Friday, 30 August 2019

कश्मीर हिन्दू दहशत के ज़ेरे साये तलाशती ज़िन्दगी.

पडोसी मुल्क़ जम्‍मू-कश्‍मीर जब से हिन्दू दहशतगर्दों की गलीज़ और नज़रे बद की ज़ेरे नज़र हुआ है, अवाम का हर तपका उस हिन्दू दहशतगर्द के ज़ुल्म और शिद्दत से सख़्त तरीन मुत्तासिर हुआ है.  हिन्दू दहशतगर्दों का सरगना जो आज कल दिल्ली में मुक़ीम है और वहीं से अपनी तमाम दहशतगर्दाना अमल को अंजाम दे रहा है.  उसके दहशतगर्द एक-४७ और तमाम आला किस्म के अस्लेह से लेस अवाम और इंसानी हुक़ूक़ की सख़्त तरीन खिलाफ वर्ज़ी करते हुए देखे जा सकतें हैं. 

ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत सहाफत, और दहशतगर्दों की मुआफ़िक मीडिया के बक़ौल कश्मीर में अमन लौट रहा है और ज़िन्दगी पटरी पर लौट रही है आम अवाम बन्दूक की दहशत के साये में खुश है और मिठायाँ तक़सीम कर रह रहा है.  जबकि हालात एक दम उल्टे हैं जैसा की ज़ाफ़रानी सहाफिओं की जानिब से झूट और फरेब फैलाया जा रहा है वैसा तो हरगिज़ नहीं है.  कश्मीर में हिन्दू दहशतगर्दों के काबिज़ होने २५ दिनों बाद भी कोई भी मेहफ़ूज़ नहीं है. ना ही अवाम, दानिशमंद, सियासतदान, सहाफी, हुकूमते कश्मीर में काम करने वाले मुलाज़िम, तालिबे इल्म, उस्ताद यहाँ तक की जर्राह (डॉक्टर्स) जो के इंसानी हुकूक की देख भाल करते हैं और एक बीमार को शिफा देने में मददगार साबित होतें हैं वो भी मेहफ़ूज़ नहीं हैं.

मुल्क़ कश्मीर की दारुल हुकूमत श्रीनगर का 'क़ल्ब' कहे जाने वाले लाल चौक गुजिश्ता पीर को एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला। एक जर्राह  प्‍ले कार्ड लेकर वहां पर बैठे दिखाई दिए। मुक़ामी अवाम को एहसास हुआ की जर्राह (डॉक्टर) उमर शाद सलीम शायद मुज़ाहेरा कर रहे हैं और दहशतगर्दों के सरगना को पैगाम भेजना चाहतें हैं.  लेकिन जब उनकी नजर उनके प्‍लेकार्ड पर गई तो हकीकत कुछ और निकली। डॉक्‍टर सलीम के प्‍लेकॉर्ड पर लिखा था, 'यह खिलाफत नहीं, एहतेजाज नहीं है, यह गुज़ारिश है।'

भारत के पड़ोस में नेपाल की तरह बर्फीली वादिओं में बसा एक छोटा सा पडोसी मुल्क़ कश्मीर दरअसल, आज कल हिन्दू दहशतगर्दों के क़ब्ज़े में आ गया है.  और उनका सरगना अवाम पे सख़्त ज़ुल्म, सितम और केहर बरपा कर रहा है.  अपने अना, ग़ुरूर और गुस्से को ठंडा करने के लिए और सियासी बदला लेने के लिए वो कश्मीर को आतिशे नार कर रहा है.  ठंडी वादिओं को इंसानी लाशों के सबब गर्म और बंदूक की गोलिओं, तोप ख़ानों की आवाज़ से ख़ौफ़ज़दा कर रहा है.  पिछले ४ हफ़्तों से कश्‍मीर में इंटरनेट के काम नहीं करने की वजह से मरीज़ों को मरकज़ी हुकूमत की दूर अंदेशी अवामी सेहत स्कीम का फायदा नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्‍हें काफी परेशानी हो रही है। ऐसे मरीज़ों की आवाज को बुलंद करने के लिए डॉक्‍टर सलीम ने प्‍लेकार्ड लेकर लालचौक पर बैठने का रिस्‍क उठाया। ३८ साला यूरोलॉजिस्‍ट सलीम शहर बंबई के नामचीन जसलोक हॉस्पिटल की मुलाज़मत छोड़कर अपने मुल्क कश्मीर में हुकूमते कश्मीर के ज़ेरे साये बतौर जर्राह (डॉक्‍टर) खिदमत देने आए हैं।

