Sunday, 30 January 2022

सहाफी जुबेर यहाँ पर भी साबित हुए दुरुस्त। जम्मू कश्मीर पाकिस्तान का हुआ।


अज़ीज़ नाज़रीन,

अक़वामे मुत्तहदा और उससे मुनसलिक तमाम तंज़ीमे अगर कोई क़रारदार नाफ़िज़ करती हैं तो बोहोत ग़ौर फ़िक्र कर के करती हैं।  और एक बार कोई क़रारदार नाफ़िज़ हो गया तो अब वोह तमाम आलमी बरादरी के लिए एक क़ानून की हैसियत रखता है।  फिर जिस मुल्क ने उस क़रारदार की खिलाफ़वर्ज़ी की तो उसके ऊपर अक़वामे मुत्तहदा फौजी हिकमत कर के उस मुल्क को अपने क़रारदार पर अमल करने पर मजबूर कर देता है।  अक़वामे मुत्तहदा या उसकी किसी भी तंज़ीम में एक बार कोई क़रार नाफ़िज़ हो गया तो अब उसको मन्सूख़ करना इतना आसान नहीं होता है। 

नाज़रीन अक़वामे मुत्तहिदा की आलमी सेहत इदारे ने जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा तस्लीम किया है और अक्साई चिन को चीन का माना है।  अक़वामे मुत्तहिदा की आलमी सेहत इदारे ने अपनी वेबसाइट में ऐसा नक़्शा नाफ़िज़ किया है.     

सहाफ़ी ज़ुबैर के पास तमाम आलम की इत्तेलात पहले आ जाती हैं बाद में उनको अमली जामा पहनाया जाता है।  और हू बहू चीज़ें वैसी ही साबित होती है जैसा की इस सहाफ़ी को इत्तेला या मालूमात मिलती है।  नाज़रीन जिस जम्मू कश्मीर पर भारत आज़ादी के ७० साल से अपना हक़ जताता था और उसके ऊपर मुसल्लद हो रहा था अब वैसा नहीं होगा।  जम्मू कश्मीर पाकिस्तान को सुपुर्द कर दिया गया है और अक्साई चिन चाइना के साथ गया है।   उसका एहलाकारी (ऑफिसियल) एलान जल्द किया जाएगा।  

नाज़रीन २०१७ में अपने वेब पेज  https://autojourna.wordpress.com/  में जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान का बताया गया था. और तब तो बीजेपी और पीडीपी कश्मीर में हुकूमत चला रहे थे और किसी क़िस्म की कोई हलचल नहीं थी. इस सहाफ़ी ने अपने फेसबुक पेज जौर्नालिस्ट जुबेर पर जो नक़्शा लगाया था उसमे भारत के ५ टुकड़े दिखाए गए हैं.   

मज़ीद इस सहाफ़ी ने हिंदुस्तान की निस्बत से भी एक नक़्शा शाया किया हुआ है और अपने मज़मूनों  में इस बात का ज़िक्र भी किया है की भारत महज़ ५ हिस्सों तक महदूत रह जाएगा।  जम्मू कश्मीर में जो भारत की अताह फौज है उसको निकलने के लिए मेहफ़ूज़ रास्ता नहीं मिल रहा है. और कमो बेश ९ लाख से ज़ाइद फौज मौजूद है जिसको अपनी ज़िन्दगी और मौत का ख़ौफ़ सताये हुए है.  जैसा की हर संघी और शिद्दत पसंद हिन्दू पाकिस्तान को १९७१ की याद दिहानी करवा कर और ९३,००० फ़ौजिओं के हथियार डालने की हिकमत पर अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकते थे.  २०१५ से कई तब्सिरों में यह बात कही है की जम्मू कश्मीर में हम हिसाब पूरा कर देंगें।  

नाज़रीन होगा वही जो होना है, चाहे कुछ भी कर लो आएगा तो हक़ ही.   चाहे यह ज़ाफ़रानी जोकर आसमान तक उछल जाएँ या ज़मीन पर टपा टप गिरें होगा वही जो होना है या जो मेरे रब ने हिंदुस्तान की तक़दीर में लिख दिया है. 

Zuber

इल्म के चिराग़ करो रौशन, ज़हानत आएगी तुम्हारे पीछे पीछे।

इल्म के नूर से चश्मे हुए रौशन  

इल्म आया ज़ालिम भागा फ़ौरन।  

ज़ुबैर

अज़ीज़ नाज़रीन,

वैसे तो इल्म की एहमियत पर सहाफी कई मज़मून शाया कर चूका है, ताहम गर दौरे ज़ालिमियत में  मुस्लिम मर्द और दुख्तराने मिल्लत को ज़िंदा रहना है तो इल्म का हासिल करना लाज़िम कर लो। इल्म की ताक़त से अपना हक़ लेने की जद्दो जेहद करने की हिम्मत और क़ुव्वत पैदा होती है।   इल्म की ताक़त से इंसान में नए नए फलसफे, मिंतक़ और गुफ्तगू में उज्जत,  जिरह और बेहेस करने की सलाहियत आती है।  

A curse (Shrap) that will never leave you……any where.

नाज़रीन यहाँ यह सहाफ़ी वाज़े करना चाहता है की इल्म की दौलत से वही शख़्स फ़ैज़याब होता है,  जिसको इल्म लेने की ख़्वाहिश और आरज़ू होती है।  नहीं तो ऐसे भी तालीम साज़ जाहिल भरे पड़े हैं जो होते तो B.Tech, M.Tech (साइंस दान), जर्राह (डॉक्टर), सहाफ़ी, अदलिया में बैठे जज या वकील,  इंजीनीर प्रोफेसर राकेश लेकिन अव्वल नंबर के जाहिल होते हैं। 

नाज़रीन तालीम या इल्म हासिल करने के बाद इंसान में अच्छे और बुरे को समझने की सलाहियत आती है।  अक़ल आती है और उसका दिमाग़ रौशन हो जाता है। 

अब जो लोग हिन्द में बड़ी बड़ी डिग्रीयां B.Tech, M.Tech, सहाफ़ी, ले कर भी एक जाहिल जैसा काम करतें हैं,  एक चौकीदार के नक़्शे क़दम चलते हैं और अपने नाम के आगे फख्र से चौकीदार लिखतें हैं उसपे ग़ुरूर महसूस करतें हैं।  जर्राह (डॉक्टर) एक जानवर का पख़ाना पेशाब खाते पीते हैं और उसके फायदे बतातें हैं, बजाये एलोपेथी से इलाज करने के करोना का इलाज पख़ाने और पेशाब से करने की वकालत करतें हैं।  साइंस दान एक जानवर के पख़ाने को एटम बम की ताक़त वाला बोलतें हैं।   

फिर ऐसे पड़े लिखे जाहिलों के बारे में यही बात कही जा सकती है की इनके पास डिग्री तो आ गयी लेकिन ज़हानत नहीं आई।  और ज़हानत आती है ख़ुद रातों को जाग कर किताबों का मुताला करने से, इल्म हासिल करने से, ना की डिग्री हासिल करने से।  फिर ऐसे डिग्री जीवी तो नक़ल कर के पास हो जातें हैं।  या फिर किसी तंज़ीम के रसूख़ और बड़े ओहदेदार की सिफारिश से डिग्री हासिल कर लेते हैं।  एक बड़े ओहदेदार की सिफारिश डिग्री तो दिलवा सकती है लेकिन ज़हानत नहीं। और कितना ही बड़ा ओहदेदार क्यों ना हो उसके अंदर यह सलाहियत नहीं की एक गधे को आला नसल का जंग में इस्तेमाल होने वाला अरबी घोडा या एक लंगूर-लँगूरनी को आला ज़हन सहाफ़ी बना सके।  अगर आशीष को दे दना दन, सूसू तिहाड़ी, अंजन में लगा कंजन, रूह बिक गई, स्वीटा हो गई साफ़ में सहाफत की ख़ुसूसियात आएगी तो वोह किताबों का मुताला करने से आएगी ना की ज़ाफ़रानी चाटुकारिता से आएगी। 

वही भारत में हो रहा है जो देखने में आ रहा है।  एक १२वी फ़ैल जिस्म की नुमाइश करने वाली नचौड़ी वज़ीर तालीम मुंतख़िब की जाती है।  हो सकता है यह ओहदा देने वाला हम सूबा किसी ज़ामाने में इसके ज़िम्नी जाल में अटक गया होगा।  फिर उसी ग़ैर मुनासिब ग़ैर ज़रूरी वाहियात रिश्ते को ११ साल बाद उस ख़ातून ने भुनाया।  लेकिन अब बहू के वोह लटके झटके वोह नज़ाकत कहाँ बची अब तो गैस सिलंडर को भी झेलना पड़ रहा है। 

