Monday, 22 December 2025

असदुद्दीन की बढ़ती मक़बूलियत।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

भारत में इन्तेख़ाब का ख़ुमार ख़तम हुआ उसके साथ ख़तम हुआ अक़ीदत मंदों के भगवान की ऊल जलूल बकवास का दौर, जिसको सुन कर ऊबकारी आने लगी थी।  ऐसा महसूस होने लगा था की अब यह शख़्स वकाई में ज़ईफ़ हो गया है और इसको किसी बेहतरीन नफ़्सियाती जर्राह से राब्ता क़ायम करने की सख़्त ज़रुरत है। 

नाज़रीन हाल ही में बिहार में ६ रकून स्टेट असेंबली की फ़तह और महाराष्ट्र बल्दिया इन्तेख़ाब में मजलिस इत्तेहादुल मुस्लेमीन ने कारगरदेगी दिखाई है उस से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है इत्तेहादुल मुस्लेमीन की मक़बूलियत में खासा इज़ाफ़ा हुआ है  जो बात वोह दिसम्बर २०२३ या उस से भी क़ब्ल कहते रहे थे उस ही मुद्दे पर मजलिस इत्तेहादुल मुस्लेमीन लड़े और फ़तह हासिल की है।

मजलिस के सदर हर मुबाहिसे हर तक़रीर में बोलते थे हर मुख़ालिफ़ खुद को मोदी से बड़ा हिन्दू दिखाना चाहता है।  अगर मुख़ालेफ़ीन हिन्दू मुस्लिम पर चुनाव लड़े तो हरगिज़ ज़ाफ़रानी महाज़ नहीं जीत पायेगें।  और मोदी चाहते ही यही है की चुनाव हिन्दू बनाम मुस्लिम कर दिया जाए फ़िर उसको हवा ज़ाफ़रानी तंज़ीम के तमाम रकून देना शुरू कर दें।  जहाँ एक तरफा चुनाव हुआ की उसका फ़ायदा बीजेपी को होगा।  मुख़ालेफ़ीन मुद्दों पर चुनाव लड़ें।  हरगिज़ उसको हिन्दू मुस्लिम नहीं होने दें और ना ही इन्तेख़ाब को मुद्दों से हट कर मोदी को हिन्दू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, हिंदुस्तान पाकिस्तान के नाम पर अग़वाह करने दें।  

मोदी, बीजेपी ने भरसक कोशिश की के इन्तेख़ाब हिन्दू मुस्लिम पर लड़ा जाए और अक्सरियत अवाम के दिल में नफरत का ज़हर मज़ीद बड़ा कर एक तरफ़ा अक्सरियत अवाम के वोट ज़ाफ़रानी तंज़ीम को मिल जाएँ।  

नाज़रीन मोदी नाम के इस ताजिर को मालूम है की हिन्दू कितना बेवक़ूफ़ है उसको मज़हब के नाम पर बहकाना कितना आसान हैं।  तभी तो भगवान रजनीश (ओशो) भगवान चंद्रास्वामी जैसे पाखंडी इस ही ज़मीन पर पैदा हुए।  

नाज़रीन अगर आज मुख़ालेफ़ीन में से कोई फ़तहयाब हुआ है तो उसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ असदुद्दीन हैं।  जिन्होंने मुख़ालिफ़ीन को जीत का मंत्र दिया और उसका असर अब दिख रहा है।  असदुद्दीन को वज़ीर ए आज़म देखना बोहोत से अवाम असंद करेगें।  जिनमे शामिल हैं एक बड़ी अक्सरियत मुस्लिम अवाम के साथ सिख, क्रिस्टी, दलित, आदिवासी और सेक्युलर हिन्दू।   कियोंके वोह तालीमी आफ़ता हैं, क़ानून और दस्तूर के जानकार हैं, दानिशमंद हैं आगे के हालात पर गहरी पकड़ होती है।   दूसरी बात वतन से मोहब्बत उनके अंदर कूट कूट कर भरी हुई है।  तीसरी बात बदउनवानी (करप्शन) के कोई भी इलज़ाम उनके ऊपर नहीं है। 

अगर इंडिया महाज़ को सीटें कम पड़ती है और मजलिस उनको सपोर्ट करती है तो वज़ीर ए आज़म की पहेली पसंद असदुद्दीन ही होंगे।  