डॉक्टर उमर किसी भी किस्म के एहतेजाज का हिस्सा नहीं थे बल्कि उन्होंने तो दिल्ली में मुक़ीम दहशतगर्द सरगना से गुज़ारिश की थी की कम अज़ कम आप अपनी ही जारिकर्दा स्कीम का तो लेहाज़ कीजिये और मरीज़ों का एहसास कीजिये.  आपके इंटरनेट बंद होने के सबब  'हम आयुष्‍मान भारत कार्ड को स्‍वाइप नहीं कर पा रहे हैं।' उमर के वाल्दैन कैंसर के मरीजों का इलाज करते हैं। वे अपनी ज़ाती क्लिनिक में गरीब ग़ुरबा मरीजों से पैसे नहीं लेते हैं।

दहशतगर्दों की एक आदत आम होती है की वो ऐसे दरवेश और फरिश्ता सिफ़त इंसान को हद दर्जे के अज़ीयत और तकलीफ देतें हैं ताके उस तकलीफ की तपिश और शिद्दत को देख कर आम अवाम ख़ौफ़ज़दा हो जाए, इबरत हासिल करे और हमारी दहशत और शिद्दत के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने की जुर्रत ना करे.   डॉक्टर उमर किसी भी किस्म के एहतेजाज में शामिल नहीं थे बरक्स वो तो गुज़ारिश कर रहे थे की आज आपने कश्मीर में इंटरनेट, फोन और तमाम ज़राये राब्ता मुनक़ता कर रखा है जिसके सबब मरीज़ों को तकलीफ हो रही है.  जब हालात जंग जैसे हैं और तमाम ज़राये राब्ता बंद हैं तो अपनी बात अगर मुक़ीम देश तक पहुचानी है तो कैसे पहुंचाई जाए.   तो उन्होंने लाल चौक पे तख्ती का सहारा लिया ताके बन्दूक धारी दहशतगर्दों की नज़र उनके प्ले कार्ड पे पड़ेगी और सरगना तक बात पहुंच जायेगी.  लेकिन उनको क्या मालूम  था की तमाम ज़ुल्म और ज़ियात्ति हिन्दू दहशत की सिर्फ और सिर्फ कश्मीरी और ख़ास मुसलमान अवाम के लिए है.  एक डॉक्टर जो की सिर्फ भारतीय आतंकिओं ओर उसके सरगना मोदी से गुज़ारिश कर रहा था एक एप्लीकेशन के ज़रिये की आपने जो प्रधान मंत्री योजना के तहत मुफ्त मरीज़ों को सेवा देने का प्रोग्राम शुरू किया है वो इंटरनेट बंद होने की वजह से ठप पड़ा हुआ है. मरीज़ों की तादात बढ़ती जा रही है.  उसको एक-४७ और दिगर बंदूकों की नौक पे अपहरण कर लिया जाता है. 

फिर हिंदुस्तानी दहशतगर्द उस डॉक्टर को जो के सफ़ेद एप्रन में था बन्दूक और एक-४७ से लेस अगवाह कर के एक गाडी में बिठा के लिए जातें हैं. और गाडी के पीछे लिखा होता है लाल चौक पुलिस श्रीनगर. उन दहशतगर्दों को इतना भी खौफ नहीं के हम एक-४७ के ज़ोर पे कैमरे के सामने एक डॉक्टर जो इंसानियत के नाम पे मरीज़ों के लिए गुज़ारिश कर रहा है उसको अगवाह कर रहें हैं बेरुन मुल्क इस तरह की ज़ोर ज़बरदस्ती क्या पैग़ाम देगी.