नाज़रीन उमूमन यह देखने में आया है की ज़ाफ़रानी ऐ.बी.वी.पी. के गुंडे कॉलेजेस, यूनिवर्सिटीज में तालीम लेने नहीं बल्कि ख़ुराफ़ात और दहशत मचाने जातें हैं।  जब इम्तेहान आतें हैं तो उस्ताद को धौंस, डपट कर के नक़ल कर के पास हो जातें हैं।  जो उस्ताद इनकी धौंस और दहशत में नहीं आया उसका होता है क़त्ल।  उज्जैन के माधव कॉलेज के प्रोफेसर सबरवाल बेहतरीन मिसाल हैं उस क़त्ले आम की जो ऐ.बी.वी.पी. के दहशतगर्दों ने पीट पीट कर कुर्सी से बाँध कर उनको उस हद तक पीटा की उनकी मौत वाक़े हो गयी। 

ऐसे ही यूनिवर्सिटीज में दहशत मचा कर निकले हुए दहशतगर्द बेरूपिये कभी प्रोफेसर राकेश के भेस में कभी डॉक्टर संबित के भेस में और कभी तेजस्वी सूर्या के भेस में ज़ाफ़रानी दहशत के पीछे छुपे हुए वोह काली भेड़ें होतें हैं जिनके पास तालीम की ज़हानत और इल्म के चिराग़ की रौशनी तो होती नहीं बल्कि दहशत की तलवार और क़लम होती है।  जिससे वोह अवाम और समाज को ख़ौफ़ज़दा करते रहतें हैं।  लेकिन जब इनके सामने कोई असल तालीम साज़ या उनके सर का उस्ताद जाता है जो इनकी काली करतूत कॉलेज के ज़माने से जानता है तो भाग खड़े होतें हैं।

FARARI

ऐसे ही भगोड़ों की कुछ सियासी तंज़ीमों ने फौज तैयार कर रखी है जो हर मुद्दे पर या तो झूठी, फरेबी बेहेस करतें हैं, हर मुद्दे पर झूट फैलातें हैं या जंग में अपनी हार देख कर भाग खड़े होते हैं। और ऐसे फरेबी, झूठे और मक्कार भगोड़ों को भगाने वाले कोई और नहीं असली तालीम साज़, हक़ पसंद सियासतदान, दानिश्वर या रूहानी शख़्सियत होती हैं। 

Zuber

Friday, 28 January 2022

ख़ाकी दहशतगर्दों के बाद अब नस्लों की बारी।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हमारी वालेदा एक कहावत कहती थी जैसा करोगे, वैसा भरोगे। ख़ाकी दहशतगर्दों ने ज़ाफ़रानी हुकूमत के ज़हर की खेती के हामी बन कर मुस्लिम अवाम और नौजवानों को शहीद कर दिया अब उसका बदला मालिके कायनात ले रहा है।  चुन चुन के एक एक ज़ालिम को उसकी ही ज़ुबान में जवाब दिया जा रहा है।  

मुद्दा मध्यप्रदेश के इंदौर से है। जहाँ लसूड़ियाँ थाना हलके में काम करने वाला ख़ाकी दहशतगर्द अस.आई. के फ़रज़न्द प्रवीण तोगड़िया ओह्ह्ह सोरी २१ साला  शुक्ल प्रवीण शुक्ल ने खुद को अपने वालिद की सर्विस रिवॉल्वर से कनपट्टी पर रख कर गोली मार ली है और हलाक हो गया।   उस दहशतगर्द के फ़रज़न्द ने तहारतख़ाने में जा कर अपने आपको गोली मारी जहाँ पर शैतानों और ख़बीसों का घर होता है।   

मारा गया दहशतगर्द का फ़रज़न्द बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) फाइनल ईयर का तालिबे इल्म था. लसुड़िया थाना के सरबराह  इंद्रमणि पटेल ने बताया कि प्रवीण फाइनल इयर की इम्तेहान में नकल करते हुए धरा गया था।  इस बात से वोह परेशान था।  नाज़रीन यहाँ यह बात फिर साबित हो गई जो इस सहाफी ने अपने तमाम गुजिश्ता मज़मूनों में लिखी है और तब्सिरों में कही है।  हिन्दू दहशतगर्दों के लड़के पढ़ाई लिखाई तो करते नहीं हैं और नक़ल कर के पास हो जातें हैं।  यही बात यूनिवर्सिटीज में दहशत के किसान और तालिब ऐ.बी.वी.पी. के बारे में कही है।  यह ऐ.बी.वी.पी. के दहशतगर्द कॉलेजेस में सिर्फ और सिर्फ लड़की बाज़ी करने जातें हैं।  कौन हिन्दू लड़की किस से बात कर रही है कौन हिन्दू लड़की किस को अपने नोट्स दे रही है।  इतना ही नहीं फिर अपनी क्लास मेट्स और कॉलेज आने जाने वाले रस्ते, गली नुक्कड़, चौराहों पर खड़े हो कर फ़िक़रे कसना, आते जाते उनके साथ ढिल्लम ठिल्ली करना उनको परेशान करना यह इन हिन्दू दहशत के तालिबे इल्म और यूनिवर्सिटीज में ज़हर की पैदावार करने वाले इन किसानों का एक आम रव्वैया है।

नाज़रीन भोपाल कुछ याद आया, जी याद कीजिये नहीं तो हम याद दिलाएं।  जी हाँ यह वही भोपाल है जहाँ पर ५ मुस्लिम मासूम नौजवानों को सिमी का आतंकी बोल कर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द शिव राज ने पकड़ा था।  फिर जिस रोज़ उनको बैल मिलने वाली थी तब हालात ऐसे किये की उनको शूट कर दिया और बोल दिया जेल तोड़ कर भाग रहे थे पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।   ज़ालिम आतंकी छक्के शिव राज सिंह चौहान उर्फ पृथ्वी राज चौहान तू भूल गया होगा हम हरगिज़ नहीं भूले और बदला लिए बग़ैर ना तो तेरे को छोड़ेगी और ना ही तेरे कारिंदों को छोड़ेगे।  

तेरा हर ज़ुल्म २० साल तक याद रखा जाएगा,

ज़ालिम का जब तक नामों निशाँ नहीं मिट जाता

जंग का नक़्क़ारा बजता रहेगा।

जुबेर   

भाइयों और बहनों उनका गोली मारो नारे का मतलब है

G से जालिम

O से ऑरेंज

L से लाश

I से इनकी  

नाज़रीन वहीँ हिन्दू दहशत की पनाह गाह और खूंखार ज़मीन जहाँ कोई भी इंसान मेहफ़ूज़ नहीं है गुजरात के एहमदबाद में एक २१ साला दहशतगर्द किशन भारवाड़ मारा गया है।  उसको तीन नावाक़िफ़ अफ़राद ने गोली मार के हलाक कर दिया है।  बताया गया है की यह किशन भारवाड़ सोशल मीडिया पर खूब ज़हर की काश्त करता था और नावाक़िफ़ बयानों से सुर्खिओं में बना रहता था।   इसका ताल्लुक़ हिन्दू दहशतगर्द तंज़ीम विहिपी से भी बताया गया है। 

तीसरा वाक़िया भी ज़ाफ़रानी हुकूमत में से है, जहाँ योगी के ज़ेरे क़यादत चलने वाले सूबे उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में एक आला ज़ात हिन्दू कुशल दुबे ने फांसी लगा ली है।   इस हादसे से तमाम अफ़राद सन्न हैं और गाँव में मातम पसरा हुआ है। 

बताया गया है की गाँव के ही तीन अफ़राद भुल्लन, बिट्टी और धुन्नू परिहार मोबाइल पर कुशल दुबे को धमकी देते थे, उसकी बेहेन, दीगर मस्तूरातों के बारे में गन्दी बातें लिखते थे गाली गलौच करते थे।  जिससे आजिज़ आ कर उसने यह क़दम उठाया। 

UP में KABA

Zuber

Wednesday, 26 January 2022

मेरे रब की लाठी बे आवाज़ है, अब पिट गए हिन्दू तुलबा।

अज़ीज़ नाज़रीन,  

जिस बात का ज़िक्र यह सहाफी हर वक़्त मन्ज़रे आम पर करता है फिर वही होता है।   हालात तो वैसे ही हो रहे है जिसको २०१९ में "का" और एन आर सी के वक़्त कही थी अभी इन पुलिस वालों और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम को मुस्लिम दिख रहें हैं लेकिन आगे यह लोग हिन्दू अवाम को भी हलाक करने से गुरेज़ नहीं करेगें।   जो भी इक़्तेदार में बैठे ज़ाफ़रानी हाकिमों से सवाल करेगा या अपना हक़ मागेगा वोह इनका दुश्मन होगा और वही हो रहा है।  

