Monday, 30 September 2019

महाराष्ट्र इन्तेख़ाबात पे सहाफी की पैनी नज़र.


अज़ीज़ नाज़रीन,

हिंदुस्तान के सूबे महाराष्ट्र और दीगर हल्क़ों में इन्तेख़ाबात का खुमार चढ़ने लगा है.  सियासी जमातें अपने अपने नुमाइंदों के साथ पिछले अपने किये हुए कामों का तज़किरा खूब ज़ोर और शोर से कर रहें हैं.  बहर कैफ दीगर सूबों की बात ना करते हुए फिल वक़्त महाराष्ट्र की बात करतें हैं.  इन्तेख़ाबात तो महाराष्ट्र में बाद में होंगे लेकिन उसका रिजल्ट और वज़ीरे आला का इन्तेख़ाब तो पहले ही हो चूका है.  दुनियां वालों के पास कोई भी तहक़ीक़ाति मालूमात बाद में पहुँचती है पहले तो वो अल्लाह के ख़ास बन्दों के पास पहुंच जाती है.  दुनिया में चीज़ें बाद में मंज़रे आम पे आतीं हैं पहले तो उसके ऊपर मोहर वली कामिल लगा देतें है और फैसला कर देतें हैं.

महाराष्ट्र में भी इन्तेख़ाब तो बाद में होंगें लेकिन उसका फैसला तो पहले ही हो चूका है.  इस इन्तेख़ाब में दो जुड़ी हुई सियासी जमातों का इक़्तेदार तक़रीबन ख़त्म हो जाएगा.  तीन जामात उभर कर आएंगीं और सियासी अखाड़े की जंग इन तीनों के बीच में ही रहेगी.  एक जमात बोहोत ज़्यादा सीटें ले कर आएगी दूसरी काफी कम लाएगी और तीसरी उससे कम.  लेकिन दूसरी और तीसरी जमात के बीच जंग काफी दिलचस्प मरहले में पहुंचेगी.  कभी दूसरी जमात आगे होगी तो कभी तीसरी.  बिल आखिर होगा वही जो मालिके हक़ीक़ी को मंज़ूर होगा. 

महाराष्ट्र की हुकूमत एक नंबर वाली जामत को तीन या दो नंबर वाली जमात की हिमायत से बनेगी. उस ख़ास जामत की अवाम का एक ख़ास तपका वज़ीरे आला की कुर्सी पे अपने नुमाइंदे को फ़ाइज़ देखना चाहेगा.  लेकिन उस जमात के सरबराह को कुर्बानी पेश करनी होंगी और अवाम की अर्ज़ी को मुस्तरद कर के वज़ीरे आला की कुर्सी पे हमारी पसंद के नौजवान और उनके फ़रज़न्द को फ़ाइज़ करना पड़ेगा.  

फिर कुर्सी पे नए वज़ीरे आला फ़ाइज़ होंगे.  नई कैबिनेट में एक ख़ास ख़वातीन को वज़ीर की पोस्ट दी जायेगी.  तमाम अवाम भौंचक्का और अचभित हो जाएगा.  वज़ीरे आला के इस इन्तेख़ाब से तमाम महाराष्ट्र और दिल्ली की सल्तनत में एक भूचाल आ जाएगा.  अवाम और मीडिया के लंगूर उधम मचा डालेंगे.  बिल आखिर वज़ीरे आला अपने फैसले को हरगिज़ नहीं बदलेंगे, और वो ख़वातीन वज़ीर बनेगी और अपनी ज़िम्मेदारी को बा खूबी अंजाम देगी. 

नई बम्बई के एक ख़ास खित्ते पे वज़ीरे आला की ख़ास तवज्जो होगी और उस खित्ते की खूब तरक़्क़ी होगी.  जो खित्ता कभी मीडिया के लंगूरों के लिए दहशत का एक हिस्सा होता था उसी खित्ते में अब मीडिया आ कर अपना डेरा जमाया करेगा.  और बड़ी बड़ी मरात से उसको नवाज़ा करेगा. 