नाज़रीन आपको डॉक्टर कफील याद होंगे जिन्होंने अपने खर्चे से सूबे उत्तर प्रदेश में हिन्दू दहशतगर्द के साये जब बच्चों की मौत वाक़े हो रही थी तब मदद की थी और उनको भी ऐसे ही ज़लील कर के मुलाज़मत से निकाल दिया गया था.  क्योंकि हिन्दू दहशतगर्द नहीं चाहता था की उसकी हिमाक़त और ग़फ़लत का कफ़्फ़ारा उसको अपनी ओहदे से अलहदगी के रूप में चुकाना  पड़े.  सो उसने अपनी नाकामयाबी का तमाम नज़ला डॉक्टर कफील के ऊपर उतार दिया और उनको नाहेल, निकम्मा, रिश्वतखोरी का झूठा इलज़ाम लगा कर नौकरी से ही मुअत्तिल कर दिया और ६ माह उनको जेल में रहना पड़ा.  वही डॉक्टर कफील हाल ही में जून जुलाई २०१९ को बिहार में वैसी ही बीमारी से बच्चो को अपने खर्चे से बचाते हुए नज़र आये.  और अधमरे बीमार बच्चो को अपने गोद में उठा के उनका इलाज़ करते हुए नज़र आये.  इस तमाम कारे ख़ैर और इंसानीयति इक़दाम में डॉक्टर कफील ने हुकूमते बिहार से किसी भी क़िस्म की ना ही इमदाद ली और ना ही हुकूमत के ज़ेरे इंतज़ाम हॉस्पिटल में गए, बल्कि घास पूस और बांस का घर बना के शहरी आबादी से दूर उन्होंने मरीज़ों का इलाज किया.

नाज़रीन आपको इराक़ का बगदादी याद होगा उसके कारिंदे भी कुछ इसी तरह से अमलपेश होते थे जैसे की सरज़मीने हिन्द पे काबिज़ हिन्दू दहशतगर्द अपने सरगना की अना को कायम रखने के लिए कश्मीरी अवाम के साथ बर्बरियत का मुज़ाहेरा कर रहे हैं.

डॉक्टर सलीम को तो कैमरे के सामने दिन के उजाले में हिन्दू दहशतगर्दों ने अगवाह किया है.  कश्मीर में १० साल से ले कर १८ साल के कमो बेश ५००० से ७००० नौजवानों को रातों की तारीकी १ बजे के बाद उनके वाल्देन के आँखों के सामने एक-४७ और दिगर जानलेवा अस्लेह के साथ हिन्दू दहशतगर्द अगवाह कर के ले जा चुके हैं. इनमे से किसी का भी कोई सुराग़ अभी तक नहीं है.  ज़ाफ़रानी सहाफियों के ज़ेरे क़ौल सब कुछ सही और दुरुस्त है.   कल ही डॉक्टर सलीम को अगवाह  करने के बाद दो ताजिरों को हिन्दू दहशतगर्दों ने ज़बरदस्त गोली बारी की जिसके सबब एक ताजिर जहांबाहक हो गया.

Thursday, 29 August 2019

मोदी की दहशत के खिलाफ एक जुट हो रहा अवाम

ख़ाना जंगी के मरहले में तेज़ी से गामज़न भारत में पहला हिन्दू दहशतगर्द दिफ़ाई फौजों के हाथों मारा गया.  कश्मीर की दिफ़ा के लिए और ३७० मंसूख़ करने के ख़िलाफ़ खुल के मैदान में आये दिफ़ाई फौजी (नक्सलवादी).

