Monday, 5 February 2018

एक था राजा……. भाग - १

पात्र

राजा
:
भारत का वर्तमान राजा
मंत्री संत्री
:
संसद में वर्तमान मंत्रीओ का कैबिनेट
भक्त गण
:
संघ तथा उससे जुड़े हुए समूचे समूह.
लंगूर लँगूरनिया
:
भारत के मीडिया का वो धड़ा जो झूट फरेब फैलता है और राजा के गुणगान और भक्ति में लीन रहता है. तथा सच्ची बात कहने से गुरेज़ करता है.
जनता
:
भारत की वर्तमान जनता
फ़कीर
:
लेखक
काल
:
२०१४ के बाद का भारत

लेखक का ये लेख आज के भारत पे एक कल्पना है जो ९०% सटीक है जिसको उसने नाटकीय अंदाज़ पे अपने शब्दों में पेश किया है.  लेखक का इरादा किसी की भावना के साथ खेलना नहीं है परन्तु सत्य को आलोकित करना है.  नाटक के पहले भाग में राजा के पात्र का कुछ निजी हिस्सा कल्पना मात्र है. जिसका उसके जीवन से कोई भी संबंध नहीं है. बाकी हिस्सा राजा तथा अन्य पात्रो का सटीक अवलोकन है.

किसी प्रदेश का एक राजा हुआ करता था उसकी प्रजा और भक्त उसको बेपनाह मोहब्बत करते थे और उसको बोहोत ही दयालू, कृपालु, न्यायसंगत, दानी और शूरवीर, मर्यादावादी परुषोत्तम समझते थे. राजा अपने आप को बोहोत दानी समझता था और जब भी प्रजा के किसी भी काम से खुश होता तो उसका ५०० किलो आटा, ३०० किलो दाल इसी  हिसाब से चावल, घी और अन्य वस्तुए किलो से बड़ा देता था.  प्रजा भी खुश और राजा भी, और सभी भक्त ये समझते थे के अन्न दाता कितने दयालू हैं. फिर अगर राजा के निर्णय के विरुद्ध कोई भी जाता तो उसके भक्त उसको जान से मार डालते.  राजा के खिलाफ कोई भी सर उठाने की ज़ुर्रत करता तो उसको उसके सैनिक काल कोठरी में डाल देते थे और उसको प्रदेश के साथ गद्दारी करने के जुर्म में परेशान किया जाता था.  उसके निर्णयो को राज्य के मंत्री संत्री बजाय राजा को उसकी गलती का एहसास दिलाने और भूल सुधार करने के उस निर्णय का बचाव करते नज़र आते थे. सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था और राजा का सरकारी खज़ाना लबरेज़ होता जाता था.

इतना सब कुछ होने के बाद भी उस राजा के प्रदेश का नाम पिछड़े हुए देशो में गिना जाता था, बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही थी.  मेह्गाई आसमान को छु रही थी, भ्रष्टाचार अपने उरूज पे था.  फिर भी भक्त और प्रजा अपने देश को एक सुखी समृद्ध समझते थे.

सब कुछ यूं ही चलता रहता अगर उस राजा के प्रदेश में एक फ़कीर, ज्ञानी, महापुरूष नहीं आते. वो फ़कीर मनुष्य की कार्यप्रणाली बात चीत का व्यवहार और महिलाओ के प्रति सम्मान को देख कर उस इंसान के पिता तथा पूर्वजो के बारे में बता देते थे.  धीरे धीर उस ज्ञानी फ़कीर की ख्याति बढ़ने लगी और अब बात राजा के दरबार तक पहुँची के एक फ़कीर है जो इंसान की कार्यप्रणाली को देख कर उसके पिता के बारे में बता देते है.

राजा को उत्सुकता हुई और उसने उन ज्ञानी फ़कीर को अपने दरबार में बुला लिया.   पूरा दरबार सजा, मंत्रीओ संत्रीओ, भक्त गण से ले कर लंगूर और लँगूरनिओ की टीम कवर करने के लिए सभी लोग मौजूद हुए; दरबार में आम जनता भी आई. सबसे पहले उस फ़कीर ने लंगूर और लँगूरनिओ को हाशिये पे लिया और बेनकाब करना शुरू किया जो झूट फरेब फैला के जनता को गुमराह कर रहे थे.  ये लोग राज्य के वफादार नहीं है बल्कि ये ही लोग प्रदेश के गद्दार है और सुख शांति को भंग करने वाले यही है और ये लोग पाखण्डिओ की औलादो में से है और इनके पूर्वज गद्दारी में लिप्त होंगे.  राजन अगर आपका प्रदेश खंडित होता है तो इन जैसे पाखण्डिओ की वजह से होगा जो झूट फरेब फैला के अपने पद की गरिमा नहीं रखते बल्कि उसके साथ गद्दारी करते है. आगे उस फ़कीर ने कहा इनको राजा की झूटी तारीफ और गुणगान करने के लिए मुवावज़ा मिलता है ये लोग राजा के सच्चे हमदर्द नहीं है बल्कि इनको खरीदा गया है और खरीदा गया सामान हमेशा सड़ा गला होता है. फिर बारी आई मंत्रीओ की सबने एक एक कर के अपने पूर्वजो के बारे में पुछा और मंत्रीओ की कार्यप्रणाली और भाषा को देख कर उस फ़कीर ने एक दम सटीक अनुमान लगाया और जो सच साबित हुआ.