अगले पांच सालों में महाराष्ट्र में नए वज़ीरे आला कई कामयाब फैसले करेगें.  महाराष्ट्र की खूब तरक़्क़ी होगी.  किसानों, अक़लियतों और एहले हुनूद की कोई हक़तल्फ़ी नहीं होगी.  बरक्स शर पसंद तंज़ीमे शिद्दत मचाने की जुर्रत करेगीं लेकिन उनको अपनी सूझ बूझ और आला ओहदेदारों से सलाह मशोरा कर के वज़ीरे आला उस शर के बीज को पेड बनने से पहले ही कुचल डालेंगे.

महाराष्ट्र हिन्दुस्तान का एक वाहिद ऐसा सूबा बनेगा जहाँ की अवाम की माशी हालत तमाम हिंदुस्तान के किसी भी सूबे के अवाम से कई गुना ज़्यादा होगी.   नई फैक्ट्रिया खुलेंगी अवाम के लिए रोज़गार मोहिय्या होंगे.  महाराष्ट्र में हिंदुस्तान के किसी भी सूबे से ज़्यदा सस्ता साज सामान मिलेगा.  ये देख कर दीगर सूबे के अवाम महाराष्ट्र में पानी की तरह बहते आयेगें.  वज़ीरे आला उनको रोकने के लिए और महाराष्ट्र की माशी हालात को ख़राब ना करने के लिए ख़ास तवज्जो देंगे और फिर महाराष्ट्र में वही अवाम रह सकेगा जो किसी ख़ास वक़्त  तक महाराष्ट्र में आ कर बस गया होंगे.  इस मोहीम को तमाम सियासी और वज़ीरे आला की हिमायती जमात का पूरा ताऊन और हिमायत मिलेगी क्योंकि महाराष्ट्र में दीगर सूबे के अवाम की रोक थाम किसी मज़हब की बुनयाद पे नहीं होगी बल्कि महाराष्ट्र की फलाह के लिए होगी.

अगले पांच साल महाराष्ट्र में कोई बद अमनी नहीं होगी कोई ख़ाना जंगी नहीं होगी कोई सयासी बवाल नहीं उभरेगा.  महाराष्ट्र में फलाही कामो को खूब फरोग मिलेगी और उसकी तार्राकी होगी.

Saturday, 28 September 2019

रूहानी अलफ़ाज़ और जिहाद फी सबीलिल्लाह.

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आप लोगों के दरमियान मुफ्तियाने किराम और मौलाना हज़रात की सरकारे दो आलम हज़रत मोहम्मद मुस्तुफा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की चंद हदीस मुबारक के बयान की निस्बत से आया हूँ.  कोई भी मुसलमान किसी भी सही मुसनद, मोतबर और बुखारी शरीफ की हदीस का इंकार नहीं कर सकता और अगर वो हदीस का इंकार कर रहा है तो वो काफिर है और कुफ्र कर रहा है.  क्योंकि क़ुरआन हर जगह खुला हुकुम दे रहा है ऐ ईमान वालों अल्लाह और उसके नबी की बात मानो. 

कुछ मौलाना हज़रात सिक्के का एक पहलू तो बताते है लेकिन पूरी बात और सिक्के का दूसरा पहलू नहीं बताते. जिसकी वजह से हम जैसे तन्क़ीदी लोगो के दिलो दिमाग में एक अलग ही कैफियत तारी हो जाती है और सवालात का सिलसिला ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता.

गुजिश्ता हफ्ते मौलाना वहीदुद्दीन का एक वीडियो देख रहा था जिसमे वो आधी इंग्लिश और आधी हिन्दू में एक हदीस शरीफ बयान कर रहे थे.  मौलाना साहब कहते हैं की अल्लाह के रसूल की हदीस है जिस मुसलमान ने किसी भी इंसान का दिल दुखाया वो जन्नत में नहीं जाएगा.  मज़ीद मौलाना साहब हदीस की तशरीह करते हैं.  इस हदीस में सिर्फ मुसलमानों के दिल आज़ारी का ज़िक्र नहीं है, बल्कि हर शख़्स का ज़िक्र है ख़्वाह वो काफिर ही क्यों ना हो.  फिर आगे मौलाना साहब कहतें है की अगर आपको जन्नत की तलब है या आप चाहते हो की आपको जन्नत में आला मुक़ाम मिले तो किसी की दिल आज़ारी मत करो.  नहीं तो आप जन्नत से महरूम रहोगे.  

