Monday, 23 December 2019

शहर और मुसलमानों पर ख़ाकी और ज़ाफ़रानी दहशत

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Khakee Terror on the houses of Muslims.

भारत में ज़ाफ़रानी दहशत के क़ब्ज़े वाले सूबों और इलाक़ों में मुसलमानों को चौ तरफ़ा सख़्त अज़ीयत और तकलीफ से गुज़रना पड़ रहा है.   मुसलमानों को पहली मार हिन्दू दहशतगर्दों की जानिब से झेलनी पड़ रही हैदूसरी ख़ाकी दहशत (पुलिस) की जानिब से रातों की तारीकी में उनके घरों, मस्जिदों और ज़ाराये तिजारत पर हमला रेज़ हो रहे हैंजब ये ख़ाकी दहशत किसी भी घर पर हमलरेज़ होती है तो रस्ते में आने वाली उन तमाम साजो सामान को तबाह और बर्बाद कर डालती है जो इनके हमले की राह की रूकावट बनती हैं.   तीसरी मार उन संघी और हिन्दू शिद्दत पसंद घुसपैठिओं की है जो मुस्लिम भेस में भीड़ में घूस कर हमला कर रहें हैंजिसकी वजह से मुसलमानों का नाम पुलिस और हुकूमत के रिकॉर्ड में खराब हो रहा हैचौथी मार मुसलमानों को किसी भी वक़्त  बाहरी तस्सव्वुर कर के क़ैद होने का.

यहाँ तक की ख़ाकी दहशतगर्द रातों की तारीकी में मस्जिदों के ऊपर हमलावर होते हुए सी.सी. टी वी कैमरे में क़ैद हुएशर्मनाक. इस तरीक़ेकार अमल के बाद इन अफ़राद को कौन है जो जुडिशल अथॉरिटी तस्लीम करेगा.

ऐसे  मज़हबी इमारतों और निजी जायदाद पर रातों की तारीकी में पोशीदा हमले कर के दहशत फ़ैलाने वालों को क्यों ना दहशतगर्द तस्लीम किया जाएक्योंकि इनका अमल जुडिशल अथॉरिटी के जैसा तो नहीं हैबल्कि अवाम में समाज में दहशत फ़ैलाने के जैसा है.   

जब किसी मुल्क के शहरी और ख़ास क़ौम पुलिस की क़त्ल, मजमूई क़त्ल, दंगे, ज़िना बिल जब्र, आतिश या  ग़ैर क़ानूनी हिरासत जैसी दहशत और अमल वा कारगरदेगी से ख़ौफ़ज़दा होना शुरू हो जाएँ तो उनको दहशतगर्द तस्लीम करने में को हर्ज नहीं हैक्योंकि अगर ख़ास तंज़ीम का रद्दो अमल अवाम को हिफाज़त फ़राहम करने के बजाये उनके अंदर दहशत भरने लगे तो वो दहशतगर्द होता है, अब ये तंज़ीम भलें ही पुलिस जैसी जुडिशल ऑथोरिटी ही क्यों ना होक्योंकि इन पुलिस वालों का अमल ग़ैर क़ानूनी है और अदालती निज़ाम की खिलाफवाज़ी करता हैमुसलमानों की इबादत गाह को नुक़सान पहुंचाने, मुसलमान के घर में एक डाकू के जैसे रात की तारीकी में घुसने और घर के सामन के साथ तोड़ फोड़ करने और तबाह करने के पीछे की हिकमत क्या हैघर में मौजूद खवातीनों के बीच दहशत फ़ैलाने की क्या वजह हो सकती है. फिर इस तरीक़े के तमाम अमल ग़ैर क़ानूनी हैं और ऐसे अमल ओमूमन दहशतगर्द करतें हैं ताके उस ख़ास क़ौम के दीगर अवाम के बीच दहशत फैलाई जा सकेइसी लिए इन ख़ाकी को जैसा इनका अमल है वैसा ही नाम दिया गया हैख़ाकी दहशतगर्दकिसी भी शख़्स का ओहदा एहम और फ़ोक़ियत नहीं रखता की वो किस ओहदे और कुर्सी पर फ़ाइज़ हैफ़ोक़ियत रखता है उसका किरदार और अमलऔर उसका आला ग़ैर जानिबदार अमल ही उसको इज़्ज़त दिलवाता है और ज़िल्लत भीअगर पुलिस में रह कर दहशतगर्दों की तरह अमल होगा तो तुमको नाम भी दहशतगर्द ही दिया जाएगा.

फिर पुलिस का इस तरीक़ेकार किरदार क़ाबिले फख्र होता अगरचे वो सभी के लिए एक जैसा होताया क़ानून की किताबों में पुलिस को इस तरह से बे गुनाह मस्तूरातों को मुत्तासिर करने और ख़ौफ़ज़दा कर के दहशत फैलाने की इजाज़त होती तो पुलिस का अमल क़ाबिले फख्र तस्लीम किया जातादूसरी बात क्या पुलिस का किरदार और अमल हर दंगों ऐसा ही रहता हैक्या पुलिस समाज के हर तपके और क़ौम के साथ दंगों में इसी तरीक़े की हिकमत इख्तियार करती है, अगर नहीं तो मुसलमानों के साथ ऐसा दहशत भरा किरदार क्योंऔर पुलिस किया चाहती है.

