Wednesday, 28 December 2022

Now it is Uzbekistan to face the Indian venom.

 

AUTONOMOUS JOURNALIST

Now it is Uzbekistan to face the Indian venom.

https://autojourna.wordpress.com/2022/12/28/now-its-uzbekistan-to-face-the-indian-venom/



यौमे जिन्ना धूम से मनाया, यौमे बाबर की करो तय्यारी।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हर साल की तरह इस साल भी सहाफ़ी ने २५ दिसम्बर बड़े ही धूम धाम से बनाया।  अपने एहबाबों को मेरी क्रिसमस मुबारकबादी पैग़ाम दिए और जश्न मनाया।  दोस्तों की दावत पर मुर्ग़ मुसल्लम के साथ कबाब और मीठे का एहतेमाम किया गया था।  नाज़रीन २५ दिसम्बर को जश्न बनाने की सहाफ़ी के पास दो वजह होतीं हैं।  एक अपने हम ख़्याल हम वतन क्रिस्टी अवाम की ख़ुशी में शामिल होना दूसरा उस अज़ीम शख़्सियत को ख़िराजे अक़ीदत पेश करना, जिनकी दनिश्वरी, दूरअंदेशी की वजह से आज अज़ीम इस्लामिक रियासत जोहरी ताक़त बना और कुफ़्र, नाइंसाफों, कातिलों, इस्लाम दुश्मनों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा। 

आज हिन्द में मुसलमानों के ऊपर होने वाले ज़ुल्म, नस्ल कूशी, नाइंसाफी, इज़्ज़ते नफ़्स का क़त्ल और इस्लाम पर हमले होने के सबब सबसे पहले वोही अज़ीम इस्लामिक रियासत मुस्लिम हुक़ूक़ की बात करती है।  मुस्लिम अवाम भी अब अपने हक़ और इस्लाम की बक़ा के लिए पाकिस्तान की ही जानिब देखने लगा है।  यह बात अलग है दौरे नबूवत की तरह अभी भी कुछ मुनाफ़िक़ हैं जो पाकिस्तान से लिल्लाही बुग्ज़, कीना रखते हैं और हर चंद कोसते रहतें हैं उनको अपनी बक़ा भारत के ना इंसाफ़, ज़ालिम, इस्लाम दुश्मन हाकिमों के अंदर ही नज़र आती है।  ख़ैर ऐसे मुस्लिम अवाम सिर्फ नाम भर के मुस्लिम होतें हैं उनको ना इस्लाम से कोई मतलब और ना ही पैग़म्बर की बेहुरमती से कोई सरोकार यह तो हैं ही काफ़िर  इनकी नमाज़े, इबादत, तिलावते क़ुरान सब बेकार हैं अगर इनके अंदर एक मुसलमान के दर्द का एहसास नहीं है और नबी सल्लम की बेहुरमती पर इनका ख़ून जोश नहीं मारता है तो यह काफ़िरों से मिले हुए हैं।  यह लोग वैसे ही हैं जैसा की पाँचों वक़्त नबी के पीछे नबवी शरीफ़ में नमाज़ अदा करने वाले, नबी की महफ़िल में बैठने वाले लेकिन उनके दिलों के ऊपर अल्लाह ने लानत की मोहर लगा दी थी। ऐसे ज़लील मुसलमानों की नबी सल्लम ने सिफ़त बयान की और  सूरे मुनाफ़ेक़ून नाज़िल की गई की यह मुसलमान नहीं बल्कि मुनाफ़िक़ हैं।

इस साल २५ दिसम्बर में दोहरी ख़ुशी का एहसास हुआ।  हर साल तो यह सहाफ़ी ही उस अज़ीम संत की सालगिरह का जश्न बनाता था इस साल उस जश्न में सऊदी अरेबिया भी शामिल हो गया।  नूर अला नूर।  सऊदी हुकूमत ने इस साल क्रिसमस सिलिब्रेशन का फैसला किया था।  बाज़ारों में क्रिसमस की धूम नज़र आई और ताजिरों ने अपनी दुकानों पर क्रिसमस ट्री सजाया।   शॉपिंग माल, दुकाने लाल रंग की पैराहन क्रिसमस केप से आरास्ता थी।

सऊदी की दारुल ख़िलाफ़त रियाद में  क्रिसमस की धूम देखी गई।  सऊदी के अज़ीम खबरनामे "दी अरब न्यूज़" में पहली दफ़ा क्रिसमस को ले कर एक ख़ुसूसी शुमार शाया किया गया था।    

उम्मीद है जिस तरह यौमे जिन्ना को क्रिसमस की तरह सऊदी और तमाम मुमालिकों में बनाया गया उसी तरह १४ फ़रवरी को यौमे बाबर को जश्न के साथ मानाया जाए। 

यह सहाफ़ी किंग सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ की अदलिया में दरखवात करता है। 

