Tuesday, 27 February 2018

एक बूढी नसीहत

लेखक का ये लेख उसके १६ जून २०१६ को अंग्रेजी में लिखी एक कहानी Old commencement का  हिंदी रूपांतरण है जो सिर्फ  कल्पना मात्र नहीं है बल्कि १००% सटीक अवलोकन है उन छुपे हुए अल्लहावालो का जो अपने लिए नहीं बल्कि खुदा की मखलूक के लिए जीते है और अपने मालिके हकीकी को रात की तारीकी में दबे पाँव तलाशते है, उसके सामने रोते है गिड़गिड़ाते है और तमाम मखलूक की खेर व आफ़ियत की दुवाये करते है.  जिसको लेखक ने कहानी के अंदाज़ पे अपने शब्दों में पेश किया है.  लेखक का इरादा किसी पौशीदा इंसान के राज़ फाश करना नहीं है बल्कि समूचे समाज को ये बताना है के आज अगर वो चेन से सोते है क्योके रातो को ऐसे अल्लाह वाले रोते है.   

बोहोत समय पहले एक बूढ़ा आदमी इंसानी बस्ती से दूर शहर के बाहर जंगल में एक झोपडी में रहता था। वह अपने सभी परिवार के सदस्यों को खो चूका था और तनहे तनहा रह गया था उनके बाल सफ़ेद हो चुके थे उनका शरीर कमज़ोर हो गया था, उसके कंधे थक चुके थे, लेकिन उनका दृढ़ संकल्प आज भी उतना ही मज़बूत था जैसा की उसके उम्र के बीसवे साल में हुआ करता था। वह मरने वाला था, इसलिए उसने मृत्यु से पहले तीर्थ यात्रा पे जाने की योजना बनाई थी। उन्होंने अपनी जमा पूँजी की गणना की लेकिन वो किसी भी सूरत से यात्रा के खर्चे को पूरी नहीं हो रही थी। उसने अपना सामान जो कुछ भी उसके पास था वह बेच दिया, और किसी तरह से वह तीर्थयात्रा और रास्ते के खर्चे का इंतज़ाम करने में कामयाब हो गया।

परिवहन दुवारा शहर से निकलने के बाद, वह छोटे मार्ग पर पहुँचा जो कि तीर्थस्थान तक जाता था। यहां से उसे चल के जाना होगा क्योंकि अब तीर्थस्थान तक कोई परिवहन उपलब्ध नहीं था। छोटा रास्ता बहुत खतरनाक था और धूल से भरा हुआ था। उसने रस्ते में एक खाई देखि जिसको पार करके ही तीर्थस्थान तक पंहुचा जा सकता था, खाई बोहोत गहरी थी और उसपे कोई पूल नहीं था। कई अन्य तीर्थयात्रि अतयंत पीड़ा तथा कष्ट के साथ नहर पार कर रहे थे।  वृद्ध व्यक्ति किसी तरह से नहर को पार करने में कामयाब हुआ और तीर्थ स्थल पर पहुंचा। उसने अपने धार्मिक रीति व विश्वास के अनुसार सभी संस्कार और रीति-रिवाजों में भाग लिया और तीर्थ पूरा किया।

तीर्थ यात्रा से वापसी के समय बूढ़े व्यक्ति ने रास्ते में सड़क बनाने का निश्चय किया, उसके लिए तैयारी शुरू कर दी और नहर पर पुल का निर्माण करने की कोशिश की। लेकिन उसके कमजोर कंधे ज्यादा कुछ नहीं कर सके, उसने अन्य तीर्थयात्रियों की मदद लेने का फैसला किया। बूढ़े आदमी को अपने दृढ़ संकल्प पे यकीन था, उसने जवान तीर्थयात्रियों की टीम को इस काम के लिए गठित कर लिया जो वहां से आ जा रहे थे। युवा तीर्थयात्रियों की मदद से उसने लक्ष्य हासिल किया और नहर पर पुल का निर्माण किया।

पुल के पूरा होने के बाद जवान तीर्थयात्रियों ने बूढ़े आदमी का मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि बूढ़ा आदमी, बड़े मियां, चचा आप पागल हो बुढ़ापे में सठिया गए हो। बुढ़ापे की वजह से आपके दिमाग ने भी सोचना बंद कर दिया है। आप पहले ही तीर्थ यात्रा कर चुके हो और अब ज़िन्दगी के उस मुकाम पे पहुंच गए हो के दुबारा वापस इस जगह नहीं आने वाले हो। क्योंकि आप मरने वाले हैं, तो आपने नहर पर पुल का निर्माण क्यों किया है। आपने फ़िज़ूल की बात के लिए अपनी क्षमता, शक्ति और धन बर्बाद कर दिया हैं जिसका आपको कुछ फ़ायदा नहीं मिलने वाला है।

बूढ़ा आदमी शांति से मुस्कुराता है और युवा तीर्थयात्रियों को देखा उसके चेहरे पे युवाओ की बातो पे पश्चाताप के ज़रा भी भाव नहीं थे उसने बहुत नम्रता से जवाब दिया मैं जानता हूं कि मैं इस जगह पर फिर कभी नहीं आऊँगा। मैंने अपने जीवन का हिस्सा बिताया है और मैं मरने वाला हूँ। लेकिन मैंने इस पुल का निर्माण किया है जो आपके जैसे लोग हैं उनके लिए जो तीर्थ यात्रा में भाग ले रहे हैं और तीव्र समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ख़राब मौसम और रस्ते के कारण वो बेहद थकान महसूस करते हैं। मैंने अपना जीवन पूरा कर लिया है और मैं जानता हूँ में मरने वाला हूं, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि ख़राब मौसम और रस्ते के कारण दूसरों को तीर्थयात्रा के लिए वही तकलीफ का सामना करना पड़े जो मुझे हुई है। बूढ़े आदमी के जवाब को सुनने के बाद, जवान तीर्थयात्रियों को बूढ़े के ऊपर अपने मज़ाक पे बोहोत शर्मिन्दिगी महसूस हुई। वे बूढ़े आदमी के पैर पकड़ते हैं और अपने मज़ाक के लिए खेद व्यक्त करते हैं बूढ़ा आदमी तुरत एक फरिश्ते का रूप धारण करता है, और वो उन युवा तीर्थयात्रियों को राष्ट्र की ताकत बनने, और प्रसिद्धि पाने का आशीर्वाद दे कर आकाश में गायब हो जाता है।

कहानी की सार  और नैतिकता यह है कि दूसरों के लिए जीवित रहना चाहिए और दूसरों के लिए मरना चाहिए।

जुबेर एहमद खान
पत्रकार


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Old commencement

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