Wednesday, 7 February 2018

एक था राजा……. भाग - २

                                                भाग १ से जारी…..

फिर राजा ने संकोच करते हुए फ़कीर से कहा हां ये बात सही है के मेरे अंदर राजवाड़ा खून नहीं है लेकिन ये बात आपको कैसे पता चली ये बात तो बरसो पुरानी है. और मेरे कोनसे व्यवहार से आपको मेरे पूर्वजो के बारे में पता चला.  उसपे फ़कीर बोले आपकी दान और दक्षणा की आदत से. राजा हक्का बक्का हो कर देखता रहा मंत्री संत्री सुन्न हो गए. लंगूर और लँगूरनिओ के पास अब उस फ़कीर की बात का कोई भी जवाब या काट नहीं रहा और उन्होंने अपनी और फजीती ना करवाते हुए चुप रहना ही उचित समझा.

फिर दरबार में से किसी ने हिम्मत करते हुए कहा अरे फ़कीर तुम जादूगर हो दान दक्षणा तो अच्छी बात है और अगर हमारे राजा दान दे रहे है तो वो दानी है न की पंसारी. उसपे फ़कीर ने ज़ोरदार कहकहा लगाया और विनर्मता से कहा हां दान देना अच्छी बात है लेकिन हर एक मनुष्य के लिए दान का एक पैमाना ऊपर वाले ने उसकी ज़ेहनियत के हिसाब से फिक्स कर दिया है. जब बादशाह, नवाब या राजा किसी के कार्य से खुश होते है तो जागीरे दान करते है शहर कसबे और सूबे दान में दिया करते है. हीरे मोती और सोने के सक्को में तूलवा देते है. लेकिन आपके अन्न दाता तो ५०० और ६०० किलो अनाज पे ही अटके हुए है. ये ज़ेहनियत एक राजा की नहीं हो सकती एक पंसारी की ही हो सकती है. उसको राज्य का कारभार तो मिला लेकिन उसकी ज़ेहनियत नहीं बदली.

राजवाड़ी खून की एक और तासीर होती है एक बार जो वस्तु किसी को दे दी वो किसी भी हालत में वापिस नहीं लेते.  लेकिन वर्तमान के राजा का हाल तो उस राजा से भी बूरा है जो ५०० या ६०० किलो अनाज बड़ा देता था. यहाँ तो राजा वस्तु पे कम किया हुआ रेट दूसरी तरह से वापिस ले लेता है. आइये जानते है किन किन वस्तुओ पे रेट कम करने के बाद बैक डोर से वापिस ले लिया गया.                               

गैस सब्सिडी: सरकार ने २०१४ में गैस सब्सिडी शुरू करने के साथ ही शुरू की थी वापिस लेने की कवायत. जितने ज़ोर शोर से सब्सिडी नहीं दी गई थी उससे कही  ज़्यादा ज़ोर शोर से छोड़ देने के विज्ञापनों की भरमार. बड़े बड़े सितारों द्वारा सब्सिडी छोड़ने की वकालत.  टी.वि पे बड़े बड़े विज्ञापन उसपे भी दिल नहीं भरा तो गैस कंपनी बुक करते समय ही सब्सिडी छोड़ने के ऊपर ज़ोर देने लगे भावनात्मक सन्देश के साथ आपकी सब्सिडी छोड़ने से प्रधान मंत्री शक्तिशाली होंगे. इतने पे भी दिल नहीं भरा तो मन की बात में जिन गरीब मज़दूरों, विधवा टीचरों ने प्रधान मंत्री की भावुक अपील सुन के सब्सिडी छोड़ दी उनका नाम गिनाया गया. ताके दूसरी जनता भी प्रोत्साहित हो सके. अगर सब्सिडी दे के वापिस ही लेना थी तो देने का क्या मतलब. फिर जिन्होंने गैस सब्सिडी वापिस नहीं की उनको हर महीने १८८ या २८८ या किसी महीने १५० रूपये बैंक में जमा होता है.  लेकिन ये सब्सिडी वापिस बैंक अपने ग्राहकों से ले लेते है बेक डोर से या दुसरे रस्ते से ये सब्सिडी वापिस सरकारी ख़ज़ाने में जमा हो जाती है.   इस पत्रकार के और उसके परिवार के एक अन्य सदस्य के स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से नियमित पैसा निकाल लिया जाता है और पूछने पे कभी जवाब होता है मिनिमम बैलेंस नहीं रखा, कभी चेक बुक चार्ज, कभी मैसेज चार्ज, कभी सर्विस चार्ज फिर ज़्यादा जानकारी और रिज़र्व बैंक का सर्कुलर मांगने पे एक अधिकारी से दुसरे अधिकारी के पास मेनेजर कहा है तो छुट्टी पे है.  फिर ये सारी परेशानिया इस राजा के काल में ही क्यों भोगना पड़ रही है पहले तो ऐसा कभी भी नहीं हुआ.