नाज़रीन जामियां मिलिया इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जिन बेगुनाह तालिबे इल्मों पर ख़ाकी दहशत टूटी थी अब वही हालात हिन्दू तालिबे इल्मों के साथ हुए हैं।   अल्लाहाबाद में हॉस्टल के अंदर घूस के पुलिस ने जो दहशत मचाई है वोह देखते ही बनती थी।

पुलिस ने जिस बेदर्दी से मुस्लिम तालिबे इल्मों को सिर्फ और सिर्फ उनके मज़हब और हुकूमत से सवाल करने के जुर्म में मारा था वही रवय्या अल्लाहाबाद में पुलिस का हिन्दू तालिबे इल्मों के ख़िलाफ़ देखने को मिला।  पुलिस के अमल और इन्तेज़ामियाँ का तालिबे इल्मों के ऊपर बेदर्दाना लाठी चार्ज इस बात का सबूत है की हुकूमत में बैठे ज़ाफ़रानी ज़हन ना मज़हब देखते हैं और ना ही अवाम की हक़ की बात सुनते हैं।  जो इन ज़ाफ़रानी हाकिमों के ख़िलाफ़ उठेगा वोह मारा जाएगा।   अभी तो हिन्दू तालिबे इल्मों के ऊपर पुलिस और इन्तेज़ामियाँ का क़ेहर टूटा है, जल्द ही जो बीजेपी, संघ या शिद्दत पसंद हिन्दू होंगे और बिलफार्ज उन्होंने मोदी, योगी, अमित या बीजेपी से हक़ की बात को सुनंने को बोल दिया तो वोह भी हो जाएगा इन हाकिमों का दुश्मन नंबर एक। 

बीजेपी की इस तरह की शिद्दत और दहशत इस बात की तस्दीक़ करती है की जो लोग सोच रहे हैं की अरे बात मुस्लिम अवाम की है हम क्यों बोले तो ऐसा नहीं है

आज हम हैं कल तुम्हारा नंबर भी आएगा।  

यह ज़ालिम का फलसफा है अगर ज़ुल्म

के लिए कोई नहीं मिला तो इनका अपना मारा जाएगा।

जामियां मिलिया इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ख़ाकी दहशतगर्द हमले पर अगर तमाम अवाम एक सुर में बीजेपी के ख़िलाफ़ हो जाता तो तभी हुकूमत गिर जाती।   लेकिन भारत के अवाम को तो खुद ही अपनों को गवाने की आदत है।  अब हालात ऐसे हो गए हैं की हक़ मांगने पर लाठियां पड़ती हैं।  हॉस्पिटल में मरीज़ को दाख़िल करते वक़्त अवाम डरता है कहीं योगी जी नाराज़ ना हो जाएँ।  ऑक्सीजन की सिलेंडर मांगने वाले कई मरीज़ और उनके ेहले खाना या तो अब इस दुनियां में नहीं या तड़प तड़प के जीने को मजबूर हैं। 

किसी को मीडिया से बात करने की इजाज़त नहीं अपने दिल की बात कहने की इजाज़त नहीं सभी जगह पहरा है मानों भारत फिर से ग़ुलाम हो चूका है।  अगर यही हिम्मत और शुजात २०१७ में नहीं २०१८ में नहीं २०१९ में भी नहीं २०२० में दिखाई होती और तमाम भारत का अवाम एक सुर में हुकूमत के ख़िलाफ़ बगावत करता तो हालात इतने पेचीदा नहीं होते।  

Zuber 

Tuesday, 25 January 2022

मुश्क़ से बेहतर पसीना, ख़ुश्बू पसीने की फ़ैल के रहेगी……

नूर से मामूर सीना, मुश्क़ से बेहतर पसीना, देख लें हम सब मदीना …….

अज़ीज़ नाज़रीन,

जिस इस्लाम की ख़ुश्बू को फैलने से रोकने के लिए यहूद और ज़ाफ़रानी नबी सल्लम के उसवाये हसना को झूट और फरेबी हिकमत इख़्तेयार कर के अहले नास के दिलों दिमाग़ में वस्वसा डालतें हैं, लेकिन हर बार अपनी गन्दी सोच भारत और यहूद की सरज़मीन से उठने वाले गलीज़ धुँवे को अल्लाह के फ़रिश्ते वही पर ज़िबह कर डालतें हैं जहाँ से वोह गंदगी उठी थी।    इस्लाम एक इंक़लाब है जो आ कर रहेगा।  सुबह का सूरज अपनी सिम्त बदल सकता है लेकिन हिन्द में और तमाम आलम में इस्लाम का परचम बुलंद होने से शैतान तो क्या दुनियाँ की कोई ताक़त नहीं रोक सकती।  जो होना है वोह तो हो कर रहेगा। 

इस ज़िम्न में इस सहाफी ने अप्रैल २०१९ में उर्दू में “इन्क़लाब ज़िंदाबाद” और “मशाअल्लाह शुरू हो गई इन्क़लाब की जंग” उन्वान से दो नज़में लिखे हैं।   

नाज़रीन इस्लाम और उस पर अमल करने वालों के ख़िलाफ़ चाहे तमाम आलम की ताक़तें बदगुमानी फैलायें, उनके इस्लामिक लिबास, चेहरे और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी का मज़ाक़ बनाएं लेकिन जिस के पास वोह हक़ीक़ी ख़ुश्बू पहुंच गई फिर वोह उसको इख़्तेयार करने से नहीं रुकता।  चाहे तमाम आलम उसके ख़िलाफ़ हो जाए, कियोंके वोह शख्स अब उस मोहब्बत और उस ख़ुश्बू के एहसास को महसूस कर चूका है।   जहाँ एक जानिब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत की तमाम आलम में तनक़ीद करने वालों की कमी नहीं देखी जाती है वहीँ दूसरी जानिब तालिबान के इस्लामी ऊसूल और नबी सल्लम के उस्वाये हसना इन्साफ पसंदी को देखते हुए लोग उस हुकूमत से मुत्तासिर हुए बिना नहीं रह सक रहे हैं।   एक अमेरिकी आला ओहदेदार ने तालिबान से मुतास्सिर हो कर इस्लाम क़ुबुल कर लिया है।  तालिबान हुकूमती ख़बरनामे ने इत्तेला देते हुए बताया की एक अमेरिकी शहरी ने तालिबानी तर्जुमान ज़बीउल्लाह मुजाहिद की मौजूदगी में इस्लाम मज़हब इख़्तेयार कर लिया है।  

उस अमेरिकी शहरी का नाम क़ब्ल अज़ इस्लाम क्रिस्टोफर था, जिनको इस्लाम में आने के बाद मोहम्मद ईसा नाम दिया गया है।  ईसा ने बताया की वोह कई सालों से अफ़ग़ानिस्तान में रह रहें हैं।  और उन्होंने तालिबान को बोहोत नज़दीक से देखा और उनकी अख़लाक़ीयात से मुत्तासिर हो कर इस्लाम मज़हब अपनाया है।  

ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने उनको शहादा पढ़ाया और उनको इस्लाम में दाख़िल किया। एक्सप्रेस ट्रिब्यूनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जब उन्होंने शहादा पड़ा और उनका नाम मुहम्मद ईसा दिया गया तब उनकी चश्मे अश्कों से नम थे और वोह फुट फुट कर अपने गुजिश्ता गुनाहों पर मालिके हक़ीक़ी के सामने रो पड़े।      

नाज़रीन यह पहला वाक़िया नहीं है जब इस्लाम और उस पर अमल करने वालों के किरदार को देख कर उनसे मुनसलिक अवाम दाख़िले इस्लाम हुए।  १५ अगस्त २०२१ को जब अफ़ग़ानिस्तान २० साल की ज़ाफ़रानी दहशत की गुलामी से आज़ाद हुआ था तब एक ब्रतानियाँ की ख़ातून सहाफ़ी की आप बीती भी खूब मीडिया की सुर्खियां बनी थी, और सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी।   उन्होंने अल ऐलानियाँ इस्लाम क़ुबूल किया था और एक सहाफ़ी इजलास में बताया था की उन्होंने तालिबान के मस्तूरातों के साथ हुस्ने सलूक और उनकी इज़्ज़त को देखते हुए इस्लाम क़ुबूल किया है।   

जो एक ग़ैर मेहरम की जानिब पूरी आखों से देखते भी नहीं थे।  में तो उनकी क़ैद में थी जो चाहे कर सकते थे लेकिन में जब तक उसकी क़ैद में रही हर वक़्त ख़ातून ही मेरी किफ़ालत को आती थी कोई मर्द ना आता था।  मेरी इज़्ज़त और जान तालिबान की क़ैद में भी मेहफ़ूज़ रही। 

तो खड़े हो फ़ौरन अदब से उठ के मोहम्मद आये मोहम्मद आये.........