मौलाना वहीदुद्दीन साहब को चंद बातें कहना चाहूंगा:-

१.      जिस हदीस की आपने बात कही है सर आँखों पे लेकिन वो हदीस अमन पसंद मुल्क, जगह के लिए और जब मुल्क़ में अमनों अमान हो उस वक़्त के लिए है. जंग जैसे हालात में नहीं.
२.       आपने फर्माया की जिसको जन्नत की आरज़ू है वो किसी भी शख़्स की दिल आज़ारी ना करे.  में कहना चाहता हूँ अगर कोई भी अमल इसलिए किये जाएँ की दुनिया अच्छी हो जाए जन्नत मिल जाए तो वो अल्लाह के साथ अदल बदल की पेश कश (एक्सचेंज ऑफर) हो गया. हम अच्छे आमाल करेंगे तू बदले में जन्नत अता कर. हम नमाज़ क़ायम करेगें तू दुनिया अच्छी कर. अल्लाह से मोहब्बत है तो कैसा एक्सचेंज. मोहब्बत में कोई एक्सचेंज नहीं बे लोस बग़ैर किसी लालच के अमल होना चाहिए. बिल फ़र्ज़ तमाम आमाले सालेहा  किये और उस मालिके हक़ीक़ी ने ना जन्नत अता की ना दुनिया फिर शिकवा भी तो हम ही करते है. ऐ अल्लाह इतना सब करने के बाद भी हम पे ये मुसीबत.
३.         दोज़ख़ किस की मर्ज़ी से मिलेगी वो थोड़ी कोई शैतान की मर्ज़ी से मिलेगी. वो भी तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही मिलेगी. मज़ा तो तब है जब आप तमाम आमाले सलेहा करें और अल्लाह आपको दोज़ख़ दे दे फिर भी आप उसको बोहोत बड़ी नेमत जाने और कहें अल्लाह आप कितने रहीम है हम तो समझ रहे थे की आप हमको मुनाफ़िक़ों वाली दोज़ख अता करेंगे लेकिन आपने आपको इतना ख़ुशक़िस्मत जाना, की काफिरों की दोज़ख़ में जगह दी.
४.         जंग जैसे हालात में तो हुकूमत के निज़ाम और कानून बदल जातें हैं, फिर अगर कोई बंदा जिहाद फि सबिल्लीलाह कर रहा है तो क्या उसके ऊपर कोई क़ैद होनी चाहिए?   दुश्मन को हलाक़ करने से लेकर क्या तलवार की मार, हाथ की मार और ज़ुबान की मार उसके लिए सब जाईज़ हैं 

जब किसी काफिर मुल्क़ में हर जानिब बद अमनी हो ख़ाना जंगी चल रही हो और वो काफिर मुल्क का बादशाह या हाकिम मुस्लिम अवाम पे सख्त तरीन ज़ुल्म और दहशत करता हो, उसके ख़िलाफ़ इस्लामिक जिहाद चालू हो तो ऐसे हालात में शीरी ज़ुबान का मुज़ाहेरा कैसे मुमकिन है.  जिहाद की तीन तहरीरी इनतेबह (वार्निंग) की अव्वलीन शर्त ही ये है की या तो आप दाख़िले इस्लाम हो जाव नहीं तो इस्लामिक मुमालिक के साथ जंग करो.  और जिहाद में दुश्मन को ख़त्म करने का हुकुम है ना की उससे दोस्ती और उसके लिए दस्तरख़्वान वसी करने की हिदायत.  हाँ वो बात अलहदा है की जब जिहाद ख़त्म हो जाए और आप काफिरों पे ग़ालिब हो जाएँ तो अब आप उनके साथ हुसने सुलूक करें.  क्योंकि अब रियासते इस्लामी क़ायम हो चुकी है और अब वो आपके असीर हैं.  अब जंगी क़ैदिओं को ज़्यादा अज़ीयत और तकलीफ ना दी जाए.   

