Saturday, 23 September 2023

तालिबान को मदद भारत की ग़लीज़ हिकमत।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हर इंसान की नियत पर फैसले होतें हैं।  जिसके ऊपर इस सहाफ़ी ने नज़म लिखी है।  अगर नियत ग़लीज़ और गन्दी है तो वोह अच्छे किये हुए काम के भी बुरे नतीजे मिलते हैं।  किसी मुल्क की मदद करना किसी ख़ातून को पैसे देना बुरा अमल नहीं है और ऐसी मदद करने वाले के दरजात बुलंद होतें हैं।  लेकिन मुद्दा वही है मदद करते वक़्त तुम्हारी नियत क्या थी।  अगर किसी ख़ातून की मदद करते वक़्त हरामख़ोरी की नियत थी या उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर उसके जज़बात से खेलने की ग़लीज़ गन्दी नियत थी तो वोह पैसा सदक़े की शकल में दरजात बुलंद करने के बजाये लानत का बाईस बनेगा और देने वाले के ऊपर अल्लाह और उसके फरिश्तों की लानत होगी।  अब एक जाइज़ काम भी ग़लीज़ नियत की वजह से गंदे नतीजे देगा। 

नाज़रीन किसी भी इंसान के गंदे और अच्छे अमल का कफ़्फ़ारा वोही अदा करता है और हाकिम के गंदे और अच्छे अमल का कफ़्फ़ारा पूरा मुल्क अदा करता है।  भारत ने तालिबान को २०० करोड़ की इमदादी रक़म माहे फ़रवरी २०२३ के बजट में जारी की थी।  उस रक़म को पा कर तालिबान ने वज़ीर ए ख़ज़ाना मोहतरमा रुपया नहीं गिरा बल्कि डॉलर मज़बूत हुआ है को शुक्रिया कहा था। 

सवाल यह उठता है की भारत ने तालिबान को २०० करोड़ रूपये की इतनी बड़ी इमदाद काहे को दी थी।  भारत की मोदी सरकार जो अपने ही मुसलमानों के ख़ून की प्यासी है उस से बग़ैर किसी ग़लीज़ नियत के किसी मुस्लिम मुल्क वोह भी तालिबान जैसे को इमदाद देने के पीछे की तहक़ीक़ ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम ने निकाली और नतीजे बेहद चौकाने वाले थे।  

भारत ने तालिबान को मदद सिर्फ पाकिस्तान को घेरने और अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन से दहशत को फ़रोग़ देने दहशत के अड्डे नई फैक्ट्रीज़ की इफ्तेताह करने के लिए दी थी।  जिसके बाद पाकिस्तान पर दहशतगर्द हमले काफ़ी बढ़ गए थे और पाकिस्तान ने तालिबान हुकुमरानों से अफगान ज़मीन को पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल ना करेने की कई बार गुज़ारिश की गई थी। 

नाज़रीन आपको सोवियत यूनियन याद है जब वोह अफ़ग़ानिस्तान पर क़ाबिज़ था तब अमेरिका ने तालिबान को फ़रोग़ दी और ग़लीज़ नियत के साथ क़ुव्वत फ़राहम की थी ताके तालिबान रूस को भगा दे और अमेरिका आलमी क़वी मुल्क बन जाए।  किसी हद तक अमेरिका को कामयाबी मिली और सोवियत यूनियन अफगानिस्तान में ना सिर्फ जंग हारा बल्कि उसके टुकड़े भी हुए।  लेकिन अब तालिबान इतना क़वी हो गया था की अमेरिका को ही जंग के लिए ललकार दिया।  २० साल की ख़ाना जंगी और बदअमनी के बाद बिल आख़िर अमेरिका को जंग में शाकिस्त हुई।  कियोंके जो अमेरिकी हदफ़ था बर्रे सग़ीर में उसकी मौजूदगी क़ायम रख चीन, रूस पर अंकुश लगाए रखना वोह हदफ़ को ना पा सका। 

नाज़रीन अब हिंदुस्तान की निस्बत से बात करतें हैं मोदी हुकूमत ने भी वही ग़लीज़ नियत के साथ काम किया और तालिबान को मदद फ़राहम की।  यह जज़बा अपने हमसाये से हुसने सुलूक का हरगिज़ नहीं था कियोंके अगर मदद फ़राहम करना थी तो पहला हक़ पाकिस्तान का होता है जो भारत से ज़्यादा क़रीब है लेकिन  मोदी हुकूमत की ग़लीज़ और गन्दी नियत तो पाकिस्तान के ऊपर दहशत फैलाना थी इसीलिए तालिबान को मोहरा बना कर मदद की भीक दे दी।  और उसके बाद पाकिस्तान पर ख़ूब दहशतगर्द हमले भी हुए लेकिन अब नतीजे की बारी है कियोंके ऊपर वाला किसी भी अमल पर उस इंसान या हाकिम की नियत देखता है जो की दिलों के हाल को भी जानता है। 

दूसरी बात ना तो तालिबान कोई भी ऐसा काम करेगा जो इस्लाम की रूह से ख़िलाफ़ ए शरा हो और ना ही अल्लाह किसी भी हाकिम के ग़ैर ज़रूरी अमल से मुत्तासिर होगा।  अब यहाँ पर अल्लाह उसकी नियत पर फैसला करेगा।  अगर नियत एक हमसाये को मदद की थी तो सबसे ज़्यादा भारत का पड़ोस पाकिस्तान है तो पहला हक़ पाकिस्तान का था ना की अफगानिस्तान का और अगर नियत ग़लीज़ ही थी तो अब अल्लाह की अदालत में भारत का फैसला होगा।