इस रूहे ज़मीन का सबसे बड़ा दहशतगर्द, खबीस और शैतानी अमलियात का मरकज़ मोदी और उसके ३६५ शैतानी पार्लिअमान के ख़िलाफ़ अब अवाम की बैचेनी और मुख़ालेफ़त अपने ऊरूज पे जा पहुंची है.   जिस तरह ३६५ बुतों में हर रोज़ का एक अलग बूत था लेकिन दिफ़ाई फौजी फतह हासिल करने में कामयाब हुए.  उसी तरह से इन ३६५ शैताने पार्लिअमान पे एक दिन दिफ़ाई फौजी कामयाब होंगे.

इस ज़िम्न में कश्मीर की दिफ़ा के लिए अगर कोई सबसे पहले आगे आया है तो वो हैं इंसानियत के दोस्त और ना इंसाफ़ी के दुश्मन पहरेदार अमन के फौजी.  छत्तीसगढ़ में कश्मीर मुद्दे पे और दफा ३७० मंसूख करने के सबब सबसे पहला हिन्दू दहशतगर्द अमन के पहरेदारों से जंग करते हुए मारा गया. 
  
इस सहाफी को तो शर्म आती है मुस्लिम अवाम और उनके रहनुमाओं पे चाहे वो सियासी हलक़े में असदुद्दीन, आज़म खान या अकबरदुद्दीन हों या कोई मज़हबी रहनुमा हों उन्होंने अभी तक कश्मीर मुद्दे पे काहे को कोई एहतेजाजी हिकमत इख्तियार नहीं की है, और हुकूमते हिन्द की दहशतगर्दाना रवैये के ख़िलाफ़ अभी तक कोई एहतेजाज क्यों नहीं मुनक़्क़िद किया.  ये सहाफी अभी तक समझने से क़ासिर है की मुस्लिम अवाम में काहे को इतनी बुज़दिली है और वो मोदी की दहशत से इस क़दर ख़ाइफ़ क्यों हैं की हक़ बात कहने से भी ख़ौफ़ज़दा हो रहे हैं.  


असदुद्दीन जैसे सियासतदां कश्मीर को हिन्दुस्तान का लाज़मी हिस्सा तस्सवुर करतें हैं.  और किसी भी सियासी नुक़्ता ऐ नज़र पे पाकिस्तान के खिलाफ ज़बरदस्त एहतेजाज में तमाम मुस्लिम सियसतदाँ और मज़हबी रहनुमा शाना बा शाना रहतें हैं.  ठीक है पाकिस्तान के साथ सियासत में आप हुकूमते हिन्द का साथ दीजिये लेकिन जब मसला काफिर बनाम मोमिन हो जाए तो आपका फर्ज़े ऊला है की आप इस्लाम और मुसलमान की दिफ़ा के लिए खुल के मैदान में आएं.  और ये हिन्दू बनाम मुस्लिम जंग का आगाज़ किसी भी मुस्लिम नुमाइंदे ने नहीं शुरू किया था बल्कि खुद मोदी और उसके दहशतगर्दों ने इस जंग का आगाज़ किया है.  २०१९ के इंतेखाबात को जिस अंदाज़ में हिन्दू धर्म युद्ध का नाम दे कर ज़ाफ़रानी मिडिया के सहाफियों ने शिद्दत पसंदी का मुज़ाहेरा किया था वो किसी भी बाविक़ार, दानिशमंद, तालीमी अफ्ता और ज़हीन सोच से पोशीदा नहीं है, की इस तरह की सियासी शिद्दत पसंदी और सहाफियों की एक तरफा हिमायत और शिद्दत मुल्क को ख़ानाजंगी की तरफ ले जायेगी.     

