Sunday, 25 February 2018

धर्म और आस्था के नाम पे पाखंड, फरेब, डाका, वसूली


धर्म और आस्था की आड़ में कब तक फरेब लूट चलती रहेगी

आज कल समूचे हिन्दू स्टेट में बाबरी मस्जिद के नाम पे राम की आस्था नामक बारिश खूब ज़ोरो पे है.  कभी सांसद सुब्रमणियम स्वामी आस्था नामक पिटारा खोल के नागमणि तलाशने की कोशिश करते है तो कभी गोरखनाथ पीठ के स्वामी योगी आदित्यनाथ आस्था की बासुरी बजाते हुए नज़र आते है.  कभी पाखंडी, फरेबी, ढोंगी संबित पात्रा मीडिया के सामने आस्था का ढोंग करता है. कभी हिन्दू आतंकवादी गिरिराज आस्था के नाम पे कट्टरवादी ज़हर उगलता है.  फिर इन सभी आस्था प्रेमिओ के कथानाक में एक जैसी समानताये है सभी का ये मानना है के मुस्लिम तो मक्का और मदीना चले जायेगे अपना धार्मिक उत्थान करने फिर हम किधर जायेगे. हमारी आस्था का क्या होगा मुसलमानो से निवेदन है हमें मंदिर के नाम पे ज़मीन दे दो या राम के नाम पे ज़मीन छोड़ दें हम वहां राम मंदिर बनवा लेंगे.  

अगर साधू योगी महाराज की बात की जाए तो उन्होंने सिर्फ आस्था की बात कही ना ज़मीन त्यागने की बात कही और ना ही मक्का या मदीना की बात कही. 

लेखक का ठाम यकीन है और वो भी ये मानता है के हिन्दू धार्मिक आस्था राम चंद्र जी में है और होना भी चाहिए उसपे किसी भी समाज का अपवाद या विवाद नहीं है. विवाद तो षड्यंत्र पे है जिस तरह रात के अँधेरे में डाका डाल के मूर्ती रख के मस्जिद को विवादित कर के हड़पने की साजिश की उस दूषित ज़ेहनियत पे विवाद है.  फिर आज के राम भक्त जो कुछ रुपयों में अपना ईमान बेच देते है जो दंगा फसाद मचाते है जो राम के नाम पे खून व गारत करते है. तो ऐसे राम भक्तो की आस्था तब कहा गायब हो जाती है. तो यहाँ सवाल आस्था का है ही नहीं यहाँ सवाल षड्यंत्र का और लड़ाई सत्य की है.

फिर योगी महाराज के साथ खुद राम और सीता २०१७ में मौजूद थे और हेलीकाप्टर की सवारी कर के अयोध्या पहुंचे थे कुछ समय बाद वो राम एक महिला के साथ बलात्कार के जुर्म में जेल गया.  और जिनको बाबर भक्त बोला जाता है वो आज भी मर्यादावादी होते है कानून पे यकीन रखने वाले दंगे फसाद से दूर रहने वाले और अपना मज़हब और मस्जिद जाईज़ जगह पे बनवाने वाले होते है.  तो लेखक ये बात कताई मानने को तैयार नहीं जब आज का बाबर भक्त बिकाऊ नहीं है मर्यादावादी पुरषोत्तम होता है तो १५०० ईस्वी का खुद बाबर कैसे किसी भी समाज की मंदिर को तोड़ के अपने खुदा की इबादत गाहा बनवाएगा.  एक दम झूटी बात है किसी भी मुस्लिम राजा ने कभी भी कोई भी मंदिर नहीं तोडा और अगर तोडा होगा तो उस मंदिर में पुजारी हरामकारी करता होगा जैसा के आज के समय में सभी आश्रमों, मंदिरो, देवालयों और योगशालाओं में महिलाओ के साथ बलात्कार किया जाता है और उनको बंदी बना के रखा जाता है. राम पाल से लेकर राम रहीम और ७० साल का जैनी साधू सभी भोग कामना में लीन पाए गए. 

यहाँ तक के एहमद शाह अब्दाली की निस्बत से फरेब फैलाया जाता है के उन्होंने ११००० मंदिरो को तोडा इतिहास में जिसका कोई पुरावा नहीं मिलता. फिर जो मुस्लिम राजा अपने मालिके हकीकी की इबादत करता है किसी भी रियाया की इबादत गाह को नहीं तोड़ सकता.  किसी दुसरे मज़हब की इबादत गाह को तोड़ के अपने खुदा की इबादत गाह (मस्जिद) बनवाना वैसा ही है जैसा के बकरी ने बाल्टी भर दूध दिया और उसमे पेशाब या मैगनी कर दी अब उस दूध को पीने के बजाए फेक देना ही उचित है.