फ़िर इस सहफ़ी की तालिबान के ऊपर लिखी हुई नज़म  पर किसी कोई कोई एतेराज़ नहीं होना चाहिए।  

सहाफ़ी ज़ुबेर 

ए कटूवे ए भड़वे ए मुल्ला ए आतंकवादी

अज़ीज़ नाज़रीन 

मुसलमानों की हिंदुस्तान से मोहब्बत के नतीजे मिलने लगे हैं।  मुसलमानों की हर महाज़ पर ज़लालत, उनसे नफ़रत, उनका क़त्ल ए आम, उनके घरोंदों रोज़गार की तबाही उनकी हक़तलफ़ी उनके नौवजवानों की गिरफ्तारी इंसाफ़ की इबादत गाह अदालतों से उनकी हक़तल्फ़ी जग ज़ाहिर है। फ़िर भी यह मुसलमान है की अभी भी पाकिस्तान की तोहसीह करो यह हक़ बात कहने से ख़ौफ़ज़दा है।  हमें तो हिंदुस्तान से मोहब्बत है।   यह मोहब्बत नहीं है बल्कि तुम्हारा ख़ौफ़ है और अंधी अक़ीदत है (अंध भक्ती)।  जब ज़ालिम तुम्हारी नस्लों को काटना शुरू कर दे और तुम फ़िर भी उससे हुस्ने सुलूक की तवक़्क़ो रखो तो वोह उस ज़ालिम से मोहब्बत नहीं बल्कि तुम्हारी बेवकूफी और अंधी भक्ति है। 

मेरी तालिबान पर लिखी हाल ही की नज़म तालिबान आया तालिबान आया ज़ाफ़रानी घबराया पर कुछ हूकूमती नुमाइंदों ने सख्त एतेराज़ दर्ज किया है।   

मेरा सवाल उन्ही तन्क़ीदी अवाम से है तालिबान को २०० करोड़ की इमदाद किस ने दी थी।  जिसके ऊपर मेने मज़मून लिखा है मुग़लों के बाद अब आये तालिबान। अपने ही वतन के अक़लियती वज़ारत ख़ाने का बजट ४०% कम कर के तालिबान को इमदाद फ़िर किस बुनियाद पर बीजेपी भारत के मुसलमानों से मोहब्बत का दम भरती है।  

आज मुस्लिम अवाम को पीट पीट कर डरा डरा कर उस हद तक ग़ुलाम बना दिया गया है उससे भारत की एक और तक़सीम तो दूर पाकिस्तान की तोहसीह या अपने हक़ के बारे में भी बोलने में ख़ौफ़ होता है। 

जिस मुस्लिम अवाम को एवान में भड़वा कटुआ मुल्ला आतंकवादी ज़रा मिल बहार बताता हूँ ऐसी धमकियां दी जा रही हैं उसी मुस्लिम अवाम की महिलाओं से हुस्ने सुलूक की तवक़्क़ो रखती है बीजेपी।  अब में उन मुस्लिम ख़वातीनों से पूछना चाहता हूँ जो बीजपी और संघ के दिए हुए चंद टकों पर अपने ईमान का सौदा कर के इस्लाम मुसलमानों के खिलाफ बयान बाज़ी करती थी मोदी योगी को राखी पेश करती थी क्या वोह तवायफ़े हैं।  और उनके शोहर, वालिद, भाई उनके लिए भड़वा गिरी कर रहें हैं।  अगर नहीं तो जवाब दो।  इस ज़ालिम पार्टी के गुंडे ट्रोलर ने एवान में एक मुस्लिम नुमाइंदे को कैसे भड़वा कटुवा कहा।

मुसलमानों से हर मुद्दे पर भारत से मोहब्बत की उम्मीद की जाती है और जब उनके हक़ की बात आती है तो उनके साथ हक़तल्फ़ी की जाती है।  हरयाणा के नोह, तमाम उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश का खरगोन, आसाम वहां से मुस्लिम बस्तियों के ऐसे उजाड़ा है जैसे किसी ज़ालिम दुश्मन ने फ़िज़ाई हमला कर के बम गिराया दिया हो।  पूरी पूरी मुस्लिम बस्तियाँ एक दो किलोमीटर नहीं बल्कि १० और १२ किलोमीटर मट्टी का ढेर बना दी गई हैं। 

मुस्लिम नामो निशाँ मिटा दिया गया है अब वहां मुस्लिम बस्ती के नाम पर सिर्फ राख का ग़ुबार, गर्द और तबाही का ढेर बचा है।  फ़िर भी मुस्लिम सियासत है की हिंदुस्तान से मोहब्बत का दर्स दे रही है और उनको देख कर उनके पैरोकार उनसे दो क़दम आगे निकल कर हिंदुस्तान की मोहब्बत में पाकिस्तान को कौस रहें हैं, हिंदुस्तान हमारा वतन है हम यही रहेगें यही मरेंगे और इसी मट्टी में दफ़न होंगे।

हम कहाँ कह रहें हैं की पाकिस्तान की मट्टी में जा कर दफ़न हो लेकिन तोहसीह की बात तो कर सकते हो।   जब ज़हर की मिक़्दार इतनी बढ़ गई है की सदन, अदालत, सदर ए जमुहरिया तक उसकी की तपिश पहुंच गई है तो अब मज़ीद किसी से हुसने सुलूक की उम्मीद रखना बेवक़ूफ़ी है। 

इंसाफ़ देने वाला ही नाइन्साफ़ हो जाए तो अब तुमको ऐसे ही दुसरे और तीसरे दर्जे में जीना पडेगा और अपनी नस्लों को ऐसे ही ज़लील होते देखना पड़ेगा।  या नहीं तो जो तुम्हारा हक़ है उसको ज़ालिम से छीन लो।

