ज़फर, आदमी उस को ना जानिएगा, वो हो कैसा ही
साहब ऐ फेहम ओ ज़का,
जिसे ऐश मैं याद ऐ ख़ुदा ना रही जिसे तैश मैं
ख़ौफ़े ख़ुदा ना रहा
अज़ीज़ नाज़रीन,
आज का मज़मून उस पाकीज़ा ज़ात, इश्क़े हक़ीक़ी और
ख़ौफ़े नूर पर मुश्तमिल है जिसके क़ब्ज़े कुदरत में मेरी जान है. नाज़रीन हुकूमते
हिन्द के ज़ेरे क़यादत काम करने वाली ज़ाफ़रानी निहायत आला अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और उसके तरीक़ेकार हिकमते अमली पर जब से इस सहाफी ने मिसाइल, बम, एक-४७ से मज़मूनी और तास्सुराती हमले तेज़ किये हैं ज़ाफ़रानी दहशत और हुकूमते हिन्द की इज़्ज़त और आबरू की भारी तबाही और बर्बादी से खलबली मची हुई है.
नाज़रीन इस सहाफी को हिन्द के अवाम बाग़ी,
हिन्द मुख़ालिफ़, ग़द्दार और ना जाने किन किन अल्क़ाब से नवाज़तें हैं. मुझे फ़ख़र है ऐसे अलक़ाबों से ये मेरे लिए ऐजाज़ है. मुझे ऐसे तमग़ों से कुछ फ़र्क़
नहीं पड़ता और ना ही इस बात से फ़र्क़ पढता है की अवाम मेरे बारे में क्या तास्सुरात और राये रखती है. दूसरी बात मुझे इस बात
की भी फ़िक्र और मलाल नहीं है की अवाम मुझसे नफरत करता है या मोहब्बत. क्योंकि
अगर मोहब्बत का पैमाना सामने वाले की जी हूज़ूरी करना है और अपना हक़ छोड़ देना है. वहीँ नफरत का पैमाना अपना
हक़ मांगना है तो मुझे अवाम की नफरत पसंद अपना हक़ छोड़ के सामने वाले की जी हूज़ूरी
करना और बजाये अपना हक़ तलब करने के उसके हक़ की बात करना पसंद नहीं है. फिर में किस बात के लिए ऐवान, अदलिया, हुकमत या उनके नुमाइंदों से मोहब्बत का दम भरूँ। मुस्लिम अवाम के लिए
क्या अमल सरकार की जानिब से अच्छा हुआ है जिसकी वजह से में सरकार, अदलिया से मोहब्बत
करूँ. एक बार नहीं बल्कि २०१४ के बाद और उससे पेश्तर (पहले) सुप्रीम कोर्ट के ज़्यादातर
फैसले मुत्तसिब और मुस्लिम अवाम के ख़िलाफ़ दिए गए हैं. जिससे अदलिया ख़ास आला तरीन
अदलिया की वक़त, वक़ार और इज़्ज़त कोड़ी भर की नहीं रही. जिस अदलिया पे अवाम ख़ास मुस्लिम
एतेमाद, यक़ीन करते थे और उसकी इज़्ज़त २०१४ के बाद इन तमाम सालों में पस्ती की जानिब
जाती रही और आज की तारीख़ में ये सहाफी अदलिया के लिए हद दर्जे की अदना और तौहीन
आमेज़ बदज़ुबान तहरीर करता है. उसकी वजह है. इज़्ज़त और ज़िल्लत इंसान
के अमल की होती है ना की इंसान की, ना ही उसके ओहदे की और ना ही सीमेंट
और ईटों से बनी इमारत सुप्रीम कोर्ट की. अदलिया के जैसे फैसले होंगें वैसे ही तास्सुरात
उसको मिलेंगे. अगर फैसले इन्साफ और हक़ पर मबनी होंगें तो तास्सुरात
इज़्ज़त फजाई वाले होंगें. और अगर ना इंसाफ़ी वाले होंगें तो तास्सुरात भी वैसे
ही आयेगें.
ये इस कायनात का और उस हक़ जलील का निज़ाम है. वैसे देखा जाए तो काबे की कोई अज़मत और वक़त नहीं है। काबा क्या है ईंट और मट्टी से बनी हुई एक इमारत या हुजरा. उसको मोअज़्ज़्म का हुजरा बोल दीजिये या बैतुल्लाह. लेकिन असल तो है ख़ुदा का ख़ौफ़ और इश्क़े हक़ीक़ी. वो ख़ौफ़ जो फरिश्तों पर तारी हुआ जब इब्लीस ने रब्बे क़दीर की ना फ़रमानी की और रब को जलाल आया. उस जलाल के ख़ौफ़ से तमाम फ़रिश्ते उस नूर के इर्द गिर्द तवाफ़ करने लगे. और उस रब्बे कायनात की मिन्नत करने लगे. फिर अल्लाह ने उस नूर को दुनिया में उसी जहाज माबूस फ़रमाया जहां आज काबा है.
