नई दिल्ली: यू पी की साधु हुकूमत पर अज़ीम अदालत ने एक मामले में ‘‘अदालत का वक़्त बर्बाद'' करने के जुर्म में उत्तरप्रदेश की ज़ाफ़रानी हुकूमत पर १५ हजार रुपये का जुर्माना लगाया है जिसमें सूबे ने ५०० दिनों की ताख़ीर के बाद अज़ीम अदालत में एक अपील दायर की थी. अपील दायर करने में ताख़ीर पर ग़ौर करते हुए हाकिमे अदालत जस्टिस एके कौल की सदारत वाली बेंच ने कहा कि फाइल किस तरह से आगे बढ़ती है उसकी तारीख तय करने में भी बाहमी ‘‘आदाब'' और इख़्लास नहीं दिखाया गया.
बेंच में हाकिमे अदालत (जस्टिस) दिनेश माहेश्वरी और हाकिमे अदालत (जस्टिस) हृषिकेश राय भी शामिल थे. बेंच ने एकम दिसंबर को जारी हुकुमनामे में कहा, ‘‘ख़ुसूसी इजाज़त की दरख़ास्त" में ५७६ दिनों की ताख़ीर हुई है, (बुज़ूर्ग वकील के मुताबिक ५३५ दिन). बरहाल ताख़ीर तो हुई है। फाइल, कैसे आगे बढ़ती है और उसकी तारीख तय करने में भी बाहमी आदाब और इख़्लास को नहीं दिखाया गया था। शायद, इसलिए हम हिदायत दे रहे हैं कि ताख़ीर के लिए ज़िम्मेदारी तय की जाए और ऐसे अफ़राद से जुर्माना वसूला जाए.''
बेंच में मज़ीद आगे कहा, ‘‘हम ताख़ीर की वजह से ‘‘ख़ुसूसी इजाज़त की दरख़ास्त" ख़ारिज करते हैं लेकिन अदालत का वक़्त ज़ाया करने के लिए दरख़ास्त गुज़ार को १५ हज़ार रुपये का जुर्माना अज़ीम अदालत के एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड के फलाही ख़ाते में जमा कराने के लिए कहते हैं.' मज़ीद कहा कि अज़ीम अदालत में अपील दायर करने में ताख़ीर के ज़िम्मेदार आला ओहदेदारों से जुर्माना वसूला जाए.
अज़ीम अदालत ने अक्टूबर २०१८ में इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच के हुकुमनामे के ख़िलाफ़ सूबे की ज़ाफ़रानी योगी हुकूमत की तरफ से दायर अर्ज़ दाशत (पेटिशन) पर समात कर रहा था. हाई कोर्ट की बेंच ने जनवरी २०१८ में दिए गए वाहिद बेंच ने हुकूमत के फैसले को ख़ारिज कर दिया था. जिसके ख़िलाफ़ सूबे की हुकूमत ने अपील दायर की थी। एकल बेंच ने एक शख़्स की मुलाज़मत या खिदमत बाक़ायदा बातरतीब बहाल करने का मुताल्लिक़ा महकमे को हुकुम दिया था.
सहाफी जुबेर का फैसले पर नुक़्ता ऐ नज़र।
नाज़रीन जो दूसरों के लिए बग़ैर किसी उज्र और ग़ैर ज़रूरी,
धोखे से, साजिश कर के, झूट-फरेब फैला कर ग़ार तय्यार करता है वोह ख़ुद ही उसमे गिरता
है। साधू के लिए अब अलफ़ाज़ हिजड़ा या जनखा दुरुस्त
हो गया उसकी दो वुजूहात बताता हूँ।
१. दूसरों के लिए ग़ार करने वाला साधू ख़ुद उसमे गिर गया। अब इसमें इतनी कूव्वत और हिम्मत नहीं की अज़ीम अदालत के फैसले के ऊपर तब्सिरा कर सके या उसके कुर्की या जुर्माने की अनदेखी कर सके। साबित हुआ तू हिजड़ा है जनखा. यह ज़लालत तो साधू के लिए किसी मुजरिम से कम नहीं है। इसको मुस्लिम अवाम के असासे कुर्क करने का बोहोत शौक़ था। अब ख़ुद की हुकूमत पर जुर्माना लगा है। अगर इस जनखे में ज़र्रा बराबर ग़ैरत और शर्म बाक़ी होगी तो खुदकशी कर लेगा। यूं तो बड़ी बड़ी बातें करता है, अपने आपको बोहोत क़वी और ताक़तवर बताता है लेकिन सही तो यह है की दीगर भारतीय जनखा पार्टी (भाजपा) के मेंबरान की तरह यह भी जनखा है।
२. इस जनखे ने जब हैदराबाद का नाम तब्दील करने की गलीज़ और फ़िर्क़ापरस्त ज़हरीली ज़ेहनियत का मुज़ाहेरा किया था तब २८-२९ नवंबर को अपने एक मज़मून में इसको ललकारा था और कहा था की अगर तू मर्द है तो तेरी पार्टी में शाहनवाज़, मुख़तार, ज़फर जैसे जो मुनाफ़िक़ हैं उनके नाम तब्दील कर और उनकी नस्लों को हिन्दू मज़हब पर चलने की हिदायत दे और ऐसे की नस्लों के नाम तब्दील कर और अगर तू १५ दिनों में तब्दील नहीं कर सका तो तू हिजड़ा साबित होगा जनखा। आज १७ दिन गुज़र गए ना तो शाहनवाज़, ना नक़वी और ना ही ज़फर के नाम तब्दील करने के कोई हूकूमती कागज़ या दस्तावेज़ मीडिया में दिखाए गए। दूसरा अब लंगूर और लँगूरनियों की बारी है जिनकी मियाद कल यानी १५ दिसम्बर को ख़त्म हो रही है। फिर वोह भी हिजड़ा या जनखे साबित होंगे।
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