Wednesday, 28 February 2018

आतंकी का सरेंडर.


५ दिनों से ज़्यादा की लुका छुपी के बाद आखिरकार बिहार के मुजफ्फरपुर सड़क हादसे का मुख्य आतंकी मनोज बैठा ने सरेंडर कर दिया. इस हादसे में नौ स्कूली बच्चों की मौत हुई थी.

हालांकि नितीश कुमार की सरकारी यंत्रणा उस आतंकी को पूरा सपोर्ट कर रही है और सरेंडर करने के बाद मनोज बैठा को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा क्योंकि इस हिट एंड रन मामले में मनोज के भी घायल होने की खबर मिली थी. इलाज के लिए पहले मनोज बैठा को श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, लेकिन बाद में मनोज को पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) में शिफ्ट किया गया.

यहाँ पे सवाल बड़ा यही है उसको भी अगर चोट लगी थी तो इतने दिनों तक किधर भटक रहा था. उसको हॉस्पिटल में ही होना चाहिए था. एक दम बकवास है सिर्फ पुलिस रिमांड और जेल से बचने के लिए हॉस्पिटल का बहाना ले रहा है ये मासूम बच्चो का कातिल आतंकवादी.  पुलिस के पास सर्रेंडर करने के बाद हॉस्पिटल में इसलिए भर्ती हो गया के रिमांड और जेल से बच जाऊँगा. सिर्फ और सिर्फ नाटक है और इसमें नितीश की आतंकवादीओ के लिए भक्ति शामिल है जो मासूमो की जान से ज़्यादा आतंकवादी को बचाने में लगा है.  जो मासूम इस आतंकी हमले में शहीद हुए वो सभी भारत का भविष्य थे क्या पता उनमे से कोई अब्दुल कलाम बन के निकलता या लाल बहादुर शास्त्री या सुशिल कुमार शिंदे या फिर रामनाथ कोविद. क्योके जो बच्चे सरकारी स्कूलों में पड़ते है और गरीबी में जीते है वो ही देश का नाम रोशन करते है. अमीरी में जीने वाले तो ललित मोदी, मालिया और नीरव मोदी बनते है वो देश का नाम सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशो तक में रोशन करते है और कमा कुठा के विदेशो के भ्रमण पे निकल जाते है. ऐसे लोगो को तो फ़ासी देना चाहिए और जो राजनेता ऐसे आतंकवादीओ को बचाने की कवायत करे उसको भी फ़ासी देनी चाहिए.

ये है पूरा मामला

शनिवार को सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर के बीच एनएच 77 पर भीषण सड़क दुर्घटना हुई थी. इसमें 9 बच्चों की घटना स्थल पर ही मौत हो गई. बीजेपी नेता मनोज बैठा अपनी बोलेरो गाड़ी से सीतामढ़ी से मुजफ्फरपुर आ रहे थे. इस दौरान मुजफ्फरपुर के मीनापुर थाना क्षेत्र के धरमपुर गांव में उनकी गाड़ी ने पहले एक महिला और पुरुष को टक्कर मारी, फिर भागने के चक्कर में सड़क किनारे खड़े बच्चों को कुचल दिया. ये बच्चे अपने स्कूल से घर लौट रहे थे.

हादसे में 9 बच्चों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी. गाड़ी खुद मनोज बैठा चला रहा था. आजतक ने सीसीटीवी फुटेज भी सबसे पहले दिखाया था, जिसमें वो अपने गाड़ी चलाते हुऐ रुन्नीसैदपुर टोल प्लाजा क्रॉस कर रहा था.

ये पत्रकार केंद्र सरकार से निवेदन करता है के मासूम बच्चो के हत्यारे उस आतंकवादी के लिए सजाये मौत की सिफारिश करे. और अगर नितिन याहू की भक्ति इस आतंकवादी और सजा के बीच में आती है तो उसको भी सजा दी जाए.