होलूविन हो गया, मुसलमानों और इस्लाम दुश्मन हिंदी सिनिमा चल गई, जुव्वे-मैख़ाने खुल गए, कुफ्रिया दरबार खुल गए, हिजाब हट गया, ख़ातूनों को अब बहार निकलते वक़्त मेहरम की पाबन्दी नहीं।  तो अब ख़ातून ऐ जन्नत हज़रते फ़ातेमा ज़ेहरा का मज़ार ऐ अक़दस बनाया जाए। जन्नतुल बक़ी में जितने भी सहाबा ऐ किराम मौजूद हैं उनके मज़ारात पर तहरीर किया जाए की यह किस सहाबा का मज़ार है।  हज़रते आयेशा का पोशीदा किया गया मज़ार वापिस से नमूदार किया जाए।  उम्मा को ज़ियारत का शर्फ़ बख़्शा जाए।

Zuber

Tuesday, 27 December 2022

सबसे बड़े दोग़ले और ग़द्दारे वतन। कौन में, हाँ तुम, बस तुम, ओफ़्फ़ो …..

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज का मौज़ूं हालाते हाजरा और उन तमाम हूकूमती ग़ुलामों ख़्वाहा वोह ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ हों, फौज, अदलिया या इन्तेज़ामियाँ पर सहाफ़ी का ज़ोरदार तमाचा है।  नाज़रीन जहाँ हिन्द में कुछ भी ग़लत होता है उसका ठीकरा संघ, बीजेपी, शिद्दत पसंद हिन्दू अब्दुल के फ़रज़न्द के ऊपर फोड़ना शुरू कर देतें हैं।  इसमें ज़ाफ़रानी लंगूर सरे फेहरिस्त होतें हैं जो मसले को अपने ऊल जलूल फ़लसफ़े और हुकूमत की तरफ़दारी  करने वाले मुबाहिसे से मज़ीद पेचीदा कर देतें हैं।  लेकिन जब मसला संघी दहशत, बीजेपी हुकूमत की ग़फ़लत और फौज के क़तल का मुल्ज़िम कोई संघी, बीजेपी वाला या शिद्दत पसंद हिन्दू होता है तो इन बावले लंगूरों पर पूरी तरह ख़ामोशी छा जाती है।  और मौत की ख़ामोशी का मातम किसी मुख़्तलिफ़ मुद्दे पर करतें हैं जिसका कोई वजूद और बुनयाद ही नहीं होता है।    

बरोज़ २६ दिसम्बर हिन्दू दहशत की पनहा गहा गुजरात के नाडियाद में भारत के सरहदी दिफ़ा अमला (BSF) के एक फौजी मेलजी भाई वाघेला को शैलेश उर्फ़ सुनील जादव ने डंडे से पीट पीट कर त्रिशूल से घोंप कर तलवार से काट कर भल्लम-भाला घुसा कर हलाक कर दिया।  जिसके सबब मौक़ा ऐ वारदात पर ही वोह जवान हलाक हो गया। 

आमुक क़ातिल सुनील जादव फौजी की दुख्तर के ऊपर ग़लीज़ निगाहें रखता था और उसने फौजी की बेटी के नाज़ेबा वीडियो बना कर उनको सोशल मीडिया पर वाइरल कर दिए थे।  इस बात से ख़फ़ा फौजी के एहले ख़ाना और उनका फ़रज़न्द नवदीप क़ातिल जादव को समझाने की नियत से उसके घर पहुंचे थे।  मुबाहिसा बहस में तब्दील हो गया और इस दौरान क़ातिल शैलेश उर्फ ​​सुनील और उसके वालिद दिनेशभाई छाबाभाई जादव, चाचा अरविंदभाई छाबाभाई जादव, दादा छाबाभाई चतुरभाई जादव, सचिन अरविंदभाई जादव, भावेश चिमनभाई जादव, कैलाशबेन अरविंदभाई जादव और शांताबेन चिमनभाई जादव ने लाठी, तलवार, त्रिशूल, भाला, बल्लम, आरी और फावड़े से जवान पर एक साथ हमला बोल दिया।   जिसमे जवान मौक़ा ऐ वारदात पर ही हलाक हो गया और उनका फ़रज़न्द शदीद ज़ख़्मी हो गया।  जिनको अहमदाबाद रिफर किया गया है।  तमाम क़ातिल क़त्ल करने के बात फ़रार हो गए। 

नाज़रीन ऐसे हस्सास क़तल और मसलों पर ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ और तमाम हिन्दू मज़हब के पेशवा जिनके जज़बात ज़ाफ़रानी अगोछे से टूट जातें हैं तमाम मीडिया और मातम गेंग सब खामोश हैं।  वहीँ अगर चीन के हमले पर असदुद्दीन हक़ बोलतें हैं की हमारे जवानों के ऊपर हमला हुआ तो यही हिन्दू रक्षक दल और मीडिया के नुमाइंदे बवाल मचा देतें हैं।  हुकूमत से सवाल पर ग़द्दारी का तमग़ा असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम के गले में टांग दिया जाता है। 

