शहीद याकूब मेमन
अन्याय जन्म देता हे अलगाओवाद को और अलगाओवाद जन्म देता हे बटवारे को. १४ अगस्त १९४७ भारत को आज़ादी नसीब हुई लेकिन अनेक टुकड़ो मे. जिसमे मुख्यत पाकिस्तान एक बड़ा हिस्सा भारत का अलग हो गया. जो मुसलमान पाकिस्तानी समर्थक थे वो पाकिस्तान चले गए लेकिन जो सच्चे भारतीय थे उनको भारत के अंदर रहने में ही अपनी फलाह और कामयाबी नज़र आई. लेकिन य क्या भारत का हिन्दू कभी उन मुसलमानो को भारतीय नहीं समझ सका जो भारत में रह गए थे. १९४७ से ले कर १९९२ तक सभी मुसलमानो को पाकिस्तानी और गद्दार कह कर सम्भोदित किया जाता रहा. यहाँ तक के स्कूल में मुसलमान बच्चो को प्रताड़ित किया जाता उनको मारा पीटा जाता, स्कूल टीचर सामने खड़े रह कर मुसलमान बच्चो को हिन्दू बच्चो से पिटवाते और उसको नाम दिया जाता कुश्ती। जब कुश्ती ही करना हे तो मुसलमान बच्चा कियो हिन्दू बच्चे को मार नहीं सकता इस सवाल पे टीचर चुप हो जाता. य बाते सिर्फ लेखक का दिमागी फुतूर नहीं हे बल्कि उसने य सारे वाकियात उसके साथ महसूस और दुसरे मुसलमानो के साथ अनुभव किये.
०६ दिसंबर १९९२ को बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गई और उसके साथ शहीद किये गये हज़ारो मुसलमान जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। पुलिस की गोली चली तो मुसलमानो पे, हॉस्पिटल में डॉक्टर्स का मुसलमान का इलाज करने से इंकार, उधोगिक जगत का मुसलमान को दान न देना। फिर मार्च १९९३ को इन सारे सवाल का जवाब मुसलमानो ने अपने ही अंदाज़ में दिया जिसके बाद एक और नाम अपने साथ जोड़ दिया गया वो नाम था आतंकवादी। अब जहा कही भी मुसलमान जाता उसको शक की नज़र से देखा जाने लगा. हर मुसलमान के पीछे भगवा मोरल पुलिस लगी रहती और किसी भी झूठे इलज़ाम में उसको गिरफ्तार करवा दिया जाता. १९९३ से लेकर २०१० तक हर मुसलमान में सरकार, पुलिस, न्यायलय और हिन्दू जनता को आतंकवादी ही नज़र आने लगा. ज़ुल्म की हद तब और भी बड़ गई जब मुसलमान हल्को में ब्लास्ट का दोषी भी मुसलमानो को ही करारा दे कर जेलों में बंद किया गया. जब तक की हिन्दू आतंकवाद का चेहरा बेनक़ाब नहीं किया गया.
अब परीक्षा और बारी थी न्याय के मंदिर तथा भारत की न्याय प्रणाली की। यहाँ पे भारत की न्याय प्रणाली मुसलमानो के लिए कम नहीं रही. जब १९९३ के ब्लास्ट करने वाले याकूब को फ़ासी की सजा दी जाती हे तो बाबरी मस्जिद शहीद करने वालो के ऊपर अभी तक चार्ज शीट तक दाखिल नहीं होती. जिन शिव सेनिको ने दंगो में सिर्फ मुसलमानो को चुन चुन कर शहीद किया था वो सब बरी हो गए. जो पुलिस सरगना तियगी जिसने १५ से २० मुसलमानो को सुलेमान बेकरी में गोलिओ से भून डाला था वो बरी हो गया.
फिर २००२ के आतंकवादी कोडनानी को काहे २० साल की सज़ा और बजरंगी को काहे उम्र कैद. य केसा भारत का न्याय हे एक को २५३ लोगो की जान लेने पे फ़ासी और दूसरी तरफ ३००० लोगो की जान लेने वालो को सिर्फ जेल. उसमे भी सितम देखिये न्यायल का जिसने कोडनानी को बैल पे घर जाने की इजाज़त दे दि और वो आतंकी महिला खुली हवा का आनंद ले रही हे.
अब मेरे पहले वाक्य पर आईए, अन्याय तो हो गया मुसलमानो के साथ. पिछले १० सालो में सिर्फ तीन फ़ासी हुई और वो तीनो मुसलमानो की. पहला मोहम्मद अजमल कसाब दूसरा शहीद मोहम्मद अफज़ल गुरू और तीसरा शहीद याकूब मेमन।
तुमको किया मिला तुम्हारी भारत से वफादारी का इनाम। गद्दार, पाकिस्तानी और आतंकवादी का तमगा। तो उस तमगे को अब सही साबित करना तुम्हारा काम हे।
अगर अब नहीं जागे तो कभी नहीं जागोगे। अत्याचार सेहना भी एक अन्याय हे और अन्याय के खिलाफ लड़ाई करना न्याय.
ज़ुबेर एहमद खान
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