तालिबान को २०० करोड़ की मदद देने में भारत सरकार की मंशा पर सवालियां निशाँ हैं।  जिसका ख़ुलासा अगले मज़मून में करूंगा।  वोह २०० करोड़ दहशत को फ़रोग़ देने के लिए दिए गए थे ना की एक हमसाये की मदद की निस्बत से दिए गए थे।  नियत गलीज़ थी अब तकलीफ भोग रहा है भारत।   जिसका ज़िक्र ऊपर लिखे तालिबान को मदद दिए जाने वाले मज़मून में किया जा चूका है।  

सहाफ़ी ज़ुबेर

Sunday, 17 September 2023

लंगूरों की तिलमिलाहट और फांसी दिए जाने की फ़िक्र ज़ाहिर हो रही है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मज़मून दो कहावतों में थोड़ी तरमीम कर पेश करने की इजाज़त चाहूंगा। 

१.           अब आया है लंगूर पहाड़ के नीचे,

२.          लंगूर के मुँह में अंगूर: 

इंडिया महाज़ के लंगूर लँगूरनियों की ख़ास जमात के बहिष्कार से ज़ाफ़रानी चिड़ियाघर (मीडिया)  के लंगूर और लँगूरनियाँ ज़बरदस्त बिलबिला गए हैं।  ऐसे तमाम लांगूर और लँगूरनियों को हुकूमत तब्दील होते ही जेल में ठूसना चाहिए और फांसी की सज़ा देनी चाहिए।  कियोंके इन लंगूर लँगूरनिओं की ग़द्दारी और मोदी हुकूमत की हर ग़फ़लत ख़िलाफ़ ए दस्तूर अमल पर भी सवाल ना पूछने की वजह से ही भारत का ज़वाल हुआ। 

यही भारत के साथ ग़द्दारी है।  मोदी और बीजेपी वालों का जो होगा सो होगा लेकिन सबसे पहले इन ग़द्दार लंगूर लँगूरनिओं को चुनचुन कर इनके घरों से निकाल कर जेल में ठूसना होगा और भारत की शिनाख़्त, सालमियत और बाहमी भाईचारगी के ख़िलाफ़ जंग की साजिश का केस चलाना होगा।Waging war against Country.  जिसका सबूत २०१९ अप्रैल में वोह इन्तेख़ाबी तजज़िया था जिसमे चित्रा त्रिपाठी, अंजना ॐ, स्वेता सींग, रूबिका लियाक़त और कई दुसरे लंगूर इन्तेख़ाब को एक जंग जैसे पेश कर रहे थे।

फिर मोदी को एक जंगी फौजी की तरह हाथ में तलवार लिए घोड़े पर और राहुल को दूसरी तरफ दिखाया गया था।  उस तज्ज़िया को नाम दिया गया था "धर्म युद्ध"।  अब यह समझमे नहीं आ रहा है की वोह धर्म युद्ध किस के ख़िलाफ़ था।  दोनों कांग्रेस और बीजेपी हिन्दू पार्टी हैं और भारत की ही हैं।  दूसरी बात जब नतीजे आना शुरू हुए तो यहीं लँगूरनियाँ ज़हरीली नगीने किसी भी मुख़लिफ़ नुमाइंदे की शाकिस्त को ऐसे बोल कर बयान करती थी "यह देखिये दुश्मन का एक और फौजी हलाक हुआ, दुश्मन का एक और क़िला भाजपा के क़ब्ज़े में हुआ" उसके ऊपर पेनल में मौजूद एक सहाफी ने एतेराज़ भी दर्ज किया था।  आप कैसे दुश्मन अलफ़ाज़ का इस्तेमाल कर रही हैं और मुख़लिफ़ कैसे भारत का दुश्मन हो गया दोनों ही तंज़ीमे भारत की हैं और इन्तेख़ाबी मरहले का हिस्सा हैं।  मुख़लिफ़ भी दस्तूर के हिसाब से इन्तेख़ाब में हिस्सा ले रहें हैं।  

भाजपा के बोये हुए इस ज़ाफ़रानी ज़हर को ख़त्म करने की पहली क़िस्त वही होगी ज़हरीले लंगूर और लँगूरनिओं को ख़तम किया जाए।  और आला तरीन सहाफ़ियों को पेनल में जगह मिलनी चाहिए जो नई हुकूमत से सवाल पूछे।  जैसे अभिसार शर्मा, साक्षी जोशी, प्रज्ञा मिश्रा, रविश कुमार, संदीप चौधरी और बोहोत से नाम हैं नई सरकार खुद ही फेलसा करे।  

सिर्फ वतन से झूठी मोहब्बत में अंधे हो कर हुकूमत के हर नाज़ेबा अमल की पैरवी ना करें।  असली वतन का वफ़ादार वही जो आतिशी मुद्दों पर जिस पर की आलमी सतह पर भारत की साख खराब होती है मौजूदा हुकूमत से सख्त अलफ़ाज़ में सवाल करे और हुकूमत को ऐसा काम करने से रोके जिसकी वजह से मुस्तक़बिल में वतन की आन बान और शान को झटका लगे। 

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

Saturday, 16 September 2023

वली की शहादत हाकिम की बर्बादी।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

जब भी कोई हाकिम किसी दरवेश को शहीद करता है तो उसका ज़वाल उस हाकिम और मुल्क के मुस्तक़बिल पर ज़बरदस्त पढ़ता है।  औरंगज़ेब आलमगीर एक ऐसे वाहिद मुग़ल बादशाह थे जिनके दौर ए हुकूमत में हिंदुस्तान की सरहदे फ़ारस से ले कर बर्मा और कश्मीर से कन्यकुमारी तक फ़ैली थी।  मुग़लिया हुकूमत और जाने कितनी चलती अगर आलमगीर के हुकुम पर सरमद नामक वली की गर्दन क़लम ना की होती। 

