Thursday, 28 February 2019

अब हम भी जंग ही चाहते हैं.

नाज़रीन इस सहाफी ने जब से सहाफत की दुनियां में कदम रखा था वो हर पहलू पे मुज़ाकरात और बात चीत को तरजीह देता रहा है.  और इसका सहाफत में आने का मक़सद भी वही था जो आलूद, ज़हर, गंदगी हिन्दू शिद्दतपसंदों के ज़हन में मुस्लिम अवाम की निस्बत से लंगूर और लँगूरनिओं ने भरी है उसको हकीकत से रू बरू करवाया जाए.  बिल आखिर ये सहाफी अपने मक़सद में काफी हद तक कामयाब हुआ और जो मुस्लिम अवाम कांग्रेसी दौरे हुकूमत में एक दहशतगर्द या आतंकी बोल के बदनाम किये जाते थे और उनकी गिरफ्तारी की जाती थी वो २०१४ के आते आते बिलकुल ख़त्म हो गई थी.  

ये भारीतय अवाम की बदबख्ती और ना अक़्ली है की अपनी की हुई बदकारिओं को पोशीदा रखते हैं और जब उसका माकूल जवाब दिया जाता है तो आलमी बरादरी के सामने आंसू पूछवाने चले जातें हैं और पूरे भारत में ऐसा माहौल तैयार करते हैं जिससे ऐसा महसूस हो की सारी बादकारिया दुसरे फ़रीक़ की हैं और ज़ुल्म भारत के साथ हुआ है.  जबकि ऐसा नहीं है.  अब सिलसिलेवार बातों का तब्सिरा और जायज़ा लेते हैं. 

१९९० से कुछ अर्से क़ब्ल बाबरी मस्जिद का तनाज़ा हिन्दू दहशतगर्दों ने अपनी सियासी हिकमते अमली को पूरा करने के लिए शुरू किया, जिसको हिन्दू शिद्दतपंसदों के ज़रिये मज़ीद हवा दी गई.  मसला इतना पेचीदा हो गया की १९९२ में बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गई.  उसके बाद ना सिर्फ शहीद हुए हज़ारों बे गुनाह मुसलमान बल्कि कई हिन्दू भी इस मुतानाज़े में मारे गए.   जो मसला अब कश्मीर के बाद अगले नासूर की पेशनगोई कर रहा है.  

लेकिन उन हादसात की तपिश भोगी कई मुसलमानों ने जिनकी ना तो कोई ऑफ.आई.आर. दर्ज करने वाला था और ना ही उनको माकूल तिब्बी सहायता फ़राहम की गई.  सरमायाकारों और ताजीरों से इमदाद भी इन लुटे पीटे मुसलमानों को नहीं मिली.  फिर जब इन सब मामलों का जवाब किसी मुजाहिद ने अपने अंदाज़ में दिया.  फिर क्या था तमाम अखबारात और हुकूमते हिन्द के हाशिये पे तमाम मुसलमान आ गए.  मुसलमानों की ज़बरदस्त तरीके से गिरफ्तारियां शुरू हुई.  उस दौर के लंगूरों की तो चांदी हो गई.  अखबारात की मुसलमानों और बॉम्ब ब्लास्ट की निस्बत से जितनी इश्तेआल अंगेज़ी भरी सुर्खिया उतना बड़ा पैकेज.  इन सब वजूहात से मुस्लिम अवाम का तस्सव्वुर भारत में बे हद खारब हुआ. और हर दूसरा मुसलमान हिन्दू अवाम को दहशगर्द ही दिखने लगा.  

लेकिन इस सब गहमा गहमी में ना तो हुकूमते हिन्द को, ना ही लंगूरों को और ना ही शिद्दत पसंद और दहशतगर्द हिन्दुओं को इस बात का एहसास हुआ की जो आग उन्होंने लगाई थी इसकी तपिश और सज़ा उनका खुद का मुल्क भारत भोग रहा है.  मसले की जड़ तक जाने के बजाये और वजह जाने बिना दहशतगर्द हिन्दू अब मुसलमानों को अवामी जगहों और ज़ाराये आमद रफ़्त वाली चीज़ों पे हरासा करने लगे.

अब बारी थी हूकूमते हिन्द की अदलिया की, जिसने अज़्म किया था की मार्च १९९३ के बम ब्लास्ट करने वाले को फ़ासी तो देना है.  लेकिन इस सब गहमा गहमी में वो ये भूल गई की वो ना इन्साफ बन रही है और हद से बढ़ने वालों में उसका नाम दर्ज हो गया जब बाबरी मस्जिद के शहीद करने वाले हिन्दू दहशतगर्द आयेवाने पार्लिमेंट में बैठे हैं और जिन शिव सैनिकों, बजरंगदल, वी ही पि के दहशगर्दों ने दंगा फसाद किया था वो सब बरी हो गए.  और मुसलमान फसादी हो कर सजा के मुस्तहिक़ बन गए. एक मुसलमान को दहशतगर्दी के इलज़ाम में सूली पे लटका दिया.  ये इन्साफ का कौन सा पैमाना है.  पहल किस ने की थी बाबरी मस्जिद को किस ने शहीद किया, भारत को आतिशे नार किस ने किया.  फिर जब इन्साफ करना ही मक़सद था तो दोनों फ़रीक़ों के ऊपर कारवाही काहे को नहीं की गई.

