Sunday, 25 January 2026

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया लेकिन मिल्लत को गर्त में झोंक दिया यह वादा कर की मुस्लिम कभी अपनी तंज़ीम खड़ी नहीं करेगें अपनी क़ियादत नहीं करेगें बस दूसरों को सपोर्ट करेंगे और वोह सियासी नुमाइंदा उनके हक़ के फ़ैसले करेगा. अब्दुल दरी बिछायेगा और कुर्सी लगाएगा फिर कुर्सी पर बैठा नुमाइंदा अब्दुल का इस्तासाल करेगा.  यह ग़ुलामी की सिफ़त हमारे सियासी आक़ाओं ने भरी है.  तभी से अब्दुल उस ही काम को कर रहा है. उस पर सितम देखिये मौजूदा वज़ीर आज़म पंचर पुत्र बोल कर मखौल उड़ाता है. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर अब्दुल को ज़हनी ग़ुलाम बनाया इसलिए आप सत्ता के शीर्ष पर बैठे हो. अगर यह हक़ लेने इंसाफ़ होने की बात मिल्लत में पहले आ जाती तो आप गुजरात मुस्लिम नस्ल कुशी के जुर्म और इन्साफ़ के पैमाने पर जेल में होते. 

ख़ैर अब्दुल को देर सवेर अक़ल आ ही गई. अब अब्दुल तुम्हारी भपोती नहीं है. अब्दुल अपना हक़ मांगता है उसके मसाइल हल करने की बात करता है.  ईद बरात पर टोपी पहन गमछा डाल फोटो डालने से अब्दुल अब पिघलने वाला नहीं है. 

हमारे घर की सिफ़त कभी भी गुलामी वाली नहीं थी. हमारे वालिद ए बुज़ुर्गवार ने भोपाल में मेडिकल कॉन्फ्रेंस में महेश जोशी की ग़लत बात पर मंच पर जा कर उनको टोंका मंत्री महोदय गलत बयानी कर रहे हैं. वैसे ही हमारी जब से होश संभाला है कभी गुलामी नहीं की. जो बात हक़ थी वही कही.  

जो जो बातें २०१० से लेखन छेत्र में आने के बाद लेख या अख़बारों में तब्सिरों के तोर पर कहीं वही आज सियासी हलकों में आम हो रही हैं. 

१. २०१२ में असदुद्दीन के कांग्रेस से टूटने पर शिव सेना ने मजलिस को साम्प्रदाइक कहा था. उस पर हिंदुस्तान टाइम्स अंग्रेज़ी अखबार में मेने कहा था असदुद्दीन सेक्युलरिज़म के कुली नहीं है सेकुलरिज्म के बोझा ढोने की सारी ज़िम्मेदारी उनके कन्धों पर नहीं है. पहले शिव सेना अपने आप को देखे. 

२. सेकुलरिज्म यह नहीं की तुम दुसरे धर्म के धार्मिक कामों में हिस्सा लेने लगो मूर्ती पूजा करने लगो या हिन्दू मस्जिद में आ कर नमाज़ पढ़ना शुरू कर दे और बोले की में सेक्युलर हूँ. तुम अपने धर्म को पालने हुए समाज के हर तबके कें कितने मसले हल करते हो. 

३. सेक्युलर पार्टियों को बोला था हमारे कितने मसले हल किये ईद बरात पर टोपी पहन गमछा गले में डाल कर फोटों खिचवाने से हमारे मसले हल नहीं होंगे.

४. हर पुलिस स्टेशन में मंदिर का होना इस मुद्दे पर तो २०१५ में लेख लिखे हैं.

कुल मिला कर अब यह नतीजा निकल कर आता है अब्दुल अब दरी नहीं बिछायेगा कुर्सी नहीं लगाएगा. अब खुद कुर्सी संभालेगा तुम्हारे लिए तो हरगिज़ दरी नहीं बिछायेगा. 


Journalist Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...