सहाफ़ी ज़ुबेर

Wednesday, 2 April 2025

क़ानूनी चाबुक अब फ़रेबी सहाफ़ियों पर चलना चाहिए।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हिंदुस्तान की तक़दीर में तबाही और बर्बादी, तक़सीम की अहम् वजह बेगुनाह मुसलमानों की ग़ैर क़ानूनी गिरफ़्तारी और अकसरियत अवाम के गुनाहों की अनदेखी रही है।  एक जानिब जहाँ मासूम शरजील इमाम, उमर ख़ालिद, शिफ़ा उर रेहमान, ताहिर हुसैन जैसे सैकड़ों मुसलमान दिल्ली दंगों के इलज़ाम में आजतक ५ सालों से जेल में बंद हैं।  वहीँ कपिल मिश्रा दंगों का एहम मुल्ज़िम ५६ लोगों का क़ातिल वज़ीर क़ानून बना बैठा है। आज ५ साल बाद कचहरी ने उसके ऊपर FIR  दर्ज करने की हिदायत दी है। अदालत ने कहा पुलिस की ट्रैक रिपोर्ट के हिसाब से वोह उस जगह मौजूद था जहाँ दंगा हुआ।  यह मज़हबी तफ़रीक़ है। इसके अहम मुजरिम भारतीय ज़ाफ़रानी मीडिया के वोह सहाफ़ियों की टोली है जो हर वक़त हिन्दू मुस्लिम करते थे।  मुसलमानों का मीडिया ट्रायल कर उनके लिए जेल का रास्ता हमवार करते थे। 

मुस्लिम आला तालीमी आफ़ता यूनिवर्सिटी के तहक़ीक़ीन को जेल में ५ सालों से क़ैद कर के रखा है।  नाज़रीन ऐसे कई मामले सामने आये जिसमे मीडिया ट्रायल के बाद पुलिस ने मुस्लिम बच्चों को गिरफ़्तार किया ५ साल ७ साल किसी किसी मामले में १० और २० साल जेल में रहने के बाद अदालत को उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सुबूत न मिलने पर उनको बाइज़्ज़त रिहा किया गया।  तब्लीग़ी जमात बेहतरीन मिसाल है।  कैसे कैसे अलफ़ाज़ बोले गए थे मौलाना साद साहब की रूहानियत को एक झटके में दहशतगर्दों से मिला दिया था।  कारोना बम, कारोना आतंकी।  जो जिस ज़मीर फ़रोश ज़ाफ़रानी सहाफ़ी के ज़ेहन में आ रहा वोह अलफ़ाज़ दिए जा रहे थे।  लेकिन अदालत ने क्या पाया कुछ नहीं ना ही साजिश के कोई सबूत मिले और ना ही ताबिलगी जमात का एक भी मुसलमान करोना फ़ैलाने का ज़िम्मेदार पाया गया सभी बाईज़्ज़त बरी हो गए।  

जहाँ हिन्दू दहशतगर्दाना जुर्म में मुलव्विस भी पाया जाता है तो उसको सिर्फ मुजरिम मुखातिब किया जाता है और मुसलमान पर फ़ौरन दहशतगर्द का लेबल लगा दिया जाता है।  अब अदालतों को सही और ग़लत का फ़ैसला करना होगा।  कपिल मिश्रा जैसे दरिंदे, ज़ालिम, वतन का ग़द्दार, इज्तेमाई क़ातिल को अदालत को दहशतगर्द  के क़ानून के अंदर गिरफ़्तार कर सज़ा देनी चाहिए।  

वहीँ ऐसे तमाम सहाफ़ियों के ख़िलाफ़ भी कारवाही होना चाहिए जो बग़ैर तहक़ीक़ मुस्लिम नौजवानों के ख़िलाफ़ एक तरफा माहौल तैयार करने के मुजरिम हैं।  उन सबके ख़िलाफ़ तहक़ीक़ होना चाहिए की किस के इशारे पर कहने पर यह सहाफ़ी से जल्लाद और दरिंदे बन गए।  इनकी आमदनी की जांच होना चाहिए।  २०१२-१३ में इनके पास कितनी दौलत और असासे थे और २०१४ के बाद इनकी आमदनी कितनी हुई।  