सरमद काशानी एक सूफ़ी मजज़ूब थे जो याद ए इलाही में इतने गुम हो गए थे की उनको दुनियावी हर चीज़ एक बोझ लगती थी।  यहाँ तक की उनको अपने बदन पर कपड़े भी भारी लगते थे सो आप रब की जुस्तजू या तलाश में बरहना घूमते थे।  आप आधा कलमा पढ़ते थे।  ला इलाहा मतलब नहीं है कोई माबूत।जब औरगज़ेब के दरबार में सरमद के क़िस्से बयान होना शुरू हुए और मुफ़्तियों के फतवे आये की इनको क़तल कर दिया जाए।   हुकूमत से ग़द्दारी, खुदा और उसके क़ानून की खिलाफ वर्ज़ी और बोहोत से इलज़ाम लगा कर हुकूमत ए मुग़लियाँ के हाकिम औरग़ज़ेब ने उनका सर तन से जुदा करने का हुकुम नाफ़िज़ कर दिया की इसको क़तल कर दिया जाए। 

जब सरमद को जल्लाद ने क़तल किया तो उन्होंने अपने तन से जुदा सर को ज़मीन पर नहीं गिरने दिया और हाथों में ले लिया और जमा मस्जिद दिल्ली की सीढ़ियां चढ़ने लगे।  १, २, ३ अल गर्ज़ ७ सीढ़ियां चढ़े तो, उनके पीर ने आवाज़ दी।  सरमद कहाँ जा रहे हो उन्होंने कहा जा रहा हूँ अपना सर ले कर हुज़ूर की बारगाहे रिसालत में और मुग़लिया सल्तनत को बद्दुआ दी।  उनके पीर ने बोला रूक जाओ आप वहीँ पर गिर पड़े। 

जब सरमद की शहादत की दास्तान अवाम ने देखी वोह बात जंगल की आग की तरह पूरे दिल्ली में फ़ैल कर हिंदुस्तान में फ़ैल गई।  बात बादशाह के हरम में भी पहुंची।  यह बात सून कर बादशाह के होश फ़ाख़्ता हो गए, और उनको लगा की उनसे ग़फ़लत में कुछ तो ग़लती हो गई।  लेकिन अब जो होना था हो चूका था अब तो बर्बादी की बारी थी।   और हुआ वही औरग़ज़ेब के बाद महज़ एक मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ही हाकिम रहे और वोह भी निहायत ही कमज़ोर।   

कांग्रेस के दौर ए हुकूमत में शहीद अफ़ज़ल गुरू को फांसी दे दी गई।   सिर्फ़ अक्सरियत अवाम की तस्कीन के लिए और एक मुनाफ़िक़ फ़रेबी देढ़ आँख वाले ज़ाफ़रानी साधू के दबाव में आ कर एक बेगुनाह को फ़ाँसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया गया था।  वोह भी बेगुनाह थे उनकी शहादत का ज़र्रा भर कफ़्फ़ारा कांग्रेस और हिंदुस्तान की अवाम भोग चुकी है। बड़ा होना बाक़ी है।  शहीद अफ़ज़ल की फ़ाँसी के बाद जो कांग्रेस उसका सियासी नफ़ा लेना चाहा रही थी वोह महज़ ४५ पर सिमट गई और उत्तराखंड में आया ज़बरदस्त तूफ़ान जिसमे कमो बेश  एक लाख के क़रीब लोग मारे गए और मज़ीद १० से १२ लाख बेघर हो गए।  

तारीख़ से किसी भी सियासी जमात ने सीख नहीं ली जो ग़लती कांग्रेस ने की वही ज़ाफ़रानी महाज़ ने की और शहीद याक़ूब मेमन को फांसी दे दी।  जबकी बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले तमाम हिंदुस्तान में मुसलमानों का क़त्ले आम करने वाले दंगा फ़साद करने वाले खुली हवा में घूम रहें हैं। 

नाज़रीन इस बात को कई दफ़ा दोहरा चूका हूँ और हदीस क़ुदसी बयान कर चूका हूँ अल्लाह के वलिओं से जिस बन्दे ने बग़ावत की उनको दुःख पहुंचाया तो उससे अल्लाह का खुला एलान ए जंग है।  अब है कोई इतना बड़ा सूरमा और हाकिम जो अल्लाह से जंग की ललकार को क़ुबूल करे और अल्लाह से जंग जीत जाए।   

जिस तरह सरमद की शहादत के बाद मुग़लिया सल्तनत तबाह हो गई उसी तरह शहीद अफ़ज़ल और याक़ूब की शहादत के बाद हिंदुस्तान का मुस्तक़बिल भी अल्लाह वैसा ही लिखेगा जैसा ज़ुल्म और ज़्याती इन दोनों तंज़ीमों ने अल्लाह के वलिओं के ख़िलाफ़ की थी। 

अल्लाह का बदला बोहोत सख़्त है।  कोई नहीं बचेगा जिस जिस ने कुफ़्र और वतन की झूठी मोहब्बत में आ कर अल्लाह वालों का दिल दुखाया  सब तबाह हो जायेगें, मारे जायेगें, नेस्त नाबूत हो जायेगें।  वतन से मोहब्बत का कोई फ़लसफ़ा कोई हदीस इस सहाफ़ी के नज़रों से नहीं गुज़री।  दारुल हर्ब है तो कहीं से कहीं तक वतन से मोहब्बत की कोई भी गुंजाइश नहीं है।  हाँ अलबत्ता दारुल अमन के लिए कोई राह निकल सकती है।     