कांग्रेस के सरबराह राहुल गांधी ने गलती से पूछ लिया की चीन का हमारे सरहदों पर क़ब्ज़ा हो गया है और मोदी इन्तेज़ामियाँ की नाकामी ज़ाहिर हो रही है तो उनको ग़द्दार बोला जाता है नाज़ेबा कलेमात से उनको उनकी वालेदा को नवाज़ा जाता है।  इटली की बार डांसर जैसे ख़िताब दिए जातें हैं।  नाना-नानी के घर से यही तालीम मिली है ऐसे अलफ़ाज़ राहुल गांधी को सुनाने पड़ते हैं।  फिर ऐसे मसलों पर जब बीजेपी के नुमाइंदे, शिद्दत पसंद हिन्दू अपने मुँह की गंदगी ख़ारिज करतें हैं तो मीडिया पूरी तरह ख़ामोश रहती है और ऐसे नाज़ेबा कलेमात इलज़ाम लगाने के लिए  बीजीपी के नुमाइंदों को खुला मैदान दिया जाता है।  वहीँ कोई भी मुख़ालिफ़ मजलिस, कांग्रेस, सपा, बसपा, त्रिमूल, कम्युनिस्ट अगर अपनी हक़ बात कहतें जो हुकूमत के ख़िलाफ़ जाती है तो मीडिया की जानिब से फ़ौरन टोका टोकी शुरू हो जाती है। 

तमाम मुख़ालिफ़ अगरचे वोह हक़ीक़ी भारत का वफादार है और उसके अंदर जज़्बा है अपने वतन के लिए कुछ करने का लेकिन हुकूमत से जाइज़ सवाल भी कर लिया तो वोह पाकिस्तानी, इटली के वफादार, ग़द्दार, दहशतगर्द, चीन के हमदर्द, नक्सल वादी हो जातें हैं।  फिर जिस हिन्दू ने एक फौजी को हलाक किया वोह क्या हुआ। 

राहुल गांधी ने हक़ीक़त बोला सुबह से शाम तक जो लोग हिन्दू मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम करतें हैं अगर ज़र्रा भर देश के हक़ीक़ी मसलों पर तवज्जो देतें तो आज भारत की ऐसी हालात नहीं होती।

नाज़रीन इन दोग़लों का किरदार देखिये कल देर शाम मक़तूल और क़ातिलों के नामों के साथ यह ख़बर मेरे पास पहुंच गई थी।  लेकिन खबरनामे में मक़तूल का नाम तो छापा था लेकिन क़ातिल दहशतगर्द का नहीं, तो कुछ संघी; मुस्लिम अवाम के ऊपर इलज़ाम लगा रहे थे की मारने वाला विशेष समुदाय से होगा Religion of Peace से होगा। मेने कुछ जवाब नहीं दिया सोचा इनकी ही लाठी से पीटने दो। फिर आज जब  नाम ज़ाहिर हुए और सब कुछ शफ़्फ़ाफ़ हो गया, की क़ातिल दहशगतगर्द हिन्दू हैं और मक़तूल सरहद पर दुश्मन से लड़ने वाला फौजी तो दहशतगर्दों ने अपनी बरदारी के इंसान को बचाने के लिए मक़तूल की बेटी के किरदार का क़त्ल करना शुरू कर दिया।  उसको आवारा, बदचलन, बरहना थी जो पराये मर्द के साथ जा कर ज़िना किया ऐसे तास्सुरात आने लगे।  अब किस को बचाने की कोशिश कर रहें हैं।  यह संघी तो कौरवों से भी ज़्यादा बड़ा चीर हरड़ कर रहें हैं। वहीँ दूसरी जानिब श्रद्धा-आफ़ताब, ज़ीशान-तूनिशा शर्मा की मोहब्बत को ग़लत रंग दे कर अब्दुल को बदनाम किया जा रहा है।  वही फ़लसफ़ा इस The Butcher of Gujrat के ऊपर काहे को नहीं लागू होता।  जिसने फौज के जवान को हलाक कर दिया। 

अब बताओ कौन है दहशतगर्द। जिस आर्मी के लिए लंगूर-लँगूरनियाँ संघी, बीजेपी वाले और शिद्दतपसन्द हिन्दू पापले पीटते हैं उसी फौज के जवान को कहीं और नहीं बल्कि हिन्दू आतंक के गड में क़तल कर दिया। बताओ जिस फौजी को सरहद की हिफाज़त करने की ज़िम्मेदारी होती है उसी फौजी को आतंकिओं ने अपने गड भगदादी की पनाह गाहा रक़्क़ा (गुजरात) में मौत के घाट उतार दिया।