तो जब बाबर ने कोई मंदिर तोड़ा ही नहीं तो फिर कैसे राम की आस्था उस जगह पे जाग गई जो उनकी थी ही नहीं.  फिर भी अगर आज का राम भक्त आस्था का फरेबी चश्मा पहन के दुसरे समुदाय की इबादत गहा पे डाका डालने की गन्दी और गलीज़ नियत रखता है तो लेखक उन सभी आस्थावादीओ से पूछना चाहता है क्या राम मंदिर अब डाका डाली हुई ज़मीन पे बनेगा, फरेब कर के, धोका दे कर लूटी हुई ज़मीन पे बनेगा. क्या उनके राम इतने मजबूर हो गए के डाका डाली हुई ज़मीन पे अपना मंदिर बनवायेगे और भक्तो को आने का निमंत्रण देंगे.   फिर अगर ज़मीन लेना ही है तो षड्यंत्र, फरेब फैला कर के क्यों.

दूसरी बात अगर उच्चतम न्यायलय में इस बात के पुख्ता सबूत मिलते है के मंदिर को तोड़ के वहां मस्जिद बनवाई गई थी तो ऐसी मस्जिद में खुद ही नमाज़ नाजाइज़ है.  क्योके किसी दुसरे धर्म की दिल आज़ारी करके उसके धार्मिक स्थल को तोड़ के अपने लिए धार्मिक स्थल बनवाना नाजाइज़ है.  लेकिन सबूत पुख्ता और ठोस होना चाहिए झूट, फरेब, खरीद फरोख्त, जान से मारने की धमकी या न्यायलय को पक्षपात की बुनियाद पे आर्डर अपने पक्ष में लेना सबूत नहीं होगा. 

लेखक को और समूचे मुस्लिम ब्रदर्स को अभी तक भी उच्चतम न्यालय पे पूरा यकीन है के फैसला मुस्लिम समाज के हक़ में आएगा. क्योके जिस तरह से हिन्दू समाज को राम पे भरोसा है के वो कुछ भी गलत नहीं होने देंगे तो राम ही झूट, फरेब और डाकाज़नी से हथियाई  हुई ज़मीन से दूर हो जायेगे.  फिर अगर राम मर्यादावादी थे तो वो खुद भी ये नहीं चाहेंगे के एक समुदाय की इबादत गाह को तोड़ के उनके लिए भव्य मंदिर बनवाया जाए.

फिर भी अगर झूट और फरेब की बुनियाद पे उच्चतम न्यायलय का फैसला मुस्लिम समाज के खिलाफ आता है तो लेखक यही समझेगा के हिन्दू धर्म के राम भी फ़रेबिओ के साथ है और उनका धर्म भी भीख पे यकीन रखता है तभी तो मुस्लिम टैक्स पयेर्स के रुपयों का दुरुपयोग कर के सरकार हिन्दू तीर्थ यात्रा के लिए सब्सिडी देती है जिसमे शामिल है.  

उत्तर प्रदेश: कैलाश मानसरोवर के लिए एक लाख रुपये

दिल्ली: वरिष्ठ नागरिकों की एसी बस में तीर्थयात्रा

मध्य प्रदेश: विदेश यात्रा पर भी सब्सिडी

उत्तराखंड: वरिष्ठ नागरिकों के लिए तीर्थाटन

हरियाणा: सिंधु दर्शन यात्रा का लाभ

राजस्थान: प्लेन से तीर्थयात्रा की सुविधा

गुजरात: श्रवण तीर्थदर्शन योजना

कर्नाटक: चार धाम की यात्रा पर सब्स‍िडी

तमिलनाडु: येरुशलम की यात्रा के लिए सब्सिडी

ओडिशा: वरिष्ठ नागरिकों का ख्याल

असम: बस यात्रा पर सब्सिडी


इस विषय पे अधिक जानकारी के लिए और कितना पैसा सब्सिडी के नाम पे किस तीर्थ पे जाने के लिए मिलता है लेखक का १८ जनवरी २०१८ को लिखा लेख ये है इस्लाम और मुस्लिम पढ़िए.    

फिर हिन्दू धर्म में हर काम भीख मांग के किया जाता है.  गणपति पंडाल से ले कर तो दुर्गा उत्सव तक होली के रंगो से ले कर तो महाआरती तक सभी धार्मिक कामो के लिए दुसरे समाज के लोगो से भी धन अर्जित किया जाता है.  १९९३ के बाद तो गणपति के लिए ज़बरदस्ती मुस्लिम समाज से पैसा वसूला जाता था जिसके ऊपर कई मुस्लिम युवको को अपनी जान देनी पड़ी. फिर भला हो एक मराठी अधिवक्ता का जिसने २००० में हाई कोर्ट बॉम्बे में एक पेटिशन डाली और उसके ऊपर कोर्ट का सख्त निर्देश आया और ज़बरदस्ती चंदा लेने वालो को जबरन वसूली करने की संज्ञा दी और ऐसे लोगो के ऊपर पुलिस को सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिए तब जा के वो प्रथा बंद हुई.

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