आज के हालाते हाजरा में भी वही झूटी, फरेबी और शिद्दत पसंद ज़ेहनियत नुमाया और काम कर रही है जो २०१४ से पहले कोंग्रेसी हुक्कामों के सर पर मुस्सलद रहती थी.  लेकिन २०१४ के बाद हुकूमते हिन्द की बाग़ डोर नए हाकिम के सम्भालने के बाद मुस्लिम अवाम की हक़ तलफि उनका क़त्ले आम, पोशीदा तरीके से उनकी माशियत को तबाहकुन फैसले खुल के लिए जाने लगे, जिसके पीछे ज़ेहनियत वही शिद्दतपसंदी और आलूद वाली काम कर रही थी.  इस सभी बातों में मसलाये कश्मीर को भी फरामोश नहीं किया जा सकता.  जिस तरह से २०१४ के बाद भारतीय फौज का ज़ब्र, ज़ुल्म, तशद्दुत बे पनाह बढ़ गया था जिसकी वजह से कुछ ना ज़ेबा वाक़ेयात हुए पठानकोट, उरी और अब पुलवामा.  जिसकी तपिश और इलज़ाम तराशी शिद्दत पसंद ज़ेहनियत पाकिस्तान के ऊपर आईद  कर रही है. लेकिन यहाँ पर फिर हुकूमते हिन्द और मौजूदा बादशाह शदीद गफलत का शिकार थे, और मामले को अपने सयासी नफे के लिए या गफलत की वजह से मज़ीद पेचीदा बना कर ज़िम्मेदारी पाकिस्तान के ऊपर लाद दी गई, और हालात जंग जैसे बना दिए गए.  मसला जब कश्मीर से ताल्लुक रखता है तो उसकी ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पे कैसे लादी जा सकती है. अगर पुलवामा हमला हुआ तो वो तास्सुरात है उस ज़ुल्म का जो कश्मीरी अवाम कमो बेश ३० साल से ज़ायद झेल रहा है, आपकी नाहीली का आपके जब्र का आपके तशद्दुत का आपके अना को कायम रखने का.   

अगर आपने मुजाकेरात को आगे बढ़ाया होता कश्मीरी अवाम की हक़तल्फ़ी पे तवज्जो दी होती;  राजा हरी सिंह और भारत के साथ मुहायदे की उस दफा पे अमल किया होता और अपनी फौज को वापिस भारत बुलवाया होता तो हालात इतने पेचीदा ना होते थे.    

फिर भी पकिस्तान की जंग टालने की हर मुमकिन कोशिश ना काम साबित हो गई.  पकिस्तान के वज़ीरे अज़ाम की अमन की आखिर दरख्वास्त और कोशिश को भारीतय मिडिया और अवाम डर और खौफ की वजह बता रहे थे, और तस्सवुरे ख्याली में पाक फौज को मज़ीद धमकी दे कर १९७१ की याद दिहानी करवा रहे थे.  एहमकों की तरह ललकार रहे थे क्योंकि शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम को गुमान हो गया था के उनके पास दुनिया की सबसे ताक़तवर फौज है वो किसी भी हिमाक़त का माकूल जवाब देने में एहल है.   लेकिन वो ये भूल गए थे की जंग का आगाज़ ही तशद्दुत और बे ख्याली में लिए हुए फैसलों के बाद होता है, और हार उसी की जानिब मुतव्वज्जो होती है जो जोश में होश खो देता है. 

जिस पकिस्तान को भारतीय हुक्काम, अवाम, लंगूर और फौजी सरबराह कमतर समझ के तवक़्क़ो कर रहे थे उसने रात की तारीकी में डाकूओं की तरह १३ दिन के मश्क के बाद किये हुए भारतीय हमले का जवाब महज़ एक ही दिन में वो भी दिन के उजाले में डंके की चोट पे दे दिया.   अब किसी किस्म का शक शुबा भारीतय हुक्काम, लंगूर, अवाम और फौजी सरबराहों के दिलों दिमाग में नहीं रहना चाहिए की अगर जंग हुई तो उसकी तपिश आते कई सालों तक देखने को मिलेगी. 

इस सहाफी की हालते हाजरा पे नुक़्ताये नज़र

आज के हालाते हाजरा पे इस सहाफी की नुक़्ताये नज़र एक दाम साफ़ और वाज़े है की इस बार तो जंग हो ही जाना चाहिए.  अभी तक ये सहाफी मुज़ाकरात की वकालत करता था लेकिन मुज़ाकरात, अमन की बात, दानिशमंदी, जंग बंदी की हिकमते अमली को अगर हिन्दू दहशतगर्द खौफ बोल रहे हैं और घबराहट बता रहे हैं, बुज़दिली बोल रहे हैं तो हम जंग की सिफारिश करतें हैं. जिस तरह से हर मसले को पाकिस्तान की जानिब मुतवज्जो कर दिया जाता था और अपनी और अपने दहशतगर्दों की बदकारिओं, बदआमालियों को पोशीदा रखा जाता था जिससे की मज़ीद हिन्दू शिद्दतपंद तंज़ीम को उसका सियासी नफा मिल सके, उसी हिसाब से इस जंग में भी जीत उसी की होगी जो हक़ पे होगा, और जिसने जंग शुरू करने में पहल और हद से ज़्यादा ताजाऊस नहीं की होगी.