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Terrorist surrendered
 

जुमे की नमाज़ आगे बढ़ाने की अपील

रंगों का त्योहार होली इस बार २ मार्च को मनाया जाएगा. इस दिन जुमा है और देशभर के मुसलमान विशेष नमाज अदा करते हैं. ऐसे में होली और नमाज सही तरीके से समापन हो जाए, इसके लिए लखनऊ के एक मौलाना ने बड़ी पहल की है.

लखनऊ के सबसे बड़े सुन्नी मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगी ने हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की है. उन्होंने होली के त्योहार को देखते हुए मुसलमानों से जुमे की नमाज का वक्त आगे बढ़ाने की अपील की है. ऐसा पहली बार होगा जब जुमे की नमाज का वक्त आगे बढ़ाया जाएगा ताकि होली खेलने वाले होली खेल सकें और उसके बाद जुमे की नमाज अदा की जाए.

इस संबंध में उनकी तरफ से एक लेटर जारी किया गया है. मौलाना ख़ालिद राशीद फिरंगी ने कहा है कि 2 मार्च को देशभर में होली मनाई जाएगी. इसी दिन जुमा है और पूरे देश में मुस्लिम जुमे की नमाज अदा करेंगे. उन्होंने कहा कि ये दोनों चीजें एक दिन होंगी, ऐसे में मुसलमानों को सुझाव है कि जो मस्जिदें मिली-जुली आबादी में हैं, वहां नमाज का वक्त थोड़ा बढ़ा लिया जाए. ताकि होली खेलने वालों और नमाज पढ़ने वालों को कोई परेशानी न हो.  इस तब्दीली का असर यह कि दोनों पक्षों के बीच सद्भावनापूर्ण माहौल होगा.

पत्रकार जुबेर का आकलन

एक दम सही फैसला मौलाना साहब का मुस्लिम समाज वैसे भी भाईचारे में विशवास रखता है और किसी भी समाज के धार्मिक उत्सव में बाधा नहीं डालता है, कुछ शरारती तत्व ईद हो या बकरी ईद या ईद मिलाद जान बूझ कर मुस्लिम समाज के त्योहार पे ऐसा कुछ काम करते है जिससे मुस्लिम समाज को त्योहार की ख़ुशी न मिले. लेकिन मुस्लिम समाज हर वर्ग की ख़ुशी का ख्याल रखते हुए अपने धार्मिक कामो को आगे पीछे कर सकता है. सही फैसला इससे हिन्दू समाज के होली के रंगो में कोई बेरंग नहीं उत्पन होगा. सभी मस्जिदों में होली वाले रोज़ जुमे की नामाज़ का समय आगे बड़ा देना चाहिए ताके हिन्दू अपनी होली ठीक से खेल सके और उसके बाद मुस्लिम नमाज़ अदा कर सके उससे हिन्दू मुस्लिम भाईचारा भी दिखेगा और गंगा जमुना तहज़ीब भी झलकेगी.

Tuesday, 27 February 2018

एक बूढी नसीहत

लेखक का ये लेख उसके १६ जून २०१६ को अंग्रेजी में लिखी एक कहानी Old commencement का  हिंदी रूपांतरण है जो सिर्फ  कल्पना मात्र नहीं है बल्कि १००% सटीक अवलोकन है उन छुपे हुए अल्लहावालो का जो अपने लिए नहीं बल्कि खुदा की मखलूक के लिए जीते है और अपने मालिके हकीकी को रात की तारीकी में दबे पाँव तलाशते है, उसके सामने रोते है गिड़गिड़ाते है और तमाम मखलूक की खेर व आफ़ियत की दुवाये करते है.  जिसको लेखक ने कहानी के अंदाज़ पे अपने शब्दों में पेश किया है.  लेखक का इरादा किसी पौशीदा इंसान के राज़ फाश करना नहीं है बल्कि समूचे समाज को ये बताना है के आज अगर वो चेन से सोते है क्योके रातो को ऐसे अल्लाह वाले रोते है.   

