Friday, 6 December 2019

मुबारक फतह आप ही की हुई.

पहले क़ुव्वते गौरो फ़िक्र फ़ना होती है,  फिर किसी क़ौम की शौकत पे ज़वाल आता है.

अज़ीज़ाने मिल्लते इस्लामियाँ,

आज का इस सहाफी का मौज़ूं सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम तालीम साज़ों, दानिशमंदों, वुक्ला हज़रात, सयसतदाँ, सहाफियाने किराम और  उल्माए दीन से खिताब है.    

सहाफी का आज का मौज़ूं दो हिस्सों पर मुश्तमिल है एक हिस्सा है उस फतह की मुसर्रत का जो दिसम्बर को आलमे इस्लाम को हासिल हुई. और दूसरी उस जंग का जो आने वाली है.  

पहला बाब या हिस्सा.  

६ दिसम्बर का रोज़ इस रूहे ज़मीन पे मौजूद सिर्फ और सिर्फ हर सच्चे  मुसलमान के लिए सख़्त सदमे और ग़म से कम ना था.  इस सदमे में १९९२ से क़ब्ल सिर्फ दलित अवाम ही शामिल होता था क्योंकि उस रोज़ उनके अज़ीम रहनुमा और दस्तूर के वालिद बाबा साहब अमेडकर का योमे वफ़ात है.  लेकिन ६ दिसम्बर १९९२ के हिन्दू दहशतगर्द हमले के सबब हर सच्चा मुसलमान भी उस ग़म में शामिल होने लगा.  क्योंकि उस रोज़ हिन्दू दहशतगर्दों ने बाबरी मस्जिद और मुसलमानों की क़दीम इबादत गाह को जब्र और शिद्दत के ज़ोर पे शहीद कर दिया था.  इस दिन ना सिर्फ मुस्लिम इबादत गाह शहीद हुई बल्कि दस्तूर का भी क़त्ल हुआ. 

उस दिन के बाद ६ दिसम्बर को हर सच्चा मुसलमान सियाह दिन के जैसे बनाता था.  लेकिन आज ०६ दिसम्बर २०१९ को कमो बैश २७ साल की हिन्दू दहशतगर्दों की गुलामी से हर सच्चे मुसलमान को आज़ादी मिल गई और उन्होंने हिन्दू दहशत के ऊपर फतह हासिल कर ली.   दो रिवीव पेटिशन सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम अवाम की जानिब से दाख़िल की गई.  एक माननीय मुस्लिम सुप्रीम पर्सनेल लॉ बोर्ड की जानिब से और दोयम पीस पार्टी की जानिब से भारत के ज़ाफ़रानी दहशत के ज़ेरे क़यादत काम करने वाली अदलिया में दाख़िल की गई.   अब से  दिसम्बर योमे फतह जैसे बनाये मुस्लिम.

अब देखना ये दिलचस्प होगा की ज़ाफ़रानी दहशत के ज़ेरे क़यादत भारतीय अदलिया क़लम के बजाये शमशीर से  इन्साफ का क़त्ल करती है या क़लम और क़ानून की मदद से फरेबी, झूठे, जालसाज़ राम को फ़ासी. वैसे आम तोर पर ये देखा गया है की ज़ाफ़रानी सुप्रीम दहशत (सुप्रीम कोर्ट) इन्साफ देने में क़लम और दिमाग का इस्तेमाल कम करती है बरक्स तलवार से इन्साफ का क़त्ल करने में उसको ज़्यादा महारत हासिल हैउसकी दो वजह हैं एक इन्साफ की कुर्सी पे बैठे जज ज़ाफ़रानी दहशत के गलीज़ नुत्फे की पैदावार होतें हैंदूसरी उनके पास ज़हानत, अकलमंदी और तालीम कहाँ होती है जो फैसला वो कानून की दफा और इन्साफ के पैमाने पर देंगेवो तो एक जाहिल, मतिमंद तलवार बाज़ दहशत को फरोग देने वाले ऐसे इंसान की शक्ल में इन्साफ की कुर्सी पे बिठा दिया जाता है जिसको सिर्फ खून, क़त्ल और इंसानी लाशों को देखना पसंद होता हैऔर २०१४ के बाद हर वो जज जो इन्साफ का क़त्ल करता है वो जल्लाद साबित हो चूका है

दूसरा बाब या हिस्सा.


इस हिस्से में मुस्लिम दानिशमंदों, मौलानाओं की जमात को और मुस्लिम सियासतदांओं को ललकार है की उनको शर्म हया नहीं आती की पैगम्बर कुरान की अज़मत को कैसे पामाल किया जा रहा है और आप लोग जंग या जिहाद का फतवा काहे को नहीं दे रहें हैं.  किस चीज़ का इंतज़ार कर रहें हैं आप लोग.  