सुबाये कश्मीर और पाकिस्तान के अवाम को किसी भी किस्म की घबराहट और बेचैनी में नहीं रहना चाहिए.  वो अल्लाह और उसके फरिश्तों की पनाह में हैं.  फ़िज़ाओं में अल्लाह के फ़रिश्ते परवाज़ कर रहे हैं.  भारतीय फौज के ऊपर एक गलबा तारी होगा और वो जल्द ही उस खौफ और पोशीदा मखलूक से रू बरू होगी जिसके सामने इनकी ताक़त और क़ुव्वत सिर्फ गर्द और गुबार साबित होगी.

Tuesday, 26 February 2019

ख़याली पुलाव का शुक्रिया.

नाज़रीन सहाफी का मज़मून दो हिस्सों में मुश्तमिल है.  पहला हिस्सा आज की हुकूमते हिन्द की कारगरदेगी में मुन्नासिर है, जबकि दूसरा हिस्सा बचपन की एक कदीम कहानी पे मुन्नासिर है.

पहला हिस्सा

आज के दौर के भारत का भी वही हाल है जैसा के बादशाहों के वक़्त होता था.  लंगूरों की टीम का इसतेसाल किया जाता है उनको जेल जाने की धमकी या टैक्स लगा दिया जाता है.  फिर लंगूर भी एक गुलाम की तरह वही करतें हैं जो बादशाह सलामत चाहतें हैं.  जिस तरह आज़ाद कश्मीर पे सर्जिकल स्ट्रीक की कहानी को बे पनाह इश्तेहार दे कर आज के दौर के बादशाह अपना सियासी नफा देख रहें हैं.   लंगूरों के हिसाब से १००० किलो ग्राम विस्फोटक और ३०० बमों की बारिश दहशतगर्दों के अड्डों को तबाह करने के लिए की गई.  इतना विस्फोटक पूरे शहर को नेस्त नाबूत करने के लिए काफी है.  और जब पूरा शहर राख का ढेर बन जाता है तो उसका मलबा हटाने, लाशों को दफ़नाने और मज़ीद कई इक़दाम करने की ज़रुरत होती है.  अब ऐसे हमलों का नशर उस मुल्क का मिडिया बा खूबी करता है.  लेकिन ना तो अभी तक पाकिस्तान के किसी भी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसी एक भी तस्वीर शाया की है.   और ना ही बिलडोज़र से हटाते हुए मलबे की तस्वीरें या वीडियो देखे जा सकतें हैं.  अमेरिका पे ९/११ के हमलो की तस्वीरें आज तक गूगल में मौजूद हैं.

फिर सर्जिकल स्ट्राइक का ये ख्याली पुलाव सिर्फ एक तरफ़ा है, क्योंकि पाक मिल्ट्री सरबराह जनरल मेजर गफूर ने किसी भी ऐसे हमले और इंसानी मौत का इंकार किया है.  दूसरी बात जिस तरह से भारतीय मीडिया मंसूबा बंदी कर रहा है की २१ मिनट से ज़ाइद भारतीय तय्यारे पाकिस्तानी फ़िज़ाओं में घूम रहे थे और बम बारी करते रहे.  इस दौरान ३०० बम गिराए गए जिसमे ३०० अफ़राद जांबाहक हुए.  हसी आती है.  पहली बात २१ मिनट तक पाकिस्तान अपनी फ़िज़ाओं में दुश्मन के तय्यारों को घूमने फिरने देगा और बरियानी खिलायेगा.  क्या शादी में बिन बुलाये मेहमान हैं वो तय्यारे, नहीं वो दुश्मनी निकालने वाले बम बरसाने वाले तय्यारे हैं और उनको फ़ौरन मार गिराया जाता.  

दूसरी बात क्या पाकिस्तान भारत में रहने वाले बेबस मुसलमान की तरह है जिनको ४० - ५० आदमखोर लीचर्स का झुंड जब चाहे लीच कर दें और वो मुसलमान अपना नसीब समझ के मार खाता रहे.  नहीं अगर २१ मिनट तक भारतीय तय्यारे पाकिस्तानी फ़िज़ाओं में रहते तो उसका माकूल जवाब पाकिस्तानी राडार और एंटी मिसाइल सिस्टम देता.  तीसरी बात ३०० बम गिराए और ३०० अफ़राद हलाक हुए, मतलब एक बम पे एक इंसान ये बात भी कुछ हज़म नहीं हो रही है.  अगर एक बम की कुव्वत और ताक़त १० अफ़राद को मारने की है उस हिसाब से ३०० बम कितने अफ़राद मार सकते थे. 

पाक पे हमले का फलसफा सिर्फ और सिर्फ भारत के मिडिया की तरफ से अवाम के दिलों दिमाग का सर्जिकल स्ट्राइक है.  जिसकी ना तो अभी तक भारीतय फौज ने, ना ही वज़ीरे  दाखला और ना ही वज़ीरे खारजा ने ऑफिसियल तस्दीक की है.  दूसरी तरफ ना तो पाक हुकूमत ने और ना ही पाक फौज ने किसी भी ऐसे हमले  की तस्दीक की है बल्कि ऐसे किसी भी हमले का और किसी भी इंसानी हलाकत का इंकार किया है. 

