मानसिकता नज़र आ गई.  चलिए मान लेते है शिव सेना सुप्रीमो को रामचंद्र की बड़ी ही फ़िक्र है, बात राम की हो रही है और रेल गाड़िया समूचे महाराष्ट्र से भर के जा रही है और उनमे सिर्फ शिव सैनिक सवार है.  तो क्या रामचंद्र को शिव सेना ने महदूत कर दिया. क्या रामचंद्र समूचे हिन्दू समाज के लिए भगवान् नहीं है. अगर है तो शिव सेना ने समूचे भारत से हिन्दू जनता को आने का आहवान काहे को नहीं किया.  फिर महाराष्ट्र से भी सिर्फ शिव सैनिक ही काहे को गए, दीगर हिन्दू क्यों नहीं गए.  फिर अगर वो सभी राम भक्त थे तो उन सभी के गले में शिव सेना का गमछा क्या कर रहा था.  मतलब साफ़ है राम के नाम पे राजनैतिक फायदा लेने की मंशा है.

फिर ठीक है अगर शिव सेना को इतना ही रामचंद्र जी से प्यार है और वो किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं कर रहे है तो उनको शिवाजी की प्रतिमा की जगह अरब सागर में रामचंद्र जी की मूर्ती बनवाना चाहिए.  मोदी जी ने अपने भगवान् की मूर्ति गुजरात में बनवा दी.  योगी जी ने अपने भगवान रामचंद्र की अयोध्या में सबसे बड़ी मूर्ती बनवाने का एलान किया है.  तो शिव सेना भी ऐसा ही एलान कर दे, के हम राजशाही का खात्मा करते है और शिवाजी की दासता से छुटकारा पा के उसकी जगह रामचंद्र जी की मूर्ती बनवाने का एलान करते है. क्या उद्धव जी इतना साहस रखते है, क्या उनका प्यार दिखावा और राजनीति से प्रेरित नहीं है.

कहाँ है विकास, क्या ये छलावा है....


बीजेपी का विकास सिर्फ एक छलावा और दिखावा है. कम काम और बखान ज़्यादा.  इस गोरख धंदे में लंगूर पत्रकार बीजेपी का पूरी तरह साथ दे रहे है और एक वफादार पालतू की तरह बीजेपी की रखवाली कर रहे है; लंगूर सदा ही बीजेपी और संघ  के दलाल के रूप में काम करते हैं और लँगूरनिया बिकी हुई महिलाओं की तरह बर्ताव करती हैं और बीजेपी, संघ के सामने अपना तन मन धन सब कुछ नौछावर करने को तत्पर रहती हैं.  क्योंकि उनको मीडिया रुपी मंदिर के महंत के आदेश ही ऐसे होते है; ये हमारे ख़ास मेहमान है तुमको इनको खुश करना है.  अब लाचार ये लँगूरनिया मीडिया रुपी मंदिर में देवदासिओं की हैसियत से काम करती है. सिर्फ गुलाम सोच अपनी खुद की खबर चला नहीं सकती, बोल नहीं सकती, सच्ची बात कह नहीं सकती. 

जिन प्रदेशों में बीजेपी १५ से २० साल से राज कर रही है उन प्रदेशों में विकास के नाम पे और हिन्दू सहानुभूति ले कर जनता को खूब ठगा गया है.  ये पत्रकार सदा ही चुनवी सभाओं में घूम के ख़बरों और माहौल का ज़ायज़ा लेता है.  विकास कार्यों का आकलन कर के तथा सच्ची खबर दिखा कर उस प्रदेश की सरकार को हाशिये पे लेता है; सरकार की नाकामी को बे नक़ाब करता है, चाहे वो किसी भी पार्टी से हो.  लंगूर चुनावी मौसम में सदा ही बीजेपी के लिए एक पतली गली तलाश कर के लाते है यानी ऐसी खबरे जिससे बीजेपी की साख को बट्टा नहीं लगे और जनता भ्रमित होती रहे.  २०१५ में मोदी के प्रधान बनने के बाद गुजरात के विकास को पहले ही ये पत्रकार अपने लेख गुजरात का काला सच में नग्न कर चूका है.