नाज़रीन ज़रा तसुव्वर कीजिये अगर किसी अब्दुल के फ़रज़न्द ने फौजी को हलाक किया होता वोह भी ऐसी सूरते हाल में की उसकी बेटी के वीडियो उसने वायरल किये होते थे तो क्या हाल होता अभी तक उसका लंगूर-लँगूरनियाँ, ज़ाफ़रानी महाज़ इज्तेमाई क़तल कर चूका होता।  अभी तक तो ना सिर्फ अब्दुल उसका एहले ख़ाना बल्कि पूरी मुस्लिम माशरत तबाह हो जाती।  फिर तमाम हमदर्दी उस मक़तूल फौजी के एहले ख़ाना और उसकी जानिब मुतवज्जो हो जाती।  अब्दुल के फ़रज़न्द का घर अब तक मिस्मार कर दिया जाता और उसको पुलिस शदीद अज़ीयत देती हुई पाई जाती।  फौज के अराकीन, कर्नल, मेजर मीडिया के रू बरू बैठ कर सिर्फ अब्दुल के फ़रज़न्द के नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम बरादरी के मुक़ाबिल आ जाते।   लेकिन अब चारों जानिब ख़ामोशी है।  ऐसा कियों??

आफ़ताब-श्रद्धा और अभी ज़ीशान-तनीषा शर्मा की मोहब्बत के बारे में टीम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की पूरी तहक़ीक़ात रिपोर्ट आ गई है।  मसला ऐसा नहीं है जैसा मीडिया पेश कर रहा है।  ज़ीशान के बारे में जो कुछ भी तनीषा की वालेदा ने कहा लिखा वोह सब दबाव में बोला गया है।  लेकिन सही वक़्त पर उसको शाया करूँगा। 

Zuber

Saturday, 24 December 2022

असद साहब को खुली तहरीर। मंज़र बदलते ही ग़ुलाम हुई लँगूरनियाँ।

अज़ीज़ नाज़रीन,

जनाब असद साहब से गुज़ारिश करना चाहूंगा  हर मुद्दे पर भारत के मुवाफ़ेक़त में बहस और हुकूमत को घेरने की बातें ना किया करें। बीजेपी, संघी कभी भी अपनी ग़लती और ग़फ़लत को तस्लीम नहीं करेगें।  

मोदी और बीजेपी ही भारत को बर्बाद करेगें। बीजेपी का भारत को तोड़ने का काम चालू है। हाल ही मे चीन के भारत की मज़ीद जमींन पर क़ब्ज़ा करने वाली घटना पर जब आपने सवाल पूछे और एवान में बहस का मुतालबा किया तो संघी आग बाबुला हो गए। फ़ौज के बड़े बड़े कर्नल, आराकीन भी मोदी और हुकूमत की चाटूकारिता कर रहे थे।  असद साहब आप तो अपना दुख ज़ाहिर कर रहे थे की भारत को मोदी इन्तेज़ामियाँ तोड़ डालेगी और संघी आपके उस दुःख पर भी गन्दी गाली गलोच कर रहे थे। 

मै असद साहब से कहना चाहता हूँ काहे को आप भारत के हक़ मे बोल कर दहशतगर्दों की गाली गलौच और गंदी ज़ुबाँन सुनते हैं। मरने दीजिये इनको और इनके देश को।  हाँ मुस्लिम हक़ की बात कीजिये उसमे संघी गाली दें या ज़लील करें, क़ौम और मिल्लत के लिए गाली सुनना पड़े तो भी चलेगा। लेकिन भारत के लिए नही।  होने दो क़ब्ज़ा चीन का पाकिस्तान का या बंगलादेश का। हमे क्या करना है।

चीन के हाल ही के ९ दिसम्बर के हमले मे २० भारतीय फौजी मारे गए हैं।  जिसका ज़िक्र मैने जिस रोज़ ख़बर आवामी हल्क़े में ज़ाहिर हुई थी, उसी रोज़ कर दिया था की २० फौजी मारे गए हैं और दर्जनों घायल हैं।  उसके उपर वज़ीरे दाख़ला से बयान आया ना कोई घायल है ना कोई मरा है।  अब मेरी उस बात की तस्दीक़ कल की गई और ख़बर को सिक्किम में एक हादसे में १६ भारतीय फौजी शहीद बोल कर लीक किया गया।  जिसको सिक्किम का हादसा बोला गया वोह ९ दिसम्बर को मारे गए फौजी थे।

भारतीय फ़ौज के अफसरों का दोग़ला पन ग़द्दारी देखो वोह असद साहब के उपर तनक़ीद कर रहे थे और मोदी हुकूमत का बचाव। यह लोग तो भारत के ग़द्दार हैं इनको सबसे पहले गोली मारना चाहिए।  असद साहब के वाजिब सवाल पर हर फौज का सरबराह मोदी हुकूमत को मेहफ़ूज़ कर रहा था और असद साहब के ऊपर निहायत ही अदना दर्जे की बदज़ुबानी कर रहा था।  एक फौजी ऑफिसर असद साहब को कुत्ते से शबी  देता है।  सिर्फ इसलिए की असद साहब हक़ सवालात पूछ रहे थे और मोदी इन्तेज़ामियाँ को कटघरे में खड़ा कर रहे थे।  तो वोह बात भारत के गद्दारों को हज़म नहीं हुई।  फिर मरने दो इन गद्दारों को।  असद साहब अब कभी भी चीन क़ब्ज़ा करे या भारतीय फौजी हज़ारों की तादात में मारे जाएँ कोई सवाल मत करिये।  जब आपके जाइज़ और वतन की मोहब्बत वाले सवाल पर इन गद्दारों को अंगार लगती है तो टूटने दीजिये भात को और मरने दीजिये हर दुसरे रोज़ इनके फौजी।