अब आप एक तरफ़ा हमले पे खुशी बनाते रहिये, और दिवाली से बचे हुए पटाखे अब इस्तेमाल कीजिये.  वैसे भी झूटी कारगरदेगी पे आपको अपना नाम करना खूब आता है. मुगलों की बनाई हुई हर इमारत को आप लोग जब अपना नाम देने से नहीं चूकते तो झूठे सर्जिकल स्ट्राइक की बात तो बोहोत छोटी है.    फिर आप लोग तो तारिख तक तब्दील कर देते हो तो झूठा सर्जिकल स्ट्राइक क्या चीज़ है. आप लोगो के हिसाब से मोहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान, अकबर से हल्दी घाटी में राण प्रताप और औरग़ज़ेब से शिवाजी जीता था.  फिर ये आप लोग ही हो जिसमे लंगूरों से ले कर तो बीजेपी के मंत्री तक मुगलों की सभी तामीर करदा इमारतों ताज महल, बाबरी मस्जिद, दिल्ली जामी मस्जिद, चार मीनार, धार जामी मस्जिद और ना जाने कितनी इमारतों पे अपना झूठा हक़ जताते हो.   

मोदी जी ने तमाम मीडिया को या तो जेल जाने की या टैक्स चोरी की धमकी दी होगी, तभी तो सभी मीडिया मोदी के हुकुम के गुलाम बन के झूटी सच्ची बातों में मुश्तमिल हो रहे हैं.  मोदी ने पूरा गेम बोहोत सोच समझ के खेला है. पिछले एक साल से जिस तरह से बीजेपी और मोदी की साख मुतावातिर गिर रही थी उसका ख़मयाज़ा हर हाल में बीजपी को भोगना पड़ता. और इस सहाफी ने पूरे एन.डी.ऐ.  को एक दम दुरुस्त १३० से १५० का फिगर दिया है. उस हिसाब से बीजेपी तो सरकार बनाने में बोहोत दूर है.  फिर क्या था पार्लियामेंट का आखिर इजलास १३ फरवरी को ख़त्म हुआ और १४ को अटैक करवा दिया.  क्योंकि अब कोई और इजलास नहीं होना है तो कानून साज़ मोदी हुकूमत से सवाल जवाब तलब नहीं कर सकते.  फिर अब तो ख़ास इजलास की भी कोई नौइय्यत नहीं है, क्योंकि अब मोदी हुकूमत केयर टेकर वाली हुकूमत की हैसियत से काम कर रही है और इंतेखाबात में सिर्फ २ महीने बचे हैं. 

देखिये किस चालाकी से पूरे अवाम का ज़ेहन ही दूसरी तरफ लगा दिया जिन मुद्दों पे मोदी हुकूमत घिरती नज़र आ रही थी अब उन पे तब्सिरा ही नहीं होता. 

१.     राफेल
२.     मेह्गाई,
३.     अकलियतों के हुकूक
४.     मसलाये कश्मीर
५.     हिन्दू आतंकवाद
६.     राम मंदिर
७.     जमुहरियत का क़त्ल
७.     बेन अक़वामी सतह पे मुल्क की गिरती साख.

पुलवामा अटैक की तपिश से बचने के लिए झूठा सर्जिकल स्ट्राइक करवा दिया.  फिर क्या था मिडिया के लंगूर, भक्त, अंध भक्त, तशद्दुत पसंद हिन्दू अवाम को वतन की मोहब्बत की गाजर लटका के पूरे मुल्क में खुशी का तूफ़ान मचा दिया जिससे के मोदी की साख पहले से और बढ़ जाए, और राये शुमारी को सख्त तरीन मुत्तासिर किया जा सके.  अगर सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था तो पहले की सरकार या राहुल का नाम ले के भक्तों के ज़रिये मुक़ाबला करने की क्या ज़रुरत है. ठीक है वतन के लिए कुछ अच्छा काम हुआ तो उसमे किसी भी सरकार का मुक़ाबला भक्तों के ज़रिये अपने आपसे करने की क्या ज़रुरत है.  आज १९७१ का नाम ले कर कांग्रेस तो किसी भी संघी या मोदी जी से उसका मुक़ाबला नहीं करते है.  मतलब साफ़ है सर्जिकल स्ट्राइक को राहुल बनाम मोदी और कांग्रेस बनाम - बीजेपी बना के २०१९ पे राय शुमारी को सख्त तरीन मुत्तासिर करने की मोहीम है.