मध्य प्रदेश में भी बीजेपी की सरकार १५ साल से ज़्यादा समय से है लेकिन जो हालात २०१२ सड़कों की निस्बत से थे तकरीबन वही हालात नवंबर २०१८ में भी है.  २०१२ में सड़कों की दुर्दशा के ऊपर अपने लेख Is it Muslim Jami Masjid or Hindus’s Bhoj Shila???... द्वारा शिवराज सरकार को सूचित भी कर चूका था.

अक्टूबर २०१३  में चुनाव के समय ये पत्रकार मध्य प्रदेश के कई बड़े शहरों के दौरे पे था. अपना चुनावी दौरा ख़त्म कर के इस पत्रकार ने हलाते हाजरा पे एक लेख लिखा था Piggeries at the sacred place of Muslims.   

अब इंदौर के मुस्लिम बहुल खजराने से गंदगी ख़त्म हुई या नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन सड़कों की बदहाली का हाल वही है जिसका ज़िक्र सतना चित्रकूट मार्ग पे लगे जाम पे एक सज्जन ने किया है.  २०१७ में शिवराज सिंह ने अमेरिका का दौरा किया था उसके तुरंत बाद सड़को की बदहाली का एक वीडियो प्राप्त हुआ था.  जिसका ज़िक्र लेखक ने अपने नवंबर २०१८ को लिखे लेख भाजपा के लिए बुरे दिन आने, और जनता के लिए जाने की ... में किया है.  जनता से बात करते समय इंटरव्यू में इंदौर तथा सतना दोनों ही जगह की जनता का ये ही कहना था पिछले १०-१५ सालों से यथावत स्थिति है.  विकास कुछ नहीं हुआ, सतना में हिन्दू श्रद्धालुओं को तकलीफ का सामना करना पड़ता है और और खजराने में गंदगी की वजह से मुस्लिम.  सतना में पिछले १० सालों से रोड बन रही है लेकिन अभी तक नहीं बनी, वहीँ इंदौर के खजराने में पिछले १०-१२ सालों से गंदगी है लेकिन सफाई नहीं हुई.
                      
दिसंबर २०१८ में इस साल चुनाव में भी लेखक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक निजी कार्यक्रम में गया था. लेखक भोपाल में ४ दिन १५ से १८ तक रहा और उसने हालात का जायज़ा भी लिया. विकास की अगर बात करे तो भोपाल महानगर होते हुए भी उतना विकासशील नज़र नहीं आया जितना होना चाहिए.   साफ़ सफाई का आभाव देखने को मिला, सड़कों पे गायों का जमावड़ा जिसकी वजह से यातायात समस्या उत्पन्न होती रहती है.
   
जनता के सामने सही और सटीक खबरे किसी भी पार्टी का पक्ष न लेकर निष्पक्ष तरह से रिपोर्ट और खबरों का संचालन सिर्फ और सिर्फ वही पत्रकार करते है जो मोदी सरकार और बीजेपी के घर की रखवाली नहीं करते जो मोदी और बीजेपी की रखवाली करते है वो सिर्फ दूसरों के ऊपर भोंकते है.