भारतीय ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों की मजबूरी कही जाए, दोग़ला पन या ग़द्दारी यह सहाफ़ी समझने से क़ासिर है।  अब इन लंगूर-लँगूरनियों के नए आक़ा मोदी जी नहीं बल्कि राहुल जी होते जा रहें हैं।  इन लँगूरनियों को जबी में ज़हन फ़रोश बोलता हूँ।  जैसे की एक बदकिरदार औरत मौक़े की नज़ाकत और सामने वाले की क़ुव्वत, ओहदा और पैसा देख कर गिरगिट के जैसे रंग बदलती है और चापलूसी करती है वैसा ही आहिस्ता आहिस्ता यह लँगूरनियाँ करने लगी हैं।  

जिस तरह की हवा मोदी, बीजेपी के लिए २०१२ से २०२२ तक हर इंतेखाब में बाँधना इस सहाफियों की मजबूरी थी वैसे ही हवा अब कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए बांधना शुरू कर दी है। 

हाल ही में आज तक की चित्र त्रिपाठी और अंजना ॐ कश्यप बीजेपी के नुमाइंदों को ज़रा ज़्यादा ही हाशिये पर रख रहीं हैं और कांग्रेस के लिए हवा बाँधने के काम कर रहीं हैं।  लगता हैं उनको अब एहसास होना शुरू हो गया होगा की ग़ुलाम भारत के आखिर वाइसराय लार्ड माउंट बेन्टन का दौर का इक्तेदाम होने वाला है सो उन्होंने अभी से कांग्रेस के हक़ में चापलूसी का आग़ाज़ कर दिया है। 

लेकिन यहाँ में फिर से दोहराना चाहूंगा की यह मीडिया हाउस फिर ग़लती कर रहें हैं।  किसी एक हुकूमत या तंज़ीम की चापलूसी करना उनके हुकुम के ताबेदार होना और हक़ बात से मुँह छुपाना नाहक़ बात पर हुकूमत को हाशिये पर नहीं लेना चुब्ते हुए सवाल हुकूमत या इक़्तेदार की कुर्सी पर बैठे हुए नुमाइंदों से नहीं करना दरअसल अपने फ़र्ज़ और सहाफ़त से ग़द्दारी करने जैसा है। 

बिल फ़र्ज़ अगर २०२४ में कांग्रेस आती है जिसके इमकानात कम नज़र आ रहें हैं और हुकूमत के किसी भी नाजाइज़ अमल पर पर्दापोशी की गई और सवाल नहीं किया गया तो वैसा ही होगा जैसा आज कल हो रहा है।   सिर्फ उन्ही मुद्दों जिसपर की हुकूमत की भारत के विदेश नीति पर झूटी वाह वही वाली खबरे दिखाई जाएगी।  मसला ऐ कश्मीर, मुस्लिम नस्ल कुशी, नाइंसाफ़ी, फ़िर्क़ा वाराना फ़सादात, अदलियाई दहशत, सियासी और इन्तेज़ामियाई दहशत जैसे मसलों पर अगर भारत को आलमी बरदारी कटघरे में खड़ा करेगी तो ख़ामोशी इख़्तेयार की जाएगी।    

Zuber

Tuesday, 20 December 2022

तुम करो भगवा का अपमान अब्दुल का नाम बदनाम

अज़ीज़ नाज़रीन,

एक कहावत है जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है पहले वोह ख़ुद ही उसमे गिरता है।  यहाँ दो बात आप हज़रात के ज़हेनशीन करना चाहूंगा।  एक होता है ग़फ़लत में किया गया काम और दूसरा होता है साजिश, ज़हन की गंदगी, ज़हर की मिक़्दार भरे आलूद की वजह से किया गया काम।  पहले वाले में इंसान नादानी में कोई काम कर जाता है मक़सद उसमे किसी भी साजिश या ज़हन की गंदगी आलूद नहीं होता है।  लेकिन दुसरे वाले में मुजरिम साजिश करता है जुर्म करने की हिकमते अमली इख़्तेयार करता है फिर जुर्म कर डालता है। 