Zuber

Sunday, 23 January 2022

वतन का नाम ग़द्दारों ने फिर किया रौशन।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

जिस हिसाब से संघी दहशत, ज़ाफ़रानी महाज़ के शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी ने वतन भारत का नाम वाहियात, इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी  और हराम ख़ोरी (ज़िना बिल जब्र, गिरहो गर्दाना ज़िना) जैसे अमलों से रोशन किया है उसी ज़िम्न ने स्मगलिंग जैसे अमल भी भारत के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा रसीद करतें हैं।  इन तमाम वाहियात अमलों में ना सिर्फ संघी दहशतगर्द शामिल हैं बल्कि भारत की हुकूमत के वज़ीरों और फौज के सरबराहों के नाम भी आना शुरू हो गए हैं।  वज़ीरे आज़म से ले कर वज़ीरे दाख़ला और फौज के चीफ तक इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी और नस्ल कुशी जैसे आलमी जुर्म में शामिल होने के सबूत मिले हैं। 

अज़ीज़ नाज़रीन इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफ़वर्ज़ी के बाद तमाम जराइमों में स्मगलिंग भारत में होने वाला दूसरा सबसे बड़ा जुर्म है।  इस ज़िम्न में  तिलिंगाना के कस्टम डिपार्टमेंट के आला ओहदेदारों ने हैदराबाद आलमी फ़िज़ाई अड्डे पर दुबाई से लौटे एक शख़्स के पास से २७१५.८०० किलोग्राम सोना ज़प्त किया है।  जिसकी तिजारती क़ीमत १.४० तक़रीबन २00 करोड़ के क़रीब बताई गई है।

ख़बर के हिसाब से २१ जनवरी देर शाम हैदराबाद आलमी फ़िज़ाई अड्डे पर एक शख़्स ने अपने सामान के साथ २ किलो से ज़्यादा सोने की चेन और सोने के पत्ते मेहफ़ूज़ कर के लाया था।  जिसकी भनक कस्टम डिपार्टमेंट को मिली थी, उस शख़्स के सामान की तफ्तीश दौरान यह आशियात बरामद की गयी।  उसके बिल और माक़ूल हिसाब ना दे पाने के सबब उसको हिरासत में ले कर मज़ीद तफ्तीश का आगाज़ कर दिया है।

नाज़रीन वैसे जितने भी ज़ाफ़रानी हैं मोदी के इशारे पर और हूकूमते हिन्द की मिली भगत से सोने की स्मगलिंग अमीर मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान, दुबाई, ओमान और दीगर ख़लीज मुमालिकों से करतें हैं।   दुबाई में भारत का वोह ज़ाफ़रानी कांसुलेट जनरल जिसको लीगल इम्युनिटी हासिल थी और अरबों खरबों रूपये के सोने की तस्करी में शामिल था।  फिर बवगतु रघुराम शेट्टी उर्फ़ बी.आर. उडीपी केसा पकड़ा गया जिसके साथ मोदी के सांठ गाँठ के सबूत आलमी  अदालत और तमाम ख़लीज मुमालिकों को पहले ही इस सहाफ़ी की जानिब से फ़राहम किये जा चुके हैं।  भटकल का नाम सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अक्सरियत की वजह से मुत्तासिब और ज़ाफ़रानी ज़ेहनियत के ख़ाकी दहशतगर्दों ने बदनाम किया था।  अब हिन्दू अक्सरियत उडीपी के बारे में ऐसा क्यों नहीं करते जैसा भटकल के बारे में किया था।  इस  बी.आर. उडीपी ने तो आलमी हल्क़े पर अपनी वालेदा की पूगी बजा दी।  वालेदा मतलब  जी भारत।

हालाते हाजरा पर सहाफ़ी जुबेर का तब्सिरा।      

उस शातिर स्मग्गलर का नाम और ज़ात उसकी शिनाख़्त और किसी ख़ास तंज़ीम या संघ से ताल्लुक़ात को जिस हिसाब से कस्टम ने मेहफ़ूज़ रखा है और ना तो सहाफियों को उसकी मज़ीद जानकारी दी और ना ही अवाम के रू बारू आम किया है; उससे  गुमान यह लगाया जा रहा है की वोह भारत में मौजूद ज़रूर ही किसी ख़ास तंज़ीम और संघ से ताल्लुक़ रखने वाला डाकू होगा। 

नाज़रीन आप लोगों की इत्तेला और जानकारी के लिए बताता चलूँ की हैदराबाद १९९२-९३ तक सख़्त मुत्तासिब और फ़िर्क़ावाराना ज़हर की ख़ेती के सबब तबाह और बर्बाद हो चूका था।  हैदराबाद में आज़ाद भारत का पहला हुकूमती दहशतगर्द वल्लभ पटेल का भारत की क़यादत में भारतीय दहशत फ़ोर्स का हमला भी हुआ था।  पहली दहशतगर्द तंज़ीम संघ का मरकज़ी दफ्तर (हेडक्वार्टर) भी हैदराबाद ही था।  लेकिन फिर दो शेरों ने हैदराबाद को अमन और फलाह के रास्ते पर ले जाने का बीड़ा उठाया। और तमाम ज़हरीले जानवरों को और ख़ेती को तबाह कर दिया।   नाज़रीन आपके इल्म में इज़ाफ़े के लिए बताता चलूँ की जिस तरह आज़ाद भारत के पहले हूकूमती दहशतगर्द वल्लभ पटेल ने हैदराबाद को ज़हरीले ज़ेहनियत के चलते तबाही मचाई थी इन दो शेरों की तबाही से ना तो अवाम मुत्तासिर हुआ और ना ही गंगा जमुनी तहज़ीब और ना ही हैदराबाद की तहज़ीब और तमद्दुन पर कोई आंच आई।   

जो ज़हरीले कीड़े हैदराबाद का नाम तब्दील करने की फ़िराक में थे उनका खुद का नक़्शा तब्दील हो गया।  ख़ुद हैदराबाद के हिन्दू और तमाम अक्सरियत अवाम ने पुर ज़ोर तरीक़े से मुख़ालेफ़त की और उस ज़हर को फिर से हैदराबाद की पुर अमन फ़िज़ा में घुसने की इजाज़त नहीं दी जिस निज़ाम को अल्लाह के वली सिफ़त नुमाइंदों ने हक़ के परचम तले चलाने का बीड़ा उठाया है।

आज की ताज़ा सूरते हाल यह है की तमाम अमन पसंद अवाम इस शहर हैदराबाद में अमन और सुकून से रह रहें हैं।  नहीं तो यह वही हैदराबाद है जो दंगों, फसाद, फ़िरक़ावारना ज़ेहनियत के चलते जहन्नुम से ज़्यादा अज़ीयतनाक हो चला था।  और इस अज़ीयत में ना सिर्फ मुस्लिम अवाम जल रहे थे बल्कि हर वोह शख्स उस शिद्दत और तकलीफ को महसूस कर सकता था जो अमन का हामी और पैरोकार था।  क्योंकि अगर फ़िज़ा शहर या सूबे की खराब होगी तो उसका ख़मयाज़ा सिर्फ और सिर्फ एक जमात को नहीं भोगना पड़ेगा बरक्स उसका कफ़्फ़ारा या पेनल्टी तो मौजूद तमाम अवाम को देना होगा।  जैसा सूबे शुमाल में ज़हर बोया जा रहा है और काम के नाम पर सिफर वैसा ही ज़हर किसी ज़माने में हैदराबाद में बोया जाता था।  वहां पर भी हर मस्जिद को तोड़ कर मंदिर तामीर की बातें की जाती थी लेकिन अवाम के फलाही काम पर जब बात होती तो भाग खड़े होते।  लंगूरों ने वहां पर भी घुसने की कोशिश की लेकिन आज एक लंगूर मौजूद नहीं है सभी को हलाक कर दिया गया।  अब जो बचे हैं तो वोह हक़ पसंद अभिसार, साक्षी, संदीप, रविश या प्रज्ञा जैसे अमन पसंद या हक़ के परचम के अलमबरदार सहाफ़ी हैं।

