Friday, 6 December 2019

जंग तक़रीबन फतह के क़रीब.

अज़ीज़ नाज़रीन,

मेरे हम क़दम सहाफियों, दानिशमंदों, और हम वतनों.  सहाफिओं में ख़ास नाम लेना चाहूंगा अभिसार शर्मा, रविश, राणा अय्यूब, अभिलाष पांडे, आकाश बनर्जी जो की हक़ बात कहने से गुरेज़ नहीं करते और सच्चाई को सामने लाते हैं.
 
इस सहाफी का सहाफत की रूहानी दुनियाँ में आने के पीछे सिर्फ और सिर्फ दो ही मक़सद थे.  एक इन्साफ जो की अकलियतों (ख़ास मुस्लिम और क्रिस्टी) को हिंदुस्तान में नहीं मिल पा रहा है, उसके लिए जद्दो जेहद करना, दूसरा हिंदुस्तान में संघी दहशतगर्दों, हिन्दू शिद्दत पसंदों ने बीजेपी के नुमाइंदों ने जो इस्लाम की निस्बत से झूट फरेब फैला रखा था उसको बे नाक़ाब करना और सच्चाई सामने लाना.  दोनों ही मक़सद धीरे धीरे कामयाब होते दिख रहे हैं.  लेकिन फिर भी जंग अभी अपने हतमी मरहले को नहीं पहुंची है और अभी भी लम्बी जंग लड़नी बाक़ी है. 

ज़ाफ़रानी मीडिया के कुछ लंगूर और लँगूरनियाँ  सियासत और किसी ख़ास जमात की ताईद उस अंधे अकीदतमंद की तरह करतें हैं, जिनके पास बीनाई है लेकिन वो उस जमात के ऐब और बदकारियाँ, बदामालियाँ, हरामकारी देख नहीं सकते. उस जमात की धोखेबाज़ी, जालसाज़ी, मस्तूरातों के साथ ज़िना बिल जब्र, क़त्ल, दहशतगर्दी, फ़िर्क़ा परस्ती हो चाहे वो डाकाज़नी या कोई और गुनाह को देखते हुए भी कुछ ज़मीर फरोश, रियाकार लँगूरनियाँ और लंगूर उस जमात की जी हूज़ूरी करतें हैं चापलूसी करतें हैं.  एक लँगूरनी तो इस हद तक गर्मजोश हो जाती है की कौमी चैनल पर हिटलर के रू बरू बैठ कर पूछ बैठती है आप इतना गर्मजोश कैसे रहतें हैं.  आज में आपकी गर्मजोशी का राज़ जान कर रहूँगी.  क्या आप कोई टॉनिक लेते हैं.  में रात को कभी कभी थक जाती हूँ और उनसे बोल देतीं हूँ. नहीं, आज बोहोत थक गई, आज नहीं“.  लेकिन आप हैं की आपके चेहरे पे थकान दिखती ही नहीं है.  दूसरी इतनी दीवानगी दिखाती है क़ौमी ख़बरनामे में बोल बैठती है.  में ........... ॐ मोदी.   और ऐसी लँगूरनियाँ जिस्म फरोशी के कारोबार से ज़्यदा ख़तरनाक़ कारोबार कर रहीं हैं और वो है ज़हन फरोशी का दलदल और कारोबार.

लेकिन जहाँ तक मज़हब का ताल्लुक़ है किसी भी मज़हब के खिलाफ झूट, फरेब फैलाना अवाम के दिलों दिमाग़ में शक वा शुकूक डालना ये तो गुनाहे अज़ीम है.  आपसे गुज़ारिश है वीडियो पूरा देखें.


में शुक्र गुज़ार हूँ हर उस इंसान का जो मुस्लिम ना होते हुए हिन्दू आला ज़ात का ब्राह्मण या पंडित है, लेकिन सच्चाई के परचम का अलम्बरदार हुआ और हक़ बात की ताईद की और सच्चाई को सामने लाने में मदद की.  इस्लाम, क़ुरान और प्रोफेट की निस्बत से जितने भी हिन्दू फरेबी, झूठे और रियाकार थे उनको माकूल जवाब खुद सच्चे हिन्दू ने दिया. क्योंकि अगर वही बात बा हैसियत मुस्लिम में, या कोई और मौलाना, मुस्लिम दानिशमंद कहते तो दीगर, ख़ास हिन्दू, अवाम पे उसका उतना असर नहीं होता जितना की पंडित या आला ज़ात के ब्रह्मिन कहतें हैं तो उसका असर होता है.     

