अज़ीज़ नाज़रीन,
ज़ाफ़रानी हुक्मरानों को मुस्लिम नाम से तकलीफ और अज़ीयत है. ये ही वजह है की हुकूमत के हर क़ानून हर रद्दो अमल
मुस्लिम मुख़ालिफ़ होतें हैं. हाल ही में १५
दिसम्बर को जामियां मिलिया इस्लामिया में खाकी दहशत देखने को मिली थी. इस दहशतगर्द हमले में खाकी दहशतगर्दों ने सख़्त तरीन
बर्बरता दिखाई और तालिबे इल्मों और तुलबाओं के ऊपर शिद्दत पसंदी का मुज़ाहेरा किया था. जिसकी हर खित्ते हर महाज़ पर सख़्त मज़्ज़म्मत की गई
थी. उस हमले से एक रोज़ बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
के तुलबा ने वैसा ही एहतेजाज मुन्नाक़क़ीद किया था.
लेकिन यहाँ पर ज़ाफ़रानी साधू ने इंटरनेट मुन्तक़िल कर के तुलबा के ऊपर जो ख़ाकी
दहशत मचाई है वो रौंगटे खड़े कर देने वाली है.
हर हाल में ये पुलिस या क़ानून के मुहाफ़िज़ नहीं हो सकते. क्योंकि क़ानून का मुहाफ़िज़ या पुलिस तालिबे इल्म,
इंसान, पेशेवर मुजरिम और दहशतगर्दों में बा
खूबी फ़र्क़ समझ सकता है. एक अव्वल नंबर के शहरी
तालिबे इल्म को अदना दर्जे के मुजरिम दहशतगर्दों की तरह पीटना. फिर जिस अंदाज़ में ज़हरीले बोल तुलबा को बोले गए
"का.....ये" तुम जावो पाकिस्तान यहाँ पर हम तुमको मार डालेगें वग़ैरा वग़ैरा
उससे साफ़ ज़ाहिर होता है की ये शिद्दत करने वाले पुलिस या क़ानून के मुहाफ़िज़ नहीं बल्कि
हिन्दू दहशतगर्द थे.
तालिबे इल्मों को पूरी तरह बरहना कर के ज़मीन पर उल्टा लिटा के उनके पुश्त पर
कोड़े बरसाना ये इंसान नहीं बल्कि दहशतगर्दों का काम है. और हाँ अगर गुनाह इस दर्जे का हो की सजा भी वैसी
ही दी जाए तो अलहदा किस्सा है. एक तालिबे इल्म
अगर एहतेजाज कर रहा है अपने मुस्तक़बिल को तारीकी में देख कर हुकूमत से सवाल पूछ रहा
है की आप ज़ुल्म और शिद्दत बंद करो तो उसके वाजिब सवाल पर इतना मारना. ये इंसान के भेस में भेड़िये और शैतान हैं ये पुलिस
नहीं बल्कि हिन्दू दहशतगर्द संघ, बीजेपी और दिगार शिद्दत पसंद तंज़ीमों के नुमाइंदे
हैं. क्योंकि बोहोत से पुलिस वाले अमित शाह
और मोदी जैसे मुजरिमों, शैतानो और दहशतगर्दों के ऊपर नरम रहतें हैं. दूसरी बात अगर
तालिबे इल्मों का इश्तेआल हद दर्जे का बढ़ गया और हंगामा बरपा हो गया, फिर तुमने उनको
गलती से ज़्यादा हद दर्जे की सज़ा दे दी जो उनके किये हुए गुनाह से कई गुना ज़्यादा है. उससे आपने अपने दिल का गुबार, आलूद ज़हर, मवाद उनको
पीट पीट के निकाल दिया तो ना ज़ेबा कलमात फिरकावाराना बातें करना वो क्या है. गुस्सा
तो निकल गया. अब पकिस्तान जाओ, गोली मार देंगे,
जान से जावोगे, "का....वे". ऐसी ज़हरीली बातों की क्या वजह है और इसकी पूरी जांच होना
चाहिए.