नाज़रीन मादी आशियात की स्मगलिंग के बारे में तो आप सुन ही चुके होंगे।  गुजरात का वोह ग़द्दार अडानी का बंदरगाह।  फिर कैसे तमाम ज़ाफ़रानी हुकूमत और उसके ग़ुलाम लंगूर लँगूरनियाँ भारत की अज़मत को ताख़ में रख कर खामोश हो गए।  अगर कोई बोला तो वही ग़द्दार सहाफ़ी अभिसार शर्मा, प्रज्ञा मिश्रा, रविश या साक्षी जोशी जैसे ही बोले।  लेकिन वतन के वफादार लंगूर और लँगूरनियाँ बड़े बड़े चिपां ज़ी चिपां Zee तो पूरी तरह खामोश हो गए थे।  और देश के ग़द्दारों को गोली मारो सालों को स्लोगन देने वाले वज़ीर तो ठण्ड में चले गए थे।    

Zuber

Friday, 21 January 2022

बेलौस मोहब्बत,

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज की कहानी का उन्वान अल्लाह की पैदा कर्दा उन तमाम मख़लूक़ से निस्बत रखती है जो किसी भी शै से उन हद तक मोहब्बत करतें हैं की ख़ुद बर्बाद हो जातें हैं उस शै की खुशी के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर डालतें हैं।  फिर भी इस क़ुर्बानी और बर्बादी में भी तस्कीन और इत्मीनान पातें हैं, क्योंकी जिस शै से उनको मोहब्बत थी उनकी बर्बादी और क़ुर्बानी में ही उसकी फलाह उरूज और ख़ुशी पोशीदा थी।  

नाज़रीन आज की कहानी का आग़ाज़ सब्ज़ दरख़्तों से होता है।  जो इंसानी समाज के लिए किसी  अज़ीम नेमत से कम नहीं हैं।  

किसी मुल्क में बेपनाह सब्ज़ दरख़्त और जंगलात का झुरमुठ हुआ करता था।  उस मुल्क की फलाह और ऊरूज का राज़ ही दरख़्त थे।  अवाम ताजिर उन दरख़्तों की ठंडी साया के नीचे बैठ कर आराम करता और सुकून पा कर फिर अपने सफर पर निकल जाता।  अब सब्ज़ दरख़्तों का चर्चा उस मुल्क से निकल कर बेरुन मुल्क पहुंच गयी, तमाम मुमालिक दरख़्तों की बातें करने लगे उनके बारे में क़सीदे कसने लगे उनको मेहफ़ूज़ करने के क़वानीन बनने लगे।  यह सब देख कर कुछ शर पसंद अनासिरों को बोहोत हसद हुई और उन्होंने दरख़तों को बर्बाद करने काटने की मंसूबा बंदी कर डाली।

जब सब्ज़ हरे भरे दरख़्तों को काटा गया तो क़ुदरत का वबाल आया और उस मुल्क में बेपनाह बाढ़ और तूफ़ान जैसी कुदरती आफ़ात आने लगी।  तमाम इंसानी बस्तियां तबाह होने लगी।  अवाम भूख और प्यास की शिद्दत से मारे जाने लगे।  सूरज की तपिश ऐसी की तमाम गुजिश्ता रिकॉर्ड तोड़ डाले।सूरज ढाई नेज़े पर आ पंहुचा और तपिश से इंसानों का बदन झुलसने लगा।  

इस गहमा गहमी में एक फरिश्ता मासूम बच्चा जिसके एहले ख़ाना इस कुदरती वबा और तबाही में फ़ौत हो चुके थे।  गर्मी की शिद्दत से बेहाल साये की तलाश कर रहा था।  तभी उसको एक दरख़्त दिखा और उसने बोला बच्चे मेरी साया में थोड़ी देर बैठ जा और सुकून पा।   

चुनाचे फ़रिश्ते नुमा बच्चे ने ऐसा ही किया और वोह दरख़्त की साया के नीचे सो गया और सुकून पाया।   अब फरिश्ता नुमा बच्चा दरख़्त की ख़िदमत करने लगा जहाँ तक उस दरख़्त की साया थी उस हिस्से को साफ़ किया और उस दरख़्त की जड़ों में पानी डाल कर उसको तक़वियत फ़रहाम की। अब हर रोज़ सुबह बच्चा दरख़्त की साया के नीचे ख़ूब खेल कूद करता और शाम को घर लौट जाता।  एक लगाव एक मोहब्बत सी उस बच्चे को दरख़्त से होने लगी थी।   धीर धीरे बच्चा अपने बचपने को छोड़ कर जवानी की देहलीज पर क़दम रखने लगा। 

एक रोज़ उस नौजवान को भूख लगी और उसने दरख़्त की साया के नीचे बैठ कर बोला मुझे बोहोत भूख लग रही है मेरे पास पैसे भी नहीं हैं की कुछ खा लूँ।  दरख़्त ने अपनी टहनियां नीचे की जानिब झुका कर उस नौजवान से बोला लो मेरे फल खा लो और उनको तोड़ कर बाजार में फ़रोख़्त कर अपनी हाजत पूरी करो। 

चुनाचे उस नौजवान ने ऐसा ही किया और दरख़्त के फल से अपनी भूख मिटाई और सुकून पाया और उनको फ़रोख़्त कर के पैसे कमाए।   मज़ीद नौजवान को जिन्सी ख़्वाहिशात का एहसास होने लगा।  क्योंकि अब मासूम फरिश्ता नुमा बच्चा जवान हो चला था।  वोह दरख़्त की साया के नीचे उदास बैठा था और बोला मेरे को एक ख़ातून से इश्क़ हो गया है।  में उससे शादी करना चाहता हूँ लेकिन मेरे पास घर नहीं है।  दरख़्त ने कहा मेरी टहनियां और तना काट लो और उसका घर बनाओ और अपनी ज़रूरियात पूरी करो।  चुनाचे उस नौजावन ने उस दरख़्त की टहनियां और तना काट डाला और घर बनाया।  अपनी माशूक़ से शादी की बच्चे पैदा हुए।  

अब वोह नौजावन बूढ़ा हो गया था उसके तमाम बच्चे बड़े बड़े ओहदे पर फ़ाइज़ हो कर घर छोड़ कर चले गए थे।  उसकी एहलिया जिसके लिए उसने दरख़्त को काट डाला था वोह फ़ौत हो चुकी थी।  बूढ़ा शख़्स तनहे तनहा रह गया था, मौसम ने भी अपना मिज़ाज बदला और ख़ूब सर्द मौसम आया, सर्द हवा ऐसी की रगो में दौड़ता हुआ खून जमा दे।  बूढ़ा आदमी मायूस हो चूका था वोह अपने तमाम एहले ख़ाना या तो खो चूका था या कुछ उसे छोड़ कर बेहतर मुस्तक़बिल के लिए दूर चले गए थे।  बूढ़ा मायूस सर्द हवा से बचने के लिए उसी जगह पहुंचा जहाँ कभी गर्मियों में दरख़्त की ठंडी हवा उसको सुकून फ़रहाम करती थी।  उसका बचपन, जवानी और तिजारत उस ही दरख़्त के ज़ेरे साये परवान चढ़ी थी। 

लेकिन अब उस जगह दरख़्त नहीं था वोह पहले ही उस नौजावन ने अपना घर बनाने के लिए काट डाला था।  अब वहां दरख़्त के नाम पर महज़ एक ढूंठ ही बचा था।  बूढ़ा आदमी मायूस सर्द हवाओं से परेशान बैठा था की ठूँठ ने कहा ये बूढ़े शख़्स मेरे ठूँठ को तोड़ो आग जलाओ और अपने आपको सर्दी से मेहफ़ूज़ करो।  चुनाचे बूढ़े आदमी ने ऐसा ही किया और आग लगा कर अपनी हाजत पूरी की।

अब दरख़्त का जो आख़िर हिस्सा बचा था उसको भी उस इंसान ने काट डाला और अपनी हाजत पूरी की।   अब वहां ना तो दरख़्त बचा था और ना ही उसका कुछ नामो निशान।   लेकिन जड़ों से फिर एक नई शाख़ नमूदार होती है और फिर से वोह दरख़्त बनता है किसी और इंसान की हाजत रवाई के लिए फिर से नई इबारत लिखता है। 

कहानी का सार इस बात की तस्दीक़ करता है की दरख़्त इंसानी वजूद में कितना अहम किरदार अदा करतें हैं।  और दरख़्त बेलौस मोहब्बत करतें हैं।  अपना सब कुछ इंसान के लिए क़ुर्बान कर के भी उनको किसी से कोई गिला और शिकवा नहीं होता है।  हर इंसान की हाजत के लिए सदा दरख़्त ही काम आतें हैं।   