ये इस कायनात का और उस हक़ जलील का निज़ाम है. वैसे देखा जाए तो काबे की कोई अज़मत और वक़त नहीं है। काबा क्या है ईंट और मट्टी से बनी हुई एक इमारत या हुजरा. उसको मोअज़्ज़्म का हुजरा बोल दीजिये या बैतुल्लाह. लेकिन असल तो है ख़ुदा का ख़ौफ़ और इश्क़े हक़ीक़ी. वो ख़ौफ़ जो फरिश्तों पर तारी हुआ जब इब्लीस ने रब्बे क़दीर की ना फ़रमानी की और रब को जलाल आया. उस जलाल के ख़ौफ़ से तमाम फ़रिश्ते उस नूर के इर्द गिर्द तवाफ़ करने लगे. और उस रब्बे कायनात की मिन्नत करने लगे. फिर अल्लाह ने उस नूर को दुनिया में उसी जहाज माबूस फ़रमाया जहां आज काबा है.
दूसरी बात काबे की कोई एहमियत नहीं है बल्कि
असल है हजरते इब्राहिम का अपने रब के लिए बे पनाह इश्क़, उस इश्क़ और दीवानगी
को देखते हुए उनको हुकूम हुआ की एक घर की तामीर करो. हज़रते इब्राहिम ने एक घर
बनाया और उसमे अल्लाह की हम्दो सना करने लगे. तो अल्लाह को वो घर इतना अज़ीज़ हुआ की
अल्लाह ने उसको अपना घर कहा. और सुबह क़यामत तक हर मोमिन पर ये लाज़िम कर दिया
की वो उस घर की ज़ियारत करे और उसी की तरफ मुँह कर के नमाज़ अदा करे. काबा
की तामीर से क़ब्ल मोमिन क़िब्ला ऐ अव्वल , बैतूल मुक्क़द्दस या मस्जिदे क़ुद्स
की जानिब मुँह कर के नमाज़ अदा करते थे. तो असल इश्क़ और अमल है.
अगर इश्क़ और अमल निकाल लिया जाए तो काबे की भी कोई एहमियत नहीं है वो तो ईंट
और मट्टी से बनी एक इमारत है. जैसे की आम इमारत होती है लेकिन उसमे हज़रते इब्राहिम
का इश्क़ शामिल हो गया और उनका ज़िक्र अज़कार फरिश्तों का तवाफ़ अमल के रूप में शामिल
हो गया तो वो मिटटी का घर भी अज़ीम हो गया. और हर मोमिन पे अब उसकी अज़मत लाज़िम
हो गई.
समझाने का मक़सद ये ही है की इंसान का अमल
बड़ी चीज़ होती है और वही उसको इज़्ज़त दिलवाता है और वही ज़िल्लत. बड़े आला ओहदे पर फ़ाइज़
होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन उस ओहदे की इज़्ज़त और लिहाज़ रखना वह बड़ी बात है.
इन्साफ की कुर्सी पर बैठ कर ना इंसाफ़ी करना
वैसा ही है जैसा की एक तवायफ ने अपने जिस्म का सौदा किया और अपने ख़रीददर के साथ
धोखा किया. ऐसी सूरत में अदलिया के लिए अगर ये सहाफी अदना दर्जे की तहरीर करता
है या हद दर्जे की पस्त बदकलामी करता है तो कोई हर्ज नहीं है क्योंकि आजकल हुकूमते
हिन्द में अदलिया हो या ऐवान सभी तवायफ का ऐसा कोठा बन चूकें हैं जो इन्साफ की
कुर्सी पर तो फ़ाइज़ हैं लेकिन मुस्लिम अवाम के साथ धोखा कर रहे हैं.
आज पाकिस्तान का कानूनी निज़ाम और अदलिया हूकूमते हिन्द से हज़ार गुना अफ़ज़ल हैं. ये बात कई बार साबित हो गई. जिन मौलाना हाफ़िज़ साहब, मौलाना अज़हर मसूद, ज़की उर रेहमान पर हिन्दू ज़ाफ़रानी दहशत ने झूठे सच्चे इलज़ाम लगाए थे वो अदलिया में ग़लत साबित हुए. वहीँ भारत में बाबरी मस्जिद में ये साबित हो नहीं पाया की मंदिर को तोड़ के मस्जिद बनवाई गई थी फिर भी वो हिन्दू दहशतगर्दों के हवाले कर दी गई. तभी पाकिस्तान, हुकूमते पाकिस्तान, अवामें पाकिस्तान, निशाने पाकिस्तान, निज़ामे पाकिस्तान की ताईद और इज़्ज़त करता हूँ.
वहीँ भारत की अदलिया और ऐवान जो हैं वही कहूंगा रंडी का कोठा.
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