बोहोत समय पहले एक बूढ़ा आदमी इंसानी बस्ती से दूर शहर के बाहर जंगल में एक झोपडी में रहता था। वह अपने सभी परिवार के सदस्यों को खो चूका था और तनहे तनहा रह गया था उनके बाल सफ़ेद हो चुके थे उनका शरीर कमज़ोर हो गया था, उसके कंधे थक चुके थे, लेकिन उनका दृढ़ संकल्प आज भी उतना ही मज़बूत था जैसा की उसके उम्र के बीसवे साल में हुआ करता था। वह मरने वाला था, इसलिए उसने मृत्यु से पहले तीर्थ यात्रा पे जाने की योजना बनाई थी। उन्होंने अपनी जमा पूँजी की गणना की लेकिन वो किसी भी सूरत से यात्रा के खर्चे को पूरी नहीं हो रही थी। उसने अपना सामान जो कुछ भी उसके पास था वह बेच दिया, और किसी तरह से वह तीर्थयात्रा और रास्ते के खर्चे का इंतज़ाम करने में कामयाब हो गया।

परिवहन दुवारा शहर से निकलने के बाद, वह छोटे मार्ग पर पहुँचा जो कि तीर्थस्थान तक जाता था। यहां से उसे चल के जाना होगा क्योंकि अब तीर्थस्थान तक कोई परिवहन उपलब्ध नहीं था। छोटा रास्ता बहुत खतरनाक था और धूल से भरा हुआ था। उसने रस्ते में एक खाई देखि जिसको पार करके ही तीर्थस्थान तक पंहुचा जा सकता था, खाई बोहोत गहरी थी और उसपे कोई पूल नहीं था। कई अन्य तीर्थयात्रि अतयंत पीड़ा तथा कष्ट के साथ नहर पार कर रहे थे।  वृद्ध व्यक्ति किसी तरह से नहर को पार करने में कामयाब हुआ और तीर्थ स्थल पर पहुंचा। उसने अपने धार्मिक रीति व विश्वास के अनुसार सभी संस्कार और रीति-रिवाजों में भाग लिया और तीर्थ पूरा किया।

तीर्थ यात्रा से वापसी के समय बूढ़े व्यक्ति ने रास्ते में सड़क बनाने का निश्चय किया, उसके लिए तैयारी शुरू कर दी और नहर पर पुल का निर्माण करने की कोशिश की। लेकिन उसके कमजोर कंधे ज्यादा कुछ नहीं कर सके, उसने अन्य तीर्थयात्रियों की मदद लेने का फैसला किया। बूढ़े आदमी को अपने दृढ़ संकल्प पे यकीन था, उसने जवान तीर्थयात्रियों की टीम को इस काम के लिए गठित कर लिया जो वहां से आ जा रहे थे। युवा तीर्थयात्रियों की मदद से उसने लक्ष्य हासिल किया और नहर पर पुल का निर्माण किया।

पुल के पूरा होने के बाद जवान तीर्थयात्रियों ने बूढ़े आदमी का मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि बूढ़ा आदमी, बड़े मियां, चचा आप पागल हो बुढ़ापे में सठिया गए हो। बुढ़ापे की वजह से आपके दिमाग ने भी सोचना बंद कर दिया है। आप पहले ही तीर्थ यात्रा कर चुके हो और अब ज़िन्दगी के उस मुकाम पे पहुंच गए हो के दुबारा वापस इस जगह नहीं आने वाले हो। क्योंकि आप मरने वाले हैं, तो आपने नहर पर पुल का निर्माण क्यों किया है। आपने फ़िज़ूल की बात के लिए अपनी क्षमता, शक्ति और धन बर्बाद कर दिया हैं जिसका आपको कुछ फ़ायदा नहीं मिलने वाला है।