लेकिन अब यह इंसानों की उस बस्ती को सोचना है अगर दरख़्त ही नहीं होंगे तो उनकी हाजत रवाई कौन करेगा।  दरख़्त इंसान की ज़िन्दगी में अहम किरदार अदा करतें हैं।


सहाफी ज़ुबेर 

Saturday, 8 January 2022

नहेल नक़ल में अक़्ल लगा, मुम्बई लो में आ गया, में ज़िंदा लौट आया।

अज़ीज़ नाज़रीन,

मोदी जी ने नक़ल की लेकिन अक़्ल नहीं लगाई और पाई रूस्वाई।  उसने अक़्ल लगाई दिल की बात जुबां पर आयी हुई इज़्ज़त अफ़ज़ाई। 

मुंबई लो में आ गया।

नाज़रीन हम जैसे फलसफे बाज़ों के नज़दीक अल्फ़ाज़ों की ही तो एहमियत है।   मुंबई लो में आ गया, मतलब फतह हासिल कर के आया।  में ज़िंदा लौट आया।  मतलब मैदाने जंग से फरार हो कर पीठ दिखा कर भाग कर लौट आया।  दोनों में फ़र्क़ है।  एक को आने नहीं दिया जा रहा था लेकिन अवाम लाखों की तादात में सुनने को बेताब थी।  पुलिस के तमाम घेरे को भेदते हुए वोह पंहुचा, दुसरे को अवाम सुनने को नहीं थी तैयार, वोह मरकज़ी तहफ़्फ़ुज़ अमले के साथ हो गया फरार। 

मुंबई लो में आ गया।

अब मरकज़ी नुमाइंदा ठहरा चिन्दी चोर, कुछ इधर से चुराया कुछ उधर से चुराया और बोल दिया ग़ुलाम पालतू ज़ाफ़रानी लँगूरनियों के सामने।  उन्होंने भी खुशी खुशी चला दिया, में ज़िंदा लौट आया।  जहाँ मुँह खोलना था वहां तो ख़ामोशी और चुप्पी इख़्तेयार कर के आ गया और अब अपने मोहल्ले में पहुंच कर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हो।  मालूम है की अब यह मेरा इलाक़ा है कोई कुछ बोल नहीं सकता।  एक कहावत है अपनी गली में तो योगी आदित्यनाथ भी गीदड़ की तरह भोंकने लगता है।  लेकिन असली शेर वोह जो दुश्मन के घर में घुसे और दुश्मन को चीर फाड़ डाले, उसके मेहफ़ूज़ क़िले की दीवारों को तबाह कर दे, उसकी बुनयाद को हिला दे, उसके वजूद के लिए खतरा पैदा कर दे।  उसको उस शेर का ख़ौफ़ पैदा हो जाए।  

नाज़रीन जहाँ जहाँ इस गीदड़ योगी आदित्यनाथ को इन्तेख़ाब के लिए ज़ाफ़रानी तंज़ीम ने भेजा वहां तंज़ीम की कश्ती ग़र्क़ाब कर के आया है।  केरला असेंबली इन्तेख़ाब में बड़ी बड़ी बाते बोल कर आया था एक सीट थी वोह भी गयी।  वही हालात तिलिंगाना असेम्ब्ली इन्तेख़ाब में हुए ज़हरीले बीज  बौने की कोशिश की १ सीट पर महदूत हो गए. उसके बाद हैदराबाद बल्दिया में गया जहाँ जहाँ गीदड़ ने बोला वहां वहां ज़ाफ़रानी तंज़ीम के नुमाइंदे हारे।  और सबसे बड़ी बात असदुद्दीन के जितने भी रकूने बल्दिया थे सभी फतहयाब हुए, पुराने हैदराबाद से एक भी सीट भीक में भी नहीं मिली।  बिहार, वेस्ट बंगाल सभी जगह वही हाल है।  जहाँ जहाँ उस पनोती बाज़ गीदड़ आदित्यनाथ के मनहूस क़दम पड़े की हो गया ज़ाफ़रानी तंज़ीम का सूपड़ा साफ़। 

नाज़रीन यह ज़ाफ़रानी नुमाइंदों की एक ख़ास पहचान है अगर मोदी जी की ख़ाकी चड्डी गलती से वाशिंग मशीन में दुसरे कपड़ों का रंग ले ले तो सभी संघी अपनी तमाम ख़ाकी चड्डियाँ उसी रंग की रंग देंगे उन बेवक़ूफ़ों को इतनी भी तमीज और सोचने की सलाहीयत नहीं की गलती से हो गया होगा।  जब नाम के आगे चौकीदार लगाया तब बड़े बड़े डॉक्टर्स, इंजिनीर्स, सहाफी, बी टेक, ऍम टेक, साइंटिस्ट सभी ने अपने नामों के आगे चौकीदार लगा लिया।  क्या यह पड़े लिखे जाहिल नहीं है।  और क्या इनका अमल जहालत का मुज़ाहेरा नहीं कर रहा है।  अरे सामने वाला तालीमी आफ़ता नहीं है उसने ख़ुद ही २०१३ में एक सहाफ़त इजलास में इस बात का एतेराफ किया है।  फिर वोह काम भी अदना दर्जे का करता रहा है।  लेकिन तुम तो तालीम लिए हो ज़हानत है तुम उसके पीछे पीछे भेड़ बकरियों के जैसे कैसे चल पड़े। 

नाज़रीन अपनी बात एक कहानी से ख़तम करूँगा।  किसी देश में जानवरों का एक अजायबघर था, उसमे क़िस्म क़िस्म के जानवर थे, लेकिन एक ख़ास जानवर चिंपांज़ी (बड़ा बन्दर या लंगूर) जो अवाम की तवज्जो का मरकज़ बना हुआ था उसकी खूब चर्चा थी।  क्योंकि जैसा इंसान करता वैसा ही वोह भी करने लगता।   एक रोज़ योगी आदित्यनाथ भी पंहुचा जानवरों को देखने।  योगी उस चिंपांज़ी को देख का हसा तो चिंपांज़ी भी हसने लगा, रोया तो वोह भी रोने लगा, फिर योगी ने नाक खुजाल दी, यह देख कर चिंपांज़ी आया और योगी के हाथ पैर तोड़ दिए सर फोड़ दिया।   नौबत यह हो गयी की हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा।  तहक़ीक़ात हुई की गलती किस की थी चिंपांज़ी की या योगी की।  अजायबघर वालों ने पुछा ऐसा क्या हुआ जो चिंपांज़ी इतना इश्तेआल हो गया।   योगी बोला मेने बस नाक खुजाल दी, उसपर अफसर बोले लंगूर की ज़ुबान में इसका मतलब होता है, "तेरी माँ…………ले। 

अब योगी ने ठान ली की बदला तो लेना है, वोह जब ठीक हो गया फिर अजायबघर गया और इस बार अपने ज़ाफ़रानी लुंगी में सामने एक गाजर रख कर और जेब में एक चाक़ू रख कर गया।  और फिर वही बन्दर चाले करने का आगाज़ किया कभी उछल कभी कूद कभी अपने को थप्पड़ मारना वैसा ही चिंपांज़ी भी करता रहा।   फिर योगी ने अपनी ज़ाफ़रानी लुंगी उठाई और नीचे की तरफ से सामने गाजर को खड़ी कर के कच कच कच गाजर को काट डाला।  और चाक़ू चिंपांज़ी की जानिब फैक दिया।  चिंपांज़ी ने पहले चाक़ू को देखा फिर योगी को देखा फिर अपने नीचे और अपनी नाक खुजाल दी। 

नाज़रीन बताने का मक़सद यही है की एक लंगूर चिंपांज़ी को मालूम हैं की क्या सही है और क्या ग़लत।  लेकिन इन अक़ल के अंधों को नहीं मालूम अगर इनके सामने मोदी अपनी मसनूई गाजर खच खच खच काट कर चाक़ू भक्तों की जानिब फेंकेगे तो तमाम अपनी असली गाजर को ही काट लेंगें।  किस्सा अल मुक्तसर। 