सहाफ़ी ज़ुबेर

Wednesday, 6 September 2023

फ़क़ीरों की जगह जेल में।

अज़ीज़ नाज़रीन

इंडिया में भिकारी, मुफ़लिसी एक आम सक़ाफ़त है और ख़ास मियाँ घुमक्कड़ के उस जुमले के बाद "अरे हम तो फ़क़ीर हैं,  झोला उठा कर चल पड़ेगें जी"  फ़क़ीरों की जैसे एक आंधी आ गई है। 

बॉम्बे लोकल में रेलवे प्लेटफार्म पर टिकट विंडो पर हर जगह भीकारिओं की जमात देखने को मिल जाती है।  मज़े की बात यह भिकारी जगह का इन्तेख़ाब भी खूब चालाकी से करतें हैं।  मेहराब के नीचे बैठेगें जहाँ से अवाम का आना जाना होता है या आम रस्ते पर जहाँ से हर ख़ास और आम का आना जाना होता है।  हर मज़हब की इबादत गाह के पास मिल जायेगें।    

इन भीकारिओं में से ९५ फीसद में पेशावर होते हैं जिनका भीक माँगना रोज़गार ही होता है।  अगर ऐसों को पकड़ कर जेल में ठूसा जाएँ तो १५ लाख के सूट इनके अंदर से गिर पड़ेगें।  इनके घर आलिशान होतें हैं और मौर को यह फ़क़ीर दाना डालता है।  लेकिन पेशे से फ़क़ीर कहलाता है।   जो हक़ीक़त में गरीब और मुफ़लिस होतें हैं वोह कभी भी अपनी इज़्ज़त ए नफ़्स की वजह से ऐसा काम नहीं करेगें भूके मर जायेगें लेकिन भीक नहीं मांगेगें और दुनियां को यह ज़ाहिर नहीं होने देंगें की वोह गरीब है।  जो ख़ुद हो कर बोल रहा है में फ़क़ीर हूँ भीक मांग कर ज़ाहिर कर रहा है की वोह ग़रीब है मतलब सब से बड़ा झूठा और ग़द्दार है।   वक़्त का सबसे बड़ा अमीर वही है। 

नाज़रीन सूबे दरमियान (मध्य प्रदेश) के इंदौर में इंदिरा गाँधी के क़त्ल से क़ब्ल फ़क़ीरों के ऊपर सहाफ़ियों ने एक मोहीम चालू की थी।  उस दौर के ख़बरनामे नई दुनियां हिंदी, दैनिक भास्कर और उस दौर के जो भी ख़बरनामे थे उनके सहाफ़ियों ने भिकारिओं के ख़िलाफ़ मोहीम का आग़ाज़ किया। 

दरअसल घंटा घर ओवर ब्रिज के ऊपर भिखारियों का एक हुजूम जमना शुरू हो गया था, जो रीगल चौराहे तक रहता था।  हुआ यह था ब्रिज के नीचे एक बड़ा सा मंदिर हुआ करता था।  उसमे ज़ायरीन आते थे उनके चप्पल, पर्स और आशियात की चोरी की वारदातें बढ़ने लगी थी। 

होता क्या था इंदौर के अतराफ़ खंडवा, महू, उज्जैन, रतलाम से ग़रीब अवाम आता और ओवर ब्रिज पर पनाह गुज़ीन हो जाता था।  जिसकी वजह से शहर की ख़ूबसूरती को भी सख़्त बट्टा लगता था और चोरी चखारी की वारदात भी खूब बढ़ गई थी। 

जब सहाफ़ियों के मज़मून लोकल ख़बरनामों में शाया हुए तो हुकूमत भी होशियार हो गई।  अब भोपाल में वज़ीरे आला के दफ़्तर में काना फूसी का आग़ाज़ हुआ।  जब सहाफ़त फ़क़ीर पर तनक़ीद कर रहा था तभी इंदिरा गांधी का क़तल हो गया।  इंदौर कई महीनों के लिए कर्फ्यू की नज़र हो गया और पुलिस ने ओवर ब्रिज से तमाम फ़क़ीरों को उठा कर या तो जेल में ठूस दिया या उनके घर भेज दिया।  इसी दौरान किसी सहाफ़ी ने इलज़ाम लगा दिया इन भगवा धारी फ़क़ीरों ने सिखों के क़त्ले आम और महारानी रोड, मेजेस्टिक नगर में उनके रोज़गार की जानकारी दंगाइयों की फ़राहम की है। 

फिर क्या था  जैसे ही कर्फ्यू खुला और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी पटरी पर आई की हुकूमत ने एक ज़ुबानी तीर छोड़ दिया जो कोई भी ओवर ब्रिज पर रात सोते हुए दिखे उसको गिफ्तार किया जाए।  फिर भिकारी सक़ाफ़त को एक जुर्म क़रार दे दिया।  अब सहाफ़ियों और ज़ुबान बाज़ लोगों को मसाला मिल गया।  कुछ फ़क़ीर गिरफ्तार भी किये गए अब अवाम में ऐसी बातें होने लगी की इनको ले जा कर गोली मार दी जाती है या इनके गुर्दे दिल आँखे निकाल कर इसका बिज़नेस हो रहा है वग़ैरा।  ख़ैर वोह सब अच्छा ही हुआ था, अब भीक मांगने में लोग डरने लगे थे।  जूना रिसाला जहाँ सुबह सादिक़ से फ़क़ीरों की आवाज़ें बुलंद होती थी तो मगरिब तब आते रहते थे सब बंद हो गए।