बूढ़ा आदमी शांति से मुस्कुराता है और युवा तीर्थयात्रियों को देखा उसके चेहरे पे युवाओ की बातो पे पश्चाताप के ज़रा भी भाव नहीं थे उसने बहुत नम्रता से जवाब दिया मैं जानता हूं कि मैं इस जगह पर फिर कभी नहीं आऊँगा। मैंने अपने जीवन का हिस्सा बिताया है और मैं मरने वाला हूँ। लेकिन मैंने इस पुल का निर्माण किया है जो आपके जैसे लोग हैं उनके लिए जो तीर्थ यात्रा में भाग ले रहे हैं और तीव्र समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ख़राब मौसम और रस्ते के कारण वो बेहद थकान महसूस करते हैं। मैंने अपना जीवन पूरा कर लिया है और मैं जानता हूँ में मरने वाला हूं, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि ख़राब मौसम और रस्ते के कारण दूसरों को तीर्थयात्रा के लिए वही तकलीफ का सामना करना पड़े जो मुझे हुई है। बूढ़े आदमी के जवाब को सुनने के बाद, जवान तीर्थयात्रियों को बूढ़े के ऊपर अपने मज़ाक पे बोहोत शर्मिन्दिगी महसूस हुई। वे बूढ़े आदमी के पैर पकड़ते हैं और अपने मज़ाक के लिए खेद व्यक्त करते हैं बूढ़ा आदमी तुरत एक फरिश्ते का रूप धारण करता है, और वो उन युवा तीर्थयात्रियों को राष्ट्र की ताकत बनने, और प्रसिद्धि पाने का आशीर्वाद दे कर आकाश में गायब हो जाता है।

कहानी की सार  और नैतिकता यह है कि दूसरों के लिए जीवित रहना चाहिए और दूसरों के लिए मरना चाहिए।

जुबेर एहमद खान
पत्रकार


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Old commencement

Sunday, 25 February 2018

धर्म और आस्था के नाम पे पाखंड, फरेब, डाका, वसूली


धर्म और आस्था की आड़ में कब तक फरेब लूट चलती रहेगी

आज कल समूचे हिन्दू स्टेट में बाबरी मस्जिद के नाम पे राम की आस्था नामक बारिश खूब ज़ोरो पे है.  कभी सांसद सुब्रमणियम स्वामी आस्था नामक पिटारा खोल के नागमणि तलाशने की कोशिश करते है तो कभी गोरखनाथ पीठ के स्वामी योगी आदित्यनाथ आस्था की बासुरी बजाते हुए नज़र आते है.  कभी पाखंडी, फरेबी, ढोंगी संबित पात्रा मीडिया के सामने आस्था का ढोंग करता है. कभी हिन्दू आतंकवादी गिरिराज आस्था के नाम पे कट्टरवादी ज़हर उगलता है.  फिर इन सभी आस्था प्रेमिओ के कथानाक में एक जैसी समानताये है सभी का ये मानना है के मुस्लिम तो मक्का और मदीना चले जायेगे अपना धार्मिक उत्थान करने फिर हम किधर जायेगे. हमारी आस्था का क्या होगा मुसलमानो से निवेदन है हमें मंदिर के नाम पे ज़मीन दे दो या राम के नाम पे ज़मीन छोड़ दें हम वहां राम मंदिर बनवा लेंगे.  

अगर साधू योगी महाराज की बात की जाए तो उन्होंने सिर्फ आस्था की बात कही ना ज़मीन त्यागने की बात कही और ना ही मक्का या मदीना की बात कही. 