रेलवे रिजर्वेशन:  पिछले साल से ये नियम लागू हो गया है अब रिजर्वेशन कैंसल ट्रैन छूटने के ४ घंटे पहले तक ही करवा सकते है और ४ घंटे पहले कैंसिल किये हुए रिजर्वेशन पे मिलेगा सिर्फ टिकट का २५%.  अगर किसी को आकस्मिक कुछ कार्य आ गया या उसका कोई करीबी शांत हो गया तो उसका पैसा सरकारी ख़ज़ाने में जमा होगा आकस्मिक रिजर्वेशन कैंसल नहीं होगा. जबकि पहले ट्रैन छूटने के बाद भी ५०% तक मिल जाता था. ६ साल से बड़े बच्चे का फुल टिकट लगेगा पहले ये सीमा १२ साल तक थी.  दूसरी बात सुख सुविधा के नाम पे रेलवे जीरो सर्विसेज देती है. स्लिपर कोच को तो छोड़ो ए.सी. स्लिपर में भी भेड़ बकरिओ की तरह जनता की भरमार होती है. जबकि सरकार को अपना खज़ाना भरने के बजाये जनता को सुख सुविधा ज़्यादा देना चाहिए. वेटिंग सिस्टम बिलकुल ख़त्म कर देना चाहिए. और फॉर्म भरते वक्त ही रेलवे को अकाउंट और मोबाइल नंबर की मांग करना चाहिए. वेटिंग कन्फर्म होते ही उसका मैसेज मोबाइल पे आना चाहिए. ४ घंटे पहले तक अगर वेटिंग कन्फर्म नहीं हुई तो वो पैसा उसके अकाउंट में वापिस जमा होना चाहिए. फिर वो टिकट निरस्त समझा जाएगा फिर भी अगर कोई उस टिकट पे सफर करता है तो उसके ऊपर भारी जुर्माना लगना चाहिए.

नेशनल और स्टेट हाईवे: सरकार रोड डेवलपमेंट कर रही है लेकिन उसपे चलने के लिए कितना टोल वसूला जा रहा है इसकी कोई सीमा ही नहीं है. इस पत्रकार को २०१३ में गुजरात के अहमदाबाद होते हुए उंजा रोड से जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. फिर उसने अपनी प्रताड़ना अपने लेख के ज़रिये ज़ाहिर की है. हर २५ किलो मीटर के बाद एक ४५ रूपये का टोल. इस पत्रकार ने ४००० रूपये सिर्फ टोल टैक्स में ही भरे. रोड बनवाने की सुविधा दी लेकिन दुसरे तरीके से सरकारी खज़ाना भर लिया. और ये भक्त नहीं समझते है क्योके उनकी आँखों पे अंध भक्ति का चश्मा चढ़ा हुआ है.

पेट्रोल पे ८ रूपये कम:  हाल ही के बजट में पेट्रोल पे ८ रूपये कम किये गए लेकिन बेक डोर से दुसरे टैक्स बड़ा के वही ८ का आकड़ा फिर से सरकारी ख़ज़ाने को भरने में सक्षम हो गया.  तो सरकार ने जनता को क्या फायदा दिया कुछ नहीं. जो दिया वो वापिस ले लिया.

मुस्लिमो को सुविधा: मुस्लिम बच्चीओ और मुस्लिम नौजवानो को शिक्षा के केंद्र में सुविधा देने से पहले हज सब्सिडी ख़त्म कर दी. और वो पैसा अब मुस्लिमो के काम आएगा. तो सरकार ने अपनी जेब से मुस्लिम समाज के लिए क्या किया.  फिर इलेक्शन के वक्त ढोल पीटे जायेगे के हमने मुस्लिम समाज की शिक्षा की समस्या को हल किया. आपने कुछ नहीं किया उनसे उनका एक हक़ छीन के दूसरी सुविधा दे दी. 

आयकर कानून: राजा जी अब वसूलेंगे कॉम्पीट फी: इस साल के बजट में देश के आयकर कानून बदलने की कवायद की गई है। अभी तक कोई व्यक्ति जॉब से हो रही इनकम सिर्फ 'सैलरी' पे ही टैक्स देता था।  लेकिन अब नए आयकर कानून के प्रावधानों के हिसाब से नॉनकॉम्पीट पेमेंट्स को भी मुनाफे के दायरे में रखा है। पहले जिस पर टैक्स नहीं लगता था लेकिन अब लगेगा। साथ ही भारत में विदेशी इंटरनेट कंपनियों से भी टैक्स वसूलने की शुरुआत हो सकती है।  'बजट में दिए गए प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी कर्मचारी को अपने एंप्लॉयर के बदले किसी और (थर्ड पार्टी) से पेमेंट मिलता है तो उसे भी टैक्स के दायरे में लाया जाएगा। दूसरे शब्दों में समझें तो टैक्स के दायरे में ऐसे केस भी आएंगे जिनमें पेमेंट देने वाले और लेने वाले के बीच एंप्लॉयर-एंप्लॉयी का रिश्ता नहीं है। उदाहरण के लिए किसी विदेशी कंपनी की भारतीय सब्सिडियरी से जॉब खत्म होने पर विदेशी कंपनी से मिलने वाले सेवेरेंस पेमेंट पर भी टैक्स लगेगा। कंपनियों के एक होने और अधिग्रहण की स्थिति में भी अधिग्रहण करने वाली कंपनी से प्राप्त आय भी टैक्स दायरे में आ जाएगी।

See the English version of this Article

Once there was a King ……… Part 2

https://autojourna.wordpress.com/2018/02/19/once-there-was-a-king-part-2/ 

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...