हज़रते उमर फ़ारूक़ बोहोत ही जलाली सहाबी ऐ रसूल थे.  आपके दाख़िले इस्लाम होने के बाद अल्लाह के नबी ने फर्माया उमर तुम जैसे हो वैसे ही रहो और अपने गुस्से को इनके लिए नहीं बल्कि इनके लिए इस्तेमाल करो.  अपने जलाल को इनके लिए नहीं बल्कि इनके लिए इस्तेमाल करो.  उस वक़्त मक़्क़ा में कुफ्र का दौर था और हर जानिब अल्लाह के रसूल के दुश्मन और दीने इस्लाम को ख़त्म करने वाले गिरोह मौजूद थे.  तो आप सल्ललाहो अलैहे वस्सलम के फरमान के मुताबिक़ मोमिनो के लिए गुस्सा और जलाल कम करो लेकिन काफिरों के लिए कम मत करो. 

नाज़रीन आपको बताता चलूँ  यूं तो अल्लाह का क़ानून तमाम आलमे इंसानियत के लिए है लेकिन वो नाफ़िज़ सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम रियासतों पे होता है और उस क़ानून के अमल पेश सिर्फ मुस्लिम अवाम ही होतें हैं.  जहाँ तक काफिरों का सवाल है वो जिस ख़ुदा का इंकार कर रहें हैं वो कैसे उसके बनाये क़ानून को मानेगे.  इस्लामिक रयासत के अवाम को ५ दर्जों में बाँट सकतें हैं. 

१. मोमिन: मुस्लिम रियासत का सबसे अफ़ज़ल बाशिंदा होता है मोमिन.  मोमिन वो बंदा होता है जो अपने आपको अल्लाह और उसके रसूल की मर्ज़ी के हवाले कर दे.   

२. काफिर:  काफिर का मतलब होता है इंकार करने वाला.  ऐसा शख़्स जो किसी अच्छी बात का इंकार करे वो काफिर.  रसूल की बात का इंकार करे अल्लाह के कानून का इंकार करे वो काफिर होता है.  

३. मुशरिक: ऐसा शख़्स जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करे.  मूर्ती, तसावीर, आतिश या किसी और दीगर दुनयावी साज सामान की इबादत करने वाला और उस ही से मदद तलब करने वाला शख़्स मुशरिक होता है.  इस मूर्ती पूजा में वली अल्लाह और कामिल बुज़ुर्गाने दीन के रौज़े की ज़ियारत करना उनके रौज़े पे फातेहा ख़्वानी पढ़ना शामिल नहीं हैं.   

४. मुनाफ़िक़: ऐसा शख्स जो सिर्फ नाम का मुस्लिम होता है और उसका हर अमल इस्लाम को ज़लील करने और मुसलमानों को इज़ा पहुंचाने का होता है.  ऐसे लोग चेहरा लिबास और नाम इस्लामिक इख़्तियार करतें हैं लेकिन इनके दिलो दिमाग में इस्लाम के लिए हद दर्जे की नफरत बुग्ज़ और कीना होती है और ये लोग मुसलमानों को नुकसान और ईज़ा पहुंचाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं.

५. मुल्हिद (नास्तिक).  ये वो लोग होतें हैं जिनका किसी भी खुदा पे यक़ीन नहीं होता है बरक्स ये लोग समझतें हैं की इस कायनात का निज़ाम सदियों से चल रहा है और यूं ही चलता रहेगा.  इस्लाम का पहला कलमा ही नास्तिक से शुरू होता है. "नहीं है कोई माबूत, आगे कहा गया मगर अल्लाह के" एक मुल्हिद नास्तिक सच्चा आस्तिक या अल्लाह पे यक़ीन करने वाला बन सकता है.  नास्तिक वो जो सब कुछ देखे समझे तहक़ीक़ करे फिर भी उसपे यक़ीन ना करे.  लेकिन सब कुछ देखने समझने और तहक़ीक़ करने के बाद इस बात को तस्लीम कर ले की कोई तो ताक़त है जो कायनात के निज़ाम को संभाले हुए है और वो ताक़त इंसानी अक़ल से परे है तो हो गया वो आस्तिक. या खुदा पे यक़ीन करने वाला.    