लेखक का ठाम यकीन है और वो भी ये मानता है के हिन्दू धार्मिक आस्था राम चंद्र जी में है और होना भी चाहिए उसपे किसी भी समाज का अपवाद या विवाद नहीं है. विवाद तो षड्यंत्र पे है जिस तरह रात के अँधेरे में डाका डाल के मूर्ती रख के मस्जिद को विवादित कर के हड़पने की साजिश की उस दूषित ज़ेहनियत पे विवाद है.  फिर आज के राम भक्त जो कुछ रुपयों में अपना ईमान बेच देते है जो दंगा फसाद मचाते है जो राम के नाम पे खून व गारत करते है. तो ऐसे राम भक्तो की आस्था तब कहा गायब हो जाती है. तो यहाँ सवाल आस्था का है ही नहीं यहाँ सवाल षड्यंत्र का और लड़ाई सत्य की है.

फिर योगी महाराज के साथ खुद राम और सीता २०१७ में मौजूद थे और हेलीकाप्टर की सवारी कर के अयोध्या पहुंचे थे कुछ समय बाद वो राम एक महिला के साथ बलात्कार के जुर्म में जेल गया.  और जिनको बाबर भक्त बोला जाता है वो आज भी मर्यादावादी होते है कानून पे यकीन रखने वाले दंगे फसाद से दूर रहने वाले और अपना मज़हब और मस्जिद जाईज़ जगह पे बनवाने वाले होते है.  तो लेखक ये बात कताई मानने को तैयार नहीं जब आज का बाबर भक्त बिकाऊ नहीं है मर्यादावादी पुरषोत्तम होता है तो १५०० ईस्वी का खुद बाबर कैसे किसी भी समाज की मंदिर को तोड़ के अपने खुदा की इबादत गाहा बनवाएगा.  एक दम झूटी बात है किसी भी मुस्लिम राजा ने कभी भी कोई भी मंदिर नहीं तोडा और अगर तोडा होगा तो उस मंदिर में पुजारी हरामकारी करता होगा जैसा के आज के समय में सभी आश्रमों, मंदिरो, देवालयों और योगशालाओं में महिलाओ के साथ बलात्कार किया जाता है और उनको बंदी बना के रखा जाता है. राम पाल से लेकर राम रहीम और ७० साल का जैनी साधू सभी भोग कामना में लीन पाए गए. 

यहाँ तक के एहमद शाह अब्दाली की निस्बत से फरेब फैलाया जाता है के उन्होंने ११००० मंदिरो को तोडा इतिहास में जिसका कोई पुरावा नहीं मिलता. फिर जो मुस्लिम राजा अपने मालिके हकीकी की इबादत करता है किसी भी रियाया की इबादत गाह को नहीं तोड़ सकता.  किसी दुसरे मज़हब की इबादत गाह को तोड़ के अपने खुदा की इबादत गाह (मस्जिद) बनवाना वैसा ही है जैसा के बकरी ने बाल्टी भर दूध दिया और उसमे पेशाब या मैगनी कर दी अब उस दूध को पीने के बजाए फेक देना ही उचित है.

तो जब बाबर ने कोई मंदिर तोड़ा ही नहीं तो फिर कैसे राम की आस्था उस जगह पे जाग गई जो उनकी थी ही नहीं.  फिर भी अगर आज का राम भक्त आस्था का फरेबी चश्मा पहन के दुसरे समुदाय की इबादत गहा पे डाका डालने की गन्दी और गलीज़ नियत रखता है तो लेखक उन सभी आस्थावादीओ से पूछना चाहता है क्या राम मंदिर अब डाका डाली हुई ज़मीन पे बनेगा, फरेब कर के, धोका दे कर लूटी हुई ज़मीन पे बनेगा. क्या उनके राम इतने मजबूर हो गए के डाका डाली हुई ज़मीन पे अपना मंदिर बनवायेगे और भक्तो को आने का निमंत्रण देंगे.   फिर अगर ज़मीन लेना ही है तो षड्यंत्र, फरेब फैला कर के क्यों.