इस हमले पे अपने चाहते मोदी साहब के मुवाफ़ेक़त में कसीदे कसने वालों में सिर्फ लंगूर और भक्त ही नहीं हैं ब्लकि अला ओहदेदार मंत्री योगी और अनिल विज़ जैसे लोग भी शामिल हैं.  कोई कह रहा है बदला लेने की कूव्वत तो सिर्फ मोदी जी में ही है. कोई कह रहा है की शेर के बच्चे ने ५६ इंची छाती दिखा दी.  अब ये देखना दिलचस्प होगा की इस ५६ इंची छाती का आशिक भक्तो और लंगूरों के अलावा और कौन होता है या इस ५६ इंची छाती को देख कर लोग डर के दूर भागते हैं.  दूसरी बात इतना बड़ा हमला होने के बाद कोई भी मुल्क जल्दी संभल नहीं पाता है लेकिन ये क्या अभी हमला हुए २० घंटे भी नहीं हुए थे की पाक ने बॉर्डर पे गोली बारी की जिसकी वजह से ३ भारतीय जवान मारे गए और ३ शदीद ज़ख़्मी हो गए. 

दूसरा हिस्सा

एक बार बादशाह अकबर अपने दरबार में मौजूद दरबारिओं के क़ौल फेल का मुताला कर रहे थे.  इतने में कुछ लंगूर और लँगूरनियाँ दरबार में हाज़िर हुए और बादशाह सलामत की शान में कसीदे बाज़ी करने लगे.  एक लँगूरनी ने बादशाह का नाम अपने नाम के आगे लगा कर उनको मुत्तासिर करने लगी.  मज़ीद उसने कहा वो बादशाह की हर ख्वाहिश पूरी करने को तैयार है.  बादशाह ने लंगूरों की टीम से पुछा आप लोगों ने इतना अच्छी कसीदे बाज़ी कहाँ से सीखी.  उसपे लंगूर बादशाह को और उनके महल को मज़ीद इज़्ज़त देने के लिए झूट और फरेब फैलाने लगे और बोले. इज़्ज़त माब हम लोग आपके महल से १० कोस दूर गांव में रहते है लेकिन आपकी महल की जो रौशनी होती है उसमे रात को पढ़ाई लिखाई कर के हम आपके और आपके महल की रौशनी के शुक्रगुज़ार हैं.   उसके ऊपर बादशाह ने उनका इसतेसाल करना शुरू कर दिया और बोला, आपलोगों ने बादशाह के महल की रौशनी इस्तेमाल की है मतलब माले गनीमत इस्तेमाल किया है, अब या तो आप उसका उज्र दीजिये या जेल जाइये.  लंगूरों की टीम परेशान हो गई. बात बीरबल तक पहुंची.  बीरबल ने कहा फ़िक्र मत करो कल जब दरबार लगे तो हम भी मौजूद होंगे, ना आपको उज्र देने की ज़रूरत पड़ेगी और ना है जेल होगी. 

दुसरे रोज़ फिर दरबार सजा कारवाही शुरू होते ही बीरबल बोले बादशाह सलामत दरबार की कारवाही तो होती रहेगी आइये पहले पुलाव खाते हैं.  बादशाह, बीरबल और तमाम दरबारी लंगूरों की टीम के साथ एक खुली जगह पहुंच गए.  अब बीरबल ने एक सबसे ऊंचे दरख्त की टहनी पे एक काठ की हांडी बांध दी और उसके नीचे थोड़ी से आग सुलगा दी.  अब सभी पुलाव तैयार होने का इंतज़ार करने लगे.  कई घंटे बैठे रहने के बाद आखिर बादशाह सलामत से रहा ना गया और बोल उठे.  बीरबल हांड़ी तो इतनी ऊपर है और आग इतने नीचे कैसे पुलाव और कब पकेगा.  बीरबल फ़ौरन बोल उठा.  बादशाह सलामत ठीक उसी तरह इन लंगूरों का गावं भी आपके महल से कोसो दूर है फिर ये कैसे आपके महल की रौशनी इस्तेमाल कर सकतें है और कैसे माले गनीमत इस्तेमाल करने के जुर्म में इनको जेल हो सकती है.

झूठे हुक्मरान (तानाशाह) के रहते मीडिया की झूठन.


आज के नए दौर के भारत में जब सभी चीज़े झूट, फरेब बोल के फैलाई जाती है तो ऐसी ज़ेहनियत से मीडिया का एक ख़ास तपका कैसे अछूता रह सकता है.  ख़ास लांगुरनिओं का वो तपका जो मीडिया मानिंद मंदिर के अंदर देवदासिओं की हैसियत से काम करती हैं.  और महंत के इशारे पे संघ, बीजेपी और दिगर आला ओहदेदारों को ये देवदासियां माकूल खिदमात अंजाम देने को तैयार रहतीं हैं. 

झूट और फरेब का चश्मा पहना के ये आला ओहदेदार और हुकमते हिन्द के मुलाज़िम किस तरह से इन देवदासिओं को झूठा करते हैं, और इनके मान सम्मान को बरहना करते हैं. 

अभी कुछ १५ या २० दिन पहले एक ऐसी ही खबर मीडिया की सुर्खिया बानी थी.  जिसमे एक दहशतगर्द को भारतीय सिक्योरिटी फ़ोर्स ने एक एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था.  ये खबर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में खूब वह वही लूट रही थी. तभी ये खबर मकतूल के पास भी पहुंच गई और वो आ पंहुचा खुदमुख्तार सहाफियों के पास और ना सिर्फ अपने आपको ज़िंदा बताया बल्कि कैमरे के सामने इंटरव्यू भी दिया.  और कहा जिस तरह से मुझको एक दहशतगर्द बोल के मारे जाने की खबर आम कर दी गई है, उससे मुझे अज़हद सदमा और तशवीश हुई है.  मज़ीद उसने कहा ना तो में मरा हूँ और ना ही दहशतगर्दी से मेरा दूर दूर तक ताल्लुक है.  लिंक देखिये.