ये बात इस सहाफी ने २०१४ में ही मोदी की जीत के बाद महसूस की थी और उसने अपने गुजिश्ता तमाम मज़मून में बिला ख़ौफ़ खुले आम इस बात को मन्ज़रे आम किया है की मोदी को सिर्फ मुस्लिम नस्ल कूशी करने के लिए ही लाया गया है.  जिस अंदाज़ में गुजरात में मुस्लिम अवाम को तबाह किया गया था और दुख्तराने  मिल्लत की अस्मत तार तार की गई थी वही सब अब हिन्दुस्तान में होगा. और हुआ वही जो होना था.  अनगिनत दुख्तराने मिल्लत की अस्मत पामाल कर दी गई, बोहोत सी बच्चिओं की झूट फरेब और धोखे बाज़ी से हिन्दुआना रस्मो रिवाज के साथ हिन्दू दहशतगर्दों से शादी करवा दी गई.   इस प्यार के ज़िम्नी और झूठे जाल में फ़साने के लिए पुलिस और हुकूमते हिन्द के कारिंदे, मुलाज़िम हिन्दू दहशतगर्दों को पूरा ताऊन करतें हैं.  ये हिन्दू दहशतगर्द मुस्लिम बच्चिओं की ज़िन्दगी से खेलने के अपने मिशन पे हैं.  हर एक दहशतगर्द को एक मख़सूस टारगेट दिया हुआ है की तुमको इतनी बच्चिओं की ज़िन्दगी बर्बाद करनी है.   

२०१४ से जिस अंदाज़ में मोदी की दहशत ना सिर्फ मुस्लिम अवाम के ऊपर महदूत रही और उनको तबाह कर रही थी बल्कि हर उस इंसान को उस दहशत की तपिश महसूस हो रही थी जो मोदी के ना ज़ेबा, वाहियात, हरामख़ोरी के हुकुम की खिलाफवर्जी करता हुआ देखा गया.  जिसकी वजह से ज़बरदस्त इन्तेशार पैदा होने का खत्शा हर बार इस सहाफी ने ज़ाहिर किया था.  

जिस अंदाज़ में दिफ़ाई फ़ौजिओं ने हिन्दू देशतगर्दों के खिलाफ जंग का एलान किया है हर मुस्लिम को उनका साथ दे कर इस सरज़मीन को हिन्दू दहशत, ज़ुल्म, शिद्दत, ना इंसाफ़ी से पाक करना होगा. हूजूमी दहशत के ज़ेरे साये हर दुसरे रोज़ एक मुस्लिम, दलित की हलाकत भी किसी से पोशीदा नहीं है. हिन्दुस्तान में हर दुसरे रोज़ मुस्लिम अवाम को हुजूमी दहशत के ज़ेरे साये हलाक़ कर दिया जाता है तब भी मुस्लिम रहनुमाओं की ज़ुबानों पे बुज़दिली का ताला देखा जा सकता है.

बरोज़ हफ्ते २८ जुलाई २०१९ को उत्तर प्रदेश के ज़िल्हा अमेठी में हिंदुस्तानी फौज से किनारा कश हुए मुस्लिम फौजी अफसर अमानुल्लाह को हॉकी, लाठी और त्रिशूल से हुजूम ने तशद्दुत के साथ हमला कर के हलाक कर दिया.   उनका नौ उम्र फ़रज़न्द अपने वालिद की दिफ़ा के लिए आया उसको भी शदीद ज़ख़्मी कर दिया गया था. 

इस हूजूमी दहशत के ठीक एक महीने के बाद २६ अगस्त २०१९ को गुजरात के वडोदरा में एक मुस्लिम पुलिस कांस्टेबल आरिफ इस्माइल शेख पे हिन्दू हुजूम ने दहशत मचाई और उनपे हमला कर दिया.  मुस्लिम पुलिस कांस्टेबल  आरिफ इस्माइल शेख वडोदरा रूरल मुख्यालय में तैनात हैं.  जब आरिफ इस्माइल शेख ड्यूटी खत्म करके अपने घर लौट रहे थे, उनकी दाढ़ी और इस्लामिक हुलिया देख कर कुछ हिन्दू शर पसंद अनासिरों ने उनपे हमला कर दिया.   गनीमत ये रहा की ये दहशतगर्द हमला ज़्यादा तबाहकुन साबित नहीं हुआ और एक और मुसलमान की जान का नुकसान होने से बच गया.  अलबत्ता इस हमले के सबब उनको सख्त तरीन ईज़ा पहुंची और वो सख्त ज़ख़्मी हो गए. 