वही आज ज़ाफ़रानी कीड़ों के साथ हो रहा है।  जो ज़रा सी बात पर कुलबुलाने लगतें हैं और अपने ज़हन की गंदगी ख़ारिज करतें हैं, लेकिन वोह ख़ुद नहीं देखते की ख़ुद कितने बड़े कमज़र्फ, बरहना अपने छाती की नुमाइश करने वाले तवाइफ़ों से बदत्तर किरदार के हामी हैं।  अब इन्ही मोहतरमा को देख लीजिये।  एक हैं अमरावती की मेंबर पार्लियमान नवनीत राणा और दूसरी ज़ाफ़रानी वज़ीर स्मृति ईरानी।  लेकिन इन दोनों की बरहना कारगरदेगी देखिये।  नवनीत को देखिये कैसा अपनी छाती और जिस्म का मुज़ाहेरा फिल्म में कर रही है।   यह बोहोत भगवा का सम्मान कर रही है।  दूसरी जानिब साधू है जिसको उचक उचक कर नवनीत राणा मुत्मइन करने के इशारे कर रही है। 

यह नवनीत राणा वही है जो लंगूर चालीसा पर बोहोत फुदकी थी फिर जेल में क़ैदियों ने इसको हर रोज़ रात को उचकाया था।  बाद में सहाफ़ी इजलास में सहाफियों ने इससे लंगूर चालीसा पड़ने को बोला तो बगलें झाँकने लगी।  लंगूर नाम कैसे पड़ा वही पता नहीं था।  मतलब जबरन की सियसत कर रही थी मोहतरमा लेकिन क़ैदियों के साथ एक हफ्ते रहने के बाद टांगों में तकलीफ इतनी बढ़ गई की चलने फिरने में दर्द होता था।  बावली  

नाज़रीन सिनिमा थिएटर से सहाफ़ी का कोई सरोकार नहीं है और ना ही फ़िल्में देखता हूँ लेकिन मालूमात पूरी रहती है।  और जहाँ तक इस सहाफ़ी की पसंदीदा अदाकाराओं का सवाल है उसमे शामिल हैं। करीना भाभी, दीपिका पादकोण और स्वरा भास्कार।  

नाज़रीन इससे क़ब्ल भी कई दफ़ा इस बात को अपने मज़मूनों और ख़बरनामों के तब्सिरों में बता चूका हूँ।इन भगवा धारियों की बातों का असर अवाम पर कियों नहीं होता है कियोंके यह लोग खुद उस अमल को करने में शामिल रहतें हैं तभी अवाम पर इनकी बातों का असर नहीं होता है।  अपनी बात को एक सबक़ आमोज़ कहानी के साथ ख़तम करूंगा। 

किसी गाँव के लोग बोहोत ही ओबाश क़िस्म के थे फाहशी के हर गुनाह में मुलव्विस थे।  हुकूमत परेशान हो गई की कैसे इन गुनाह के सौदागरों को राहे रास पर लाया जाए।  किसी पंडित भगवा धारी को यह बात पता चली।  उसने फ़ौरन मंसूबा बनाया की उस गाँव में पहुंचना चाहिए।  अब पंडित जी मंदिर खोल कर बैठ गए।  टीका शीका लगा कर और भक्तों को दर्स देने लगे।  धीरे धीरे भक्तों का तांता लग गया और भीड़ बढ़ते बढ़ते १०० से हज़ार फिर लाखों में पहुंच गई।  लेकिन जुर्म वहीँ के वहीँ कम होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।  बल्कि पंडित जी के आने के बाद तो अब भगवा धारी खुले आम बरहना रक़्स करने लगी। ज़िना कारी, शराबख़ोरी, जूआ तमाम काले कारनामे बढ़ते चले गए।  

यह माजरा देख कर कुछ सर फ़िरे सहाफियों, सामाज सुधारक दानिशमंदों और तहक़ीक़ात करने वाले तालिबे इल्मों को बड़ा अचरच हुआ।  महाराज के मठ में हज़ारों लाखों की तादात में ज़ायरीन आ रहें हैं अवाम उनकी बातों से मुत्तासिर भी बोहोत हो रहा है फिर क्या वजह है की जुर्म कम नहीं हो रहें।

इसके लिए सभी बाशाऊर अवाम ने ते किया की साधू की तहक़ीक़ात करना होंगी किया वजह है की अवाम इसकी बात का एहतेराम कियों नहीं कर रहे।  एक सहाफ़ी, एक दानिशमन और एक तहक़ीक़ात करने वाला तालिब इल्म रात की तारीकी में मंदिर के तहख़ाने के अंदर दाख़िल हुए, और देखा की साधू महाराज तो करोड़ों अरबों की मादक आशियात के ताजिर हैं।  और वोह तिजारत करने की गरज़ से गांव में आये थे।     

वोह पंडित जी के आस पास ख़ूबसूरत भगवाधारी नवनीत राणा जैसी एक नहीं १०-१२ सफ़ेद मुर्गियों की फौज थी जो उनका दिल बेहला रही थी।

शराब ख़ोरी, हराम की दौलत का ज़ख़ीरा पड़ा था।  दरअसल पंडित जी उस गाँव में आये ही इसलिए थे कियोंके उनके पीछे पुलिस पड़ी थी और उनको पोशीदा होने के साथ साथ अपनी नाजाइज़ तिजारत को फैलाने के लिए एक आसरा चाहिए था। 