अब इस्लामिक रियासत के मुस्लिम की जानिब से इन ५ लोगों की जमात में से किसी की भी दिल अज़ारी हुई तो ऊपर बताई हुई हदीस की खिलाफवर्जी करता हुआ पाया जाएगा और उसके हक़ में जन्नत ना होगी.   


सहाफी ज़ुबेर एहमद ख़ान

Sunday, 22 September 2019

अज़वाजी ज़िन्दगी, वाल्देन की फर्माबरदारी और रूहानी मेहफ़िल

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज के हालाते हाजरा और मग़रिबी तहज़ीब से मुत्तासिर हो कर आमूमन नौजवान तपक़ा बच्चे और बच्चियाँ अपनी अज़वाजी ज़िन्दगी, शादी वग़ैरह के  फैसले खुद ही ले लेते हैं, जिसका ख़मयाज़ा उनको आगे चल के रूसवाई और ज़लालत की शक्ल में मिलता है.  इस मुद्दे पे हज़रत अल्लामा मौलाना रज़ा साक़िब मुस्तफ़ाई का आब दीदा बयान सुनिए.


बच्चे और बच्चियाँ शादी वग़ैरा के लिए अपने हमक़दम ज़िन्दगी के रहनुमा में सिर्फ एक या दो ही चीज़ों को तलाश कर पातें हैं जबकि उनके वाल्दैन की चश्मे दूरंदेशी वो सब चीज़ें देख लेते हैं. जिसकी ज़रुरत एक खाविंद को अपनी एहलिया में होनी चाहिए और एक एहलिया को अपने खाविंद में होनी चाहिए.   फिल वक़्त एक नौजवान जौड़ा अपने शरीके हयात में सिर्फ एक दो खूबी देख कर मुत्तासिर हो जाए और अपने वाल्दैन के किसी दुसरे फैसले पे तनक़ीद करें की क्या अब्बा आप तो बूढ़े हो गए हो, क्या अम्मी आपकी सोच धकियानूसी हैलेकिन जैसे जैसे हालात उनके सामने आयेगें उनको इस बात का बा खूबी इल्म हो जाएगा की जो फैसला बच्चो ने अपनी ज़िन्दगी के बारे में बगैर वाल्दैन को शामिल कर किया वो तबाह कुन साबित हुआ और जो फैसला वाल्दैन की रज़ामंदी से उनकी सूझ बूझ के साथ हुआ वो खुश खुर्रम और बेहतरीन ज़िन्दगी का बाइस बना.

वाल्दैन के हुक़ूक़ के बारे में बे पनाह हदीस मुबारक और क़ुरआन का खुला क़ौल हैअल्लाह तबारक ताला क़ुरआन में फार्मा रहा है की जब तुम्हारे वाल्देन बुढ़ापे को पहुंच जाए तो उनसे ऊंची आवाज़ में बात मत करो और उनको झिटकारो मतऔर उनके साथ हुसने सुलूक करो जैसा की उन्होंने तुमको तुम्हारे साथ जवानी में किया था

ये तो खुदा का क़ानून है और वो कभी तब्दील नहीं हो सकता बिल फ़र्ज़ वाल्दैन का फैसला आपको गलत मालूम हो रहा होगा लेकिन अगर आप उस फैसले पे सरे तस्लीम ख़म हो गए तो अल्लाह अपना फैसला भी बदल देता है और जो फैसला आपके लिए तबाह कुन साबित होने वाला बा ज़ाहिर दिख रहा था लेकिन आपके वाल्देन की मर्ज़ी को आपने तरजि दी तो अल्लाह उस तबाही को भी आपके लिए रेहमत बना देता है