कुछ संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद हिन्दू , जालसाज़ अपने इज्लासों में क़ुरान, प्रोफेट और इस्लाम  के खिलाफ बड़ी शिद्दत से झूट, फरेब फैलातें हैं तोहमत लगाते हैं.  इन जैसे झूठे, फरेबियों, धोखेबाज़ों को जो नफरत का बीज बो रहें हैं, खुद अच्छे खुली सोच वाले हिन्दू दानिशमंदों और सहाफिओं की जानिब से माकूल जवाब देना शुरू कर दिया गया है.  इन हिन्दू अवाम को सच कहने की तरग़ीब भी इसी बात से मिली हक़ पे चलना है और हक़ बात कहना है.  इनका मक़सद अपने मज़हब के खिलाफ बगावत करना नहीं था बरक्स सच्चाई को सामने लाना था. और फरेब को उजागर करना था जिसके कफ़न के नीचे ये फरेबी इस्लाम को बदनाम करतें है और लाशों को पोशीदा करतें हैं. में सलाम करता हूँ हर उस नौ जवान को जो सही वक़्त पर माक़ूल जवाब दे कर ऐसे फरेबियों का हौसला पस्त करता है.   क्योंकि अगर इन जैसे हरामकारी करने वालों की हौसला अफ़ज़ाई हुई तो इनको देख कर ४ और आगे बढ़ेंगे.  और नफरत का दरख़्त मज़ीद बड़ा होगा.  

इससे पेश्तर जब ट्रिपल तलाक़ पे बावेला मचा था और जब लंगूर लँगूरनियाँ ऐसी ऐसी बाज़ारू ख़वातीनों को अपने स्टुडिओं में ला कर बिठाती थी जिनका ट्रिपल तलाक़ मसले से दूर दूर तक कोई सरोकार ही नहीं था. ऐसी मस्तूरातें महज़ १०० रूपये में अपना ईमान और जिस्म का सौदा कर डालती हैं. फिर उनको १००० रूपये दिए गए और उन्होंने तो इस्लाम को ही बैच डाला और लँगूरनियों ने ऐसा दिखाने की कोशिश की के तमाम ख़वातीन इस मसले पर हुकूमते हिन्द के साथ हैं और उनकी ज़िन्दगी में महज़ एक ही मसला है ट्रिपल तलाक़.  जबकि निस्फ़ से ज़ाइद मुस्लिम मस्तूरात इस्लामिक और शरिया क़ानून की मुहाफ़िज़ नज़र आई और वो शरिया क़ानून में किसी किस्म का कोई रद्दो अमल ख़ास हुकूमत की जानिब से बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी. लेकिन उन खावतीनों की वो हिकमत लंगूर मीडिया ने पोशीदा कर दी और चंद ज़मीर फरोश जिस्म फरोश बाज़ारू औरतों को ला कर ऐसा दिखाने की कोशिश की गई की सभी मुस्लिम मस्तूरात इस मसले पर मोदी हुकूमत के साथ हैं.   लेकिन उस हिकमत का पर्दा फाश खुद अभिलाष पांडे जी ने कर दिया जब उन्होंने अपने यू टियूब चेंनेल पर हिन्दू मज़हब में मंदिरों और दीगर पाकीज़ा जगहों पे जो खावतीनों की जिस्म रेज़ी की जाती है.  उसपे लँगूरनियाँ काहे को नहीं बोलती हैं.  जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने मज़मून पीड़ादायक हिन्दू धार्मिक कूप्रथाएँ में अभिलाष पांडे जी के यू टियूब चेंनेल और उनकी मालूमात के ज़रिये किया है.

इस सहाफी के ऊपर एक इलज़ाम हमेशा लगता है की वो हिन्दू मज़हब के खिलाफ है या वो हिन्दू दुश्मन है.  ऐसा हरगिज़ नहीं है ना ही ये सहाफी किसी भी मज़हब के खिलाफ है और ना ही इसकी जंग किसी ख़ास मज़हब के नुमाइंदों के खिलाफ है.  बरक्स इसकी जंग तो उन जैसे लोगों के खिलाफ है जो जालसाज़, धोखाधड़ी से इक़्तेदार की कुर्सी पे फ़ाइज़ हो गए हैं और ना इंसाफ़ी करतें हैं.  दूसरी जंग तो हर उस शख़्स से है जो जो नबी सल्लम से हद दर्जे का बुग्ज़, कीना और हसद रखतें हैं, जो नबी की हुर्मत झूठी और फरेबी बातों पर पामाल करतें हैं. इस्लाम के खिलाफ झूट, फरेब फैलातें हैं. जो बात इस्लाम से साबित नहीं जो काम नबी से साबित नहीं जो काम सहाबा से साबित नहीं वो क्यों करते हो.  इस सहाफी का मानना है की ऐसे लोगों को उनकी ही ज़ुबान में जवाब दिया जाए तो उनको जल्दी समझ में आ जाता है. 

