इस सहाफी के कौमी इजलास में मुस्लिम मौलानाओं की शमूलियत का फ़तवा अब
रंग लाने लगा है. इस फतवे पे काफी प्रतिक्रियाएं
इस सहाफी को उसके फेस बुक मैसेंजर तथा वाट्सअप नंबर में आने लगी हैं. इस फतवे के मुवाफिक इसको सराहा रहे है और दलील को
सही बता रहे है. लेकिन संघी जो आम तोर पे नंगी गालियां देने में माहिर हैं गलीज़ ओछी
ज़ुबान इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते है इश्तेआल अंगेज़ी भरे कमेंट कर रहे हैं. कुछ मौलानाओं ने फतवे की वैधता और प्रामाणिकता पे
ही सवालिया निशान लगा दिए. उनका कहना था ऐसे
कोई भी उठ के फतवे देने लगेगा तो इस्लाम मज़हब रोडों की ज़ीनत बन के रह जाएगा. बिलकुल सही बोलै मौलाना साहबों ने; जब एक सहाफी
को ये हक़ नहीं के वो कौमी इजलास में किसी भी अफ़राद की शमूलिया का फ़तवा दे तो कोई भी
अधिवक्ता, संघी तंज़ीमों से ताल्लुक रखने वाला मौलाना, सरकार का ज़र खरीद गुलाम कैसे
किसी भी इस्लामिक मसले में फ़तवा दे सकता है.
ईद मिलाद मानना या ना मानना ऐसे मसलो पे किसी भी गैर ज़रूरी अफ़राद को बोलने का
क्या हक़ है.
दूसरी बात जो राष्ट्रिय मुस्लिम मंच के मौलाना है सब जानते है वो संघ
की खरीदी हुई वो काली भेड़े है जो इस्लाम और मुसलमानो को सिर्फ और सिर्फ इज़ा पहुंचाने
का काम करती है. ऐसी ही तंज़ीमे फलस्तीन में
और सऊदी के हकीमो के रूप में मौजूद है जो यहूदी इशारों पे नबी का लाया हुआ इस्लाम मज़हब
छोड़ के अपना खुद का 'मॉडर्न इस्लाम' चलाते है.
कुफ्रिस्तान के जो मौलाना और दिगर मुस्लिम अवाम एक मुस्लिम देश पाकिस्तान
पे तनक़ीद करते है और हिन्दू तथा भारत सरकार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की जाने अनजाने
पैरवी करते है; हाफिज सईद की गिरफ्तारी और सजा की मांग करते है उनसे ये सहाफी सिर्फ
इतना ही पूछना चाहता है, की उनकी ये मांग करने का क्या ठोस आधार है; और उनके पास क्या
सबूत है के हाफिज साहब बंबई अटैक में शामिल थे.
अगर वो सही मौलाना है और उनको ज़रा सा भी इस्लाम का इल्म है तो उनको ये मालूम
होना चाहिए की किसी भी इंसान पे कोई भी बे बुन्याद बात करना जिसका कोई भी सबूत इनके
पास नहीं है वो बोहतान है और इत्तेहान है. फिर हाफिज साहब तो मुस्लिम नमाज़ी परहेज़गार खुश दिल
सूरत वाले एक इंसान हैं. और बोहतान की इस्लामिक क्या सजा है इन मौलानाओं को
मालूम होना चाहिए. ये लोग दूनायवी ज़िन्दगी
को ही सब कुछ समझ बैठे है और उखरवी ज़िन्दगी के लिए अपने हक़ में कांटे बो रहे है. अगर इन मौलानाओं के पास कुछ भी ठोस सबूत है तो पेश
करें नहीं तो ये सहाफी रौज़ए महशर में अल्लाह के हुज़ूर इनका दामन गीर होगा, के इन्होने
बगैर किसी सबूत के मेरे मुसलमान भाई के ऊपर तोहमत लगाईं थी. अल्लाह के हुज़ूर कोई हीले
बाज़ी और गलतबयानी नहीं चलेगी. जो मुजरिम होगा और झूट बोलेगा तो उसके बदन के आज़ा गवाही
देने लगेंगे ऐ बारी ताला तेरा ये बंदा झूट बोल रहा है इसके इस गुनाह में इसका ये आज़ा
बराबरी का हिस्सेदार है.