ये वीडियो पुलवामा हादसे के कुछ ४ रोज़ बाद मिला है.  अब ये तो भारतीय फौज के अराकीन बताये जिसको मारा वो कौन था या फिर वो सहाफी बताये जिन्होंने इस मासूम बन्दे की तस्वीर के साथ खबरनामा शाया किया था.    फिर इस तरह की बेईमानी से ना तो हुकूमत के अला ओहदेदारों पे यकीन रह गया है और ना है फौज पे.

मीडिया तो अपना एतेमाद २०१३ से ही खो चुकी है जब मोदी को वज़ीरे अज़ाम बनाने की खवाहिश लिए मीडिया की लँगूरनियाँ अपने आगे से मोदी का नाम जोड़ने में फख्र महसूस करती थी.

हो गया सर्जिकल स्ट्राइक-२

आज तक के खबरनामे में बड़े बड़े अलफ़ाज़ में ये कहा जा रहा है की हुकूमते हिन्द ने आज़ाद कश्मीर पे शदीद सर्जिकल स्ट्रीक कर दहशतगर्दों के पूरे कैंप तबाह कर दिए और इस हमले में कमो बेश ३०० अफ़राद जाँबाहक हुए.   इस तरह की ख़बरें सिर्फ और सिर्फ भारीतय मीडिया तक ही महदूत हैं और किसी भी बेन अक़वामी सतह पे या अखबारों में ऐसी किसी भी खबर का हवाला नहीं मिलता है, ना ही इस सहाफी के पास ऐसा कोई भी ट्वीट बेन अक़वामी मिडिया से वसूल हुआ है जिसकी बिना पे ये सहाफी अपना मज़मून तैयार कर के नाज़रीन को सच्ची खबर से आगाह कर सके.

जिस तरह से आज तक ने अपने खबरनामे की सुर्खिया दी है "सर्जिकल स्ट्राइक - २"  बिलकुल सही बात है ये सर्जिकल स्ट्राइक-२ ही है. क्योंकि ऐसी किसी भी सर्जिकल स्ट्राइक का ज़िक्र बेन अक़वामी मीडिया में नहीं है. यहाँ तक न्यू यॉर्क टाइम्स या बी बी सी जैसे बोहोत मोतबर अखबारों में ऐसी किसी भी स्ट्राइक का ज़िक्र नहीं है. बी बी सी लंदन से अपने अंग्रेज़ी में शाये होने वाले अखबार के अज़ाफात हैं “भारतीय फ़िज़ाई फौज के तय्यारे को पाक ने भगा दिया”.  मज़ीद तब्सिरा इस सहाफी की खबर Indian aircraft violate LoC, scramble back after PAF’s timely response: ISPR पूरी तरह मुताला कीजिये.   अब ऐसी झूटी सर्जिकल स्ट्राइक की खबरें सिर्फ भारीतय मीडिया तक ही महदूत हैं.   बेन अक़वामी मीडिया में ऐसी कोई खबर नहीं है. और ना ही पाकिस्तान के किसी भी मोतबर अखबार में ऐसी कोई सुर्खियाँ हैं.  जब भारत पे हमला हुआ और ४५ जवान मारे गए तो पूरा मुल्क हिल गया था.  तो क्या पाक में हुकुमाते हिन्द की तरफ से हमला होगा और मीडिया से ले कर पूरे पाकिस्तान में हाई अलर्ट नहीं किया जाएगा. 

दूसरी बात जिन ४५ जवानों की मौत के बाद भारत और पाक के बीच पैदा हुए हालात काफी कशीदा हो गए थे और पूरा बेन अक़वामी अराकीन सख्त फ़िक्र मंद हैं. हर अखबार की सुर्खिया भारत और पाक के बीच पैदा हुई तल्खियों के ऊपर हैं. और इतने बड़े हमले को बेन अक़वामी अराकीन और अखबारात कैसे फरामोश और नज़र अंदाज़ कर सकतें हैं और ऐसी बड़ी खबर को आलमी चबूतरे पे काहे को जगह नहीं मिली.

जैसा की हुकूमते हिन्द का दावा है की पुलवामा में आतंकवादी हमला हुआ तब उसको पूरा आलमी बरादरी और बेन अक़वामी मीडिया ने कवर किया थालेकिन जब किसी मुल्क की हुकूमत की तरफ से उस हमले का जवाब दिया जाता है जिसमे ३०० से ज़्यादा दहशतगर्द मारे जातें है और पूरे दहशतगर्दी तरबियती कैंप नेस्त नाबूत किये जाते हैं तब पूरा अलामी बरादरी और बेन अक़वामी मीडया खामोश क्यों हैजबकि किसी भी मुल्क की हुकूमत की कारगरदेगी को तो पहले पेज पे जगह मिलनी चाहिएवो भी अगर अमल दहशतगर्दों के खिलाफ हो तो हर मीडिया उसको पहली खबर बोल के छापेगा और बड़े बड़े अलफ़ाज़ में छापेगा और उस हुकूमत की हौसला अफ़ज़ाई करेगाबेन अक़वामी मिडिया तो छोड़ दो भारत के अंग्रेज़ी खबरनामों ने उतनी बड़ी हेडलाइंस में ये खबर नहीं छापीजितनी की छापना चाहिए.