इस सहाफी का मुस्लिम अवाम के लिए खुला एलान हैमत करो भारतीय पुलिस और काफिर सेना की नौकरी. अभी भी वक़्त है जो कुछ भारत में पाया है उसको इस्लाम की दिफ़ा के लिए इस्तेमाल करो. छोड़ दें सभी मुस्लिम फौजी भारतीय फौज और अपने तजुर्बे का इस्तेमाल दिफ़ाई फौज को मदद करने में दें. ये जंग हक़ और बातिल के माबेन है.   १९४७ से तुम लोगों को अलहदा किया जाता रहा लेकिन २०१४ से अब तो आमने सामने की लड़ाई हो रही है. तो तुम काहे को काफिर हुकूमत का साथ देते हो. क्या मिला तुमको ये सब कर के. दो वक़्त की रोटी एक तमंचा और वो वर्दी जो खुद तुम्हारी हिफाज़त नहीं कर सकती.   गुजरात के इस मुस्लिम पुलिस अफसर के ऊपर हुए हमले पे कुछ लोग बोल रहे थे की ये मुद्दा मज़हब से जुड़ा हुआ नहीं है और जब जांच होगी तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. मेरा सिर्फ इतना सवाल है जब एक पुलिस वाला सरकारी अधिकारी ही महफूज़  नहीं है तो अवाम किस के पास अपनी हिफाज़त की गुहार लगाएगी.   हुकूमते हिन्द तो इंसानी लाशों की ज़मींदार ही नहीं है.  कल ही एक मुस्लिम मौलाना और मदरसा उस्ताद को दिल्ली पे मोबाईल की दूकान के बहार पीट पीट के हलाक़ कर दिया गया है. 

पिछले महीने जिस मुस्लिम फौजी कर्नल को पीट पीट के हलाक कर दिया था, उस ख़बरनामे पे कैसे कैसे तास्सुरात और रूझानात रहे थे. "अच्छा किया", "इन कटुओं को जहाँ देखो मार डालो", "ख़तम कर दो इनकी नस्लों को" "फौज में था तो क्या हुआ था तो गद्दार". वग़ैरा वग़ैरा. भारतीय अवाम ख़ास शिद्दत पसंद हिन्दू तो फ़ौजिओं से बोहोत उन्सियत रखतें हैं फिर सिर्फ मुस्लिम होने पे हिन्दू अवाम के तास्सुर कैसे तब्दील हो जातें हैं.  मुसलमानों और मुस्लिम रहनुमाओं (सियासतदानों और मज़हबी) तुम कितनी ही क़ुर्बानी इन काफिरों और उनके मुल्क़ के लिए दो लेकिन जब तुम्हारा वक़्त पड़ेगा तो सब एक हो जायेगे और तुमको तनहे तनहा छोड़ देंगे. तो तुम भी एक हो जाओ और करो खुल के पाकिस्तान की हिमायत

सिर्फ अब तो पाकिस्तान और दिफ़ाई फ़ौजिओं की मदद करना है. पैसे, ज़ेहनी और जिस्मानी. अगर कोई जवान फौजी है तो भारतीय फौज से इस्तीफा दे कर जंग में पाकिस्तान का साथ दे. वैसे भी ज़ाफ़रानी मिडिया ने २०१९ का इंतेखाब मोदी बनाम दुशमन बना दिया था. जबकि मुखालिफ तंज़ीमें भी हिन्दू ही थी. लेकिन उन्होंने मोदी के मुक़ाबले में चुनाव लड़ने की जुर्रत की तो हो गए वो मोदी के दुश्मन.  

तो इस जंग में तुम भी एक हो जाओ और खुल के दिफ़ाई फ़ौजिओं की इमदाद करो.  और इस हिन्दू दहशत के नासूर को और शैतानी मरकज़ को ख़तम कर दो, सफाये हस्ती से मिटा दो, नेस्त नाबूत कर दो.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...