अगर ये मुस्लिम मौलाना भारत की सुरक्षा एजेंसीज द्वारा दी गई किसी भी
सामग्री को देख के गुमराह हो रहे है और हाफिज सईद और पाक के खिलाफ इश्तेआल अंगेज़ी कर
रहे है तो भारत की सुरक्षा एजेंसीज की ओकात तो बोहोत पहले ही इस सहाफी को पता चल गई
थी जब वो सहाफत में आया था. जिस तरह से झूठे
केसस में मुस्लिम नौजावानों को फसाया गया था फिर उनकी जवानी बर्बाद हो कर कोई २० साल
कोई २५ साल उस इलज़ाम से बरी हुए. दूसरी बात
भारत की सुरखा एजेंसीज की किस बात पे यकीन किया जाए के उनके दूआरा पेश किये हुए सबूत
पर्याप्त हैं जो मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ ब्लास्ट में १५ और २०
सालो तक ये सुनिश्चित नहीं कर पाई के असली मुजरिम कौन है और सबूतों के अभाव में सभी
हिन्दू आतंकी जेल से बरी हो गए. हाल ही में
दिल्ली में दो मदरसों के तालिबे इल्मों में भारत की इन सुरक्षा एजेंसिओं को आतंकी नज़र
आने लगे थे. जिसके ऊपर इस सहाफी ने २१ नवंबर को एक ट्वीट किया है.
केजरीवाल पे हमले के पीछे हिन्दू आतंकी और भाजपा का हाथ. चुनाव आते ही
ब्लास्ट शुरू हो गए और पाकिस्तानी एजेंसी आई.अस.आई. जो बरसो से खामोश थी फिर से
सक्रीय हो गई. मुस्लिम समुदाय के आतंकी फिर से सक्रीय हो गए और कुछ की गिरफ्तारी
भी की गई. सुरक्षा एजेंसीज को आतंकी हमलो के फीडबैक मिलने लगे. दिल्ली के आस पास
आतंकी सक्रीय हो गए और भारत की प्रभुता और सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस होने लगा.
क्या ये भी इत्तिफाक नहीं है. सिर्फ और सिर्फ भाजपा का षड्यंत्र और सस्ती लोकप्रियता
और सहानुभूति के लिए किया गया कृत. एक तीर से दो निशाने, ऐसी झूटी और फरेबी
खबरों के आधार और पाक के नाम पे वोट का ध्रूवीकरण कर के २०१९ का चुनाव जीतना और
अगर हार गए तो इस तरह की गतिविधिया जारी रख कर सत्ताधारी पक्ष और सरकार के काम पे
कटाक्ष करना और कहना हम ५ साल तक सत्ता पे रहे लेकिन एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ.
फिर वोट बैंक की राजनीती का इलज़ाम लगाना वगेरा वगेरा.... तो ऐसी धूर्त और कपटी
मानसिकता भाजपा, संघी और आतंकिओं की है वो सदा ही पीठ पे वार करते है और आमने
सामने की लड़ाई में पिछवाड़ा दिखा कर भाग जाते है.
इन मौलानाओं को बम्बई के १६६ लोगो की जान के ऐवज़ में हाफिज सईद की गिरफ्तारी चाहिए क्या इन्होने जितने भी मुस्लिम २०१४ के बाद गौ आतंकिओं के हमले; हिन्दू आतंकिओ की भीड़ द्वारा झूठे इलज़ाम में मार दिए गए, उनके लिए इन्साफ की मांग भारत सरकार से की थी. अगर भारत सरकार ने नहीं सूनी तो क्या इन्होने उस मुद्दे को अंतराष्ट्रीय मंच पे ले जाने की पहल की थी. इन मुस्लिम दानिशमंदो को कूव्वत नहीं के वो भारत सरकार के आतंकवाद के खिलाफ बोल सके लेकिन ये सहाफी अपनी हैसियत और कूव्वत के हिसाब से अपना काम अंजाम दे रहा है और इसको फख्र है उसने किसी भी हिन्दू आतंकी तंज़ीम या सरकारी आतंकवाद के साथ समझौता नहीं किया . जो गलत था उसको कहा और लिखा. बिलफ़र्ज़ अगर कोई कमी नज़र आती है तो कहें, या ध्यान में लाएं अगर वो कमी है तो उसको दूर किया जाएगा. इंशाअल्लाह.