याक़ूब मेमन की फ़ासी का ये सहाफी सख़्त मुख़ालेफ़त करता है और करता रहेगा.  क्योंकि वो सुप्रीम दहशतगर्द हमले में शहीद हुए.  उनको किसी ग़लती के ऊपर सजा नहीं दी गई उनकी जुडिशल किलिंग की गई थी और सुप्रीम कोर्ट, सदरे जमुहरिया की निगरानी में उनको शहीद किया गया.  उनके साथ ना इंसाफ़ी हुई और इन्साफ नहीं हुआ अगर इन्साफ का पैमाना पूरा करना था तो पहले बाबरी मस्जिद को शहीद करने वालों को सज़ा देनी थी.  जो संघी ज़ाफ़रानी गुंडों ने बॉम्बे में दहशत मचाई थी उनको सज़ा देनी थी.  याक़ूब मेमन ने तो मार्च १९९३ को बम ब्लास्ट किया था.  उसके पहले ०६ दिसम्बर १९९२ और जनवरी से ले कर फरवरी १९९३ तक क्या हुआ. उसका पहले हिसाब होना था.  फिर याक़ूब को सुप्रीम दहशतगर्द और दहशतगर्द प्रेजिडेंट के ज़ेरे क़यादत क़त्ल (शहीद) करवाना था.

नाज़रीन सहाफत की रूहानी दुनियाँ में आने के बाद इस बात को कई दफा मेने मन्ज़रे आम किया है की संघी, शिद्दत पसंद हिन्दू, बीजेपी के नुमाइंदे अपने गुनाहों, बदकारियों, बदामालियों, हरामख़ोरी को पोशीदा रखने के लिए इस्लाम, क़ुरान और हदीस पे झूठ, फरेब बांधते हैं.  ताके उनकी बदकारिओं और उनके मज़हब की गलीज़ और गन्दी हिकमत ज़माने से पोशीदा रहे और इस्लाम बदनाम होता रहे.  दूसरी एक और बात २०१० में जब से में सहाफत में आया था बड़ी शिद्दत और सख्ती से कहता हूँ  की हर संघी और शिद्दत पसंद हिन्दू झूट, फरेब को इतनी सख़्ती और अज़्म के साथ बोलता है हर बार बोलता है बार बार बोलता है फिर कुछ दिनों बाद वो झूट ही सच हो जाता है और सच कही दफ़न हो जाता है.  संघ की जो ट्रोल आर्मी है तभी सच जान कर तिलमिला उठती है और जिसने सच को ७ पाताल के नीचे से खोद के निकाला है उसका दुश्मन हो जाती है.  


इस सहाफी की जंग हिन्दू शिद्दत पसंदों, संघी दहशतगर्दों और बीजेपी के उन सियासतदानों से है जो इस्लाम के ख़िलाफ़ फरेब, झूट फैलातें हैं.  भारत के जमुहरियत पर दहशतगर्द हमला कर के हलाक करने वालों और इन्साफ के क़ातिलों के ख़िलाफ़ है.  और इस जंग में ये सहाफी किसी हद तक जीत हासिल करने में कामयाब हो रहा है जब ख़ुद हिन्दू मज़हब के आला ज़ात ब्राह्मण ऐसे संघी दहशत और शिद्दत पसंदों को माकूल जवाब दे रहें हैं जो, इस्लाम, क़ुरान और पैगम्बर के ख़िलाफ़ ग़लतबयानी, झूट और फरेब फैलातें हैं.  और अवाम अब सड़कों पर आ रहा है उस दहशत के ख़िलाफ़ जो जमुहरियत और इन्साफ का क़त्ल करतें हैं.  मुझे और क्या चाहिए अवाम जाग गया इस सहाफी का मक़सद पूरा हो गया.  

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