नक़ल करो लेकिन अक़्ल लगा कर, नहीं तो ज़लालत बनेगा मुक्क़द्दर।

Zuber 

Friday, 7 January 2022

गर मर्द होते, नामर्द तो ललकार क़ुबूल करते। काहे को गुफा पुत्र बनते।

अज़ीज़ नाज़रीन,

दिखा दी ताक़त हिजड़े ग़ायब।  ज़ाफ़रानी संसद में ऐसा क़रारदार पास हुआ था की २० लाख मुसलमानों को काट डालेंगे।  उसके जवाब में आज बरोज़ जुमा बाद नमाज़ जैसा की मौलाना तौक़ीर रज़ा दामत  बर्कातूहू ने वादा किया था की हम मुस्लिम मुल्क की यकजेहदी के लिए खाना जंगी से बचाने के लिए खुद अपनी मर्ज़ी से क़ुर्बान होने को तैयार हैं।  उनके इस एलान पर तमाम मुस्लिम ब्रादरान लब्बेक बोल कर अपने मौलाना के पीछे चल पड़े।   पहला जथ्था खुद क़ुर्बानी देने के लिए इस्लामिया कॉलेज ग्राउंड पर पंहुचा जिसकी तादात कम से कम ५० हज़ार से १ लाख के क़रीब रही होगी।  लेकिन यह क्या क़ातिल ख़ुद ग़ायब हो गया भगवा कसाई योगी जिसको मुस्लिम अवाम के ऊपर बोहोत गोलियां चलाने का शौक़ है वोह हिजड़ा भी किसी मेहफ़ूज़ समझी जाने वाली भोग (गुफा) में जा घुसा।  गुफा पुत्र।  अरे जब ताक़त नहीं हिम्मत नहीं तो काहे को हमारे रस्ते में आते हो।  अब योगी, भोगी और खाकी ख़ौफ़ज़दा होंगे की अगली हिकमत इस हुजूम की क्या होगी।  जिस धर्म संसद में ज़हरीले बोल बोलने पर महज़ ६० - ७० से ज़्यादा हिन्दू नहीं थे वहीँ अपनी जानों की क़ुर्बानी देने के लिए १ लाख के क़रीब मुस्लिम अपने मज़हबी पेशवा और क़ौमी रहबर तौक़ीर रज़ा के बुलाने पर आ पहुंचे।  अब तुम ज़्यादा डिसिपीलीन या हम जिनको तुम पंचर बाज़ बोलते हो।  तुम जैसे तालीमी आफ़ता से तो हम पंचर बाज़ लाख गुना आला हैं जो क़ौम के रहबर और पेशवा के एक बुलावे पर सर कटाने के लिए लाखों जमा हो जातें हैं। 

इन धर्म संसद वालों के मुसलमानों को काटने के बुलावे पर महज़ ५० से ६० लोग जमा हुए तो सोचो अगर मुसलमानों से कटवाने के लिए बुलाया जाता तो कितने आते।  शायद एक भी नहीं आता।  मोदी की पंजाब अवामी जलसा कुर्सीयां थी ७० हज़ार आये ७० भी नहीं।     

यह पहली बार नहीं बल्कि बारहा इन भगवा तंज़ीमों को मुस्लिम अवाम ने ज़ोरदार तमाचा मारा है।  हर बार के जैसे गाल पर चस्पा हो गया है जो सुबह क़यामत तक के लिए तारिख के सफों में दर्ज हो चुका है। 

नाज़रीन हर कट्टरपंथी की यही कहानी है।  बड़ी बड़ी बातें वडा पाव खाते। 

हीरो या विलन; मर्द या नामर्द।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हाल ही में पंजाब में भारत के वज़ीरे आज़म  के साथ  जो कुछ भी हुआ उसको तमाम संघ के नुमाइंदे, शिद्दत पसंद हिन्दू,  बीजेपी और उससे मुनसलिक अवाम विक़ार का मुद्दा बना कर पंजाब के वज़ीरे आला पर तनक़ीद की बौछार करने लगे।   नाज़रीन यहाँ एक बात वाज़े करना चाहता हूँ की इस मुद्दे पर इतना हूँ हल्ला सिर्फ और सिर्फ वज़ीरे आज़म भारत की फरारी इख़्तेयार करने की हिकमत को उजागर करता है। 

अवाम को इस बात पर ग़ौर और फ़िक्र करने की ज़रुरत है, जो शख़्स वज़ीरे आज़म के ओहदे पर फ़ाइज़ है और तमाम तहफ़्फ़ुज़ के इक़दाम किये हुए हैं फिर भी वोह अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो पाया तो क्या ऐसा शख्स अवाम के मक़सद और उनके मसले हल करने में कामयाब होगा।   नाज़रीन इस ज़िम्न में यह सहाफ़ी इस बात को कहने में कोई गुरेज़ नहीं करेगा की अगर मुल्क का कोई वज़ीरे आज़म बनने की सलाहियत और हौसला रखता है तो वोह महज़ तीन जमात के अवाम में से कोई होना चाहिए।   पहला मुसलमान दूसरा सिख और तीसरा क्रिस्टी (ईसाई) जहाँ तक शुजात, ताक़त, हौसला और ज़हानत का सवाल है वोह मुस्लिम अवाम में कूट कूट के भरी है।  सिख अवाम में शुजात, ताक़त और हौसला और ईसाई में हौसला और ज़हानत।  

ईसाई अपनी ज़हानत की वजह से ही तक़रीबन निस्फ़ से भी ज़ाइद दुनियां के ऊपर हुकूमत कर चुके हैं।और आज की तारिख में अगर तमाम आलम में कोई मज़हब पहले नंबर पर है तो वोह है ईसाई मज़हब फिर इस्लाम।   लेकिन भारत के पसमंज़र में यह सहाफ़ी अलहदा ज़ाविये से देखता है भारत में आबादी के तनासुब को भी मद्दे नज़र रखते हुए वज़ीरे आज़म के लिए पहली दूसरी और तीसरी दर्जे बंदी की गई है।  

नाज़रीन आपको यहाँ यह बताना मुनासिब समझता हूँ जो हालात भारत वज़ीरे आज़म के साथ पेश आये वैसे ही हालात सबसे बड़े इस्लामिक मुल्क के सदर जोको वेदादो के साथ पेश आये थे।  सदर जोको जो की एक मुस्लिम हैं, फिर उन्होंने क्या किया देखिये।   जहाँ तक मोदी जी का सवाल है वोह २० मिनिट तक ओवर ब्रिज पर खड़े रहे और हालात को तकते रहे।  फिर जब कुछ ना बन सका तो तमाशा बन गए।  और अपना फरारी का रिकॉर्ड क़ायम रखा।  हर जगह से फ़रार। 

नाज़रीन अब संघी बाल्टी भर भर के कांग्रेस को सिखों को कोस रहें हैं।  दरहक़ीक़त यह संघियों की ग़लती नहीं है बल्कि इनके ख़ून में ही ग़द्दारी भरी हुई है।  और गले लग कर गर्दन काटना इनके ख़ून में शामिल है।  मुगलों से दुश्मनी की वजह हमारे ऊपर ज़ुल्म किये हिन्दू धर्म खतरे में था जब तक मुग़ल थे तब तक।  फिर ईसाई मज़हब से दुश्मनी क्योंकि उन्होंने हमारे ऊपर हुकूमत की और हमारे ऊपर ज़ुल्म किये।   लेकिन यह क्या जिस सिख़ समाज को २०१९ के पहले और २०२० तक हर इंतेखाब में गले लगाते नहीं थकते थे, वही आज इनको गद्दार नज़र आने लगे।  यह वही सिख़ समाज है जिसको ८४ के दंगों का इन्साफ दिलवाने के लिए मोदी से ले कर योगी और संघ से ले कर शाह जी और उनकी सियासी हिकमत पूरी करने वाली फ़िल्मी नचौड़ी बीजेपी एक सूर में बोल पड़ते थे हम इन्साफ दिलवाएंगे।   लेकिन २०२० के बाद ऐसा क्या हुआ की तमाम सिख़ ब्रदर इन संघी को दुश्मन नज़र आने लगे।    