कुफ्रिस्तान में कुछ ज़र खरीद मुस्लिम समाज में मौलाना हाफिज सईद साहब को लेकर इश्तेआल और छाती कूट रहे है; जिनको के पाक उच्चत्तम न्यायलय ने और सरकार ने तमाम जुर्म से बरी किया है. ये मौलाना आतंकी संघ के चेले और उसकी गंदगी है. इनके दिलों पे १० साल पुराना बम्बई का दर्द अभी तक पेवस्त है जबकि मूस्लिम नौजवानो को आदमखोर आतंकिओं की भीड़ ने २०१८ तक पीट पीट के शहीद कर डाला वो बातें याद नहीं है. उत्तर प्रदेश में कासिम पानी पानी चिल्लाता रहा लेकिन आतंकी उसके ऊपर लाते घुसे बरसाते रहे. उससे भी ज़्यादा दुख वाली बात उनकी जसत को पुलिस की निगरानी में घसीट के ले जाया गया. लेकिन इन मौलानाओं ने भारत सरकार के आतंक के खिलाफ एहतेजाज नहीं किया.
ये सहाफी, अधिवक्ता इमरान साहब से भी सवाल करता है जो टीवी डिबेट में
अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ईद मिलाद पे फतवे देतें हैं और हदीस का मफूम समझाते
है के अगर किसी शख्स को सही बात पता थी और उसने दूसरों को नहीं बताई तो वो रौज़े महशर
में सजा का मुर्तकिब होगा. एक बात शायद इमरान
साहब और तमाम मौलाना जो हाफिज सईद पे बवाल कर रहे है और भारत सरकार के आतंक का एक हिस्सा
बन रहे है उनको श्याद ये पता नहीं होगी के ज़ुल्म सहना और उसको रोकने के लिए लड़ाई ना
करना भी गुनाहे अज़ीम है और इन सभी की क़यामत के रोज़ जवाब देहि बनती है जब मुसलमानो के
खिलाफ ज़ुल्म हो रहा था आपने किस हद तक उसको रोकने का काम किया.
इतना सब होने के बाद फिर अगर भगवा सरकार मुस्लिम नौजवानो से भारत के
वफादार रहने की उम्मीद करती है तो वो किसी बेवकूफों की दुनिया में जी रही है. हाँ कुछ ज़र खरीद मौलाना, सहाफी आपकी भभूति लगा के
आपके कसीदे पड़ते रहगे लेकिन जो सच्चा मुस्लिम हमदर्द होगा वो कभी भी गलत बात पे आपका
साथ नहीं देगा. कांग्रेस ने मुस्लिम और मराठा
आरक्षण दिया था तो यही बीजेपी थी जिसने २०१४ के बाद न्यायालय में जा के दावा फाइल किया
और आरक्षण ख़त्म करवा दिया अब मुस्लिम नोजवानो को ना तो नौकरीओं में और ना ही शैक्षणिक
संस्थाओं में आरक्षण है. जब मराठा और मुस्लिम
आरक्षण ख़त्म किया तो कैसे सिर्फ मराठा समाज को १६% भगवा सरकार ने आरक्षण दे दिया. हम किसी की हकतलफी नहीं करना चाहते और ना है हम
मराठा आरक्षण के खिलफ है परन्तु जो हक़ मुस्लिम समाज का था वो भी आपने लूट लिया और ख़त्म
कर दिया, फिर हिन्दू आतंकी और सरकार हमसे गर्दन कटाने की उम्मीद रखते है.