तो बात समझ में आ गई की खुद पंडित जी रातों की तारीकी में हरामकारी में मुलव्विस थे और सुबह के उजाले में मंदिर में दरस देते थे।  तो उनकी बातों से मालिके कायनात ने रेहमत छीन ली थी जो शहद सी मिठास थी वोह ख़तम कर दी थी और अवाम पर उनकी बातों का असर नहीं हो रहा था। 

सच्चा साधू और वली वही जिसकी बातों का असर सुनने वाले पर इस क़दर हो की आँखों से पशेमानी के आंसू रवां हो जाएँ और वोह अहद करे की अब तो इस गुनाह को हरगिज़ नहीं करूँगा।   नाज़रीन किसी भी इंसान को दरस देने से पहले इंसान को यह देखना चाहिए क्या वोह आदत उसमे तो नहीं है।  अगर है तो पहले खुद अपने आप को दुरस्त करे फिर दूसरों को बोले।  तभी उसकी कही बात का अवाम पर असर होगा। 

।। एक था आसाराम, एक है झांसाराम ।। 

 Zuber

Sunday, 18 December 2022

क्या हक़ है ज़ाफ़रानी को बदनाम करने का, चेलेंज है ऐसा करो…..

अज़ीज़ नाज़रीन, 

गुजिश्ता एक हफ्ते से किसी नौटंकी के ऊपर नौटंकी देख रहा था।   किसी नौटंकी का नग़्मा "बेशर्म रंग" शाया हुआ  जिसके ऊपर तमाम ज़ाफ़रानी ना सिर्फ बेशर्म हो गए बल्कि बरहना हो कर नंगा रक़्स करने लगे।  इन दिमाग़ी मुफ़लिसों पर अब तो ना गुस्सा आता है और ना ही हँसी।  जो हर मुद्दे को इस्लाम और पैग़म्बर तक से मुनसलिक कर देतें हैं।   

मेने बहैसियत सहाफ़ी यह नग़्मा देखा और मुझे इसके अंदर ऐसा कुछ भी नहीं लगा की किसी भी मज़हब की तोहीन की गई हो या हिन्दू मज़हबी पेशवा का मज़ाक़ बनाया गया हो।  बल्कि मुझे नग्मे की मौसीक़ी बोहोत पसंद आई जो आवाज़ है वोह दिल काश है हाँ सीन बरहना हैं तो आज कल के माहौल में अवाम वही तो देखना पसंद करता है।  जो भी बीजेपी वाले और ज़ाफ़रानी गुंडे दंगा फसाद कर रहें हैं उनमे से ९९ फीसद तो फाहशी, बरहना मस्तूरातों को देख कर ना जाने क्या क्या करते रहतें होंगे। कई बीजीपी के रकून असेंबली और पार्लियमान एवान में बरहना (ब्लू) फिल्मे देखते हुए पकड़े गए हैं।  और सिर्फ ज़ाफ़रानी अंगोछा लपेट लेने से हिन्दू मज़हब की बेइज़्ज़ती हो गई।  क्या फलसफा है।  

Today's Seeta Devi of Modern India. 

अगर इतनी ही हिन्दू मज़हब की परवाह है तो उत्तराखंड की उस मासूम बच्ची जिसको के बीजेपी के वज़ीर के फ़रज़न्द ने खूब इतेमाल किया और उसको क़तल ही इसी वजह से किया की योगी, मोदी और अमित शाह को नफ़्सी और जिस्मानी मुतमईन करने का दबाव डाल रहा था उसका आशिक़।  ऐसे मुद्दों पर कहाँ चली जाती है इनकी मज़हबी अक़ीदत।  क्या किसी भी मर्द को रातों में नफ़्सी और जिस्मानी मुतमईन करने की एक आम हिन्दू सक़ाफ़त है अगर नहीं तो ऐसे मुद्दों पर हिन्दू संस्कृति कहाँ चली जाती है। 

हर मुद्दे पर इनको इस्लाम ही काहे को नज़र आने लगता है।  अगर मुद्दा ज़ाफ़रानी अगिया से हिन्दू मज़हब को ठेस पहुंची है तो उस नग़्मे में हरे  रंग की अगोछा भी लपेटे हुए है। लेकिन यह दिमागी मुफ़लिस हर मुद्दे को इस्लाम और पैग़म्बर से मुनसलिक कर देतें हैं।  अगर फिल्म में राम के किरदार में शाहरुख होते और सीता ऐसे ही बरहना रक़्स करती ज़ाफ़रानी अगोछा बाँध कर और लक्ष्मण सीता को बरहना देख कर तरसता रहता तब भी तुमको किसी भी मज़हब पर ऊँगली उठाने का कोई हक़ नहीं है।   सीधे सीधे तुम डायरेक्टर प्रोडूसर को तम्बीह कर सकते हो।    