Wednesday, 21 November 2018

पीड़ादायक हिन्दू धार्मिक कूप्रथाएँ

बीजेपी, संघी आतंकिओ और कट्टरपंथी हिन्दुओं के लिए मोदी भले ही राम, कृष्णा और भगवान् हो सकते हैं, परन्तु  साधारण जनता के सामने मोदी की सच्चाई खुल के सामने गई है के वो भगवान् के रूप में राक्षस, रावण और शैतान हैं. मोदी जी कहतें हैं वो समाज से कुरीतियों का खात्मा करने आये हैं, जिसका बीजेपी के राजनैतिक जोकर और संघी आतंकी हाँ में हाँ मिलाते है. किसी में इतना साहस नहीं की मोदी जैसे हिटलर रुपी राजा से सवाल कर सकेसभी नंदी बैल के आगे सर हिलाते है गुबू गुबू गुबू. मुझे राजनैतिक फायदा होगा गुबू गुबू गुबू ट्रिपल तलाक़ बिल पास होगा गुबू गुबू गुबूपरन्तु उनके खुद के धर्म में जो कुरीतियां है और महिला उत्पीड़न है उसको ख़त्म करने में कोई योगदान नहीं देतेमोदी भी मंदिरों के उन पंडितों और पाखंडिओं की तरह है जो महिला को सिर्फ भोग विलास और आनंद की वस्तु मात्र समझते है.

हिन्दू धर्म में मंदिरों में अत्यधिक कष्टदायक कुरीतियांनियोग” औरदेवदासी” प्रथा जिसके तहत एक महिला का मान सम्मान का हर दूसरे रोज़ बलात्कार होता है; ऐसी कुरीतिओं और प्रथाओं पे कट्टरपंथी, बीजेपी, संघी आतंकी और खुद मोदी काहे को खामोशी इख्तियार किये है.  नियोग प्रथा की ये हरकतें देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे,देखे विडियो|


मोदी सरकार, बीजेपी, संघी आतंकी और कट्टरपंथी हिन्दू; मुनाफ़िक़ों के ज़रिये इस्लाम मज़हब को झूट और फरेब के आधार पर बदनाम करने की कोशिश करते है.  कभी उत्तर प्रदेश के किसी मुनाफ़िक़ जिसको खुद शिया समुदाय ने धर्म निकाला कर दिया है द्वारा फरेबी फिल्म बना कर और कभी बरेली की उस महिला द्वारा न्यायपालिका में झूठे केस दर्ज करवा कर जो कहती है में इस्लामिक कानून और शरीयत को नहीं मानती हूँ.   परन्तु अपने खुदके मज़हब की कुरीतिओं पे खामोश हैं  

भारत में देवदासी प्रथा भाग -

आचार्य चंद्रास्वामी, स्वामी नित्यानंद, इच्छाधारी भीमानंद, स्वामी कौशलेन्द्र प्रपन्नाचार्य फलाहारी महाराज, आसाराम, ॐ साईं, रामपाल, राम रहीम जैसे पाखंडिओं की लम्बी क़तार है.  जिसमे कम से कम २०० से ज़्यादा पाखंडी महंत और मंदिरों के पुजारी महिला और अपने भक्तो का शोषण करते हुए गिरफ्तार किये गए. हर एक मंदिर का महंत और बड़े ओहदेदार पुजारी बलात्कारी तथा महिला भोगी होता है. 

भारत में देवदासी प्रथा भाग -  

देवदासी प्रथा तकरीबन भारत के हर राज्य में खूब फल फूल रही है.  केरला का वो साधू गंगेशानंदा तीर्थपादा, उर्फ़ हरिस्वामी जिसके लिंग को एक २२ साल की युवती ने अपनी अस्मत बचाते हुए काट डाला था शयद ही कोई भूल पायेगा.  उसके ऊपर इलज़ाम था की उसने न बालिग अवस्था से लेकर यौवन तक उक्त युवती का देवदासी प्रथा के तहत शारीरिक शोषण किया था. ये प्रथा केरला, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजिस्थान, उत्तरप्रदेश, हरयाणा, ओडिसा जैसे राज्यों में खूब परवान चढ़ रही है. वृन्दावन में ऐसी हज़ारो देवदासियां आश्रमों में अपने जीवन का अंत देखने और वृद्ध अवस्था में अमानुष अवस्था में पड़ी है जिनका कोई भी वारिस या देखने वाला नहीं है.   मज़े की बात तो ये है की केरल, कर्नाटक और ओडिसा को छोड़ कर सभी राज्यों में महिला सम्मान की बात करने वाली बीजेपी शासन में है.