जामियां मिलिया इस्लामियां में खाकी दहशतगर्द हमले के बाद से जो भी लाइव वीडियो
तुलबा और अवाम ने सोशल मीडिया को फ़राहम किये थे उससे ज़ाफ़रानी महाज़ की खासी ज़लालत और
रूसवाई हुई है. सही देखा जाए तो वो हमला ज़ाफ़रानी
हुकूमत और दहशतगर्दों की सोची समझी साजिश का नतीजा था. और इस हमले में दहशतगर्दों और ज़ाफ़रानी हुकूमत की
मिली भगत की भी ख़बरें हैं.
इस ज़लालत और रूसवाई से बचने के लिए ज़ाफ़रानी हुकूमत ने एक नई हिकमते अमली इख़्तेयार
की है. जब भी ते शुदा और मंसूबा बंदी कर के
दहशतगर्द हमला करना होता है तो उस खित्ते, इलाक़े और शहर का इंटरनेट मुनतक़ा कर दिया
जाता है.
जामियां मिलिया इस्लामियां में दहशतगर्द हमला करने के बाद अलीगढ़ में सोची समझी
साजिश के तहत हमला करना था, फिर वहां पर भी इंटरनेट मुनतक़ा कर दिया गया और फिर खाकी
दहशतगर्दों में मचाई है बर्बरता जिसके लाइव फुटेज किसी के पास नहीं हैं. सही देखा जाए तो ज़ाफ़रानी हुक्मरानों ने एक नई हिकमत
इख़्तेयार की है जिस शहर और खित्ते पर हमला करना होता है पहले उसके तमाम ज़ाराये राब्ता
मुनतक़ा कर दिया जाता है. अब आज राजिस्थान में
एक एहतेजाज से क़ब्ल इंटरनेट टेलीफोन और तमाम ज़ाराये राब्ता मुनतक़ा कर दिया गया है.
जामिया मिलिया इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का हमला सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अवाम के ऊपर ज़ाफ़रानी दहशतगर्द और हुकूमत
के ज़ेरे क़यादत दहशतगर्दी का ते शुदा साजिश का जीता जागता सबूत है. इस तरीकेकार हिकमत अमली पर अब मुस्लिम और सेक्युलर
अवाम को हुकूमत से राब्ता क़ायम करने के बजाए आलमी बरादरी के सामने मसले को रखना चाहिए. क्योंकि इस तरह के हमलो से क़ब्ल ज़ाफ़रानी हुकूमत
एक नई साजिश चलती है इंटरनेट, मोबाइल, टेलीफोन तमाम ज़ाराये राब्ता ससपेंड कर कर हमला
करवाती है. ऐसा करने के पीछे की मंशा और साजिश
क्या है. हुकूमत तो बताएगी नहीं बरक्स आलमी
दबाव आएगा तब बात साफ़ होगी.
इस तरीक़ेक़ार हमलों को ये सहाफी साजिश क्यों बोल रहा है उसकी बड़ी वजह है सिर्फ
और सिर्फ ज़ाफ़रानी हुकूमत में बड़े पैमाने पर आगज़नी और मुस्लिम जान का नुकसान हो रहा
है. अगर इंटरनेट और टेलीफोन बंद करने की हिकमत
को हुकूमत अफवाहों को गर्म ना होने और सूरते हाल को मज़ीद बिगड़ने ना दिए जाने की वजह
बताती है. तो ऐसी बातें बकवास और फरेबी हैं. क्योंकि अगर इंटरनेट ही तमाम झगडे और आगज़नी, अफवाहों
के बाजार को गर्म करने का ज़ारिया है तो दिगर ग़ैर ज़ाफ़रानी हुकूमतों में काहे को एहतेजाज
पुर अमन होते रहे. चाहे वो महाराष्ट्र हो तिलिंगाना,
केरला, आंध्र प्रदेश.
ऐसे हालात के पीछे सिर्फ और सिर्फ दो वजह हैं जो ये सहाफी समझ पाया है. एक या तो ज़ाफ़रानी हुकुमरान नाहेल और निक्कम्मे हैं
उनके अंदर हुकूमत करने का सही और दुरुस्त जज़्बा सलाहियत, तालीम और ज़हानत नहीं है या
ऐसे हमले जान बूझ कर पुलिस के ज़ारिये या ज़ाफ़रानी माहाज और संघ या कोई और हिन्दू तंज़ीम
के शिद्दत पसंदों के ज़रिये उकसा कर करवाए जा रहें हैं. इस सहाफी को तीसरी कोई और वजह समझ में नहीं आती
है.
No comments:
Post a Comment