दूसरी बात अगर उच्चतम न्यायलय में इस बात के पुख्ता सबूत मिलते है के मंदिर को तोड़ के वहां मस्जिद बनवाई गई थी तो ऐसी मस्जिद में खुद ही नमाज़ नाजाइज़ है.  क्योके किसी दुसरे धर्म की दिल आज़ारी करके उसके धार्मिक स्थल को तोड़ के अपने लिए धार्मिक स्थल बनवाना नाजाइज़ है.  लेकिन सबूत पुख्ता और ठोस होना चाहिए झूट, फरेब, खरीद फरोख्त, जान से मारने की धमकी या न्यायलय को पक्षपात की बुनियाद पे आर्डर अपने पक्ष में लेना सबूत नहीं होगा. 

लेखक को और समूचे मुस्लिम ब्रदर्स को अभी तक भी उच्चतम न्यालय पे पूरा यकीन है के फैसला मुस्लिम समाज के हक़ में आएगा. क्योके जिस तरह से हिन्दू समाज को राम पे भरोसा है के वो कुछ भी गलत नहीं होने देंगे तो राम ही झूट, फरेब और डाकाज़नी से हथियाई  हुई ज़मीन से दूर हो जायेगे.  फिर अगर राम मर्यादावादी थे तो वो खुद भी ये नहीं चाहेंगे के एक समुदाय की इबादत गाह को तोड़ के उनके लिए भव्य मंदिर बनवाया जाए.

फिर भी अगर झूट और फरेब की बुनियाद पे उच्चतम न्यायलय का फैसला मुस्लिम समाज के खिलाफ आता है तो लेखक यही समझेगा के हिन्दू धर्म के राम भी फ़रेबिओ के साथ है और उनका धर्म भी भीख पे यकीन रखता है तभी तो मुस्लिम टैक्स पयेर्स के रुपयों का दुरुपयोग कर के सरकार हिन्दू तीर्थ यात्रा के लिए सब्सिडी देती है जिसमे शामिल है.  

उत्तर प्रदेश: कैलाश मानसरोवर के लिए एक लाख रुपये

दिल्ली: वरिष्ठ नागरिकों की एसी बस में तीर्थयात्रा

मध्य प्रदेश: विदेश यात्रा पर भी सब्सिडी

उत्तराखंड: वरिष्ठ नागरिकों के लिए तीर्थाटन

हरियाणा: सिंधु दर्शन यात्रा का लाभ

राजस्थान: प्लेन से तीर्थयात्रा की सुविधा

गुजरात: श्रवण तीर्थदर्शन योजना

कर्नाटक: चार धाम की यात्रा पर सब्स‍िडी

तमिलनाडु: येरुशलम की यात्रा के लिए सब्सिडी

ओडिशा: वरिष्ठ नागरिकों का ख्याल

असम: बस यात्रा पर सब्सिडी


इस विषय पे अधिक जानकारी के लिए और कितना पैसा सब्सिडी के नाम पे किस तीर्थ पे जाने के लिए मिलता है लेखक का १८ जनवरी २०१८ को लिखा लेख ये है इस्लाम और मुस्लिम पढ़िए.    

फिर हिन्दू धर्म में हर काम भीख मांग के किया जाता है.  गणपति पंडाल से ले कर तो दुर्गा उत्सव तक होली के रंगो से ले कर तो महाआरती तक सभी धार्मिक कामो के लिए दुसरे समाज के लोगो से भी धन अर्जित किया जाता है.  १९९३ के बाद तो गणपति के लिए ज़बरदस्ती मुस्लिम समाज से पैसा वसूला जाता था जिसके ऊपर कई मुस्लिम युवको को अपनी जान देनी पड़ी. फिर भला हो एक मराठी अधिवक्ता का जिसने २००० में हाई कोर्ट बॉम्बे में एक पेटिशन डाली और उसके ऊपर कोर्ट का सख्त निर्देश आया और ज़बरदस्ती चंदा लेने वालो को जबरन वसूली करने की संज्ञा दी और ऐसे लोगो के ऊपर पुलिस को सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिए तब जा के वो प्रथा बंद हुई.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...