तो क्या ये समझा जाए दहशतगर्द हमला किसी भी हुकूमत के हमले से बड़ी फौकियत रखता हैफिर हुकूमते हिन्द के हमले को आलमी बरादरी में जगह नहीं मिली और दहशगर्दाना हमले को मिली मतलब दहशतगर्द आलमी बरादरी के ऊपर अपनी एहमियत रखते हैं.

Saturday, 23 February 2019

भारत खाना जंगी के मोहने पर.


पुलवामा हादसे के बाद जिस तेज़ी से हालात पेचीदा हुए उससे भारत खाना जंगी के मोहने पे कर खड़ा हो गया है.  ऐसे ही हालात तब पैदा हुए थे जब बीजेपी के रकूने पार्लिमानी और दिगर कारकून मुस्लिम अवाम को धमकाते थे की या तो मुसलमान पाकिस्तान चले जाएँ या हिन्दू मज़हब इख्तियार कर के हिन्दू रीती रिवाज के हिसाब से रहे.  ऐसी ही दहशतगर्दाना ज़ेहनियत २०१४ के बाद से मुस्लिम अवाम को मुतवातिर खौफ और डर के माहौल में ज़िंदा रहने में मजबूर कर रही थी.  हमेशा पाकिस्तान के साथ जंग के ऊपर मुसलमानो को हिन्दू मज़हब इख्तियार करने का खौफ दिखाना.  फिर इस मुद्दे पे पहले ही ये सहाफी दो तीन मज़मून से तमाम मुसलमानों को खिताब कर चूका है.  मुसलमानों तुमको वैसे भी मरना है और अगर ज़िंदा रहे तो भारत में तुमको हिन्दू मज़हब इख्तियार करने को मजबूर कर दिया जाएगा, बेहतर है अगर जंग जैसे हालात बनते है तो तुम पाकिस्तान के हक़ में दुआ करो.

अब जब हालात मज़ीद पेचीदा होते चले जा रहे हैं तब मोदी इंतेज़ामिया और खुद मोदी को कश्मीर याद रहा है.  एक जलसे से खिताब करते हुए मोदी जी कहते हैं हमारी लड़ाई कश्मीर के लिए है ना की कश्मिरिओं से है.  ये सहाफी मोदी जी से कहना चाहता है.  मोदी जी कश्मीरी अवाम की बर्बादी के लिये आप ओर सिर्फ आप ज़िम्मेदार हो जब ज़ुल्म हद से ज़्यादा बड जाता है तो इन्तेक़ाम लेने का ना सिर्फ जज़्बा पैदा होता है ब्लकि इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे भी फ़िज़ाओं में बुलंद होते हैं.  आज भारतीय फ़ौज की हिमायत में संघी शायरों से लेकर तो लंगूर सभी खड़े हैं.  अगर कश्मीरी अवाम की हक़तल्फ़ी के खिलाफ लंगूरों की जमात खड़ी रहती और बजाये उनको पत्थर बाज़ बोल के बदनाम करने के हकीकत बयानी की जाती, के किस तरह बे गुनाह कश्मीरी अवाम को फौज मौत के घाट उतारती है.  किस तरह फौज अवाम पे ज़ुल्म और तशद्दुत करती है.  मासूम कश्मीरी बच्चिओं और मस्तुरात की अस्मतदरी करती है. तो हालात कुछ और होते.  

मेजर गोगोई शायद आप भूल गए होंगे मोदी जी पर हम नहीं भूले. उस ना मुराद ने एक ऐसे कश्मीरी नौजवान को अपने और अपने साथिओं के तहफ़्फ़ुज़ के लिए अपनी जीप से बाँधा था जो सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान के जमुहरियत और राये शुमारी के अमल पे कामिल यकीन रखता था.  जिसका निस्फ़ खानदान या तो हुकूमत के इदारों में काम पे है या फौज में हैं. एक नहीं फौज के ऐसे हज़ारों हमले मासूम कश्मिरिओं पे ही होते है. जिसके ऊपर इस सहाफी ने कई मज़मून वीडियो के साथ शाये किये हैं.  किस तरह से नमाज़ पे जाते हुए एक रोज़ेदार को बंदूकों से लेस आर्मी जवानो ने पकड़ लिया और लातों घूसों और डंडों से मारा गया जब उसने कहा में रोज़े से हूँ मुझे काहे को मार रहे हो तो फौज का जवान कहता है काहे को रखा रोज़ा हम से पुछा था बोल कल से रखेगा रोज़ा. फिर अपने जूतों के पास उससे नाक रगड़वाई और उस फौजी ने अपने आपको उस युवक से सजदा करवाया. 