हर मसले पे मुस्लिम ही कुर्बानी क्यों दें. बाबरी मस्जिद मसले पे जब न्यायलय में मुस्लिम समाज का पक्ष मज़बूत होता जा रहा है तो लंगूर, लँगूरनिया, जर खरीद रिज़वी जैसे दलाल मुसलमानों में इन्तेशार पैदा करना चाहते है और सभी लंगूर, दलाल मुस्लिम कुर्बानी मांग रहे है. लंगूर और लागूरनिया कहते नहीं थकते मुस्लिम बड़ा दिल नहीं कर सकते क्या. वो अपना हक़ नहीं छोड़ सकते क्या, हिन्दू समाज को मंदिर की ज़मीन नहीं दे सकते क्या. हर जगह जब वतन को लहू की ज़रुरत पड़े तो काहे को मुस्लिम ही याद आते है. फिर इतना ही नहीं इतिहास के पन्नो में आप उनको किस नाम से जानते हो ये बड़ी बात है. आक्रांता, ज़ालिम, लूटेरे मंदिर तोड़ के ताज बनाया, मंदिर तोड़ के जामी मस्जिद बाँधी. आज अगर मुस्लिम समाज ने कुर्बानी दे भी दी तो इस बात की क्या ग्यारंटी है की १००० साल बाद जाते उनके वंशजो को जो गाली आज दी जा रही है वही गाली नहीं दी जायेगी. नहीं अब नहीं हरगिज़ नहीं मुस्लिम बाबरी भी लेंगे और अपना हक़ भी. इंशाअल्लाह
पाकिस्तान बोहोत ही नेक काम कर रहा है जो कश्मीर में इंसानियत के क़त्ल
और इन्साफ की आवाज़ बेरुन मुल्क बुलंद कर रहा हैं और आतंकवादी देश के ज़ुल्म, सितम, सामूहिक
हत्या, नरसंघार को अंतराष्ट्रीय मंच पे मज़बूत
कर रहा है. अल्लाह उस पाक वतन को और प्रधान मंत्री इमरान खान साहब को हमेशा सलामत रखे
और खुश रखे. पाक सरकार से गुज़ारिश है कश्मीर
के लिए जो कर रहे है वो तो करें ही उसके साथ दो चीज़ों के ऊपर मज़ीद तवज्जो दें. एक कुफ्रिस्तान, लचिस्तान में जो मज़ालिमों का सामना
मूस्लिम समाज को सहना पड़ रहा है उसके ऊपर भी इंग्लैंड और अमेरिका में भारत की खोकली
धर्मनिरपेक्षता को नंगा करे और मूस्लिम समाज के लिए उनका हक़ दिलवाने की मांग करे. दूसरी बात भारत से विभाजन के लिए मुसलमानो की मांग
को अंतराष्ट्रीय मंच पे मज़बूत करें. इस सहाफी
ने एक पेटिशन डाली है, उसकी एक कॉपी आपकी
सरकार को वाया पाक एम्बेसी दिल्ली से भिजवाता हूँ ताके आप विभाजन की मांग को अंतराष्ट्रीय
मंच पे और मज़बूत कर सके.
ये सहाफी इन तमाम मामलों पे अपने कश्मीरी भाईयों, पाक और हाफिज साहब
के साथ है. इसलिए नहीं; क्योंकि वो मुसलमान
हैं बल्कि इसलिए के वो हक़ पे हैं और कश्मीरी भारतीय आतंक, ज़ुल्म के शिकार है. इसलिए ये सहाफी हर बार की तरह इस साल भी भारत का
योमे जमुहरिया नहीं बनाएगा उसकी जगह ५ फरवरी
को कश्मीर डे बनाएगा. और अल्लाह से कश्मीर
की आज़ादी और मुस्लिम समाज के लिए भारत का एक और बटवारे की दुआ करेगा.
निर्णय
१.
तमाम गवाहों और दलीलों को सुनने के
बाद इस सहाफी की अदालत इस नतीजे पे पहुंची है की क़ौमी इजलास आज़ादी का जशन बनाना या
यौमे जमुहरिया बनाना इस्लाम का हिस्सा नहीं है.
अगर कोई मुस्लिम ना बनाये तो वो इस्लामिक क़ानून के हिसाब से एंटी नेशनल नहीं
हो सकता.
२.
फिर जो मुस्लिम मौलाना ऐसे इज्लासों
और महफिलों में शामिल होते है और किसी भी मज़हबी महफ़िल या नात खानी की महफ़िल पे तनक़ीद
करते है और ऐसी महफिलों को गुनाह, कुफ्र और बिदअत बोलते है कौमी इज्लासों में शिरकत
करने वाले वो सब लोग गुनाह के मुर्तकिब है. अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.
Celebration of National Festivals is not the essential
practice of Islam: Journalist Zuber
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