ये सब देख कर राजा बोहोत प्रसन्न हुआ अब उसको जिज्ञासा हुई के वो अपने बारे में पूछे. उसके ऊपर फ़कीर बोले अन्न दाता जान की आमान चाहता हूँ में आपके बारे में कुछ नहीं बोलूगा. उसपे राजा बोला आपको जान की अमान है बोलिये में किस की औलाद हूँ और मेरे अंदर किस का खून है.  उसपे फ़कीर निसकोच बोल दिए आप पंसारी की औलाद हो (पंसारी वो जो परचून की किराने की दूकान चलाता है).  राजा गुस्से से लाल पीला हो गया, मंत्रीओ ने मयान से तलवार खींच ली भक्त सन्न रह गए लंगूर और लागूरनियाँ हक्का बक्का ये सब माजरा सुनते ही रह गए लेकिन फ़कीर एक ही सास में सब कुछ बोलता चला गया. और राजा जिसने जान की अमान दी थी ख़ामोशी से सब कुछ सुनता रहा.

फिर कुछ देर बाद राजा का क्रोध शांत हुआ मंत्री भी ठन्डे हुए भक्त किसी ठगे मनुष्य की भाति असहाय मुद्रा में दिखे लंगूर और लागूरनियाँ चापलूसी करने लगे के कही बात दरबार से बहार न निकल जाए. और बात को तोड़ मरोड़ के पेश करने की कवायत शुरू करने लगे. लेकिन जो सत्य था अब बहार आ चूका था और धीरे धीरे जंगल की आग की तरह समूचे राज्य में बात फैलते देर नहीं लगी के अन्न दाता एक पंसारी की औलाद है उनमे असली राजवाड़ा खून है ही नहीं.  अब लोग तरह तरह की बाते बनाने लगे तभी सलाहियत की कमी है. अब ऐसे लोग भी विरोध दर्ज करने लगे जो कभी भक्त मुद्रा में राजा के सामने हाथ जोड़ के खड़े रहते थे.  फिर बात राज्य से बहार निकल के पड़ोस के राज्यों तक जा पहोची और राजा के सहयोगी जो कभी उसको समर्थन दिया करते थे झिटकने लगे.

ये सब देख के राजा को बोहोत आघात पंहुचा और उसने अपनी माता से एक दिन पूछ ही लिया के में किसकी औलाद हूँ मेरे अंदर किसका खून है.  फिर उस राजा की माँ ने कहा ये सही है तू राजवाड़ी खानदान का चिराग नहीं है. और तेरे पिता एक पंसारी थे. असली राजा के तो कोई औलाद ही नहीं थी उस समय एक पंसारी मुझसे मिलने आया करता था और तू पैदा हुआ. फिर मुझे ये पाप छुपाना था और राजा को अपना वंशज चाहिए था.  सो अन्न दाता ने तुझको गोद ले लिया और मुझको खामोश रहने की हिदायत दी.  अँधा क्या चाहे दो आँखे मुझे इससे अच्छा और किया चाहिए था के मेरा न सिर्फ पाप छुपा रहे बल्कि उसको इज़्ज़त और दानवीर, अन्नदाता का लक़ब मिले.

राजा बड़ी हैरत में था के कैसे उस फ़कीर ने सिर्फ मेरे व्यवहार के ऊपर मेरे नुत्फे का अंदाजा लगा लिया. राजा ने फिर दरबार बुलवाया और उस फ़कीर को भी,  ये जानने के लिए के उसकी कौन सी आदत से पता चला के वो रजवाड़ी खून नहीं है.

फिर से समूचा प्रदेश आया मंत्री संत्री आये भक्त गण और लंगूर लँगूरनिओ की टोली भी आई ये जानने के लिए के वो कोनसी बात थी जिसकी बिना पे अन्न दाता पंसारी बन गए. लेकिन अब सभी में वो उत्साह कदापि नहीं दिख रहा था जो राजा की हकीकत खुलने से पहले वाले दरबार में हुआ करता था. अब तो सभी सिर्फ वही वजह जानने को उत्सुक थे के राजा का पंसारी वाला भेद उस फ़कीर ने कैसे पहचाना. 


                                                           
                                              भाग २ में जारी…..

See the English version of this Article.


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