फ़क़ीरों की भी ३ तरह की जमात होती है एक करोड़ पती जो १५ लाख का सूट पहनते हैं और मशरूम खाते हैं दूसरा वोह जो मुफ़लिसी और कसमपुरसी में जी रहें हैं लेकिन इज़्ज़त ए नफ़्स की वजह से सब कुछ बर्दाश्त कर रहें हैं तीसरा वोह जो हक़ीक़ी फ़क़ीर है।   मतलब राहे हक़ में फ़क़ीर हो गया है, ऐसे फ़क़ीरों को माल ओ दौलत दुनियां की हिर्स नहीं होती तमाम आलम की जायदाद तो ऐसे फ़क़ीरों के ज़ेरे क़दम होती है और ऐसे फ़क़ीर अपने घोड़ों के पैर सोने की ज़ंजीरों से बांधते हैं। #मेहबूब-ए-इलाही #निजामुद्दीनओलिया     

बस अब हुकूमत को चाहिए की ऐसी बात भर कर दे की जो कोई भी अवामी हलके में भीक मांगते हुए देखा गया उसको पुलिस पकड़ लेगी और भिकारी प्रथा के ऊपर हुकूमत क़ानून बनाएगी।  फिर देखो सब ऐसे ग़ायब जो जायेगें जैसे लाहौल पढ़ने पर शैतान के सर से सींग गायब होतें हैं। 

बॉम्बे में छोटे छोटे मासूम बच्चों से भीक मंगवाई जाती है छोटे बच्चों के साथ गाना गाते हुए भिकारी लोकल, बस स्टैंड, अवामी आमदो रफ़्त गलीज़ कपड़ों के साथ ऐसे भिकारी देखे जा सकतें हैं।  ऐसी मासूम ज़िन्दगी को भीक मंगाने वाले माँ बाप पर हुकूमत को हिकमत करना चाहिए।  फ़िर बेरुन मुल्क एक आम सक़ाफ़त इंडिया की निस्बत से जो मशहूर है भिकारी देश उसको ख़तम करना सरकारों का काम है। 

हुकूमत हिन्द ऊल जलूल क़ानून बनाती है सिर्फ अपनी सियासत को चमकाने के लिए हिजाब बेन, नमाज़ बेन, अज़ान बेन इन मुद्दों से इंडिया की साख बेरुन मुल्क बेहद ख़राब हुई है जबकि क़ानून ऐसा बनाना चाहिए जो इंसानियत और यतीम गुरबा की फ़ायदे का हो।   ८० से ९० फीसद भिकारी भीक मांगने को एक रोज़गार के जैसे करतें हैं।  सुबह नहा धो कर मस्त ऑफिस बेग कंधे पर टांग कर निकल जातें हैं दिन भर में अगर भीक मांग कर १००० रूपये भी जमा हुए तो एक महीने का ३०,००० कमा लेते हैं।  एवरेज निकाला जाए तो १५ से २० हज़ार कहीं नहीं गए और ना कोई इनकम टेक्स ना कोई अवामी आमद रफ़्त पर टिकट। फ्री फुग्गे की कमाई।  हक़ीक़त में ग़रीब सिर्फ ५ से १० फीसद होतें हैं जो इज़्ज़ते नफ़स की वजह से भीक भी नहीं मांग सकते।  तो ऐसे प्रोफेशनल भीकारिओं पर हुकूमत को शिकंजा कसना चाहिए।

मियाँ घुमक्कड़ को अपने १५ लाख के सूट और बेरुन मुल्क वज़ीरों के साथ झूले पर झूलते हुए चाये पर चुस्की लेते हुए मौज करते हुए लंगूरों ने ख़ूब दिखाया अब ज़रा हक़ीक़ी फ़क़ीरों को भी दिखा दो जिनकी वजह से इंडिया का तसव्वुर ख़राब हो रहा है।   

सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश

Tuesday, 5 September 2023

कुल हिन्द पाक इत्तेहाद देख भाजपा का ज़हरीला कीड़ा तिलमिला गया।

अज़ीज़ नाज़रीन

पाकिस्तान और श्रीलंका की मेज़बानी में चल रहे एशिया कप क्रिकेट में जब भारत और पाकिस्तान की दोनों टीम आमने सामने आई तो पाकिस्तानी अवाम की जानिब से अमन और भाईचारे के पैग़ाम दिए जाने लगे।  फिर मैदान पर दोनों ही टीमों के खिलाड़िओं की जानिब से ख़ुश ख़ुर्रम और हस्ते खेलते फोटों देख कर भाजपा का ज़हर गटर फेम की तरह गन्दा पानी ज़ेहनों में भरा गोबर बहार निकल कर आने लगा। 

एक गटर की पैदाइश को ऐसे हस्ते खेलते अमन और भाईचारे के मुज़ाहारे करते हुए हिन्द पाक खिलाड़ी ज़रा भी पसंद नहीं आये।  उसने अपने गटर नुमा ज़ेहन में भरा हुआ गोबर और ज़मीन का गलीज़ पानी बहार फेंकना शुरू कर दिया।  गटर का कीड़ा बोलता है की भाईचारा और हसी मज़ाक़ मैदान के बहार करो मैदान में जंग। 

भाजपा के इन जैसे ज़हरीले कीड़ों की वजह से ही भाईचारे की बातें नहीं होती और दुश्मनी बढ़ती जाती है। खैर यह तो पाकिस्तान है यह भाजपाई ज़हरीले कीड़े खुद उनके वतन के मुस्लिम अवाम का नाम आते ही गटर के गंदे पानी और ज़हर से भर जातें हैं।  ज़हरीले कीड़े

