अज़ीज़ नाज़रीन,
हर
इंसान की नियत पर फैसले होतें हैं। जिसके ऊपर
इस सहाफ़ी ने नज़म लिखी है। अगर नियत ग़लीज़ और
गन्दी है तो वोह अच्छे किये हुए काम के भी बुरे नतीजे मिलते हैं। किसी मुल्क की मदद करना किसी ख़ातून को पैसे देना
बुरा अमल नहीं है और ऐसी मदद करने वाले के दरजात बुलंद होतें हैं। लेकिन मुद्दा वही है मदद करते वक़्त तुम्हारी नियत
क्या थी। अगर किसी ख़ातून की मदद करते वक़्त
हरामख़ोरी की नियत थी या उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर उसके जज़बात से खेलने की ग़लीज़ गन्दी
नियत थी तो वोह पैसा सदक़े की शकल में दरजात बुलंद करने के बजाये लानत का बाईस बनेगा
और देने वाले के ऊपर अल्लाह और उसके फरिश्तों की लानत होगी। अब एक जाइज़ काम भी ग़लीज़ नियत की वजह से गंदे नतीजे
देगा।
नाज़रीन
किसी भी इंसान के गंदे और अच्छे अमल का कफ़्फ़ारा वोही अदा करता है और हाकिम के गंदे
और अच्छे अमल का कफ़्फ़ारा पूरा मुल्क अदा करता है।
भारत ने तालिबान को २०० करोड़ की इमदादी रक़म माहे फ़रवरी २०२३ के बजट में जारी
की थी। उस रक़म को पा कर तालिबान ने वज़ीर ए
ख़ज़ाना मोहतरमा रुपया नहीं गिरा बल्कि डॉलर मज़बूत हुआ है को शुक्रिया कहा था।
सवाल
यह उठता है की भारत ने तालिबान को २०० करोड़ रूपये की इतनी बड़ी इमदाद काहे को दी थी। भारत की मोदी सरकार जो अपने ही मुसलमानों के ख़ून
की प्यासी है उस से बग़ैर किसी ग़लीज़ नियत के किसी मुस्लिम मुल्क वोह भी तालिबान जैसे
को इमदाद देने के पीछे की तहक़ीक़ ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम ने निकाली और नतीजे बेहद
चौकाने वाले थे।
भारत
ने तालिबान को मदद सिर्फ पाकिस्तान को घेरने और अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन से दहशत को फ़रोग़
देने दहशत के अड्डे नई फैक्ट्रीज़ की इफ्तेताह करने के लिए दी थी। जिसके बाद पाकिस्तान पर दहशतगर्द हमले काफ़ी बढ़ गए
थे और पाकिस्तान ने तालिबान हुकुमरानों से अफगान ज़मीन को पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल
ना करेने की कई बार गुज़ारिश की गई थी।
नाज़रीन
आपको सोवियत यूनियन याद है जब वोह अफ़ग़ानिस्तान पर क़ाबिज़ था तब अमेरिका ने तालिबान को
फ़रोग़ दी और ग़लीज़ नियत के साथ क़ुव्वत फ़राहम की थी ताके तालिबान रूस को भगा दे और अमेरिका
आलमी क़वी मुल्क बन जाए। किसी हद तक अमेरिका
को कामयाबी मिली और सोवियत यूनियन अफगानिस्तान में ना सिर्फ जंग हारा बल्कि उसके टुकड़े
भी हुए। लेकिन अब तालिबान इतना क़वी हो गया
था की अमेरिका को ही जंग के लिए ललकार दिया।
२० साल की ख़ाना जंगी और बदअमनी के बाद बिल आख़िर अमेरिका को जंग में शाकिस्त
हुई। कियोंके जो अमेरिकी हदफ़ था बर्रे सग़ीर
में उसकी मौजूदगी क़ायम रख चीन, रूस पर अंकुश लगाए रखना वोह हदफ़ को ना पा सका।
नाज़रीन
अब हिंदुस्तान की निस्बत से बात करतें हैं मोदी हुकूमत ने भी वही ग़लीज़ नियत के साथ
काम किया और तालिबान को मदद फ़राहम की। यह जज़बा
अपने हमसाये से हुसने सुलूक का हरगिज़ नहीं था कियोंके अगर मदद फ़राहम करना थी तो पहला
हक़ पाकिस्तान का होता है जो भारत से ज़्यादा क़रीब है लेकिन मोदी हुकूमत की ग़लीज़ और गन्दी नियत तो पाकिस्तान
के ऊपर दहशत फैलाना थी इसीलिए तालिबान को मोहरा बना कर मदद की भीक दे दी। और उसके बाद पाकिस्तान पर ख़ूब दहशतगर्द हमले भी
हुए लेकिन अब नतीजे की बारी है कियोंके ऊपर वाला किसी भी अमल पर उस इंसान या हाकिम
की नियत देखता है जो की दिलों के हाल को भी जानता है।
दूसरी बात ना तो तालिबान कोई भी ऐसा काम करेगा जो इस्लाम की रूह से ख़िलाफ़ ए शरा हो और ना ही अल्लाह किसी भी हाकिम के ग़ैर ज़रूरी अमल से मुत्तासिर होगा। अब यहाँ पर अल्लाह उसकी नियत पर फैसला करेगा। अगर नियत एक हमसाये को मदद की थी तो सबसे ज़्यादा भारत का पड़ोस पाकिस्तान है तो पहला हक़ पाकिस्तान का था ना की अफगानिस्तान का और अगर नियत ग़लीज़ ही थी तो अब अल्लाह की अदालत में भारत का फैसला होगा।
फ़िर इस सहफ़ी की तालिबान के ऊपर लिखी हुई नज़म पर किसी कोई कोई एतेराज़ नहीं होना चाहिए।
सहाफ़ी ज़ुबेर