आपकी फौज के ज़ुल्म और सितम ने कश्मीरी अवाम को इतना मजबूर कर दिया की उन बेबस और मजबूर नौजवानों ने अपने दिफ़ा के लिए हथियार उठा लिए. और जब कश्मीर का अवाम हर रोज़ के ज़ुल्म, टॉर्चर अपनी बेहेन बेटिओं की अस्मत के बचाव के लिए हथियार उठाता है तो आप उनको दहशतगर्द बोलते हो.  क्या उनके सामने और कोई रास्ता था, बात चीत तो आप करना नहीं चाहते थे ना ही हुर्रियत से और ना ही पकिस्तान से. तब रोज़ रोज़ के मरने के बजाये अपनी ज़िंदेगी ही दाव पे लगा दी उन लोगो  ने.  आपकी दोगली हिकमते अमली ओर अपने अना को कायम रखने की हिटलर ज़ेहनियत आज के कश्मीर के बर्बादी के ज़िम्मेदार है. नही तो हालत इतने पेचीदा कभी नही थे.  कांग्रेस के वक़्त भी कश्मीरी अवाम को भारतीय फ़ौज के ज़ुल्म, तशद्दुत और दहशत को देखने का एहसास होता था लेकिन आपने तो हद कर दी. और अब घड़याली आंसू बहा रहे हो.

नए दौर के आज के भारत में आपके ज़ुल्म से ना सिर्फ कश्मीरी अवाम बल्कि मुस्लिम अवाम भी ज़बरदस्त तरीके से मुत्तासिर हुआ है.  हर संघी और आदमखोर अवाम को आंसू की एक एक बूंद का जवाब देना होगा.  १९९२ से ले कर २०१६ तक कभी भी इस सहाफी ने आज़ादी की मांग नहीं की लेकिन जब हर दुसरे रोज़ गौ आतंकी किसी ना किसी मुस्लिम को मार डालते थे फिर भी आपकी हुकूमत खामोश रही और आज झूठी मोहब्बत दिखाने चले आये हम सब एक है.  अब इन संघी समाज को और हुकूमते हिन्द को भी मुस्लिम समाज की ज़रुरत पड़ने लगी . तब इनका प्रेम कहाँ चला गया था जब गो आतंकिओं की गुल पोशी की गई थी. तब इनकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब मुस्लिम समाज की माशियत को तबाह करने और साजिशन कानून सदनों में बनाये गए थे. तब आपकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब मुसलमानों को बर्बाद करने के कानून बीजेपी और संघी संसद, विधान सभाओं और म्युनिसिपल्टी में बना रहे थे.  तब इनकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब गैर ज़रूरी वजह से नेशनल सेफ्टी एक्ट में सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था. उत्तर प्रदेश में १६३ और हाल ही में अलीगढ़ तनाज़या के बाद विद्यापीढ़ के दहशतगर्दों को छोड़ दिया और नेशनल सेफ्टी एक्ट में ओवेसी मुवाफिक तुलबाओं  पे कारवाही की.  क्या ये ज़ुल्म नहीं है और अब हमारा साथ मांग रहे हो.   अगर जंग होती है तो इस सहाफी की तमाम दुआएं पकिस्तान के लिए होंगी.  खुली बात है.  ज़ालिम को मुसलमानों पे किये हुए अपने हर ज़ुल्म का हिसाब देना होगा.  आपके ज़ुल्म से हुए मुसलमानों के यतीम बच्चों, उनकी बेवाओं और वाल्दैन के हर आंसू का हिसाब, हर खून की एक एक बूंद का हिसाब.

आज मुसलमानों को शायरों की महफ़िल में बुला के उसन से शफक़त और मोहब्बत दिखाई जा रही है. हम सब एक हैं, शेर बोले जा रहे हैं हिन्दू मुस्लिम ज़िंदाबाद, दहशर्तगर्दी मुर्दाबाद.  लेकिन क्या किसी शायर ने ऐसी ही अशआर और अलफ़ाज़ मुस्लिम अवाम की हलाक़त के वक़्त बोले थे.  इतना ही नहीं जब नसीर और आमिर जैसे अवामी शख्सियत ने मुस्लिम समाज और इंसानियत के दुश्मनों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की तो उसको इन्ही इन्तहा पसंदों ने पूरी शिद्दत से खामोश कर डाला, आज जो लंगूर मुस्लिम अवाम को साथ लेने की बात कर रहे हैं उन्ही लंगूरों ने ऐसी अवामी शक्सियात के बयानात पे सख्त अलफ़ाज़ में मज़मत और तनक़ीद की थी.   आज उन सभी लोगो को मुसलमान अज़ीज़ और प्यारे हो गए.  दिसम्बर २०१८ के आखिर तक मुस्लिम अवाम की पीट पीट हलाकत हुई है और उसपे जो संघी मकतूल और उसके मज़हब के ऊपर तनक़ीद करते थे आज वही संघियों को मुसलमान प्यारे दिखने लगे. 

अगर भारत खाना जंगी की तरफ जाता है तो चला जाए लेकिन मुस्लिम अवाम को ज़ालिम का साथ हरगिज़ नहीं देना चाहिए.  मोदी को वज़ीरे अज़ाम संघी और तशद्दुत पसंद हिन्दू ज़ेहनियत ने बनाया ही मुस्लिम नस्ल कुशी करने के लिए था.  वतन की मोहब्बत में अंधे हो कर ज़ालिम के ज़ुल्म का हामी हरगिज़ ना बने.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...