मतलब साफ़ है इन भगवा ज़हर का हमदर्दी का पैमाना भी और प्यार का दिखावा एक छलावा है नाटक है।  इनको उसी समाज से मोहब्बत और हमदर्दी होती है जो इनके सियासी नफे का बाइस बनता है।  जब तक सिख़ इनको वोट दे रहे थे पंजाब में हुकूमत चला रहे थे तब तक सिख़ अच्छे थे जब सीखो ने अपना हक़ माँगा तो उनको गाडी से कुचल डाला।  ८०० के क़रीब किसान शहीद कर दिए गए लेकिन वज़ीरे आज़म ने एक अलफ़ाज़ हमदर्दी का नहीं बोला।  कुछ संघी बोल रहे हैं की मेरे सिख़ बोहोत अच्छे अहबाब हुआ करते थे और उन पर बोहोत भरोसा था लेकिन अब उनको में दुश्मन की फेहरिस्त में रखता हूँ।  मेरा उन जैसे तमाम संघी और भगवा ज़हर से सिर्फ एक ही सवाल है सिद्दू पा जी और वज़ीरे आला चन्नी पर इतना गुस्सा दिखा रहे हो और तमाम सिख़ बरादरी को गद्दार बोल रहे हो फिर कैप्टन अमरेंदर सिंह के क्यों आगे पीछे घूम रहे हो।  क्यों अकाली दल से मोहायदा करने को बक़रार हो।  अगर सिख़ गद्दार हैं उन्होंने मोदी से उनकी औक़ात पूछ ली  तो अकाली और अमरेंद्र  कौन     हैं क्या वोह सिख़ नहीं हैं।  यह अच्छे भगवा और बुरे भगवा क्या है।  सभी भगवा धारी ज़हरीले और गद्दार होते हैं।   दोस्ती के नाम पर जो पीठ में छूरा घोपते हैं।  

नाज़रीन फिर शिव सेना के साथ क्या हुआ, ग़द्दारी किस ने की अच्छे भगवा ने या बुरे भगवा ने।  शिव सेना भी तो कई सालों तक तुम्हारे साथ थी लेकिन आज उद्धव ठाकरे को वही गाली गलोच जो मुस्लिम, क्रिस्टी और सिखों को दी जाती है दी जा रही है।   उद्धव ठाकरे की अहलिया की शान में बदकलामी करने की जुर्म में एक बीजेपी का सियासत दान पकड़ा गया है और पुलिस उसका खूब पिछवाड़ा सुर्ख कर रही है। 

नाज़रीन मसले का लब्बो लुब्बाब यह निकल कर आता है की गद्दार है अगर कोई तो वोह है सिर्फ और सिर्फ संघी, शिद्दत पसंद हिन्दू और बीजेपी वाले अगर इनको वतन अज़ीज़ से बहार कर दिया जाए तो मेरा भारत फिर से महान होगा। 

Zuber 

Sunday, 2 January 2022

धर्म संसद की फ़ज़ीहत ना करते आया ना भागते।

अज़ीज़ नाज़रीन,

शुरू हुई हिन्दू दहशत की फ़ज़ीहत, अब क्या करेगा ज़न्खा समाज यती, वसीम, काली और उनकी बांदी ज़ाफ़रानी ख़ातून, जब मुस्लिम अवाम के दानिशवरों, मौलानाओं की जमात ने खुद एतमादी से क़तल होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है। 

शुरू हो गई आतिश, बैदार हुआ आदिल।   धर्म संसद में जो फैसला हुआ था की हमें ज़्यादा हिन्दू नोजवान नहीं चाहिए सिर्फ १०० गए इस जंग में जो एक एक हिन्दू  २- लाख मुसलमानों का क़त्ले आम करेगा और अज़्म करेगा की हम २० लाख मुस्लिम अवाम का क़त्ल करेंगें और इनकी नस्ल को ख़त्म करेगें तो हमारी जंग कामयाब है।  तभी इनकी नस्ले ख़त्म होंगी।  अब उनके इस धर्म संसद के फैसले पर मुस्लिम अवाम भी बढ़ चढ़ कर लब्बैक बोल कर अपने मज़हबी पेशवाओं की क़यादत में क़त्ल होने को घरों से निकल पड़ें हैं।   हिन्दू दहशत के गंजे नाग ने सर उठाते ही उसके ऊपर ओले पड़ना शुरू हो गए।   इससे क़ब्ल एक और मुस्लिम दानिश्वर और मुफ़्ती साहब ने इस यती के चेलेंज को क़ुबूल करते हुए इसको मुबाहिसे की दवात दी थी, जब इसने रसूले अरबी की शाने अक़दस में ग़ुस्ताख़ी की थी और क़ुरान की अज़मत को ललकारा था।  लेकिन यह भगोड़ा भाग खड़ा हुआ था।  

इस बार बरलवी शरीफ के सज्जादा और जानशीन मौलाना तौक़ीर रज़ा ने इस यती और तमाम हिन्दू दहशतगर्दों,  हुकूमत के नुमाइंदों, पेरा  मिलिटरी फोर्सेज सभी को मदू किया है की आएं और हमारा क़त्ले आम करें।   इस क़त्ले आम का आगाज़ जनवरी बरोज़ जुमा बाद नमाज़ होगा।   जिसमे पहली खेप २० हज़ार मुसलमानों ने अपनी जानों का नज़राना इन ख़ून के प्यासे रावणों को देने का फैसला किया है।  और यह क़त्ले आम यहीं नहीं रुकेगा हर जुमे को यह तादात बढ़ती जाएगी।  जब तक यह शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानी क़तल करते करते थक नहीं जाते और बस नहीं करते मुस्लिम अवाम अपनी जानों का नज़राना पेश करता रहेगा।  अब देखना यही होगा की हिन्दू शिद्दत पसंद क़तल करते करते थक जाते हैं या मुस्लिम अपनी जानों का नज़राना देते देते थक जातें हैं।  जनखा कौन साबित होता है ज़ाफ़रानी या मुसलमानी।   

एक दम सही जा रहें हैं मुस्लिम मौलानाओं की जामात।   दर असल यह क़ुरान की तालीम और नबी सल्लम का दर्स है जिसकी वजह से हर महाज़ पर यह दहशतगर्द ज़लील और रुसवा हो रहें हैं।   जी हां नाज़रीन यह वही क़ुरान है जिसकी अज़मत यती जैसे ज़ालिम कम करतें हैं और यह तालीम उन्ही नबी की है जिनकी शान में ग़ुस्ताख़ी कर के हर शिद्दत पसंद तस्कीन पाता है।  अभी तो बोहोत से मरहलों पर इन शिद्दत पसंद ज़ाफ़रानियों को हार का मुँह देखना पडेगा।   आज १४०० साल बाद उस नबी की तालीम का वोह आलम है की दुश्मन चारों ख़ाने चित हो गया तो सोचों अगर यह शिद्दत पसंद १४०० साल पहले होते और उन नबी का दीदार अपनी आँखों से कर लेते तो उनके होश फ़ाख्ता हो जाते।  आपके अंदर सिफ़त ही इतनी थी आपका जिस्म सर से पैर तक सरापा नूर ही नूर था।  ऐसा गुमान होता था मानों सफेद चादर में लिपटा हुआ कोई नूर हो।   आपके दस्ते मुबारक यदे बैज़ा की चमक को फीका करते हुए।   आपका हर अमल सुबह सादिक़ से ले कर तो ग़ुरूब आफताब तक मोज़ेज़ा था। बोलना, चलना, खाना, मुस्कुराना, अल्लाह से इश्क़, तिजारत, इबादत, अज़वाज से मोहब्बत हर अमल एक मोज़ेज़ा था।

यही अमल सुलह हुदैबिया के दौरान नबी सल्लम ने यहूद मक्का से किया था,  जबकि उस वक़्त मुसलमान काफ़ी अच्छी हैसियत में थे चाहते तो जंग कर सकते थे।  लेकिन बड़ी तादात में ख़ून रेज़ी, इंसानी अमवात और तबाही को रोकने के लिए सुलह हुदैबिया किया गया।   लेकिन आज मक्का का क्या आलम है।   नबी की तालीम पर अमल करते हुए कोई भी शख़्स ख़्वाहा मुस्लिम या ग़ैर मुस्लिम रुसवा या ज़लील हो ही नहीं सकता।  क्योंकि नबी सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं भेजे गए थे बल्कि वह तो आलमे  इंसानियत के लिए तशरीफ़ लाये थे।  और उनको रेहमतुल लील आलामीन बोला गया।  फिर उनकी बताई हुई तालीम पर जो अमल करेगा वोह कैसे रुसवा हो सकता है।  रुसवा और ज़लील दुश्मन ही होगा।      

अब आगाज़ होगा इन धर्म संसादियों के हिम्मत और इम्तेहान का, या तो करो या मरो, तीसरा इख़्तियार (विकल्प) मौजूद ही नहीं है इनके आक़ा के जैसा भागने का फरारी, भगोड़ा।   अगर हिम्मत पस्त हो जाए और हाथ पैर धूजने लगें कांपने लगें तो माफ़ी मांग लेना और तस्लीम करना की तुम लोग निहायत ही कमज़ोर लोग हो जो सिर्फ और सिर्फ विकास पैदा करने के लिए मुस्लिमानों के नाम का सहारा लेते हो।  दर असल तुम लोग तो होहिजड़े”।   

आज के बाद किसी भी मुस्लिम के रास्ते में आने की हिम्मत मत करना।    


Zuber

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