मोदी सरकार, बीजेपी, संघी आतंकी तथा कट्टरपंथी हिन्दू दुसरे मज़ाहिबों में मदाखलत करने से पीछे नहीं रहते, तथा अड़ोस पड़ोस में झाँका ताकि एक आम बात हैकभी महिला सशक्तिकरण के नाम पे ये बीजेपी के जोकर ट्रिपल तलाक़ पे पति द्वारा धन राशि देने का समर्थन करते थे और राजनैतिक लाभ लेने की द्रष्टि से किये हुए पाखंड और फरेब को अपनी राजनैतिक सभाओं में बखान करते नहीं थकते थेफिर अगर कोई राजनेता या पत्रकार (लंगूर नहीं) उनसे उनसे पूछ बैठे गौ आतंकी हमलों में मारे गए युवको की विधवाओं, या दंगो में मारे गए युवकों की विधवाओं या हिन्दू आतंकी हमलो में मारे गए मुस्लिम विधवाओं को गुज़ारे भत्ते की ज़िम्मेदारी क्या सरकार लेगी उस मद्दे पे ये बीजेपी के राजनैतिक जोकर पूर्ण चुप्पी धारण कर लेते थे. कभी पत्रकारो और राजनेताओं को टीवी डेबिट शुरू होने से पहले ही ताकीद की जाती थी के चुभते हुए और तीखे सवाल ना करे.


बीजेपी के राजनैतिक जोकरों, संघी आतंकिओं और कट्टरपंथी हिन्दू जनता का फरेब और दोहरा चरित्र भी मुस्लिम महिलाओं के सामने गया जिसको मोदी सरकार मुस्लिम महिला सशक्तिकरण का नाम दे रही है, एक विशेष वर्ग की महिलाओं का शोषण कर रही है असल में वो मदाखलत है, उनके मज़हबी एतेक़ाद पे डाका है क्योके अगर महिलाशक्तिकरण की बात है और गुज़ारा भत्ते की बात है तो फिर वही सिद्धांत बीजेपी, कट्टरपंथी हिन्दुओं द्वारा प्रायोजित दंगो में मारे जाने वाले मुस्लिम युवकों की विधवाओं के ऊपर लागू होना चाहिए२० साल से लेकर ३५ साल तक की महिलाये विधवा हो गई और उनके बच्चे यतीम.    इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश जिस धरती से ट्रिपल तलाक़ के खिलाफ संघ, बीजेपी की कठपुतली महिला ने न्यायपालिका में अर्ज़ी दी थी और योगी, बीजेपी ने मुस्लिम महिलाओं को अपनी भव्य जीत का हकदार माना था उसी उत्तर प्रदेश में मुज़्ज़फ़्फ़रपुर दंगो के मुख्य हिन्दू आतंकी बालियान और सोम के ऊपर से समूची भारतीय दंड संहिता की धाराएं हटा के उनको जेल से निकलवा लिया.

मोदी, बीजेपी और संघी आतंकिओं की हर नीति राष्ट्र हित के खिलाफ और धार्मिक द्वेष भड़काने के लिए मददगार साबित हो रही हैमोदी जी अफगान तालिबान से टेबल पे एक साथ बैठ कर बात चीत कर सकते है, जिससे राष्ट्र का कोई भी हित नहीं है परन्तु कश्मीर पे ना तो हुर्रियत से और ना ही पाक के साथ बात चीत का समर्थन करते है जो की राष्ट्र हित से जुड़ा हुआ और सबसे ज़्यादा विस्फोटक मुद्दा है, और अब भारत के लिए नासूर बन चूका है.


See the English version

Painful Hindu religious evils.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...