दंगों में पब्लिक और प्राइवेट प्रॉपर्टी को आतिशे नार संघी दहशतगर्दों ने और बीजेपी के रकूनों किया बोहोत सी जगह ऐसे अनासिर पकडे गए जो मुँह पर कपडा बांध कर अपनी पहचान पोशीदा रख कर मुस्लिम लिबास में दंगा फसाद कर रहे थेकई जगह पर पुलिस पत्थर बाज़ी और दहशत करती हुई देखी गईगाडिओं, मोटर साइकिलों में तोड़ फोड़ करना उनको आतिशे नार करना और गिरा देना पुलिस का अमल थाजबकि अभी तो "का" बिल वजूद में नहीं आया और ना ही एन.आर.सी. हुई है और ये आलम है की मुसलमानों का जीना दूभर कर दिया हैफिर वजूद में आने के बाद क्या हाल होगा सभी को मालूम है.   सिर्फ बिल की मुख़ालेफ़त ना हो और उसको वजूद में आने दिया जाए इसलिए लँगूरनिया और लंगूर मुस्लिम नुमाइंदों से मीठी मीठी बातें करतें हैंउनको मोदी के वादे का हवाला देतें हैं. अब तो आप खुश हैं और आपको किसी क़िस्म का शक वा शुबा तो नहीं है जब वज़ीरे अज़ाम ने खुद कह दिया की किसी भी क़ौम को कोई तकलीफ नहीं दी जायेगीएक भी मुसलमान के साथ ज़्यातती नहीं होगीअब तो आपका "का" के खिलाफ मुख़ालेफ़त नहीं है.

मेरा उन तमाम लँगूरनियों और लंगूरों को वाज़े अलफ़ाज़ में जवाब है.

नहीं हरगिज़ नहीं हमको मोदी जैसे झूठे और जालसाज़ पर ज़र्रा बराबर यक़ीन नहीं रहाहज सब्सिडी की किया हालत हैऔर क्या वादा  मुसलमानों से किया थाहज सब्सिडी की रक़म मुस्लिम माशरे में तालीम के ऊपर फ़रोग़ की जायेगीउस पैसे से बच्चे और बच्चिओं को तालीम दी जायेगीतालीम तो छोड़ दो जो तुलबा अपने बल बूते पर तालीम ले रहें हैं आपतो उनको ही मौत के घाट   उतार रहे होबच्चिओं पर शिद्दत कर रहे होउसके साथ लेडीज रूम में, लेडीज बैतूल खला में बदतमीज़ी कर रहे होबेहयाई कर रहे हो. आपका वादा था इस पैसे से मदरसों को जदीद किया जाएगाक्या हुआ कितने मदरसे जदीद हुएइतना सब होने के बाद भी झूठे शख्स को यक़ीन है की उसकी ज़ुबानी जमा ख़र्च से मुसलमान मुत्तासिर होंगे, और हम बिल की खिलाफत नहीं करेगेंचलिए जो कुछ भी मोदी ने कहा उसका क्या सबूत है? ऐवान में कहाँ ऐसा तहरीर किया हुआ है.

मोदी दंगा करने वालों और आगज़नी करने वालों को उनके कपड़ों से पहचान सकता हैफिर उसमे इतनी भी ज़हानत नहीं की उसके खुद के कारिंदे मुस्लिम पहनावा अपना कर आगज़नी कर रहें हैंऐसे अनासिर बीजेपी हुक्मरान सूबों में "का" के खिलाफ एहतेजाजी जुलूस में एक घुसपैठिये के जैसे दाख़िल हो जातें हैंजब जुलूस अपने ऊरूज पर पहुँचता है, हमदर्दी के नाम पर ऐसे संघी घुसपैठिये फसाद बरपा कर देतें हैंबीजेपी हुकूमत भी नाहेल और जाहिलों की तरह हिकमत इख़्तयार करती है और दंगा फसाद काबू में करने के बजाये गोली बारी करवा देती हैजिसकी वजह से हालात मज़ीद पेचीदा हो जातें हैंजब आग लगती है तो किस किस चीज़ को अपनी आगोश में लेती है कहा नहीं जा सकतालेकिन देखने वाली बात ये है की उस आग की जिन्गारी को सुलगाया किसने था वो कौन सा संघी गुस्पेठिया था जिसने पेट्रोल में जिनगारी दाल के रूह पौश हो गया.    

तमाम हालात को मद्दे नज़र रखते हुए ये नतीजा अखज़ किया जाता है की हर जुलूस में मुसलमान "काके मुख़ालेफ़त में दस्तूर के हिसाब से अपना पुर अमन एहतेजाज दर्ज करवा रहे थेऐसे जलसों और मजलिसों में कुछ शिद्दत पसंद हिन्दू और संघी गुस्पेठियों ने तमाम शरारत की जो नहीं चाहते थे की हुकूमत के खिलाफ  "का" बिल के मुख़ालेफ़त में कोई भी खड़ा रहे.

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