बीजेपी की हुकूमत का वज़ीर असेम्ली काम काज  ने तो शाहरुख को एक ही चेलेंज दिया था।  में तीन चेलेंज करता हूँ।

एक बॉलीवुड में कनाडा का नागरिक या जम्मू से हकाला गया भारत में पनाह गुज़ीन और तमाम ज़ाफ़रानियों, बीजेपी, संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंदों को क्या वोह ऐसी फिल्म बनायेगें जिसमे सीता देवी ज़ाफ़रानी अंगोछे के साथ बरहना रक़्स करें और उसमे अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ सीता का इश्क़ बताया जाए।  उसमे लव जिहाद का ज़ाविया भी कवर हो जाएगा।  फिर सीता देवी अपने ख़ाविंद राम और आधा खाविंद लक्ष्मण को छोड़ असली आशिक़ अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ भाग जाए।  जदीद भारत है उसमे कुछ भी हो सकता है। 

दूसरा रामायण के मुस्न्निफ को।  जदीद भारत नई कहानी लिखो जिसमे सीता का इश्क़ अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ दिखाया जाए।  और जिस तरह से माज़ी के रामायण में सीता अपने आशिक़ रावण के साथ भाग खड़ी हुई थी आज के दौर के रामायण में अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ भाग जाए। 

तीसरा चेलेंज और वोह हक़ीक़त पर मबनी है।  हिन्दू शिद्दत पसंदों का महज़ ज़ाफ़रानी अगोछे से मज़हब खतरे में जाता है आज के दौर में अगर सीता होती तो वोह किसी रावण के साथ भागने के बजाये अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ ही भागती। 

उसकी वजह है अब्दुल के फ़रज़न्द के पास क़ुव्वत और ताक़त की कोई कमी नहीं है गाये के गोश्त में बोहोत पावर होता है।  और राम ठहरा घास पूस खाने वाला।  वोह तो सीता को आज के दौर के "बेशर्म रंग" वाली हालात में भगवा अंगोछा लपेटे हुए देखे तो अपने नफ़्स पर हाथ रखते ही पानी छोड़ देगा।  बाक़ी का काम फिर अब्दुल के फ़रज़न्द को ही करना होगा।   

नाज़रीन इतनी लम्बी चौड़ी तहरीर करने के पीछे हक़ बयान करना है।  इन दिमागी मुफ़लिसों को हर मुद्दे पर मुस्लिम ही सॉफ्ट टारगेट नज़र आतें हैं।  बीजेपी की हुकूमत का वज़ीर असेंबली काम काज की  बेहूदा मिसाल और बयान पर धोने के बाद कुछ दिमाग़ी मरीज़ों को धोने की बारी है। 

कुछ संघी बोल रहें हैं यह तो मोदी जी की इन जेहादिओं को बढ़ावा देने की नीति की वजह से हुआ है। सबका साथ सबका विकास जैसी बातों से इनकी तरक़्क़ीयाती अमल करने की कोई ज़रुरत नहीं है।  

हम भी यही चाहतें हैं।  बिलकुल नारा बदलो।  अभी तो बीजेपी, मोदी, संघ और शिद्दतपसन्द काफिरों को बोहोत कुछ भोगना है।  जिस जिस मुद्दे पर बड़े से बोलते थे लेकिन वोह काम करते नहीं थे।  अब ऊपर वाले की लाठी पड़ रही है तो औक़ात पर आ रहे हो।  नहीं चाहिए तुम्हारा झूठा सबका साथ सबका विकास।  बोल ज़ोर से हिन्दू का साथ हिन्दू का विकास।  मुसलमानों के लिए काम करोगे सिफर, ढिंढोरा पीटोगे जग भर।  अब ऐसा नहीं चलेगा

वैसे भी एक के बाद एक मोदी, बीजेपी की जानिब से किये गए वादे जुमला साबित हो रहें हैं।  अमित शाह के एतेराफ के बाद की वोह एक जुमला था ऐसे १५ लाख किसी के भी खाते में नहीं आते। चुनाव में ऐसी बातें बोली जाती हैं, लेकिन जनता खुद भी समझती है की यह पूरा होने वाला नहीं है। 

वज़ीरे दाखला के १५ लाख के दावे को जुमला बताने के बाद हूकूमते हिन्द के वज़ीरे ख़ारजा जयशंकर ने सबका साथ सबका विकास के दावे की पोल खोल कर रख दी। अभी तीन रोज़ क़ब्ल जब पाकिस्तान के वज़ीरे ख़ारजा मोहतरमा हीना रब्बानी खार और मोहतरम बिलावल भुट्टों ने हिंदियों की पिटाई की तो कुट पिट के एक सहाफी इजलास में जयशंकर बोलतें हैं सबका साथ……… हिन्दुस्तान में मुमकिन नहीं है।  जिसके ऊपर मेने बतौर सहाफी ख़बरनामे पर उनकी खूब खिचाई भी की है।   

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...