पाक खिलाड़ी की खेल भावना से जुड़ा हुआ वोह फोटों सोशल मीडिया पर वायरल हो चूका है जिसमे वोह एक भारत के खिलाड़ी के जूते के लेस बाँध रहें हैं।  जिस पाकिस्तान को यह भाजपाई,  भारत के दहशतगर्द और लंगूर-लँगूरनियाँ पानी पी पी कर कोसते हैं दरअसल मेहमान नवाज़ी हुस्ने सुलूक मोहब्बत भाईचारा कोई पकिस्तानिओं से सीखे।  अगर वही तस्वीर का रूख उलटा होता पाकिस्तानी खिलाड़ी के जूते का लेस कोई हिंदुस्तानी खिलाड़ी बांधता तो बॉम्बे से सावरकर की औलादें (जो ख़ुद भी क्रिकेट के अज़ीम खिलाड़ी रह चुके हैं) और तमाम भारत से भाजपा के ज़हरीले कीड़े ख़ास दिल्ली, हरयाणा और जम्मू के ज़ाफ़रानी खटमल जो ख़ुद भी क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं तिलमिला जाते।  लंगूर लँगूरनियाँ तो गटर के खुले हुए ढक्कन से जैसा गंदा पानी सडकों पर बेहता है ऐसे ही गंदे पानी की तरह गंदगी फैला कर बह निकलते।  लेकिन ना ही पाकिस्तानी सहाफ़त से ऐसी कोई तनक़ीद आई और ना ही अवाम ने उसको गैर ज़रूरी तूल दिया।  तमाम पाकिस्तानी अवाम ने उस बात को खिलाड़िओं के दरमियान एक खिलाड़ी की मदद का जज़बे के मुज़ाहिरे के रूप में लिया। 

जो ज़हर भारत की अवाम में भरा पड़ा है उससे कई गुना ज़्यादा भाईचारा और मोहब्बत, इंसानियत पाकिस्तान, मुसलमानों में मौजूद है।  लेकिन भारत में दिखाया वही जाता है जो होता नहीं है और जो  हक़ीक़त में होता है उसको पोशीदा कर लिया जाता है।  वोह तो भला हो सोशल मीडिया का जिसकी वजह से लंगूर लँगूरनिओं का पाकिस्तान मुसलमानों की निस्बत से फ़ैलाया हुआ हर झूट फ़रेब ज़हर फ़ौरन पकड़ में आ जाता है और उसका पर्दा फाशा हो जाता है की झूटी खबर फ़ैलाई जा रही है।   

फिर जब ऐसी भाई चारे की खबरे मंज़र ए आम पर आती हैं तो गटर के कीडों का कुलबुलाना लाज़िम हो जाता है।  ज़ाफ़रानी कीड़ों को अमन भाईचारे की बातें पसंद नहीं हैं उनको तो जंग क़त्ल ए आम खून ख़राबे नफ़रत की बातें पसंद हैं।  फिर भरोसा कैसे जमेगा।  मुस्लिम अवाम और पाकिस्तान तो भारत के ठन्डे पानी से जले हुए है और मीठी खीर के नाम पर ज़हर को पीये हुए हैं। 

बाबरी से ले कर हिजाब, ट्रिपल तलाक़ और तमाम उन मसलों पर मुस्लिम हक़ तलफ़ी हुई जिसमें उनके मज़हबी और जज़बाती एतेक़ाद पोशीदा थे।  बाबरी पर अदालत ए उज़्मा में हलफ़ दिया की हमें सिर्फ पूजा अर्चाना की इजाज़त दी जाए मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होगा इस बात की हम पर ज़िम्मेदारी है।फिर किया हुआ गले लग कर क़तल कर दिया। 

उस पर सितम देखीये तमाम भारत दंगों की आग में झुलस गया जिसमे बॉम्बे भी शामिल था।  और जब सज़ा देने की बारी आई तो अदालत उज़्मा ने शहीद भाई याक़ूब मेमन को क़ानूनी क़तल कर दिया।  और बाबरी मस्जिद की शहादत को अदालत ने एक मुजरिमाना अमल माना जो एक सोची समझी साजिश के तहत शहीद की गई।  फिर भी मुजरिम आज़ाद घूम रहें हैं।  उन पर आज ३० सालों में मुक़दमा तक दर्ज नहीं हुआ।  

आज मुझ से तमाम पुलिस अफसर और तमाम सरकारी नुमाइंदों का याक़ूब मेमन के साथ मुस्लिम हमदर्दी की निस्बत से एक सा सवाल होता है।  जिसने २५६ लोगों की जान ली उनके चिथड़े बम ब्लास्ट में उड़ा दिए उसकी फांसी पर तुम मुसलमान काहे को हमदर्दी दिखा रहे हो।  जो बम ब्लास्ट में मारे गए उनके अहले खाना के लिए काहे को वोह जज़्बा नहीं है।  यह पुलिस अफसर और हूकूमती नुमाइंदे बम ब्लास्ट पर बाल्टी भर भर आंसू बहाते हैं और २५६ मौतों पर याक़ूब मेमन की फांसी पर जश्न मनातें हैं। 

उन सभी को रू बरू भी जवाब दिया जा चूका है लेकिन अवाम की जानकारी के लिए लिख रहा हूँ।  याक़ूब मेमन पर सिर्फ़ मुस्लिम ही नहीं हर इंसाफ़ पसंद अवाम आंसूं बहाता है।  हर क़ानून का जानकार बोलता है उनके साथ ग़लत हुआ।  उसकी वजह है पहले बाबरी मस्जिद को शहीद किया गया फिर बॉम्बे में दंगे हुए ना ही बाबरी मस्जिद की शाहदत के मुजरिमों को सज़ा हुई और ना ही दंगों में मुस्लिम अवाम को तबाह करने वाले मुस्लिम क़त्ल ए आम करने वालों को सज़ा हुई।  फिर याक़ूब मेमन को २० साल जेल में रखा उनको यह बोल कर भारत आने को बोला गया था की तुमको फांसी नहीं होने दी जाएगी।   