इसमें से जो खातून है उसका कुरान को अपने पैरों तले रोंदते हुए और नबी की अज़मत पामाल करने का वीडियो पुराना है.  लेकिन हैदराबाद के हादसे के बाद जो दो शख़्स हैं जिन्होंने रसूल की शान में गुस्ताखी की है वो तो एक दम नया है.  और कुछ २ या ३ दिसम्बर २०१९ के आस पास का होगा.  

ये सहाफी इस बात को समझने से क़ासिर है की हर जुर्म के पीछे की सोच इन दिमाग़ी मुफ़लिसों को इस्लाम, पैगम्बर और क़ुरान की ईजादकर्दा कैसे दिख जाती है.  ये हालात ऐसे नहीं रूकने वाले जब तक एक दो की ऐसी गुस्ताखी पर गर्दन क़लम नहीं की जाती तब तक ये लोग ऐसे ही गलतबयानी करते रहेंगे और झूट, फरेब को बढ़ावा देतें रहेंगे.  सच्ची बात पे कोई एतेराज़ नहीं अगरचे वो कड़वी ही क्यों ना हो लेकिन जो झूट लादा जाता है उसपे एतेराज़ है. 

जहाँ तक भारत में अदालत और क़ानून का सवाल है मुसलमानों को इन्साफ नहीं मिल रहा है उनके अपनों को ना हक़ अदालत और सदरे जमुहरिया की निगरानी में क़त्ल (शहीद) कर दिया जाता है.  मासूम याक़ूब, अफ़ज़ल और कसाब तारिख में दर्ज हो चुके हैं.  मुसलमानों पे सुप्रीम दहशत के क़ातिलाना हमले की बेहतरीन मिसाल बन गए हैं.  तो मज़हबी एतेराज़ कोई काहे को सुनेगा. 

इन हिन्दू दहशतगर्दों और शिद्दत पसंदों का झूट फरेब तो सुप्रीम कोर्ट के सामने ही बरहना हो गया जो बोल रहे थे की बाबरी मस्जिद राम का मंदिर तोड़ के बनाई गई है कोई भी हिन्दू इस बात को अदालत में साबित नहीं कर पाया.  तो ये लोग झूट और फरेब फ़ैलाने में कितने माहिर हैं इस बात का अंदाजा हो जाना चाहिए. 

दूसरी बात मासूम बच्चों की शादी बाल विवाह हिन्दू शक़ाफ़त (सभ्यता) है ना की मुस्लिम.  ना सिर्फ क़दीम हिन्दू बल्कि २०१९ के नए भारत में भी ये शक़ाफ़त राजिस्थान, हरयाणा, उत्तराखंड, जम्मू, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, ओर्रिसा, कर्नाटक में खूब फल फूल रही है और बाल विवाह ना सिर्फ किया जाता है, बल्कि हुकूमत के नुमाइंदे पुलिस और कलेक्टर के ज़ेरे क़ियादत सारा इंतज़ाम होता है. तो इस तरह की इलज़ाम तराशी पैग़म्बरे इस्लाम पे लगाना सख़्त मज़्ज़मत और गुस्ताख़ क़त्ल के फतवे का मुर्तक़िब है. 

में हर मुस्लिम सयसतदाँ से पूछना चाहता हूँ चाहे वो किसी भी जामत का हों किसी भी फ़िरक़े का हों लेकिन अगर उसके दिल में ज़र्रा बराबर नबी की इज़्ज़त और मोहब्बत है क़ुरान की अज़मत है तो ऐसे नियाहत ही वाहियात वीडियो देख कर उनका खून नहीं खोलता है. ऐसे बयानात पर गर्दन क़लम नहीं होती है तभी तो ऐसे लोगों की हौसला अफ़ज़ाई होती है.  ज़नख़ों की फौज तैयार कर के क्या हासिल कर लोगे आप लोग.  कम अदद रहो लेकिन शेर की तरह रहो की कोई भी आवाज़ करे तो चीर डालों.  अब और क्या बाक़ी बचा है जिसकी जुस्तजू और ख़्वाहिश बाक़ी है.  क़ानून से कोई मदद नहीं मिल रही, अदलिया दहशत के साये फैसले तुम्हारे ख़िलाफ़ दे रही है, संसद आपकी हक़तल्फ़ी कर रहा है. दस्तूर के हिसाब से आपको हक़ नहीं मिल रहा.  तो अब आखिर रास्ता बचा है.  जंगे शमशीर.  अब हथियार उठाने का वक़्त आ गया है.  क्योंकि आखिर उम्मीद अदलिया से थी, वो भी टूट गई.  अब तो अपने हिसाब से मसलों को हल करना ही पड़ेगा.  नहीं तो तुम्हारा वजूद खतरे में पड़ जाएगा.
 
ये सहाफी तो जिहाद फी सबी लिल्लाह कर ही रहा है अब आप लोगों की बारी है की जिहाद शमशीर यानि असले के साथ जंग का फ़तवा दें.  

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