ये तो अल्लाह के इख़्तियार में है लोह क़लम से जो तक़दीर लिख दी गई उसको बदलने का इख़्तियार पूरी तरह से अल्लाह तबारक ताला के हाथ में है

ना सिर्फ अज़वाजी ज़िन्दगी बल्कि कोई भी रूहानी या दुनयावी काम में अगर वाल्देन की मर्ज़ी शामिल नहीं है तो उस काम में आपको कभी भी कामयाबी नहीं मिलेगी

सिर्फ वाल्दैन के उस हुकुम की खिलाफ वर्ज़ी कर सकतें हैं जो हुकुम अल्लाह और उसके रसूल की शरीयत से अलेहदा हो. जैसे के वाल्दैन ग़ैर शराई काम करने को कहतें हैं, कुफ्र, मूर्ती पूजा, ज़िनाकारी, ना हक़ क़त्लो ग़ारत वग़ैरा करने का दबाव डालतें हैं या कोई भी ऐसा काम कहतें हैं जो अल्लाह और उसके रसूल के हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी करता है, तो ऐसी सूरत में आप उनकी हुकूम अदूली कर सकतें हैं.

यहाँ तक की फुक़हा बताते हैं की कोई शख़्स फ़र्ज़ नमाज़ में अल्लाह से लौ लगा बैठा है और उसकी अलील वालेदा की आवाज़ सूने तो नियत तोड़ दे तो उसका अमल बाइसे मज़मत या बाइसे लानत नहीं होगा बल्कि बाइसे फख्र तस्लीम किया जाएगाएक बंदा मोमिन अल्लाह के लिए नमाज़ अदा करता है और उसके तमाम अमल अल्लाह की रज़ा हासिल करने के लिए होतें हैं और अल्लाह की रज़ा ओलाद के लिए वाल्दैन की रज़ा में शामिल हैं.

एक शख़्स नमाज़ को अपने वक़्त से ताख़ीर कर दे या तर्क कर दे क्योंकि उसको खदशा है की वो नमाज़ पे खड़ा हुआ और कब उसकी अलील वल्दा को उसकी ज़रूरत पड़ जाए तो ऐसी तर्क की हुई नमाज़ वल्दा को दुःख पंहुचा के पढ़ी हुई नमाज़ से हज़ार गुना अफ़ज़ल है.

हज़रते औवेसे क़रनी रज़िअल्लाह अनहा ने रसूल अल्लाह का दौर पाया और इस्लाम में दाख़िल हुए लेकिन आप नबी सल्ललाहो अलैहे वस्सलाम का दीदार की हसरत दिल में लिए, लेकिन कभी नबी का दीदार ना कर सके, कियोंकि वो अपनी अलील ना बिना वालेदा की ख़िदमत में हमेशा मसरूफ रहते और अगर नबी के दीदार के लिए यमन से मक्का आते तो उनकी वालेदा की देख भाल कौन करता. इस कश्मकश में वो कभी नबी की बारगाहे रूहानी में हाज़िर ना हो सके लेकिन उनको सहाबा का दर्जा हासिल हैऔर नबी सल्लाहो अलयहे वस्सल्लम ने इस दुनिया फ़ानी से पर्दा करने से क़ब्ल जलील क़द्र सहाबा हज़रते उमरे फ़ारूक़ रज़ि अल्लाह हो अन्हा और अली शेरे खुदा को नसीहत की थी के अगर तुम्हारा कोई काम ना बन पाए तो ओवेस से दुआ करने को कहना उसकी दुआ अल्लाह कभी रद्द नहीं करता है

एक सहाबी रसूल थे और जिहाद में जाने के लिए अल्लाह के रसूल के हुज़ूर पहुंचे और जिहाद पे जाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की आप सल्ललाहो अलैहे वस्सलम ने फ़रमाया क्या आपके वाल्देन ज़िंदा है तो उन्होंने जवाब दिया जी मेरी वल्दा ज़िंदा है और अलील हैंअपने फ़रमाया आप उनकी ख़िदमत कीजिये और आपको जिहाद का सवाब मिलेगाआपके लिए वही जिहाद है

अल्लाह ताला कहने और सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...