रॉ के साबिक़ चीफ़ जिनकी दरख़्वास्त पर याक़ूब भारत आये थे और अपने आपको क़ानून के हवाले कर के पूरी जानकारी अदालत को फ़राहम की फिर उनके साथ वही किया जो आम तोर पर ज़ाफ़रानी ग़द्दार करते है दोस्त बोल कर गले लगे और पीछे से गर्दन उतार दी।  इसलिए याक़ूब मेमन के साथ तमाम इंसाफ़ पसंद अवाम की हमदर्दी थी।  अदालते उज़्मा ने अदालत का दोस्त लक़ब से नवाज़ा था।  

पहले तो बाबरी मस्जिद शहीद हुई फिर दंगे हुए याक़ूब तो तीसरे नंबर पर थे तो सबसे पहले उनको सज़ा कैसे दे दी गई।  पहले और दुसरे अभी तक मौज कर रहे हैं।  अगर हुकूमत ने अपना फ़र्ज़ अंजाम दिया होता और अदालत तक पहले दो मुजरिमों को पेश कर के सज़ा दिलवा दी होती तो याक़ूब की फ़ांसी पर किसी को हमदर्दी ना होती।  

गटर फ़ेम लंगूर-लँगूरनियों के ज़हर का पैमाना देखीये पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में पूरी फ़ौज की यूनिट को अपनी यूनिफार्म और अस्लेह के साथ जम्मू में दिखाया गया।  ज़हरीली हेडलाइंस पहले मैच में पीटेगा पाकिस्तान फिर जंग में भारतीय फ़ौज से पीटेगा।  जब्कि मेने पाकिस्तान के किसी भी सहाफ़ी टीवी या ख़बरनामे में ऐसी ज़हरीली ज़ुबान और जंग की बातें करते हुए नहीं देखा।  

उधर मज़्ज़फ़्फ़रपुर दिल्ली के बाद कर्नाटक में शिवमोगा में १ सितम्बर को एक हिन्दू ख़ातून उस्ताद मंजूला देवी ने मुस्लिम तालिब ए इल्मों को इज्तेमाई ज़लील किया है।  वोह बोलती है की तुम पाकिस्तान कियों नहीं चले जाते।  काबा, क़ुरान और क़ुर्बानी पर भी बोहोत से नाज़ेबा बातें कहीं हैं।  

 ::नतीजा ::  

में बहैसियत सहाफ़ी भारत के वज़ीरे आज़म से गुज़ारिश करूंगा की हर रोज़ की इस ज़लालत से और हिन्दू अवाम में मुसलमानों के ख़िलाफ़ बढ़ते हुए ज़हर को देखते हुए पाकिस्तान की सरहद की तोहसीह कर दीजिये।  हम भी अब ऐसे ज़हरीले फ़िर्क़ापरस्त और गटर की गंदगी में नहीं रह सकते।  हिन्दू हिन्दुस्तान में ख़ुश रहें और मुस्लिम पाकिस्तान में खुश रहेगें।  लेकिन तोहसीह २५ करोड़ मुसलमानों को देखते हुए करना होगी।  भीक में दिया हुआ टुकड़ा हमको क़ुबूल नहीं हैं।   

सहाफ़ी ज़ुबेर

Friday, 1 September 2023

Law aspirant will be guided as an intern to the justice.

Mohammed Fasih Moinuddin Ahmed Khan is now become familiar face to the Professors of law in Agnel School of Law as he conquered India subsequently the State of Maharashtra in moot court competition and declared as the best Advocate of Moot.

Principal of the college felicitate Mohammed Fasih with the memento and declared as the proud moment for college when felicitate him  on State and National level.  

After looking his legal knowledge and wisdom Fasih has been appointed as the Legal Intern in the Court of Hon’ble Lordship Mr. Justice Madhav Jamdar of Bombay High Court.  Now he become the member of legal team of Justice Jamdar.

Our correspondent from Autonomous Journalist Team discussed with Mohammed Fasih for his future planning.  After completion of his legal bachelors he is planning to  pursue Bar at Law at Lincoln's Inn Society at Harvard Law School London or Inner Temple where ever he will get admission.

On the question of joining the Indian politics or would like to become part of International politics his answer was totally reluctant.   So far he is not interested in politics but future God knows.  

To whom he considered as his roll model.  Of course his answer my father the Advocate Moinuddin Ahmed Khan and his religious head his Murshid. 

Mohammed Fasih is  influenced from his educated family homely environment.  His father is an Advocate, grand father was the Dean of Medical College a Professor. Paternal Grand father and mother are the retired Professor and Principal respectively.  Retired Government officers from Ministry of Finance, Journalists, Engineers and officers completing the family list of Uncles.  

Since from beginning Fasih has been influenced with education and he may considered as bookworm.  He was admired with the philosophical thoughts of Molana Jalal Uddin Roomi, Aristotle, and Socrates.  He gone through the books and literature on Great Greek Civilization.   He is highly influenced with his grandfather Dr. Rafi Ahmed Khan and other family members in matter of education specially the big Fuppa. 

He is doing meditation to achieve the divine path, even though he is liberal in thought. He not only believing in humanity and helping hands to the poor and beggars, but doing charity and helping secretly to the poor.  

Certainly, judiciary will see new chapter to be incorporate if the open minded liberal law abiding youths will capture the judiciary. Then justice to the aggrieved will not be a problem.   

The team of Autonomous Journalist including the Editor in Chief wish bright future for Mohammed Fasih and all open minded legal aspirants.

Reported by Journalist Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...