इनका इनकम टैक्स देना इनके जुर्म को कम नहीं कर सकता।  कियोंके अगर एक लूटेरा डाकू क़तल करता है और लूट के माल से एक चौथाई ग़रीबों में तक़सीम कर देता है बाक़ी अपने इस्तेमाल में लेता है। तो उसका जुर्म कम नहीं होगा।  उनकी सबकी जांच होना चाहिए मुजरिम साबित होने पर सज़ा के साथ तमाम असासे और दौलत ज़ब्त करना चाहिए।  

जिन मुसलमानों को हक़ की आवाज़ बुलंद करने पर जेल में ग़ैर ज़रूरी रखा गया उनको अक़वाम ए मुताहिदा से अमन और इंसानियत के मुहाफ़िज़ के तमग़े और एजाज़ से सरफ़रोज़ कर इज़्ज़त अफ़ज़ाई मिलना चाहिए।  जैसे नेल्सन मॉडेला को काले अवाम के हक़ के लिए हुकूमत से लड़ने पर जेल में रखा गया, बाद में उनको इज़्ज़त बक्शी गई।  

शरजील इमाम आला तालीमी आफ़ता तहक़ीक़ के तालिब इल्म हैं, उनके जैसा आला ज़हन और आला तालीम शायद ही किसी तालिब ए इल्म ने ली होगी।  वोह अपनी यूनिवर्सिटी के वाहिद तालिब ए इल्म हैं जो इतनी आला तालीम ले कर हर शेवे में सर ए फ़ेहरिस्त रहे।  

 

सहाफ़ी ज़ुबेर


Friday, 31 January 2025

बाप और बेटा

अज़ीज़ नाज़रीन, 

आज की कहानी बाप बेटे के दरमियान मोहब्बत और इज़्ज़त को ज़ाहिर करती है।  

किसी शहर में एक शख़्स रहता था।  उसने अपने अहल ए ख़ाना को आला मय्यार दिए और आला तालीम से नवाज़ा।  बेटा अब बोहोत बड़ा ताजिर बन गया।  उसने अपने वालिद के नाम पर कई कंपनियां खोली।  एक नई कंपनी की इफ़्तिताह पर कंपनी की इन्तेज़ामियाँ के तमाम आला मेमब्रानों का एक इजलास मुनक़्क़िद किया।   उसमे उसने अपने वालिद को सदर की कुर्सी पर फ़ाइज़ होने की गुज़ारिश की फिर उसने एक लम्बी चौड़ी तक़रीर की।   बेटे की इज़्ज़त अफ़ज़ाई देख कर वालिद ने बेटे के कंधे पर हाथ रख दिया। 

इस मौक़े पर सहाफ़ियों का हुजूम भी मौजूद था।  बेटे की तक़रीर के बाद सहाफ़ियों के सवाल जवाब का दौर का आगाज़ हुआ।  सहाफ़ी ने बेटे से पूछा इस दुनिया में सबसे ताक़तवर तुम किस को मानते हो।  वालिद को तवक़्क़ो थी की बेटा उसका नाम बताएगा लेकिन बेटे ने बड़े ही फख्र से  जवाब दिया में अपने आपको सबसे ताक़तवर मानता हूँ।  बेटे का जवाब सून कर वालिद का दिल टूट गया और उसने अपने बेटे के कंधे से हाथ उठा लिया। 

फिर सवाल किया गया आप दुनियां में सबसे ज़्यादा कामयाब किस को मानते हो तो उसने जवाब दिया बेशक मेरे वालिद को।  अब वालिद को कुछ माजरा समझ में नहीं आया।  अगर वोह कामयाब है तो बेटा कैसे सबसे ज़्यादा ताक़तवर हो गया।

इजलास के बाद बाप ने बेटे से पूछा बेटा तुमने अपने आपको दुनियां का सबसे ज़्यादा ताक़तवर किस बुनयाद पर बोला था।

वालिद की बात सून कर बेटा नूरानी मुस्कुराया और बोला जब सहाफ़ी मेरे से सवाल कर रहा था तब आपका हाथ मेरे कंधे पर था।  मेने अपने आपको सबसे ज़्यादा ताक़तवर जाना।  लेकिन जब आपने हाथ हटा लिया तो आप सबसे ज़्यादा कामयाब हो गए। 

बेशक वाल्दैन की शफ़क़त और तहफ़्फ़ुज़ में नस्लें परवान चढ़ती हैं।  

सहाफ़ी ज़ुबेर

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...